मदरसों को कंप्यूटर और करोड़ों का सरकारी फंड, हिन्दू गुरुकुलों पर ताला, सेक्युलर सिस्टम का सनातन शिक्षा को मिटाने का खौफनाक खेल

एक आम हिंदू सुबह से लेकर रात तक गधे की तरह पसीना बहाता है। वो अपनी सैलरी से इनकम टैक्स भरता है, बाज़ार से कुछ खरीदे तो उस पर जीएसटी (GST) देता है, सड़क पर चले तो टोल टैक्स भरता है।

और जब उस आम हिंदू का वो खून-पसीने का पैसा सरकारी खज़ाने में पहुंचता है, तो हमारी ये तथाकथित सेक्युलर सरकारें उस पैसे का क्या करती हैं? उस पैसे से मदरसों में पढ़ने वाले मुल्लों और मौलवियों को मुफ्त के कंप्यूटर, लैपटॉप और वज़ीफे (Scholarships) बांटे जाते हैं!

और ठीक उसी सड़क के दूसरी तरफ, हमारे वो हज़ारों साल पुराने गुरुकुल हैं जो बिना किसी सरकारी मदद के, बिना किसी फंड के, सिर्फ और सिर्फ चंद दान-पुण्य के भरोसे टिन की छतों और पेड़ों के नीचे किसी तरह अपनी सांसें गिन रहे हैं।

आज अगर कोई ब्राह्मण या सनातनी बच्चा अपने वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों को पढ़ना चाहे, तो सरकार उसे एक फूटी कौड़ी नहीं देती। उसे फटे कपड़ों में ज़मीन पर बैठकर पढ़ना पड़ता है।

अरे भाई, ये कैसा दोगलापन है? तुम हमारे ही टैक्स के पैसों से एक विशेष समुदाय को उनके मज़हब की कट्टर तालीम देने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे हो, और जिस सनातन धर्म ने इस देश को ‘विश्वगुरु’ बनाया था, उसकी शिक्षा व्यवस्था को तुमने मरने के लिए लावारिस छोड़ दिया है! 

ये कोई पॉलिसी की गलती या भूल-चूक नहीं है। ये इन सेक्युलर सरकारों की सोची समझी राजनीती है की हिन्दू तो बेवक़ूफ़ है, इसको बस हम राम मंदिर दिखा देंगे, इसके सामने भगवा लहरा देंगे, और ये उतने में ही खुश होकर हमें वोट दे देगा।

लेकिन आज का हिन्दू जाग गया है, उसे समझ आ गया है की इन सरकारों ने उसके धर्म को सिर्फ चुनाव में वोट का जरिया बना रखा है, उससे ऊपर ये राजैनतिक पार्टियां हिन्दू को कुछ नहीं समझती।

अल्पसंख्यक मंत्रालय का 3400 करोड़ का खजाना, जिहादियों को कंप्यूटर और हमारे वेद पढ़ने वालों को ठेंगा

अगर किसी सेक्युलरिस्म के कीड़े को मेरी बातों पर यकीन नहीं आ रहा है, तो ज़रा सरकार के ताज़ा बजट (2025-2026 और 2026-2027) के वो आंकड़े उठाकर देख ले जिन्हें हम हिन्दुओं से बड़ी चालाकी से छुपाया जाता है।

हर साल भारत सरकार के बजट में ‘अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय’ (Ministry of Minority Affairs) नाम के इस सफेद हाथी को 3400 करोड़ रुपये से ज़्यादा का भारी-भरकम फंड दिया जाता है। और इस खज़ाने का सबसे बड़ा हिस्सा कहां जाता है?

ये पैसा जाता है ‘मदरसों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की योजना’ (SPQEM) जैसी फर्जी स्कीमों के नाम पर! इस स्कीम की आड़ में देश भर के मदरसों को हाई-टेक किया जा रहा है।

वहां के मौलवियों को हमारे टैक्स के पैसे से मोटी-मोटी सैलरी दी जा रही है। मदरसों में फ्री वाई-फाई, इंटरनेट, टैबलेट और कंप्यूटर की पूरी लैब बिठाई जा रही है। मतलब, तुम कुरान और हदीस पढ़ने के लिए सरकारी खज़ाना खोलकर बैठे हो।

अब ज़रा दूसरी तस्वीर देखिए। हमारे जो हिंदू गुरुकुल हैं, जहाँ संस्कृत और वेदों की पढ़ाई होती है, उनके संरक्षण के लिए सरकार ने एक ‘महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान’ (MSRVVP) नाम की संस्था बना रखी है।

