कभी-कभी सोचकर ही पसीना आ जाता है की अगर इस देश का हिंदू 2014 में नहीं जागता, तो आज हमारा क्या हश्र होता! हम उस खौफनाक खाई के बिल्कुल किनारे पर खड़े थे जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
आज हम जिस आज़ादी से अपनी बात रख पा रहे हैं, वो आज़ादी 2011 में ही हमेशा-हमेशा के लिए कुचली जाने वाली थी। कांग्रेस की यूपीए (UPA) सरकार ने एक ऐसा खौफनाक और जेहादी ड्राफ्ट तैयार कर लिया था, जिसका इकलौता मकसद था बहुसंख्यक हिंदुओं के गले में पट्टा डालकर उन्हें उनके ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना देना।
इस बिल का नाम था- ‘प्रिवेंशन ऑफ कम्युनल एंड टारगेटेड वायलेंस बिल 2011’ (Communal Violence Bill 2011)। कागज़ों पर और सेक्युलर मीडिया के कैमरों पर इसे ऐसे बेचा जा रहा था मानो ये दंगे रोकने का कोई बहुत महान कानून हो।
लेकिन जब आप इस बिल के पन्ने पलटेंगे, तो आपको इसमें संविधान की आत्मा नहीं, बल्कि औरंगज़ेब के उसी खौफनाक शरिया कानून की बदबू आएगी जिसने हमारे पूर्वजों का खून बहाया था।
ये कानून एक ऐसा ‘डेथ वारंट’ था जिसे कांग्रेस ने सिर्फ और सिर्फ अपने उस मुस्लिम वोटबैंक को पालने और जिहादियों को खुली छूट देने के लिए तैयार किया था।
इस बिल का सीधा सा एजेंडा था की अगर देश में कहीं भी कोई मज़हबी दंगा होता है, अगर जिहादियों की कोई भीड़ सड़कों पर उतरकर आगजनी करती है, तो पुलिस उन जिहादियों को छुएगी भी नहीं।
और अगर किसी हिंदू ने अपनी जान, अपनी बहन-बेटियों की इज़्ज़त या अपने घर को बचाने के लिए डंडा भी उठा लिया, तो पुलिस उस हिंदू को रातों-रात गिरफ्तार करके जेल में सड़ा देगी।
ज़रा सोचिए इस गद्दारी को! ये सेक्युलरिज्म का वो खौफनाक नंगा नाच था जहाँ जिहादियों को दंगा करने का ‘लीगल लाइसेंस’ दिया जा रहा था और अपना बचाव करने वाले हिंदुओं को पैदाइशी मुजरिम घोषित किया जा रहा था।
अगर ये बिल उस वक्त संसद से पास हो जाता, तो आज भारत के हिंदू अपने ही देश में गुलाम होते और ये जिहादी हमारी छाती पर चढ़कर अपना शरिया राज चला रहे होते।
सोनिया गांधी की NAC का वो गैंग जिसने लिखा था हिन्दुओं की बर्बादी का फरमान- ‘कम्युनल वायलेंस बिल’
अब ज़रा इस बात पर गौर कीजिए की इस हिंदू-विरोधी बिल को बनाने वाले लोग आखिर थे कौन? क्या ये हमारे चुने हुए सांसद थे? क्या ये देश के बड़े और निष्पक्ष कानूनविद थे? बिल्कुल नहीं!
इस खौफनाक ड्राफ्ट को एक ऐसी असंवैधानिक और गैर-कानूनी संस्था ने बंद कमरों में बैठकर तैयार किया था, जिसे देश की जनता ने कभी वोट ही नहीं दिया था। उस संस्था का नाम था- नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (NAC – National Advisory Council)।
इस NAC की चेयरपर्सन थीं सोनिया गांधी। ये एक ऐसा ‘सुपर कैबिनेट’ था जो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी पूरी सरकार के भी ऊपर बैठकर देश चला रहा था।
सोनिया गांधी ने इस NAC में चुन-चुन कर उन अर्बन नक्सलियों, विदेशी फंडेड एनजीओ वालों और घोर हिंदू-विरोधी वामपंथियों को भर रखा था, जिनकी पूरी ज़िंदगी सिर्फ और सिर्फ सनातन धर्म को गालियां देने और जिहादियों की पैरवी करने में बीती थी।
इस खौफनाक बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी में कौन लोग थे? इसमें हर्ष मंदर जैसा वो घोषित वामपंथी था जो आज भी सीएए (CAA) के विरोध में जिहादियों की भीड़ को भड़काता हुआ नज़र आता है।
इसमें तीस्ता सीतलवाड़ (Teesta Setalvad) थी, जिसने गुजरात दंगों के नाम पर दशकों तक फर्जी सबूत गढ़कर देश को बदनाम किया। इसमें असगर अली इंजीनियर और जॉन दयाल जैसे वो लोग बैठे थे, जिन्हें हिंदू शब्द सुनते ही मिर्ची लग जाती है।
अरे भाई, जब तुम ऐसे कसाइयों के हाथ में कानून लिखने की कलम दे दोगे, तो वो क्या लिखेंगे? वो तो हिंदुओं की बर्बादी का ही फरमान लिखेंगे ना!
