दशकों तक इस देश की सेक्युलर सरकारों ने, मीडिया ने और टीवी-रेडियो वालों ने हमारे दिमाग में एक ही गाना बजाया- “हम दो, हमारे दो” या “छोटा परिवार, सुखी परिवार।”
इस देश का जो सीधा-सादा, टैक्स भरने वाला और कानून को मानने वाला आम हिंदू था, वो इस सेक्युलर जाल में पूरी तरह से फंस गया। हमने सोचा की भाई, देश की तरक्की के लिए ये ज़रूरी है। हमने बच्चे कम पैदा किए ताकि हम उन्हें अच्छी पढ़ाई दे सकें, अच्छा करियर दे सकें और देश के संसाधनों पर बोझ ना बनें।
लेकिन ज़रा आंखें खोलकर देखिए की उस तरफ क्या हो रहा था! जिस वक्त हम हिंदू ‘हम दो हमारे दो’ का पालन कर रहे थे, ठीक उसी वक्त इस देश का वो जिहादी और कट्टरपंथी तबका हमारे इस ‘बड़प्पन’ पर हंस रहा था।
उनके लिए ‘हम दो हमारे दो’ कोई राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी नहीं थी, बल्कि उनके लिए ये एक सुनहरा मौका था। मुल्लों और मौलवियों ने मदरसों से बाकायदा फतवे निकालने शुरू कर दिए की “ये काफिर बच्चे कम कर रहे हैं, तुम बच्चे ज़्यादा पैदा करो।”
ये कोई अनपढ़ता या गरीबी का नतीजा नहीं है भाई! ये एक बहुत ही वेल-प्लांड ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ है। इनका एजेंडा एकदम शीशे की तरह साफ है- संविधान और लोकतंत्र हमेशा नंबरों के खेल पर चलता है।
अगर तुम्हारी आबादी ज़्यादा है, तो तुम सरकारें बनाओगे, तुम अपने हिसाब से कानून पास करवाओगे और पूरे देश पर अपना शरिया थोप दोगे। एक हिंदू आदमी एक पत्नी के साथ पूरी ज़िंदगी गुज़ारता है और एक या दो बच्चे पैदा करता है। और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ चार-चार बीवियां लाई जा रही हैं और एक-एक आदमी 10 से 12 बच्चे पैदा कर रहा है।
अरे, ये बच्चे नहीं पैदा कर रहे, ये गज़वा-ए-हिंद की वो फौज तैयार कर रहे हैं जो आने वाले 20-30 सालों में हमारे बच्चों को उनके ही देश में अल्पसंख्यक बनाकर सड़क पर ला खड़ा करेगी।
अगर आज भी हिंदू समाज इस भयानक साज़िश को नहीं समझा, तो यकीन मानिए, वो दिन दूर नहीं जब हम अपने ही मोहल्लों में दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर जिएंगे और हमारे हाथ में कटोरा होगा।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की वो डरावनी रिपोर्ट, घटते हिन्दू और रॉकेट की तरह बढ़ती जिहादी आबादी
अगर किसी लिबरल कीड़े को लग रहा है की मैं ये सब हवा में बोल रहा हूं, तो अभी पिछले साल ही प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की जो रिपोर्ट आई है, ज़रा उसे उठाकर उसके मुंह पर मारिए। इस रिपोर्ट ने उन वामपंथियों और मानवाधिकार वालों के मुंह पर ऐसा तमाचा मारा है की इनकी बोलती बंद हो गई है।
रिपोर्ट बता रही है की 1950 से लेकर अब तक भारत में हिंदुओं की आबादी के शेयर में करीब 8 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है। हां भाई, 8 प्रतिशत! और उसी दौरान इस देश में मुसलमानों की आबादी में 43 प्रतिशत से ज़्यादा का भयंकर और खौफनाक उछाल आया है। ये कोई कुदरती विकास है क्या? ये सीधा-सीधा एक डेमोग्राफिक कब्ज़ा है।
ज़रा हमारे पड़ोसी देशों की तरफ नज़र घुमाइए। 1947 में जब देश का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था, तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में अच्छी-खासी हिंदू आबादी थी।
