जिस ‘तैमूर’ के नाम से कांपती थी दुनिया उसे हिन्दू शेरनी ‘रामप्यारी गुर्जर’ ने चटाई धूल, जब 40 हज़ार हिन्दू औरतों ने तलवारों से काटकर पहुंचाया तैमूर के जिहादियों को जहन्नुम

सच कहूं तो जब बॉलीवुड का कोई घमंडी हीरो अपने बेटे का नाम बड़े फक्र से ‘तैमूर’ रखता है, तो उसे चप्पलों से मारने का मन करता है। इन बौलीवुडियों ने  हमारे दिमाग में ये भर दिया है की तैमूर लंग एक बहुत बड़ा विश्वविजेता था, जिसके नाम से पूरी दुनिया कांपती थी। 

लेकिन इन्होंने कभी ये नहीं बताया की उसी तैमूर लंग को भारत की 40 हज़ार हिन्दू औरतों ने ऐसा काटा था की वो अपनी जान की भीख मांगते हुए कुत्ते की तरह दुम दबाकर भारत से भागा था।

आज मैं इतिहास की वो खौफनाक और खून से सनी फाइल खोलने जा रहा हूं, जिसे पढ़कर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।

बात साल 1398 की है। मध्य एशिया के समरकंद से एक खूंखार, लंगड़ा और ज़ालिम जिहादी दरिंदा भारत की तरफ बढ़ा था। उसका नाम था तैमूर लंग। वो एक जीता-जागता पिशाच था। उसका एक ही मकसद था- हिन्दुस्तान के काफिरों (हिन्दुओं) का कत्लेआम करना और इस सनातन भूमि को इस्लामी देश में बदल देना। 

जब तैमूर लंग अपनी विशाल जिहादी फौज लेकर दिल्ली में घुसा, तो उस दरिंदे ने दिल्ली में एक ही दिन में एक लाख से ज़्यादा बेगुनाह हिन्दुओं का कत्लेआम कर दिया था। सड़कों पर खून की नदियां बह रही थीं।

उस जल्लाद ने आदेश दिया था की हिन्दुओं के कटे हुए सिरों का एक पहाड़ बनाया जाए ताकि पूरे हिन्दुस्तान में खौफ बैठ जाए। हमारी माताओं और बहनों को जानवरों की तरह गुलाम बाज़ारों में नीलाम करने के लिए बंदी बना लिया गया। दिल्ली का वो कायर तुगलक सुल्तान तो तैमूर के खौफ से दुम दबाकर भाग गया था।

दिल्ली को श्मशान और राख के ढेर में बदलने के बाद, तैमूर की उस खूनी और जिहादी आंख ने हमारे सबसे पवित्र तीर्थ ‘हरिद्वार’ की तरफ देखा। तैमूर ने अपने कमांडरों को फरमान सुनाया की “अब हम हरिद्वार जाएंगे। वहां के सारे मंदिरों को मिट्टी में मिलाएंगे, पुजारियों के गले काटेंगे और गंगा के पवित्र घाटों पर इस्लाम का झंडा गाड़ेंगे।” 

उसे लगा की जब दिल्ली का सुल्तान भाग गया, तो इन निहत्थे हिन्दुओं में क्या दम है जो उसे रोक लेंगे। लेकिन उस लंगड़े दरिंदे को ये नहीं पता था की वो जिस आग में हाथ डालने जा रहा है, वो आग उसकी पूरी जिहादी फौज को जलाकर भस्म करने वाली थी।

जिहादी तैमूर से हरिद्वार की रक्षा के लिए साक्षात दुर्गा बन गई 20 साल की रामप्यारी गुर्जर, 40 हज़ार हिन्दू औरतों ने हाथों में उठा ली तलवारें

जब तैमूर के हरिद्वार कूच करने की खबर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के गांवों में पहुंची, तो वहां के हिन्दुओं ने कायरों की तरह भागने या छुपने का फैसला नहीं किया।

हमारे पूर्वज डरपोक नहीं थे भाई! जब दिल्ली की सत्ता ने हिन्दुओं को मरने के लिए छोड़ दिया, तब हमारे खाप नेताओं ने और गांव के चौधरियों ने अपने दम पर इस जिहादी आंधी को रोकने का बीड़ा उठाया।

मेरठ, सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर और हरियाणा के तमाम खाप नेताओं ने मिलकर एक ‘सर्वखाप महापंचायत’ बुलाई। इस महापंचायत में ऐलान किया गया की अब हम सुल्तानों के भरोसे नहीं बैठेंगे।

रातों-रात 1 लाख 20 हज़ार हिन्दुओं की एक खूंखार और निजी फौज तैयार कर ली गई। हर घर से एक जवान ने अपनी तलवार उठाई। और इस विशाल हिन्दू सेना का ‘सुप्रीम कमांडर’ (सेनापति) महाबली जोगराज सिंह गुर्जर को चुना गया!