इन गद्दारों ने विदेशी ताकतों और वेटिकन के इशारे पर एक ऐसा ड्राफ्ट तैयार किया जो अंग्रेज़ों के उस ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871’ से भी ज़्यादा क्रूर था, जिसमें अंग्रेज़ों ने कुछ भारतीय जातियों को पैदाइशी अपराधी मान लिया था।
इन वामपंथी गिद्धों ने ये तय कर लिया की अब से इस देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज एक मुजरिम समाज माना जाएगा। इन्होंने भारत के न्याय तंत्र को पूरी तरह से जिहादी इकोसिस्टम के पैरों में गिरवी रखने की वो साज़िश रची थी जिसे सुनकर आज भी हर सच्चे सनातनी का खून खौल उठता है।
‘ग्रुप’ और ‘अदर्स’ की खौफनाक परिभाषा जहाँ हर हिन्दू को पैदाइशी दंगाई और जिहादियों को मासूम घोषित कर दिया गया
इस बिल का जो सबसे ज़हरीला और रूह कंपा देने वाला हिस्सा था, वो था इसका सेक्शन 3(e) (Section 3(e))। यही वो फ्रॉड था जिसने इस पूरे बिल को एक ‘जिहादी मेनिफेस्टो’ बना दिया था। कांग्रेस की उस NAC ने इस बिल में देश के नागरिकों को दो हिस्सों में बांट दिया। पहला हिस्सा था ‘ग्रुप’ (Group) और दूसरा हिस्सा था ‘अदर्स’ (Others)।
बिल के हिसाब से ‘ग्रुप’ का मतलब था धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक (यानी सीधे शब्दों में मुसलमान और ईसाई)। और ‘अदर्स’ का मतलब था देश का बहुसंख्यक वर्ग (यानी 100 करोड़ हिंदू)।
अब ज़रा इस लीगल फ्रॉड को सुनिए। इस कानून में डंके की चोट पर ये लिख दिया गया की “कम्युनल वायलेंस (सांप्रदायिक हिंसा) का शिकार सिर्फ और सिर्फ कोई ‘ग्रुप’ (अल्पसंख्यक) ही हो सकता है।”
मतलब समझ रहे हैं आप? कांग्रेस ने कानून की किताब में ये दर्ज कर दिया की इस देश में दंगा सिर्फ हिंदू करता है और अल्पसंख्यक हमेशा पीड़ित (Victim) होता है!
अगर कोई मुस्लिम भीड़ हथियारों के साथ किसी हिंदू मोहल्ले में घुस जाए, 100 हिंदुओं के घरों में आग लगा दे, हिंदू दुकानों को लूट ले और दर्जनों हिंदुओं की हत्या कर दे, तो भी इस बिल के तहत उन जिहादियों पर ‘दंगे’ का केस दर्ज हो ही नहीं सकता था! क्यों? क्योंकि कानून के हिसाब से तो अल्पसंख्यक दंगाई हो ही नहीं सकता!