आज वहां हिंदू कहां हैं? उन्हें काट दिया गया, उनकी बहन-बेटियों का रेप करके उन्हें जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया। वहां हिंदू लगभग खत्म हो चुका है। वहां के जिहादियों ने अल्पसंख्यक नाम की चीज़ ही मिटा कर रख दी।
और एक हमारा ये महान सेक्युलर भारत है! यहाँ जो शांति दूत 1947 में मुट्ठी भर थे, वो आज 20-25 करोड़ के पार पहुंच चुके हैं। इनकी आबादी रॉकेट की स्पीड से बढ़ रही है और फिर भी ये बड़े बेशर्म होकर खुद को ‘अल्पसंख्यक’ बताते हैं और अल्पसंख्यक मंत्रालय की सारी मलाई डकार जाते हैं।
दुनिया के किसी भी देश में 20 करोड़ की आबादी अल्पसंख्यक नहीं होती भाई, वो दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक वर्ग होता है। लेकिन वामपंथी इकोसिस्टम ने ऐसा नैरेटिव सेट कर रखा है की अगर तुम इस बढ़ती हुई जिहादी आबादी पर सवाल उठाओगे, तो तुम्हें इस्लाम-विरोधी घोषित कर दिया जाएगा।
ये रिपोर्ट इस बात का साक्षात प्रमाण है की भारत के असली मूल निवासी (हिंदू) अपने ही देश में धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं और जिहादी दीमक इस देश को अंदर से खोखला कर रही है।
टैक्स भरे हमारा आम हिन्दू और मुफ्त का राशन डकारें ये चार बीवी वाले, देश के संसाधनों पर चल रहा खौफनाक कब्ज़ा
अब ज़रा इस डेमोग्राफी के खेल का वो आर्थिक सच देखिए जो हमारे और आपके घर के बजट को तबाह कर रहा है। सबसे बड़ा दर्द तो तब होता है जब एक आम हिंदू सुबह 7 बजे उठकर ऑफिस जाता है, गधे की तरह पसीना बहाता है और ईमानदारी से टैक्स भरता है।
हम अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इनकम टैक्स, जीएसटी (GST), टोल टैक्स और ना जाने किन-किन टैक्सों के रूप में सरकार को दे देते हैं। उसी मिडिल क्लास हिंदू का अपने एक या दो बच्चों की स्कूल की फीस और ईएमआई (EMI) भरने में दम निकल जाता है।
लेकिन हमारे खून-पसीने से भरे गए इस टैक्स के पैसे से ऐश कौन कर रहा है? वो चार बीवी और 10 बच्चे पैदा करने वाला मुल्ला! इस देश के संसाधनों पर एक खौफनाक डाका डाला जा रहा है।
सरकारें वोटबैंक के लालच में मुफ्त का राशन बांट रही हैं, मुफ्त का इलाज दे रही हैं, सरकारी स्कूलों में मुफ्त पढ़ाई और स्कॉलरशिप बांट रही हैं। और इसका सबसे ज़्यादा फायदा कौन उठा रहा है? वो जो बिना किसी प्लानिंग के, बिना किसी इनकम के दर्जन भर बच्चे पैदा करके सड़क पर छोड़ देते हैं।
अरे भाई, ये कोई चैरिटी नहीं चल रही है, ये सीधे-सीधे हम हिंदुओं पर लगाया गया एक ‘जज़िया टैक्स’ है। तुम बच्चे पैदा करने की मशीन बने हुए हो और तुम्हारे बच्चों को पालने का ठेका हमारे टैक्स के पैसों ने ले रखा है?
ये कहां का इंसाफ है! जब तुम बच्चे पैदा करते हो, तो अल्लाह की देन बताते हो, और जब उनके पेट में अनाज डालना होता है तो सरकार और टैक्सपेयर के टुकड़ों पर पलते हो।
हमारे देश के अस्पताल भरे पड़े हैं, ट्रेनें भरी पड़ी हैं, रोज़गार खत्म हो रहे हैं। क्यों? क्योंकि संसाधनों की एक लिमिट होती है। एक तरफ हिंदू अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए अपना पेट काट रहा है, और दूसरी तरफ ये घुसपैठिए और कट्टरपंथी हर सरकारी सुविधा को मुफ्त में डकार रहे हैं।
ये मुफ्तखोर इकोसिस्टम हमारे हकों को निगल रहा है। हम अपना खून जलाकर इन डेमोग्राफी बदलने वालों की फौज आखिर कब तक पालेंगे?
