51 युद्ध, एक भी नहीं हारीं, हिन्दू शेरनी 'रानी दुर्गावती', जिसने एक ही दिन में 3,000 जिहादी मुगलों का सर किया धड़ से अलग, जिंदगी भर अकबर को रखा दहसत में

51 युद्ध, एक भी नहीं हारीं, हिन्दू शेरनी ‘रानी दुर्गावती’, जिसने एक ही दिन में 3,000 जिहादी मुगलों का सर किया धड़ से अलग, जिंदगी भर अकबर को रखा दहसत में

जब पूरा उत्तर भारत मुगलों के खौफ और उनकी जिहादी आंधी से कांप रहा था, तब गोंडवाना की माटी में एक ऐसी साक्षात भवानी बैठी थी, जिसने अकबर के दिल्ली के तख्त को हिला कर रख दिया था। उनका नाम था- रानी दुर्गावती!

ये सनातन धर्म की वो खूंखार शेरनी थीं, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में एक-दो नहीं, पूरे 51 युद्ध लड़े और आपको जानकर गर्व होगा की उन 51 युद्धों में से ये शेरनी एक भी युद्ध नहीं हारी!

एक अकेली हिंदू वीरांगना ने जिहादियों के ऐसे छक्के छुड़ाए की मुगलों को समझ ही नहीं आता था की ये औरत है या साक्षात रणचंडी! इस देश का इतिहास मुगलों की उन गंदी हरम की कहानियों से नहीं बना है।

हमारा असली इतिहास हमारी उन देवियों के खून से लिखा गया है जिनकी तलवार की प्यास मुगलों के खून से बुझती थी।

कालिंजर की माटी से उठी वो भवानी जिसने पति की मौत के बाद गोंडवाना को बनाया अजेय हिन्दू स्वराज्य

रानी दुर्गावती के खून में वो राजपूती और सनातनी आग बचपन से ही खौल रही थी। उनका जन्म 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था। दिन था पवित्र दुर्गाष्टमी का!

और दुर्गाष्टमी के दिन जन्म लेने के कारण ही कालिंजर के चंदेल राजपूत राजा कीर्तिसिंह ने अपनी इस बेटी का नाम ‘दुर्गावती’ रखा था।

ये वही चंदेल वंश था जिसने खजुराहो के भव्य हिंदू मंदिर बनवाए थे और विदेशी आक्रांताओं (महमूद गजनवी) को खदेड़ कर उसकी औकात याद दिलाई थी।

जब ये भवानी बड़ी हुई, तो उनका विवाह गढ़ा-मंडला (गोंडवाना) के राजा दलपत शाह के साथ हुआ। सब कुछ बहुत बढ़िया चल रहा था, लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

विवाह के कुछ ही सालों बाद राजा दलपत शाह का अचानक निधन हो गया। उस वक्त रानी दुर्गावती की गोद में उनका महज़ 5 साल का बेटा ‘वीर नारायण’ था।

उस दौर में जब किसी राजा की मौत हो जाती थी, तो आस-पास के दुश्मन और विदेशी लुटेरे उस राज्य को नोचने के लिए गिद्धों की तरह मंडराने लगते थे। सबको लगा की अब तो गढ़ा-मंडला अनाथ हो गया है, एक कमज़ोर औरत और 5 साल का बच्चा क्या ही कर लेंगे!

कोई आम औरत होती तो शायद रो-रोकर अपनी किस्मत को कोसती या किसी और राजा की शरण में चली जाती। लेकिन दुर्गावती चंदेलों की बेटी थीं, उनकी रगों में क्षत्राणी का खून दौड़ रहा था।

उन्होंने अपने आंसू पोंछे, अपने 5 साल के बेटे को सिंहासन पर बिठाया और खुद गोंडवाना की कमान अपने हाथों में ले ली। और उसके बाद रानी ने जो राज किया, उसने पूरे भारतवर्ष में एक ऐसा अजेय ‘हिंदू स्वराज्य’ खड़ा कर दिया की किसी भी जिहादी की वहां पैर रखने की हिम्मत नहीं हुई।