लेकिन अगर आप इसका बजट देखेंगे, तो आपको रोना आ जाएगा। मदरसों को मिलने वाले हज़ारों करोड़ों की तुलना में हमारे वेद पढ़ने वाले बच्चों के लिए सिर्फ 100 करोड़ का बजट दिया गया है, जो की ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है।

क्या इस देश के ब्राह्मण और वेदपाठी बच्चों ने कोई पाप किया है जो उन्हें उनके हक़ से महरूम रखा जा रहा है? जिस देश में रामायण और महाभारत लिखी गई, जिस देश की आत्मा ही वेदों में बसती है, वहां तुम वेदों को पढ़ाने के लिए भीख के चंद टुकड़े फेंकते हो और मदरसों को पालने के लिए पूरा का पूरा खज़ाना लुटा देते हो!

ये एक सीधा-सीधा सेक्युलर फ्रॉड है जहाँ बहुसंख्यक हिंदू का पेट काटकर जिहादियों की तिजोरियां भरी जा रही हैं।

मदरसों के आधुनिकीकरण का वो सफेद झूठ जो सरकारी पैसों से कट्टरपंथ को पाल रहा है

जब भी कोई राष्ट्रवादी इंसान मदरसों की इस खौफनाक सरकारी फंडिंग पर सवाल उठाता है, तो लुटियंस दिल्ली के एसी कमरों में बैठे ये वामपंथी पत्रकार और लिबरल इकोसिस्टम वाले तुरंत अपना ‘ज्ञान’ बांचने आ जाते हैं।

ये टीवी पर बैठकर बड़ी बेशर्मी से झूठ बोलते हैं की “अरे डरो मत! हम तो मदरसों का आधुनिकीकरण कर रहे हैं। जब मदरसों में कंप्यूटर जाएगा, तो वहां के बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर और आईएएस बनेंगे।”

वाह रे वामपंथी गद्दारों! तुम्हारी इस बाज़ीगरी को अब देश का आम हिंदू बहुत अच्छी तरह से समझ चुका है। ज़रा ज़मीन पर जाकर देखिए की एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में कंप्यूटर देने का खौफनाक नतीजा क्या निकल रहा है।

जब तुम मदरसे की उस कट्टर जेहादी तालीम में इंटरनेट और मॉडर्न टेक्नोलॉजी का तड़का लगाते हो, तो वहां से कोई डॉक्टर या इंजीनियर नहीं निकलता। वहां से निकलते हैं वो पढ़े-लिखे और हाई-टेक जिहादी, जो अब डार्क वेब और टेलीग्राम के ज़रिए ‘गज़वा-ए-हिंद’ का स्लीपर सेल नेटवर्क चलाते हैं।

अभी हाल ही में बेंगलुरु और बाकी टेक शहरों में जो कट्टरपंथी पकड़े गए हैं, वो सब लैपटॉप और कंप्यूटर चलाने वाले ही तो थे! मदरसे का पूरा का पूरा सिलेबस और उसका माहौल सिर्फ और सिर्फ ‘शरिया’ और मज़हबी कट्टरपंथ पर आधारित होता है।

वहां भारत के संविधान, हमारे गौरवशाली इतिहास या राष्ट्रवाद की कोई जगह नहीं होती। वहां बच्चों को बचपन से यही रटाया जाता है की काफिरों से कैसे नफरत करनी है और कैसे इस पूरी दुनिया को दारुल-इस्लाम बनाना है।

और तुम उन्हीं मदरसों को हमारे टैक्स के पैसे से मॉडर्न बना रहे हो? तुम उनके जिहादी इकोसिस्टम को और ज़्यादा ताकतवर बना रहे हो ताकि वो तेज़ी से अपने मंसूबों को अंजाम दे सकें!