बॉर्डर के जिलों से लेकर केरल तक मिनी पाकिस्तान का निर्माण, बच्चे पैदा करना कोई मज़हब नहीं बल्कि गज़वा ए हिन्द का हथियार है
अगर आपको इस बढ़ती हुई जिहादी आबादी का असली और खौफनाक रूप देखना है, तो ज़रा अपने शहरों के कमरों से बाहर निकलिए और देश के बॉर्डर वाले जिलों का दौरा कीजिए।
बंगाल का मुर्शिदाबाद, मालदा और नॉर्थ 24 परगना, बिहार का सीमांचल (किशनगंज, अररिया), असम का धुबरी-गोलपारा, उत्तर प्रदेश के बॉर्डर वाले जिले और नीचे दक्षिण में केरल का मलप्पुरम।
ज़मीन पर जाकर देखिए, हालात इतने खौफनाक हैं की आपको लगेगा ही नहीं की आप भारत में खड़े हैं। वहां दूर-दूर तक आपको सिर्फ एक ही समुदाय की भीड़, बुर्के और लंबी दाढ़ियां नज़र आएंगी।
जिन जिलों में आज से 30-40 साल पहले हिंदू बहुसंख्यक हुआ करता था, आज वहां हिंदू 20 प्रतिशत या 10 प्रतिशत से भी नीचे आ चुका है। वहां के हिंदुओं को डर के मारे अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ा है, ठीक वैसे ही जैसे 1990 में कश्मीरी पंडितों ने किया था।
इन कट्टरपंथियों का एक फिक्स पैटर्न है। जब तक ये किसी इलाके में 10 से 15 प्रतिशत होते हैं, तब तक ये बहुत ‘शांति’ और ‘भाईचारे’ की बात करते हैं। लेकिन जैसे ही बच्चे पैदा कर-करके और घुसपैठियों को बसा-बसाकर इनकी आबादी 30 प्रतिशत का आंकड़ा पार करती है, वैसे ही इनकी असलियत बाहर आ जाती है।
फिर सबसे पहले उसी इलाके में हमारी रामनवमी और हनुमान जयंती की शोभा यात्राओं पर छतों से पत्थर और पेट्रोल बम बरसने शुरू होते हैं। फिर वहां के मंदिरों में गोमांस फेंका जाने लगता है और हमारी बहन-बेटियों को लव जिहाद का शिकार बनाया जाता है।
जब ये 50 प्रतिशत के पार हो जाते हैं, तो ये खुलेआम भारत के संविधान को मानने से इंकार कर देते हैं और शरिया कानून की मांग करने लगते हैं। ये जो बच्चे पैदा करने की अंधी रेस चल रही है ना, ये कोई मज़हब की बात नहीं है भाई!
ये सीधे तौर पर ‘गज़वा-ए-हिंद’ को ज़मीन पर उतारने का सबसे सस्ता और सबसे खतरनाक हथियार है। इन्हें बंदूकें या बम उठाने की ज़रूरत ही नहीं है।
ये तो बस अपनी औरतों को बच्चा पैदा करने की मशीन बनाकर, एक साइलेंट वॉर के ज़रिए पूरे भारत को बिना खून बहाए जीत लेना चाहते हैं। और अगर हम आज भी नहीं जागे, तो कल हमारे पास ना तो ज़मीन बचेगी और ना ही भागने का कोई रास्ता।
लिबरल इकोसिस्टम का वो सफेद झूठ जो कहता है की जिहादियों की जन्मदर TFR घट रही है
अब ज़रा उन पत्रकारों और वामपंथी इकोसिस्टम के उस सबसे बड़े फ्रॉड पर बात करते हैं, जिसे ये लोग रोज़ टीवी पर बैठकर एक मीठी गोली की तरह हमें खिलाने की कोशिश करते हैं।
जब भी कोई सच्चा हिंदू देश की बदलती डेमोग्राफी और इस जिहादी आबादी के खतरे पर सवाल उठाता है, तो ये अर्बन नक्सल और जेएनयू छाप पत्रकार तुरंत अपना ‘ज्ञान’ बांचने आ जाते हैं। ये चिल्लाते हैं की “अरे डरो मत! मुसलमानों का टीएफआर (TFR – Total Fertility Rate) यानी जन्मदर अब घट रही है। हिंदू खतरे में नहीं है।”
वाह रे वामपंथी गद्दारों! तुम्हारी इस बाज़ीगरी और आंकड़ों के खेल को अब देश का आम हिंदू बहुत अच्छी तरह से समझने लगा है। ज़रा इस ‘घटती दर’ का सच तो सुनिए। ये कहते हैं की दर 4 से गिरकर 3 या 2.5 के करीब आ गई है।
अरे बेशर्मों, भले ही वो दर गिरी हो, लेकिन वो आज भी हिंदुओं की जन्मदर (जो 1.6 से 1.9 के बीच है) से बहुत ज़्यादा है!
