हम और आप दशकों से जिस ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब और ‘भाईचारे’ की मीठी गोलियां खाकर गहरी नींद में सो रहे हैं, असल में वो भाईचारा दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे खूनी सफेद झूठ है।
असलियत क्या है? असलियत ये है की हमारे ही मोहल्लों में, हमारे ही घरों के आस-पास जेहादियों की एक ऐसी खूंखार फौज पल रही है, जो बस मौका ढूंढ रही है की कब किसी काफिर का गला रेता जाए।
हम अपने घरों में बैठकर इन्हें ईद की मुबारकबाद देते हैं, हम इनके साथ सेवइयां खाते हैं, और उसी वक्त ये मुसलमान हमारे ही बच्चों को सड़क पर सरेआम ‘हलाल’ करने का ब्लूप्रिंट तैयार कर रहे होते हैं।
दिल्ली से सटे गाजियाबाद की खोड़ा कॉलोनी में जो हुआ है ना, वो इस बात का खुल्ला सबूत है की ये जिहादी मानसिकता हमारे हिन्दू समाज को किस तरह से अंदर ही अंदर खोखला कर रही है।
एक 17 साल का मासूम लड़का, हमारा हिंदू भाई सूर्या प्रताप चौहान, जो अभी 11वीं क्लास में पढ़ता था। उसके मां-बाप ने उसके लिए कितने सपने देखे होंगे यार! लेकिन इन जिहादी भेड़ियों ने बकरीद के दिन बकरे की जगह हमारे उस हिंदू बेटे का खून बहा दिया।
बकरीद के दिन हमारे हिंदू बेटे का खून मांगने वाले ये खूंखार जेहादी भेड़िए
बात है 28 मई 2026 की है, बकरीद का दिन था। दिल्ली से सटा हुआ गाज़ियाबाद का खोड़ा इलाका, जहाँ एक 17 साल का हिंदू लड़का, 11वीं क्लास का छात्र सूर्या प्रताप चौहान, अपने घर से निकलता है।
वो एक आम मिडिल क्लास हिंदू परिवार का बेटा था जिसके मां-बाप ने उसे पढ़ा-लिखाकर एक अच्छा इंसान बनाने का सपना देखा था। उसे उसी के एक तथाकथित दोस्त ‘फैज़ान’ ने किसी पुराने विवाद को सुलझाने के बहाने से बुलाया था।
सूर्या को क्या पता था की जिस फैज़ान पर वो भरोसा कर रहा है, वो असल में उसे मौत के उस खौफनाक जाल में खींच कर ले जा रहा है जहाँ कुछ जिहादी भेड़िए उसका खून पीने के लिए तैयार बैठे हैं।
वहां पहुंचते ही 19 साल का एक जिहादी दरिंदा ‘असद’ और उसके जिहादी दोस्त (फरहान, आतिफ) सूर्या को घेर लेते हैं। बेवजह की बहस शुरू की जाती है।
और फिर दिनदहाड़े, बीच सड़क पर उस 17 साल के मासूम हिंदू बेटे को चाकुओं से गोद-गोद कर मार डाला जाता है। सूर्या की लाश सड़क पर खून से लथपथ पड़ी रहती है और वो हत्यारे वहां से सीना तानकर फरार हो जाते हैं।
अरे भाई, ये महज़ कोई आम क्राइम या लड़कों के बीच की कोई आपसी रंजिश नहीं है। अगर आप इसे नॉर्मल मर्डर मान रहे हैं, तो आप इस देश की उस जिहादी मानसिकता को पहचानने में बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं जो बचपन से ही इन कट्टरपंथियों के दिमाग में, इनके मदरसों में और इनके मोहल्लों में ठूंस-ठूंस कर भर दी जाती है।
ये कत्ल उस नफरत का साक्षात नंगा सच है जो एक ‘काफिर’ (हिंदू) के लिए इनके दिलों में कूट-कूट कर भरी गई है। सूर्या की वो लहूलुहान लाश चीख-चीख कर पूरे हिंदू समाज से पूछ रही है की आखिर कब तक इस झूठे भाईचारे की कीमत हमारे खून से चुकाई जाएगी?