ये सीधे तौर पर सरकारी पैसों से देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक भस्मासुर पैदा करने का खेल है। मदरसे कभी भी मॉर्डन एजुकेशन का हिस्सा नहीं बन सकते, वो सिर्फ और सिर्फ कट्टरपंथ की फैक्ट्रियां हैं जिन्हें सरकारी खज़ाने से पालना देशद्रोह के बराबर है।

विद्या भारती और सरस्वती शिशु मंदिरों पर सरकारों का सीधा हमला, राष्ट्रवाद की फैक्ट्रियों को बंद करने की खौफनाक साज़िश

अब ज़रा गुरुकुलों से थोड़ा बाहर निकलकर उस भगवा शिक्षा मॉडल की बात करते हैं जिसने इस देश के लिबरल इकोसिस्टम की रातों की नींद हराम कर रखी है। मैं बात कर रहा हूँ ‘विद्या भारती’ और ‘सरस्वती शिशु मंदिरों’ की।

ये इस देश में असली राष्ट्रवाद और सनातन संस्कारों को गढ़ने की वो फैक्ट्रियां हैं, जहाँ बच्चा हैरी पॉटर या सांता क्लॉज़ की कहानियां पढ़कर बड़ा नहीं होता, बल्कि भारत माता की जय और सरस्वती वंदना से अपने दिन की शुरुआत करता है।

यही वो बात है जो इस देश के काले अंग्रेज़ों और अर्बन नक्सलियों को कांटे की तरह चुभती है। ज़रा कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार का ताज़ा नंगा नाच देख लीजिए। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार आते ही उनका सबसे पहला टारगेट क्या रहा?

उन्होंने विद्या भारती और संघ से जुड़े स्कूलों को दी गई ज़मीनों का रिव्यू करना शुरू कर दिया और उन्हें वापस छीनने की धमकियां दीं। सिलेबस से हमारे हिंदू वीर सावरकर और हेडगेवार जी के चैप्टर उखाड़ फेंके और वापस टीपू सुल्तान जैसे जेहादी जल्लादों का महिमामंडन शुरू कर दिया।

केरल में तो कम्युनिस्ट सरकार सरस्वती शिशु मंदिरों और विद्या भारती के खिलाफ बाकायदा पूरी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर रही है ताकि वहां कोई हिंदू बच्चा अपने धर्म की तालीम ना ले सके।

अरे भाई, ज़रा इन सेक्युलर मगरमच्छों का खौफनाक दोगलापन तो देखिए! केरल में बिना किसी परमिशन के गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह अवैध मदरसे उग रहे हैं, वहां इन सरकारों की आंखों पर पट्टी बंध जाती है।

मदरसों में कौन सा कट्टरपंथ पढ़ाया जा रहा है, वहां से कैसे स्लीपर सेल निकल रहे हैं, ये पूछने की किसी डीएम या शिक्षा अधिकारी की हिम्मत नहीं होती। लेकिन जो सरस्वती शिशु मंदिर इस देश के बच्चों को संस्कार, देशभक्ति और कड़ा अनुशासन सिखा रहे हैं, उन पर ताला जड़ने के लिए ये गद्दार सिस्टम एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देता है।

वक्फ बोर्ड की अरबों की संपत्ति फिर भी मदरसों को चाहिए सरकारी भीख

अब ज़रा इस सेक्युलर डकैती के सबसे भयानक और नंगे सच को समझिए। इन मदरसों और इनको चलाने वाले मुल्लों के पास क्या सच में पैसों की कमी है? बिल्कुल नहीं!

आपको जानकर हैरानी होगी की भारत का वक्फ बोर्ड (Waqf Board) भारतीय रेलवे और रक्षा मंत्रालय के बाद इस देश का तीसरा सबसे बड़ा ज़मीन मालिक है। इनके पास पूरे देश में लाखों एकड़ की बेशकीमती ज़मीनें और अरबों-खरबों रुपये की संपत्तियां हैं।

अगर इनके पास इतनी अथाह दौलत है, तो फिर इनके मदरसों को हमारे टैक्स के पैसों की सरकारी भीख क्यों चाहिए? ये अपने वक्फ बोर्ड की कमाई से अपने मदरसे क्यों नहीं चलाते? क्योंकि इनकी फितरत ही यही है की अपना पैसा बचाकर रखो और हिंदुओं के खून-पसीने के पैसे पर अय्याशी करो।

लेकिन इसके ठीक उलट, ज़रा हमारे हिंदू मंदिरों की हालत देखिए। ये तो वो दर्द है जो हर सनातनी के सीने में शूल की तरह चुभता है।

तिरुपति बालाजी, मदुरै का मीनाक्षी मंदिर, मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर और ऐसे देश के हज़ारों भव्य मंदिरों पर इन सेक्युलर राज्य सरकारों ने ‘एचआरसीई एक्ट’ (HRCE Act) के तहत अपनी कुंडली मार रखी है।

एक आम हिंदू अपना पेट काटकर, अपनी श्रद्धा से भगवान के दानपात्र (हुंडी) में जो पैसा चढ़ाता है, उसे ये राज्य सरकारें खुलेआम लूट लेती हैं। और उस पैसे का क्या होता है? क्या वो पैसा हमारे गरीब गुरुकुलों को दिया जाता है? क्या उस पैसे से वेद पढ़ने वाले बच्चों के लिए हॉस्टल बनाए जाते हैं?