जोगराज सिंह गुर्जर का कद 7 फीट 9 इंच था और उनका वज़न करीब 320 किलो था। जोगराज सिंह ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया की “तैमूर अगर हरिद्वार तक पहुंच गया, तो ये हमारे लिए डूब मरने की बात होगी। हम हरिद्वार से पहले ही उस जिहादी को बीच रास्ते में घेरेंगे और उसकी सेना को को काट डालेंगे।”

जब जोगराज सिंह गुर्जर ने युद्ध की तैयारी शुरू की, तो उन्होंने ऐलान किया की सभी औरतों, बच्चों और बूढ़ों को सुरक्षित स्थानों पर या जंगलों में भेज दिया जाए ताकि तैमूर के जिहादी उन पर हमला ना कर सकें।

लेकिन इसी बीच सहारनपुर के एक चौहान गुर्जर परिवार से एक ऐसी शेरनी उठी, जिसने इतिहास के पन्नों में अपने खून से वो इबारत लिख दी जिसे आज तक कोई नहीं मिटा पाया। उस शेरनी का नाम था- रामप्यारी गुर्जर!

रामप्यारी की उम्र उस वक्त मुश्किल से 20 साल रही होगी। वो बचपन से ही बाकी लड़कियों से अलग थीं। जब लड़कियां गुड़ियों से खेलती थीं, तो रामप्यारी लड़कों के कपड़े पहनकर छुप-छुप कर तलवारबाज़ी, कुश्ती और भाला चलाना सीखती थीं।

जब जोगराज सिंह ने औरतों को पीछे हटने को कहा, तो रामप्यारी गुर्जर सीधे महापंचायत में पहुंच गईं। उनकी आंखों में ज्वालामुखी धधक रहा था।

उन्होंने भरी पंचायत में दहाड़ते हुए कहा की “सनातन धर्म और अपनी इज़्ज़त की रक्षा करना सिर्फ मर्दों का ठेका नहीं है! अगर हमारे आदमी कट गए, तो क्या हम उन जिहादियों की गुलाम बनेंगी? बिल्कुल नहीं! हम भी रणभूमि में उतरेंगी और तैमूर की छाती फाड़ेंगी।”

रामप्यारी का वो रौद्र रूप देखकर जोगराज सिंह गुर्जर भी दंग रह गए। उन्होंने तुरंत रामप्यारी गुर्जर को हिन्दू सेना की ‘महिला विंग’ का सुप्रीम कमांडर बना दिया।

और उसके बाद जो हुआ, वो दुनिया के किसी इतिहास में नहीं मिलेगा। रामप्यारी गुर्जर ने गांव-गांव जाकर, घर-घर जाकर अपनी हिन्दू माताओं और बहनों को जगाया। उन्होंने कहा की चूड़ियां उतारो और तलवारें उठाओ।

देखते ही देखते 40 हज़ार हिन्दू औरतों की एक खौफनाक और अजेय फौज खड़ी हो गई। इन औरतों ने अपने बच्चों को पीठ पर बांधा, हाथों में तलवारें, गड़ासे, भाले और हंसिए लिए। ये वो वीरांगनाएं थीं जिन्होंने कसम खा ली थी की जिहादी उनके शरीर को छू भी नहीं पाएंगे, वो सीधा उन दरिंदों के गले काटेंगी। 

रामप्यारी गुर्जर की 40 हज़ार शेरनियों ने साक्षात महाकाली का रूप धारण कर लिया था। तैमूर को लगता था की भारत की औरतें कमज़ोर हैं, लेकिन उसे नहीं पता था की वो 40 हज़ार रणचंडियों के मौत के जाल में फंसने वाला है।

रात के अंधेरे में जिहादियों का हुआ महा विनाश, रामप्यारी की शेरनियों ने तैमूर की सेना को उनके ही खून में नहला दिया

रामप्यारी गुर्जर सिर्फ जज़्बाती नहीं थीं, वो एक बहुत ही खतरनाक और दिमाग वाली कमांडर भी थीं। उन्हें पता था की तैमूर की सेना बहुत बड़ी है और उनके पास हथियार भी ज़्यादा हैं।