“बकरा हलाल होते देखा है?” वो खौफनाक शब्द जो जिहादियों के लिए एक हिन्दू की जान की कीमत बताते हैं
अब ज़रा इस कत्ल के उस सबसे रूह कंपा देने वाले हिस्से पर आते हैं। जब असद और उसके जिहादी दोस्तों ने सूर्या को घेरा, तो सूर्या ने वहां से निकलने की कोशिश की। वो समझ गया था की ये लोग उसकी जान लेने आए हैं।
लेकिन चश्मदीदों ने बताया की उस 19 साल के कातिल असद ने चाकू निकालने से पहले सूर्या की आंखों में देखकर एक खौफनाक डायलॉग मारा था।
असद ने कहा- “बकरा हलाल होते देखा है? आओ तुम्हें दिखाते हैं।”
ज़रा एक पल के लिए रुकिए और इस डायलॉग की साइकोलॉजी को समझिए। ये शब्द किसी आम गली के गुंडे या सड़क छाप बदमाश के नहीं हैं भाई! ये शब्द एक ऐसे जिहादी के हैं जिसके दिमाग में इंसानियत नाम की कोई चीज़ बची ही नहीं है।
बचपन से जब तुम अपने घर के आंगनों में, सड़कों पर मासूम जानवरों को तड़प-तड़प कर कटते हुए देखते हो, खून की नदियां बहते हुए देखते हो, तो तुम्हारे अंदर की सारी संवेदनाएं मर जाती हैं।
इन जिहादियों के लिए एक सड़क पर बंधे हुए जानवर को काटना और एक ‘काफिर’ हिंदू की गर्दन काटना, दोनों एक ही बात है। इनके दिमाग में ये सॉफ्टवेयर फीड कर दिया गया है की जो तुम्हारे मज़हब का नहीं है, वो इंसान ही नहीं है। वो तो बस एक बकरा है जिसे ‘हलाल’ करके अल्लाह के नाम पर कुर्बान कर दिया जाना चाहिए।
सूर्या वहां से भागना चाहता था, वो तड़प रहा था, लेकिन असद के उन जिहादी दोस्तों ने सूर्या को कसकर पकड़ लिया ताकि असद आसानी से उस मासूम के सीने में ताबड़तोड़ वार कर सके। चाकू लगने के बाद जो हुआ, वो सुनकर आज भी आंखें भर आती हैं।
वो चाकू सूर्या के पेट में इतनी गहराई तक धंस गया था की असद उसे बाहर निकाल ही नहीं पाया। अपनी जान बचाने के लिए, मौत के खौफ से कांपता हुआ वो 17 साल का बच्चा, पेट में वो खंजर लिए हुए ही सड़क पर बेतहाशा भागा।
सोचिए उस दर्द को! एक कदम दौड़ना भी मौत से बदतर होता है जब पेट में चाकू धंसा हो, खून फव्वारे की तरह बह रहा हो। लेकिन वो भागा। करीब 200 मीटर तक वो अपनी जिंदगी की भीख मांगते हुए, खुद को बचाने की जद्दोजहद में सड़क पर दौड़ता रहा।
ये दरिंदे फिर भी नहीं रुके। वो उसके पीछे भाग कर आये, और जिहादी उन्होंने उस चाक़ू को फिर से बाहर निकाला और बाहर निकाल के 4-5 बार वापस से सूर्या के पेट में घोंपा।
चाकू घर से लाया गया था, सूर्या को धोखे से बुलाया गया था, और उसे बीच सड़क पर इसलिए मारा गया ताकि उस पूरे इलाके के हिंदुओं के दिलों में एक खौफ पैदा किया जा सके की “अगर हमसे टकराओगे, तो ऐसे ही सड़क पर हलाल कर दिए जाओगे।”
ये सीधे-सीधे उस ‘गज़वा-ए-हिंद’ का लाइव ट्रेलर है जो ये लोग हर गली और हर मोहल्ले में चलाना चाहते हैं।
बाप ने उकसाया, दोस्त ने दिया चाकू, इनका पूरा परिवार और धर्म ही जिहादी है
अगर आपको लग रहा है की ये सिर्फ 19 साल के एक ‘भटके हुए मुसलमान’ का काम था, तो ज़रा पुलिस की जांच और उस खौफनाक सच को सुन लीजिए जिसने इस पूरे ‘मज़हबी इकोसिस्टम’ की कलई खोल कर रख दी है।
पुलिस ने जब जांच की तो पता चला की असद कोई अकेला ‘लोन वुल्फ’ नहीं था। इस मर्डर की स्क्रिप्ट बाकायदा उसके ही घर में रची गई थी। असद के बाप ‘नवाब’ ने खुद अपने बेटे को सूर्या की हत्या करने के लिए उकसाया था!