और अगर उसी हिंदू मोहल्ले के कुछ नौजवान अपनी मां-बहनों की इज़्ज़त बचाने के लिए, अपनी जान बचाने के लिए पलटवार कर दें और डंडा उठा लें, तो रातों-रात पुलिस उन हिंदुओं को ‘दंगाई’ घोषित करके गिरफ्तार कर लेगी! क्योंकि बिल कहता था की दंगाई सिर्फ बहुसंख्यक (हिंदू) ही हो सकता है।
ये क्या था भाई? ये सीधे-सीधे जिहादियों को कानूनी क्लीन चिट देने और उन्हें हिंदुओं को खुलेआम काटने का लाइसेंस देने वाला फ्रॉड था! अगर ये बिल पास हो जाता, तो कल को ओवैसी या किसी और कट्टरपंथी का समर्थक चौराहे पर खड़ा होकर तलवार लहराता और पुलिस खड़ी तमाशा देखती।
क्योंकि पुलिस को पता होता की अगर हमने इस अल्पसंख्यक को पकड़ा, तो हम ही जेल जाएंगे। कांग्रेस ने इस बिल के ज़रिए पूरे के पूरे हिंदू समाज को एक ‘पैदाइशी आतंकवादी’ और ‘अपराधी’ घोषित करने का वो पाप किया था, जिसे ये देश सदियों तक नहीं भूल सकता।
हिन्दू बेटियों के साथ ज़ुल्म हो या मंदिर तोड़े जाएं, इस कानून के तहत हिन्दुओं के लिए अदालत के दरवाज़े हमेशा के लिए थे बंद
अगर आपको लग रहा है की बात सिर्फ दंगों तक सीमित थी, तो आप इस बिल के उस अंधेरे कुएं को अभी तक नहीं समझ पाए हैं जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन में ज़हर घोलने वाला था।
ज़रा उन घटनाओं को याद कीजिए जो इस देश के इतिहास पर सबसे बड़ा कलंक हैं। गोधरा में जो हुआ, जब साबरमती एक्सप्रेस की बोगी नंबर एस-6 (S-6) को बाहर से कुंडी लगाकर ज़िंदा जला दिया गया था और उसमें हमारे 59 कारसेवक, औरतें और बच्चे भून दिए गए थे।
अगर 2011 का ये कांग्रेसी ‘कम्युनल वायलेंस बिल’ उस वक्त लागू होता, तो गोधरा में ज़िंदा जले वो 59 हिंदू ‘सांप्रदायिक हिंसा’ के पीड़ित माने ही नहीं जाते! उन्हें कोई न्याय नहीं मिलता।
क्यों? क्योंकि उन्हें ज़िंदा जलाने वाली भीड़ अल्पसंख्यक (जिहादी) थी और मरने वाले बहुसंख्यक (हिंदू) थे। इस गद्दार बिल की नज़रों में वो सिर्फ एक सामान्य दुर्घटना या आम क्राइम होता, लेकिन कोई दंगा नहीं!
ज़रा लव जिहाद और हमारी बहन-बेटियों के साथ होने वाले खौफनाक ज़ुल्मों को देखिए। बिल में ‘यौन उत्पीड़न’ और बलात्कार को भी तभी सांप्रदायिक हिंसा का हिस्सा माना गया था, जब शिकार होने वाली औरत किसी ‘ग्रुप’ (अल्पसंख्यक) से आती हो।
मतलब अगर कल को कोई जिहादी किसी हिंदू बेटी को हाथ में कलावा बांधकर फंसाता है, उसका धर्म बदलवाने के लिए उसे प्रताड़ित करता है और सूटकेस में उसके 35 टुकड़े करके फेंक देता है… तो वो सांप्रदायिक घृणा नहीं मानी जाती।
इस बिल के तहत वो एक साधारण मर्डर का केस होता और वो जिहादी आराम से सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर छूट जाता।
लेकिन अगर गलती से किसी हिंदू लड़के ने किसी अल्पसंख्यक लड़की को कुछ कह भी दिया, तो पूरे इलाके के हिंदुओं पर कम्युनल वायलेंस और गैंग रेप जैसी खौफनाक गैर-ज़मानती धाराएं ठोक दी जातीं।
क्या ये न्याय था? ये न्याय व्यवस्था का सरेआम चीरहरण था! ये इस बात का खुला ऐलान था की इस देश में हिंदू की जान की, उसकी औरतों की इज़्ज़त की और उसके मंदिरों की कोई कीमत नहीं है।