अगर 40 हज़ार औरतें आमने-सामने की लड़ाई लड़ेंगी, तो नुकसान हमारा ज़्यादा होगा। इसलिए रामप्यारी ने वो खौफनाक ‘छापामार युद्ध’ नीति अपनाई, जिसने तैमूर की सेना को खून के आंसू रुला दिए।

तैमूर की सेना जब दिल्ली से हरिद्वार की तरफ बढ़ी, तो रामप्यारी की शेरनियों ने उनके रास्ते के सारे गांव खाली करवा दिए। वहां का सारा अनाज और राशन जला दिया गया ताकि जिहादियों को खाने का एक दाना ना मिले।

रास्तों के जितने भी कुएं और पानी के स्रोत थे, उन सबमें हमारी वीरांगनाओं ने ज़हर और कंटीली झाड़ियां मिला दीं। जब तैमूर के सैनिक प्यास से तड़पते हुए वो पानी पीते, तो वहीं तड़प-तड़प कर कुत्ते की मौत मारे जाते। भूख और प्यास ने जिहादियों की आधी कमर तो वैसे ही तोड़ दी थी।

लेकिन असली तांडव तो रात के अंधेरे में शुरू होता था। दिन भर तैमूर की सेना चलती थी, और रात को जब वो थक कर अपने टेंटों में सोते थे, तब रामप्यारी की शेरनियां रात के अंधेरे में सायों की तरह उनके कैंप में घुसती थीं।

बिना कोई आवाज़ किए, बिना कोई शोर मचाए। हमारी हिन्दू औरतों ने उन सोते हुए जिहादी सैनिकों के गले ऐसे काटे जैसे खेत में मूली काटी जाती है। जब तक तैमूर के बाकी सैनिक जागते, तब तक हमारी शेरनियां तलवारों से उन्हें काटते हुए वापस जंगलों में गायब हो जाती थीं।

हर रात तैमूर के कैंप में लाशों के ढेर लग जाते थे। तैमूर के सैनिकों में ऐसा खौफ बैठ गया था की वो रात को सोने से डरने लगे थे। उन्हें लगता था की ये हिन्दू औरतें इंसान नहीं, बल्कि कोई खौफनाक आत्माएं हैं जो रात को खून पीने आती हैं।

जो जिहादी दिल्ली में औरतों का रेप करते थे, आज वही जिहादी एक 20 साल की लड़की और उसकी महिला फौज के खौफ से अपनी पैंट गीली कर रहे थे।

तैमूर लंग की रातों की नींद हराम हो चुकी थी। वो समझ ही नहीं पा रहा था की ये कैसा युद्ध है जहाँ दुश्मन सामने से नहीं आता, बल्कि रात को सीधा यमदूत बनकर आता है।

रामप्यारी गुर्जर और उनकी 40 हज़ार शेरनियों ने हरिद्वार पहुंचने से पहले ही तैमूर की आधी फौज को उनके ही खून में नहला कर जहन्नुम पहुंचा दिया था।

हरिद्वार का वो खौफनाक महायुद्ध जब हरवीर सिंह गुलिया ने भाला मारकर तैमूर की छाती फाड़ दी

रात के अंधेरे में रामप्यारी गुर्जर की 40 हज़ार शेरनियों ने जो छापामार युद्ध लड़ा था, उसने तैमूर लंग की जिहादी फौज की कमर तो वैसे ही तोड़ दी थी। भूख, प्यास और रात के उस खौफनाक कत्लेआम से तैमूर के सैनिक आधे पागल हो चुके थे।

लेकिन अभी असली महासंग्राम तो बाकी था। तैमूर किसी भी कीमत पर हरिद्वार पहुंचना चाहता था। उसे लगा की दिन के उजाले में उसकी विशाल सेना इन हिन्दुओं को कुचल देगी।

तैमूर अपनी बची-खुची खूंखार फौज लेकर आगे बढ़ा। हरिद्वार से सिर्फ 5 कोस दूर, तुगलकपुर-पथरीगढ़ के विशाल मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने आ गईं।

एक तरफ वो क्रूर जिहादी लुटेरे थे जिन्होंने आधी दुनिया में कत्लेआम मचाया था, और दूसरी तरफ हमारे महाबली जोगराज सिंह गुर्जर के नेतृत्व में 1 लाख 20 हज़ार हिन्दू वीर और रामप्यारी गुर्जर की 40 हज़ार रणचंडियां!