जी हां, एक बाप ने अपने बेटे से कहा की जा और उस काफिर को काट डाल। और असद के दोस्त फरहान ने वो चाकू लाकर असद के हाथ में थमाया था जिससे सूर्या के सीने छलनी किए गए।
अरे भाई, ज़रा सोचिए ये कैसी परवरिश है? ये कैसी तालीम है जो बंद दरवाज़ों के पीछे दी जा रही है? एक हिंदू बाप अपने बेटे को सिखाता है की चींटी को भी मत मारना, किसी से झगड़ा मत करना, पुलिस से दूर रहना।
और दूसरी तरफ ये कट्टरपंथी बाप हैं जो अपने ही बच्चों को चाकू और बंदूक थमाकर कहते हैं की जा और किसी हिंदू को हलाल कर दे!
ये कोई परिवार नहीं है, ये एक पूरी की पूरी ‘जिहाद की फैक्ट्री’ है। ये वही स्लीपर सेल मानसिकता है जो हमारे ही टैक्स के पैसों पर पलती है, हमारे ही साथ सरकारी स्कूलों में पढ़ती है, हमारी ही बिजली और पानी का इस्तेमाल करती है, लेकिन इनके दिलों में हमारे लिए जो नफरत है वो कैंसर से भी ज़्यादा खतरनाक है।
योगी की पुलिस ने 72 घंटे में ही पंहुचा दिया जिहादी असद को जहन्नुम
अब ज़रा कहानी के उस हिस्से पर आते हैं जहाँ से हमारे हिंदू समाज को थोड़ी ठंडक मिली। पहले का टाइम होता तो क्या होता? असद मर्डर करके आराम से किसी मदरसे या अपने रिश्तेदारों के घर छुप जाता।
पुलिस फाइलों में कागज़ काले करती रहती, कोर्ट-कचहरी की तारीखें पड़तीं और कुछ सालों बाद ये दरिंदा बेल (Bail) पर बाहर आकर छाती चौड़ी करके घूमता। लेकिन भाई, ये पुराना वाला यूपी नहीं है, ये बाबा योगी आदित्यनाथ का यूपी है! यहाँ जेहादी अगर हिंदू का खून बहाता है, तो उसका हिसाब कोर्ट में नहीं, बल्कि सड़क पर सीधा गोली से होता है।
जैसे ही हमारे भाई सूर्या की मौत की खबर फैली, पूरे गाजियाबाद का माहौल गरमा गया। पुलिस एक्शन में आ गई और इस हरामखोर असद पर तुरंत 50,000 रुपये का इनाम रख दिया गया। अब ये कायर जिहादी अपनी जान बचाने के लिए चूहों की तरह बिल ढूंढ रहा था।
लेकिन यूपी पुलिस की खुफिया टीमों ने अपना जाल बिछा दिया था। रविवार, 31 मई की तड़के सुबह पुलिस को पक्की खबर मिली की असद इंदिरापुरम के अभय खंड इलाके में अपने किसी गुर्गे से पैसे लेने आ रहा है ताकि वो दिल्ली या कहीं और भाग सके।
बस फिर क्या था, पुलिस ने पूरी घेराबंदी कर ली। जब ये जेहादी कुत्ता अपने एक साथी के साथ बाइक पर वहां पहुंचा और पुलिस ने उसे रुकने को कहा, तो इसकी हेकड़ी देखिए!