और सबसे बड़ी बात है ‘बेस पॉपुलेशन’। जब तुम्हारी आबादी पहले से ही 20-25 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है, तो उस पर अगर दर थोड़ी सी भी ज़्यादा हुई, तो वो हर साल लाखों-करोड़ों की ऐसी जिहादी सुनामी लेकर आएगी जो पूरे देश को निगल जाएगी।
एक हिंदू परिवार में माता-पिता के जाने के बाद उनकी जगह लेने के लिए पीछे सिर्फ एक या दो बच्चे बचते हैं। मतलब हिंदू आबादी हर पीढ़ी के साथ सिकुड़ रही है। लेकिन दूसरी तरफ? वहां आज भी 4-4 बच्चे पैदा करना आम बात है।
जो समुदाय आज की तारीख में भारत की सड़कों से लेकर संसद तक अपनी भीड़ का खौफ दिखाता है, जो पुलिस पर पत्थर बरसाता है, उसे किस बेशर्मी से आज भी ‘अल्पसंख्यक’ का टैग दिया हुआ है?
ये कैसा अल्पसंख्यक है भाई जो हर शहर के मोहल्लों में अपनी अलग शरिया अदालतें चला रहा है? ये वामपंथी इकोसिस्टम इस डेमोग्राफिक आक्रमण को ‘नैचुरल ग्रोथ’ कहकर हमारे बच्चों के भविष्य में ज़हर घोल रहा है। इनकी इस बकवास को अब जूते की नोक पर रखने का वक्त आ गया है।
चुनाव लड़ने से लेकर सरकारी सुविधाओं तक सब छीनो, दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों पर चले सरकारी चाबुक
अब सवाल ये उठता है की इस बीमारी का इलाज क्या है? क्या हमें कोई और जागरूकता अभियान चाहिए? क्या हमें दीवारों पर “छोटा परिवार, सुखी परिवार” के पोस्टर चिपकाने चाहिए? बिल्कुल नहीं! बहुत हो गई ये सेक्युलर नौटंकी।
जिनको समझना था वो दशकों पहले समझ चुके हैं, और जिन्होंने मज़हब की अफीम खा रखी है, वो किसी पोस्टर या टीवी विज्ञापन से नहीं सुधरने वाले।
इस जिहादी डेमोग्राफी को रोकने के लिए अब हमें कोई अपील या विनती नहीं करनी है, हमें चाहिए एक बेहद क्रूर, कड़क और निर्दयी ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’।
एक ऐसा कानून जिसका चाबुक सीधे इन इस्लामिक कट्टरपंथियों की दुखती रग पर जाकर पड़े। जो भी इंसान (चाहे वो किसी भी मज़हब का हो) दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करे, सरकार को रातों-रात उसके सारे सरकारी हक़ छीन लेने चाहिए। कोई रहम नहीं, कोई मानवाधिकार का रोना नहीं।
कानून का ड्राफ्ट एकदम साफ होना चाहिए। तीसरे बच्चे के पैदा होते ही सबसे पहले उस परिवार का राशन कार्ड रद्द किया जाए। हम टैक्सपेयर अपने खून-पसीने की कमाई से इन मुफ्तखोरों और इनके दर्जन भर बच्चों का पेट नहीं पालेंगे। उनके बच्चों को किसी भी सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज न मिले, वो किसी भी सरकारी योजना का लाभ न उठा सकें।
और सबसे बड़ा और सबसे मारक प्रहार जो इस कानून में होना चाहिए, वो है- ‘वोटिंग राइट्स’ और चुनाव लड़ने पर परमानेंट बैन! जो भी दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करे, उसका वोटर आईडी कार्ड तुरंत कैंसल कर दिया जाए। और उसे ना तो प्रधान का चुनाव लड़ने दिया जाए, ना विधायक-सांसद का और ना ही सरकारी नौकरी दी जाए।