रानी दुर्गावती ने लगातार 16 साल तक गोंडवाना पर राज किया। उन्होंने 52 भव्य गढ़ (किले) बनवाए। उनके राज में गोंडवाना इतना अमीर और ताकतवर हो गया था की वहां के आम किसान और व्यापारी अपना लगान (Tax) सिक्कों में नहीं, बल्कि सीधे सोने (Gold) और हाथियों के रूप में चुकाते थे।

रानी ने जबलपुर के पास अपनी राजधानी बनाई और अपने राज्य में तालाब, बावड़ियां और भव्य मंदिरों का निर्माण कराया।

मालवा के जिहादी सुल्तान बाज़ बहादुर का खौफनाक हश्र, रानी दुर्गावती के हाथों मरने के डर से कुत्ता बन के भागा

गोंडवाना की ये अकूत दौलत और शांति मुगलों और आस-पास के जिहादी सुल्तानों की आंखों में खटकने लगी थी। उन्हें पच नहीं रहा था की एक काफिर हिंदू औरत इतने बड़े राज्य पर इतनी शान से कैसे राज कर रही है। मुगलों के हमला करने से पहले मालवा के सुल्तान बाज़ बहादुर को एक बहुत बड़ी गलतफहमी हो गई।

बाज़ बहादुर वही सुल्तान था जो अपने हरम और अय्याशियों के लिए जाना जाता था। उस घमंडी जिहादी को लगा की अरे, गोंडवाना में तो एक ‘औरत’ का राज है, उसे तो मैं अपनी भारी-भरकम फौज लेकर चुटकियों में कुचल दूंगा और गोंडवाना की सारी दौलत मेरी हो जाएगी।

इसी घमंड में चूर होकर बाज़ बहादुर ने अपनी विशाल जिहादी फौज के साथ गोंडवाना पर धावा बोल दिया।

लेकिन उस बेवकूफ सुल्तान को ये नहीं पता था की उसका पाला किसी आम औरत से नहीं, बल्कि रणचंडी दुर्गावती से पड़ा है। जैसे ही रानी को बाज़ बहादुर के हमले की खबर मिली, उन्होंने अपनी सेना को तैयार किया और हाथी पर सवार होकर खुद युद्ध के मैदान में उतर गईं।

रानी दुर्गावती ने मालवा के उन जिहादियों को ऐसा काटना शुरू किया की उनकी पूरी की पूरी फौज मैदान छोड़कर भागने लगी। रानी की तलवार मुगलों और जिहादियों के सिर ऐसे काट रही थी जैसे कोई खेत में गाजर-मूली काटता है।

बाज़ बहादुर के तो पसीने छूट गए! वो जिहादी सुल्तान, जो गोंडवाना लूटने के सपने देख रहा था, अपनी जान बचाने के लिए एक कायर कुत्ते की तरह अपनी सेना को वहीं मरने के लिए छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

गोंडवाना की दौलत और अकबर की वो जिहादी हवस, जब आसफ खान को लाखों की फौज के साथ भेजा गया

मालवा के सुल्तान की इस भयंकर हार की खबर उड़ते-उड़ते दिल्ली के तख्त तक पहुंच गई। दिल्ली में उस वक्त वो अय्याश और क्रूर जिहादी अकबर बैठा था। अकबर की गिद्ध वाली नज़रें गोंडवाना की उस अथाह दौलत और रानी दुर्गावती के साम्राज्य पर गड़ गईं।

अकबर को दौलत तो चाहिए ही थी, लेकिन उसे सबसे ज़्यादा खुन्नस इस बात की थी की एक स्वतंत्र हिंदू राज्य मुगलों की गुलामी क्यों नहीं स्वीकार कर रहा है। अकबर की हवस गोंडवाना के खज़ाने और रानी दुर्गावती के सफेद और विशालकाय हाथी (जिसका नाम ‘सरमन’ था) पर थी।

अकबर ने अपने सबसे खूंखार, ज़ालिम और बर्बर सूबेदार ‘आसफ खान’ को गोंडवाना पर हमला करने का हुक्म दे दिया।

साल था 1564! आसफ खान गोंडवाना को लूटने और रानी को बंदी बनाने के लिए 50,000 से भी ज़्यादा सैनिकों की भारी-भरकम जिहादी फौज लेकर निकल पड़ा। मुगलों की उस फौज में खूंखार सैनिक, भारी तोपखाना, बंदूकें और बारूद सब कुछ था।

जब आसफ खान की फौज की खबर गोंडवाना पहुंची, तो रानी के कुछ मंत्रियों और सलाहकारों के हाथ-पैर फूल गए। उन्होंने रानी दुर्गावती से हाथ जोड़कर कहा की “महारानी!