इसने सरेंडर करने की बजाय सीधा यूपी पुलिस पर ही फायरिंग शुरू कर दी। एक गोली हमारे पुलिस वाले को भी छूकर निकल गई जिसमें वो पुलिस कॉन्स्टेबल घायल हो गया।
लेकिन उस कातिल को ये नहीं पता था की ये कोई सेक्युलर पुलिस नहीं है जो मानवाधिकार के डर से पीछे हट जाएगी। जैसे ही उसने गोली चलाई, यूपी पुलिस ने अपनी राइफलें खोल दीं और जवाबी फायरिंग में असद को वहीं सड़क पर कुत्तों की तरह ढेर कर दिया!
जो असद कुछ घंटे पहले “बकरा हलाल” करने की धमकियां दे रहा था, उसकी अपनी ही लाश सड़क पर खून से लथपथ पड़ी थी। यूपी पुलिस ने उसे किसी कोर्ट-कचहरी और तारीख-पे-तारीख के ड्रामे से बचाते हुए सीधा जहन्नुम का परमानेंट टिकट काट दिया।
ये है वो ‘योगी मॉडल’ जिसकी आज पूरे देश को ज़रूरत है! जब कोई जिहादी किसी हिंदू को मारने की सोचता है, तो उसके दिमाग में ये खौफ होना चाहिए की वो वापस अपने घर नहीं जाएगा, बल्कि 72 घंटे के अंदर उसकी लाश मोर्चरी में सड़ रही होगी।
इस एनकाउंटर ने सिर्फ असद को नहीं मारा, बल्कि उस पूरी की पूरी कट्टरपंथी मानसिकता की कमर तोड़ दी है जो हमारे बच्चों को डराना चाहती थी।
रोती हुई एक हिंदू मां की पुकार, इन जिहादियों के घरों पर बुलडोजर की मांग
असद तो मारा गया, लेकिन क्या उस 17 साल के सूर्या की मां के आंसू सूख गए? बिल्कुल नहीं भाई। जब एक मां का जवान बेटा इस तरह सड़क पर तड़प-तड़प कर मरता है ना, तो उस मां के कलेजे में जो आग लगती है, वो आग सिर्फ एक एनकाउंटर से नहीं बुझती।
जब मीडिया वाले सूर्या की मां के पास पहुंचे, तो उस बिलखती हुई मां ने जो कहा, वो हर हिंदू को अपने दिमाग में बैठा लेना चाहिए। उस मां ने कहा- “मेरे बेटे को जैसे तड़पा-तड़पा कर मारा गया, मैंने भी पुलिस से वही इंसाफ मांगा था, मैंने एनकाउंटर मांगा था और मुझे एनकाउंटर मिल गया। पुलिस ने बहुत अच्छा काम किया है।”
लेकिन उस मां का दर्द अभी बाकी है। उसने चीखते हुए कहा की मर्डर में सिर्फ असद नहीं था, वहां कुल 7 लोग थे। बाप नवाब था, वो दरिंदे फरहान और आतिफ थे जिन्होंने चाकू दिया था।
मां की मांग बिल्कुल जायज़ है। सिर्फ एक असद को ठोक देने से क्या होगा? वो बाप नवाब, जिसने चिल्लाकर कहा था “आज इसकी कहानी खत्म कर दे”, वो तो अभी पुलिस कस्टडी में है। वो जेहादी दोस्त फरहान और आतिफ भी अरेस्ट हो गए हैं।
लेकिन क्या इन्हें सिर्फ जेल में फ्री की रोटियां तोड़ने के लिए रखा जाएगा? हिंदू समाज की अब एक ही मांग है- बाप नवाब के उस घर पर बाबा का बुलडोजर चलना चाहिए जहाँ बैठकर ये खूनी साजिश रची गई थी!
वो घर, जो असल में आतंकवाद की फैक्ट्री बन चुका था, उसे मिट्टी में मिला देना चाहिए ताकि इनकी आने वाली पुश्तें भी किसी काफिर की तरफ आंख उठाने से पहले हजार बार सोचें।
जब तक इन सातों जिहादी दरिंदों को फांसी के फंदे पर नहीं लटकाया जाता या इनका भी यही हश्र नहीं होता, तब तक सूर्या की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।