ज़रा सोचिए, जिस दिन इन भीड़ बढ़ाने वाले मुसलमानों का वोट डालने का हक़ छिनेगा, उसी दिन ये सारी तथाकथित ‘सेक्युलर पार्टियां’ इनके तलवे चाटना बंद कर देंगी।
क्योंकि इन गद्दार नेताओं को इनके मज़हब से प्यार नहीं है, इन्हें सिर्फ इनके थोक के वोटों से प्यार है। वोट का अधिकार छिनते ही ये पूरा का पूरा तुष्टिकरण का इकोसिस्टम रातों-रात ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
मानसून सत्र में देश को चाहिए सबसे कड़क जनसंख्या नियंत्रण कानून
हम आज चांद और सूरज तक पहुंच रहे हैं। देश में रोज़ नए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, बुलेट ट्रेनें आ रही हैं, हमारी इकॉनमी दुनिया में डंका बजा रही है। लेकिन ज़रा एक मिनट के लिए रुक कर सोचिए भाई!
अगर 20-30 साल बाद इस देश का हिंदू ही नहीं बचेगा, अगर यहाँ की डेमोग्राफी पूरी तरह से इस्लामिक हो जाएगी, तो इन चमचमाते हाईवेज और एयरपोर्ट्स का हम क्या करेंगे? क्या हम इन बुलेट ट्रेनों में बैठकर भागने की तैयारी करेंगे?
विकास और जीडीपी (GDP) अपनी जगह है, लेकिन अस्तित्व की रक्षा सबसे ऊपर है। कश्मीर में भी बहुत विकास हो रहा था, लेकिन जब 1990 में वहां मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर ऐलान हुआ की “हिंदुओं यहां से भाग जाओ”, तो वो सारा विकास धरा का धरा रह गया।
अगर जनसांख्यिकी बदल गई, तो तुम्हारा कोई संविधान, कोई सुप्रीम कोर्ट और कोई पुलिस तुम्हें नहीं बचा पाएगी। इसलिए अब केंद्र सरकार को अपनी ‘इंटरनेशनल इमेज’ और विदेशी मीडिया की परवाह करना छोड़ना होगा।
जुलाई में मानसून सत्र आने वाला है। देश के करोड़ों सनातनियों की आज सिर्फ एक ही मांग है- हमें समान नागरिक संहिता (UCC) और सबसे कड़क ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ एक साथ चाहिए। UCC के ज़रिए बहुविवाह यानी चार शादियां करने पर ऐसा बैन लगे की कोई जिहादी दूसरी शादी करने की सोचे तो सीधे जेल जाए।
और जनसंख्या नियंत्रण कानून के ज़रिए इस आबादी के टाइम-बम को हमेशा के लिए डिफ्यूज़ किया जाए। ये दोनों कानून एक साथ आएंगे, तभी इस गज़वा-ए-हिंद की कमर टूटेगी।
संसद में बैठे हमारे हिंदूवादी नेताओं को ये बात बिल्कुल डंके की चोट पर समझ लेनी चाहिए की भारत का हिंदू अब किसी ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाले धोखे में नहीं जीने वाला। जो सरकार हमारे अस्तित्व को बचाने के लिए ये जनसंख्या नियंत्रण कानून लाएगी, अब हिंदू सिर्फ और सिर्फ उसी को अपना वोट देगा।
अब ये कोई साधारण राजनीतिक मांग नहीं है, ये हमारी नस्लों को बचाने का अंतिम धर्मयुद्ध है। या तो मानसून सत्र में इस बिल का शंखनाद होगा, या फिर ये देश उसी खौफनाक आग में जलकर राख हो जाएगा जो आग इन जिहादियों ने हमारे लिए दशकों से लगा रखी है।
जागो हिंदू जागो! अब आर-पार की लड़ाई का वक्त आ गया है।
जय श्री राम! भारत माता की जय!