बिल्कुल नहीं! हमारे मंदिरों के उस पवित्र पैसे से ये सेक्युलर सरकारें हज हाउस बनवाती हैं, मस्जिदों के इमामों को सैलरी बांटती हैं और इफ्तार पार्टियां देती हैं।

अरे भाई! मस्जिद की कमाई पर मुसलमानों का हक है, लेकिन हिंदू मंदिरों की हुंडी पर सरकारी बाबू और गिद्ध बैठे हैं! और फिर उसी सरकार के खज़ाने से मदरसों को करोड़ों का फंड जाता है। ये कोई पॉलिसी नहीं है, ये हिंदुओं का सबसे बड़ा और सबसे क्रूर ‘सिस्टेमेटिक चीरहरण’ है। 

हम हिंदू अपने ही आराध्य के चरणों में जो धन अर्पित करते हैं, उसे ये गद्दार सिस्टम उन जिहादियों को पालने में लगा देता है जो हमारे ही अस्तित्व को मिटाने की कसमें खाते हैं। इससे बड़ा सेक्युलर फ्रॉड इस दुनिया में और कहीं नहीं हो सकता।

मैकाले की नाजायज औलादें, जिन्होंने सनातन शिक्षा को पिछड़ा बताकर दफना दिया

अब सवाल ये उठता है की जब हमारे गुरुकुलों और स्कूलों के साथ इतना बड़ा अन्याय हो रहा था, तो इस देश का मीडिया और बुद्धिजीवी क्या कर रहे थे? असल में ये जो पूरा का पूरा लिबरल इकोसिस्टम है, ये लुटियंस दिल्ली के पत्रकार और जेएनयू (JNU) छाप प्रोफेसर, ये सब उस थॉमस बबिंगटन मैकाले (Macaulay) की वैचारिक और नाजायज़ औलादें हैं। 

मैकाले वही अंग्रेज़ था जिसने 1835 में भारत की उस महान गुरुकुल परंपरा को नष्ट करने का ड्राफ्ट बनाया था, जिसके दम पर भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। मैकाले मर गया, लेकिन अपने पीछे ये ‘काले अंग्रेज़’ और वामपंथी गद्दार छोड़ गया।

इन वामपंथियों ने इस देश में एक ऐसा खौफनाक साइकोलॉजिकल वॉरफेयर चला रखा है की आम हिंदू अपने ही धर्म से शर्मिंदा होने लगा है। अगर कोई बच्चा गुरुकुल में धोती पहनकर, शिखा रखकर संस्कृत बोलता है, वेद या आयुर्वेद पढ़ता है, तो ये लिबरल मीडिया वाले उसका मज़ाक उड़ाते हैं।

ये लोग टीवी पर बैठकर उसे ‘पिछड़ा’, ‘सांप्रदायिक’ और ‘दकियानूसी’ घोषित कर देते हैं। ये माहौल बनाते हैं की संस्कृत पढ़ने से कोई नौकरी थोड़ी मिलेगी, ये तो पाखंडियों की भाषा है।

लेकिन ज़रा इन दोगलों का दूसरा चेहरा देखिए! जब कोई बच्चा मदरसे में जालीदार टोपी पहनकर, ऊंचे पायजामे में अरबी और फारसी में दीनी तालीम ले रहा होता है, तो इन्हीं वामपंथियों को उसमें ‘विविधता’ और ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ नज़र आने लगता है। तब ये कहते हैं की मदरसे तो भारत की संस्कृति का हिस्सा हैं, इन्हें बचाना चाहिए।

अरे बेशर्मों! जिस सनातन शिक्षा को तुम भारत में बैठकर पिछड़ा बताते हो, उसी सनातन के वेदों, उपनिषदों और वैदिक गणित पर आज दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटीज़ (ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड और जर्मनी के विश्वविद्यालय) रिसर्च कर रही हैं।

वहां के गोरे लोग संस्कृत सीख रहे हैं ताकि वो हमारे शास्त्रों में छुपे विज्ञान, खगोल शास्त्र और चिकित्सा के ज्ञान को चुरा सकें।