तुम चाहे कश्मीर में हिंदुओं का नरसंहार कर दो, तुम चाहे मोपला में हिंदुओं को काट डालो, इस कानून के तहत तुम हमेशा ‘मासूम अल्पसंख्यक’ ही कहलाओगे और मरने वाला हिंदू मुजरिम कहलाएगा।
ये सीधे तौर पर शरिया कानून को पिछले दरवाज़े से भारत के संविधान पर थोपने की साज़िश थी। कांग्रेस और वामपंथी इकोसिस्टम ने ये तय कर लिया था की हिंदू को अदालत के दरवाज़े से भी धक्के मार कर निकाल दिया जाएगा ताकि वो कभी अपने खिलाफ होने वाले जिहादी जुल्मों की आवाज़ भी ना उठा सके।
पुलिस और प्रशासन के हाथ बाँधने वाला बिल का ‘कमांड रिस्पॉन्सिबिलिटी’ का वो हथियार
अब ज़रा इस काले कानून के उस पन्ने को पलटिए जहाँ से इस देश की पूरी की पूरी पुलिस और प्रशासन व्यवस्था को नपुंसक बनाने की खौफनाक साज़िश रची गई थी।
आप और हम सोचते हैं की जब कोई दंगा भड़केगा, जब कोई जिहादी भीड़ हमारे घरों की तरफ तलवारें और पेट्रोल बम लेकर दौड़ेगी, तो पुलिस हमें बचा लेगी। पुलिस लाठीचार्ज करेगी या दंगाइयों पर गोलियां चलाएगी।
लेकिन कांग्रेस की उस सोनिया गांधी वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (NAC) ने पुलिस के हाथ-पैर बांधने का पूरा इंतज़ाम इस बिल में कर दिया था।
इस गद्दार ड्राफ्ट में एक क्लॉज़ डाला गया था जिसका नाम था- ‘कमांड रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (Command Responsibility)।
सुनने में ये बहुत भारी-भरकम अंग्रेज़ी का शब्द लगता है, लेकिन इसका सच ये था की अगर किसी ज़िले में दंगा होता है और उसमें किसी अल्पसंख्यक (जिहादी) को ज़रा सी खरोंच भी आ जाती है, तो उस इलाके के डीएम (DM) और एसपी (SP) को सीधे तौर पर ज़िम्मेदार मानकर उन्हें जेल की काल कोठरी में सड़ा दिया जाएगा।
उन पर गैर-ज़मानती धाराएं ठोक दी जाएंगी की तुमने अल्पसंख्यकों को क्यों नहीं बचाया!
अगर ये कानून पास हो गया होता, तो क्या कोई हिंदू पुलिस अफसर या कोई भी आम सरकारी अधिकारी किसी जिहादी भीड़ पर गोली चलाने का ऑर्डर देने की हिम्मत जुटा पाता? बिल्कुल नहीं!
वो डीएम और एसपी हाथ पर हाथ रखकर खड़े रहते। वो देखते रहते की जिहादी भीड़ पूरे के पूरे हिंदू मोहल्ले को जला कर राख कर रही है, हमारी औरतों की इज़्ज़त लूट रही है, लेकिन वो पुलिस वाले अपनी रिवॉल्वर बाहर नहीं निकालते।
उस वक्त देश के बड़े-बड़े वकीलों और कानूनविदों (जैसे मुकुल रोहतगी) ने सिर पकड़ लिया था। उन्होंने डंके की चोट पर कहा था की ये बिल पुलिस का मनोबल हमेशा के लिए खत्म कर देगा।
देश की खाकी वर्दी को इन दाढ़ी वाले कट्टरपंथियों के जूतों तले झुकाने का इससे बड़ा और खौफनाक षड्यंत्र आज तक किसी ने नहीं रचा था।
नरेंद्र मोदी की वो गर्जना और राष्ट्रवादियों का प्रचंड शंखनाद, कैसे कूड़ेदान में फेंका गया हिन्दुओं को मिटाने वाला ये जिहादी बिल
अब आप सोच रहे होंगे की जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, सोनिया गांधी की वो असंवैधानिक ‘सुपर कैबिनेट’ (NAC) पूरी ताकत से इस बिल को लागू करने पर तुली थी, तो फिर ये गद्दार कानून पास होने से रुक कैसे गया?