जैसे ही युद्ध का बिगुल बजा, आसमान “हर हर महादेव” और “जय भवानी” के नारों से कांप उठा। रामप्यारी गुर्जर और उनकी 40 हज़ार औरतों ने अपने बालों को खुला छोड़ दिया, हाथों में नंगी तलवारें और गड़ासे लिए वो जिहादियों की फौज पर ऐसे टूटीं जैसे भूखी शेरनियां शिकार पर टूटती हैं।

भाई साहब, उस मैदान में जो वीभत्स और खौफनाक नज़ारा था, वो इतिहास के किसी पन्ने में नहीं मिलेगा। हमारी हिन्दू माताओं और बहनों ने औरतों वाला कोई संकोच नहीं दिखाया। उन्होंने जिहादियों के पेट चीर दिए, उनकी गर्दनें काट-काट कर फुटबॉल की तरह मैदान में उछाल दीं।

तैमूर के सैनिकों को समझ ही नहीं आ रहा था की वो लड़ें तो कैसे लड़ें। जो औरतें उनके लिए सिर्फ ‘माल-ए-गनीमत’ (लूट का सामान) होती थीं, आज वही औरतें यमराज बनकर उनका खून पी रही थीं।

जिहादियों की लाशों से हरिद्वार की वो ज़मीन पूरी तरह से पट गई थी। खून की नदियां बह रही थीं और उन नदियों में तैमूर का वो विश्वविजेता होने का घमंड डूब रहा था।

और इसी भयंकर युद्ध के बीच एक ऐसा खौफनाक प्रहार हुआ जिसने तैमूर की रूह को शरीर से अलग करने का काम कर दिया। हिन्दू सेना के डिप्टी कमांडर हरवीर सिंह गुलिया, जो अपनी बहादुरी के लिए जाने जाते थे, उन्होंने अपनी नज़रें सीधे उस लंगड़े जल्लाद तैमूर पर गड़ा दीं। तैमूर अपने हज़ारों सबसे खूंखार और ख़ास गार्ड्स के घेरे में बीच में खड़ा था।

हरवीर सिंह गुलिया ने अपने घोड़े को एड़ लगाई और साक्षात मौत बनकर तैमूर के उस सुरक्षा घेरे में घुस गए। जिहादियों की तलवारें हरवीर सिंह को काट रही थीं, उनके शरीर से खून फव्वारे की तरह निकल रहा था, लेकिन उस हिन्दू शेर को कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था। हरवीर सिंह चीरते हुए सीधे तैमूर के सामने पहुंचे और अपना भारी-भरकम भाला पूरी ताकत से तैमूर की छाती में घोंप दिया।

भाला लगते ही वो खूंखार आक्रांता, जिसके नाम से दिल्ली कांपती थी, वहीं घोड़े से नीचे गिर पड़ा। उसकी छाती फट चुकी थी और वो मुंह से खून की उल्टियां करने लगा।

हरवीर सिंह गुलिया ने उस दिन वो काम कर दिया था जिसका सपना लाखों सताए हुए हिन्दू देख रहे थे। हालांकि हरवीर सिंह गुलिया इस भयंकर हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए, लेकिन उन्होंने तैमूर के सीने में जो घाव दिया, उसने उस जिहादी की जिंदगी को जहन्नुम बना दिया।

अपनी जान की भीख मांगकर कुत्ते की तरह भागा विश्वविजेता तैमूर, जिहादियों की लाशों से पाट दिया गया था युद्ध का मैदान

तैमूर ज़मीन पर पड़ा खून थूक रहा था। उसके कमांडरों के हाथ-पैर फूल गए। जब तैमूर ने आंखें खोलकर मैदान की तरफ देखा, तो उसे सिर्फ और सिर्फ अपनी जिहादी फौज की कटती हुई लाशें नज़र आ रही थीं।

रामप्यारी गुर्जर की शेरनियां और जोगराज सिंह गुर्जर के वीर जिहादियों को दौड़ा-दौड़ा कर मार रहे थे। मुगलों और तुर्कों का वो घमंड, वो क्रूरता सब कुछ हरिद्वार की मिट्टी में मिल चुका था।

तैमूर को समझ आ गया की अगर वो एक पल भी यहाँ और रुका, तो ये हिन्दू औरतें और योद्धा उसके शरीर की बोटी-बोटी काटकर चीलों और कौवों को खिला देंगे। वो दरिंदा, जो कहता था की वो पूरे हिन्दुस्तान को इस्लाम में बदल देगा, आज अपनी जान की भीख मांग रहा था। उसने अपने कमांडरों से कहा की मुझे यहाँ से निकालो।

तैमूर के बचे हुए सैनिकों ने उसे एक घोड़े पर लादा और हरिद्वार का सपना छोड़कर वो शिवालिक की पहाड़ियों की तरफ दुम दबाकर भागने लगे। विश्वविजेता कुत्ते की तरह भाग रहा था!