और हमारे ही देश में बैठे ये सेक्युलर कीड़े विदेशी फंडिंग के दम पर हमारे ही शास्त्रों को दफनाने पर तुले हैं। ये चाहते हैं की हिंदू बच्चा सिर्फ कॉन्वेंट का रट्टू तोता बने, जो हैरी पॉटर तो पढ़ ले लेकिन उसे अपने भगवान राम और कृष्ण के इतिहास का ककहरा भी ना पता हो। ये हमारी जड़ों में मट्ठा डालने का वामपंथी एजेंडा है।

अल्पसंख्यक मंत्रालय बंद हो और देश भर में हिन्दू गुरुकुलों का डंका बजे

बहुत हो गया ये ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाला सेक्युलर ढोंग! आज मई 2026 की ज़मीनी सच्चाई ये है की अगर हमने आज अपने गुरुकुलों और अपनी सनातन शिक्षा को नहीं बचाया, तो कल हमारी आने वाली पीढ़ियां मानसिक रूप से पूरी तरह ईसाई और वामपंथी गुलाम बन चुकी होंगी।

वो शारीरिक रूप से भले ही हिंदू पैदा हों, लेकिन दिमाग से वो अपने ही देश और अपने ही धर्म को गालियां दे रही होंगी।

अब हिंदू समाज को अपने हक़ के लिए डंके की चोट पर सड़कों पर उतरना होगा। हमारी पहली और सबसे आक्रामक मांग ये होनी चाहिए की इस देश में ‘अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय’ (Ministry of Minority Affairs) नाम के इस सफेद हाथी को तुरंत प्रभाव से भंग किया जाए।

ये मंत्रालय पूरी तरह से असंवैधानिक है जो सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यक हिंदुओं का टैक्स चूसकर जिहादियों पर लुटाने के लिए बनाया गया था। मदरसों को मिलने वाले 3400 करोड़ के फंड पर ज़ीरो टॉलरेंस के तहत रातों-रात रोक लगनी चाहिए। हमारे टैक्स के पैसे से इस देश में कट्टरपंथ और गज़वा-ए-हिंद की फैक्ट्रियां नहीं चलेंगी!

इसके साथ ही, केंद्र सरकार को तुरंत एक ‘राष्ट्रीय गुरुकुल बोर्ड’ (National Gurukul Board) का गठन करना चाहिए। जिस तरह आधुनिक शिक्षा के लिए हज़ारों करोड़ का बजट दिया जाता है, वैसे ही हमारी वैदिक शिक्षा, संस्कृत, आयुर्वेद और युद्ध कला सिखाने वाले गुरुकुलों के लिए हर साल बजट में एक बड़ा और अलग फंड तय होना चाहिए।

हमारे जो ब्राह्मण और संन्यासी बिना किसी लालच के जंगलों और गांवों में सनातन की लौ जलाए बैठे हैं, सरकार उन्हें ज़मीनें दे, उन्हें आर्थिक मदद दे और उनके छात्रों को वही सम्मान और डिग्रियां मिले जो किसी आईआईटी (IIT) या एम्स (AIIMS) के छात्र को मिलती हैं।

और वो जो 2009 का गद्दार RTE कानून है, उसे बिना किसी देरी के या तो पूरी तरह रद्द किया जाए, या फिर बिना किसी ‘अल्पसंख्यक’ भेदभाव के उसे देश के हर मदरसे और हर ईसाई कॉन्वेंट स्कूल पर डंडे के ज़ोर से लागू किया जाए। या तो सब पर कानून लागू होगा, या किसी पर नहीं!

ये लड़ाई सिर्फ कुछ स्कूलों या फंड की नहीं है। ये एक महासंग्राम है जो हमारे अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ा जाना है। अगर तुम एक पेड़ की जड़ें ही काट दोगे, तो वो पेड़ कभी हरा-भरा नहीं रह सकता।

हमारी जड़ें हमारे वेद हैं, हमारे शास्त्र हैं और हमारे गुरुकुल हैं। उठो सनातनी, अपनी शिक्षा व्यवस्था को वापस छीनने का वक्त आ गया है। हमें किसी मैकाले की झूठी शिक्षा की ज़रूरत नहीं है, हमें अपने चाणक्य और अपने परशुराम वाली शिक्षा चाहिए।

संसद में बैठे नेताओं को ये ललकार सुननी ही पड़ेगी। अपने वेदों की ओर लौटो, अपने गुरुकुलों को ताकत दो, क्योंकि सनातन ही इस देश का असली और अंतिम भविष्य है!

वंदे मातरम! जय श्री राम! 

Scroll to Top