आखिर वो कौन सी ताकत थी जिसने इस जिहादी ड्राफ्ट को फाड़कर कूड़ेदान में फेंकने पर मजबूर कर दिया? भाई, इसका जवाब इस देश के उन गिने-चुने राष्ट्रवादियों की हुंकार में छुपा है जिन्होंने वक्त रहते इस ज़हरीले सांप का फन कुचल दिया था।
जब ये बिल ड्राफ्ट हो रहा था, तब दिल्ली में बैठे वामपंथियों को लगा था की हिंदू हमेशा की तरह सोता रहेगा। लेकिन उन्हें ये नहीं पता था की गुजरात की धरती पर एक ऐसा हिंदू शेर बैठा है, जिसकी नज़र से ये जिहादी साज़िश छुपने वाली नहीं है।
उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। जैसे ही मोदी जी ने इस बिल के पन्ने पलटे, उन्हें एक ही सेकंड में समझ आ गया की ये कानून नहीं, बल्कि बहुसंख्यक हिंदुओं की मौत का फरमान है।
नरेंद्र मोदी ने तुरंत एक ऐसा आक्रामक मोर्चा खोला जिसने कांग्रेस और उस पूरे लिबरल इकोसिस्टम की नींव हिला दी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक बेहद कड़ी चिट्ठी लिखी और डंके की चोट पर कहा की ये बिल “Recipe for Disaster” है।
मोदी जी ने पूरे देश को सचेत किया की ये कानून सिर्फ दंगे रोकने के लिए नहीं है, बल्कि ये भारत के संघीय ढांचे की हत्या है। उन्होंने साफ कहा की ये वामपंथी और अल्पसंख्यक एनजीओ सीधे तौर पर राज्य की पुलिस और प्रशासन को अपने जूतों तले दबाना चाहते हैं ताकि जिहादियों को खुली छूट मिल सके।
मोदी जी की उस सिंह गर्जना ने पूरे देश के सियासी माहौल में आग लगा दी। जो बाकी राज्यों के मुख्यमंत्री (जैसे जयललिता, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक) पहले सो रहे थे, उन्हें भी समझ में आ गया की अगर ये बिल पास हुआ, तो उनके हाथ से पुलिस की पावर हमेशा के लिए छिन जाएगी और दिल्ली में बैठी सोनिया गांधी की कमिटी सीधे उनके राज्यों में हुक्म चलाएगी।
अपनी कुर्सी खिसकते देख इन गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने भी इस बिल के खिलाफ बगावत कर दी।
संसद के अंदर क्या हुआ था? संसद में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे बीजेपी के दिग्गजों ने इस जिहादी बिल के चीथड़े उड़ा कर रख दिए थे। उन्होंने खुलेआम कांग्रेस की आंखों में आंखें डालकर पूछा की “तुम ये कैसे तय कर सकते हो कि दंगाई सिर्फ बहुसंख्यक ही होगा?
क्या बहुसंख्यक महिलाओं की इज़्ज़त नहीं होती? क्या बहुसंख्यक समुदाय के लोग नहीं मारे जाते?” उनके इन तीखे सवालों का कांग्रेस के किसी भी गद्दार मंत्री के पास कोई जवाब नहीं था।
और सबसे बड़ा काम किया ज़मीन पर लड़ रहे हमारे हिंदूवादी संगठनों (RSS और VHP) ने। जब इस अंग्रेजी में लिखे गए ज़हरीले बिल का हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करके देश के आम हिंदुओं तक पहुंचाया गया, तो पूरे देश के हिंदू समाज का खून खौल उठा।
हिंदू समाज के इस खौफनाक गुस्से और 2014 के आने वाले चुनावों में अपनी ज़मानत ज़ब्त होने के डर से कांग्रेस की पैंट गीली हो गई। उन्हें समझ आ गया की अगर अब उन्होंने हिंदुओं के सब्र का और इम्तिहान लिया, तो उनका नामोनिशान मिट जाएगा।
उसी डर के कारण, भारी मन से, कांग्रेस और उन वामपंथी कसाइयों को अपना ये जिहादी बिल ठंडे बस्ते में डालना पड़ा और अंततः ये हमेशा के लिए कूड़ेदान में चला गया।
अगर उस वक्त मोदी जी और हिंदूवादी संगठनों ने ये दीवार नहीं खड़ी की होती, तो आज हम और आप इस देश में खुली सांस नहीं ले रहे होते, बल्कि किसी जिहादी जेल में अपनी बेगुनाही की भीख मांग रहे होते!
आज के हर सनातनी को ये खौफनाक इतिहास अपने बच्चों को रटाना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए की कैसे ये सेक्युलरिज्म का ज़हरीला सांप हमें डसने के लिए फन फैलाए बैठा था।
और एक और बात याद रखना.. ये बिल अभी मरा नहीं है, ये सिर्फ ठंडे बस्ते में गया है। जिस दिन ये गद्दार कांग्रेस दोबारा सत्ता में वापस आयी, इनका सबसे पहला काम इसी हिंदू-विरोधी बिल को पास कराना होगा। इसलिए किसी भी हालत में कांग्रेस को सत्ता में वापस नहीं आने देना है।
जय श्री राम!