लेकिन हमारे हिन्दू वीरों ने उन्हें आसानी से नहीं छोड़ा। जब तैमूर की फौज शिवालिक के जंगलों और पहाड़ों में भागी, तो वहां पहले से तैयार हमारे हिन्दू तीरंदाज़ों और वनवासियों ने उन पर तीरों की बारिश कर दी।

भागते हुए जिहादियों को भी काटा गया। तैमूर की जिस विशाल फौज ने दिल्ली में एक लाख हिन्दुओं का कत्ल किया था, उस फौज के मुश्किल से कुछ हज़ार सैनिक ही ज़िंदा बचकर भारत की सीमा से बाहर भाग पाए।

बाकी पूरी की पूरी जिहादी फौज को रामप्यारी गुर्जर और हमारे महाबलियों ने हरिद्वार के उसी मैदान और शिवालिक की पहाड़ियों में दफन कर दिया।

आपको क्या लगता है तैमूर बच गया था? बिल्कुल नहीं! हरवीर सिंह गुलिया ने उसकी छाती में जो भाला मारा था, वो घाव इतना गहरा और खौफनाक था की वो कभी भर नहीं पाया। तैमूर जब अपने देश वापस पहुंचा, तो वो घाव रिसने लगा।

उसमें कीड़े पड़ गए। वो दरिंदा कई सालों तक उसी घाव की वजह से तड़प-तड़प कर, अपनी ही गंदगी में सड़कर कुत्ते की मौत मरा। भारत की उस सनातन मिट्टी और हमारी हिन्दू तलवारों ने उसे वो खौफनाक सज़ा दी जो आज भी इतिहास में गूंज रही है।

आज के हर हिन्दू को जाननी चाहिए रामप्यारी गुर्जर की ये खूंखार गाथा

अब एक बहुत सीधा सा सवाल हर सच्चे सनातनी के दिमाग में आना चाहिए। इतना बड़ा महायुद्ध, जिसमें 40 हज़ार हिन्दू औरतों ने साक्षात रणचंडी का रूप धरकर दुनिया के सबसे क्रूर आक्रांता को उसके ही खून में नहला दिया- ये कहानी हमारी इतिहास की किताबों से गायब क्यों है?

हमें आज तक स्कूलों में रामप्यारी गुर्जर, जोगराज सिंह गुर्जर और हरवीर सिंह गुलिया का नाम क्यों नहीं पढ़ाया गया?

ये कोई गलती नहीं थी भाई! ये उन दरबारी इतिहासकारों और अंग्रेज़ों के चमचों की बहुत गहरी साज़िश थी। इन गद्दारों ने जानबूझकर हमारे बच्चों को सिर्फ और सिर्फ मुगलों, तुर्कों और अरबों की जीत की कहानियां पढ़ाईं। इन्होंने हमें ये एहसास कराया की हम तो सिर्फ कटने और हारने के लिए पैदा हुए हैं।

क्योंकि ज़रा सोचिए, अगर हमारे देश की लड़कियों को बचपन से ही रामप्यारी गुर्जर का खौफनाक इतिहास पढ़ाया जाता, तो क्या आज कोई जिहादी हमारी बेटियों को ‘लव जिहाद’ के जाल में फंसा पाता? बिल्कुल नहीं!

अगर हमारी बेटियों के रगों में रामप्यारी गुर्जर का खून खौलने लगता, तो वो सूटकेस या फ्रिज में कटने के बजाय, उन जिहादियों के सिर काटकर चौराहों पर टांग देतीं।

तैमूर के जिहादियों को जहन्नुम पहुंचाने वाली वो हिन्दू तलवारें आज भी हमारी रगों में ज़िंदा हैं। जिस दिन इस देश का हर सनातनी अपने इस असली और खूंखार इतिहास को जान लेगा, उस दिन इस देश से हर जिहादी मंसूबा जड़ से मिट जाएगा।

हर हर महादेव! जय भवानी! 

Scroll to Top