मुगलों की फौज बहुत बड़ी है, उनके पास तोपें हैं और हमारी सेना बहुत छोटी है। हमें मुगलों से संधि कर लेनी चाहिए या अकबर की गुलामी स्वीकार कर लेनी चाहिए।”

रानी ने अपने कायर मंत्रियों की तरफ देखा और डंके की चोट पर वो ऐतिहासिक हुंकार भरी जिसने गोंडवाना के हर सैनिक के खून में आग लगा दी। रानी ने दहाड़ते हुए कहा-

“कलंकित जीवन जीने से अच्छा है शान से कट जाना! मैं इन जिहादी मुगलों के आगे कभी घुटने नहीं टेकूंगी। अगर युद्ध में मौत भी आई, तो मैं उसे माथे पर सजाऊंगी, लेकिन अकबर की गुलामी कभी नहीं करूंगी!”

रानी ने उसी वक्त अपने कवच और हथियार पहने, अपने सफेद हाथी सरमन पर सवार हुईं और मुगलों को उनकी असली औकात दिखाने के लिए युद्ध का खौफनाक बिगुल फूंक दिया। एक तरफ 50,000 की भारी भरकम जिहादी फौज थी और दूसरी तरफ मुट्ठी भर हिंदू सैनिक और उनकी रानी।

नर्रई नाला का वो भयंकर महासंग्राम जहाँ रानी दुर्गावती ने एक ही दिन में 3000 जिहादी मुगलों के सिर धड़ से अलग कर दिए

आसफ खान को लग रहा था की वो अपनी 50 हज़ार की विशाल जिहादी फौज, तोपों और बंदूकों के दम पर एक ‘औरत’ को चुटकियों में डरा देगा। लेकिन मुगलों का ये गुरूर बस कुछ ही घंटों का मेहमान था। रानी दुर्गावती जानती थीं की खुले मैदान में तोपों का सामना करना समझदारी नहीं है।

रानी ने मुगलों की भारी फौज को मैदानी इलाके में लड़ने के बजाय ‘नर्रई नाला’ की तरफ खींच लिया। नर्रई नाला (जो आज के जबलपुर के पास है) एक ऐसा इलाका था जहाँ एक तरफ घने जंगल और ऊंची पहाड़ियां थीं, और दूसरी तरफ उफनती हुई गौर नदी और नर्मदा का किनारा था।

जैसे ही वो जिहादी फौज उस घाटी में फंसी, तभी सामने से अपने सफेद हाथी ‘सरमन’ पर सवार होकर गोंडवाना की भवानी साक्षात महाकाली का रूप धरकर मैदान में उतर आई। रानी दुर्गावती ने अपनी सेना को सीधे मुगलों पर टूट पड़ने का आदेश दे दिया।

भाई साहब! उस दिन नर्रई नाला की घाटी में जो खौफनाक तांडव हुआ! रानी की तलवार बिजली की तरह चमक रही थी। गोंडवाना के हिंदू वीर उन मुगलों पर ऐसे भूखे शेरों की तरह टूटे की मुगलों की बंदूकों और तोपों ने भी काम करना बंद कर दिया।

वो जिहादी सैनिक जो दिल्ली से गोंडवाना को लूटने के सपने देखकर आए थे, उनकी गर्दनें कट-कट कर ज़मीन पर गिरने लगीं।

रानी दुर्गावती ने उस दिन मुगलों को वो भयानक मौत दी की नर्रई नाले का पानी मुगलों के खून से लाल हो गया। एक ही दिन के उस भयंकर महासंग्राम में रानी की सेना ने आसफ खान की फौज के 3000 से ज़्यादा जिहादी मुगलों को काट डाला!

जी हां, 3000 मुगलों की कटी हुई लाशें उस दिन गोंडवाना की माटी पर बिछी पड़ी थीं। आसफ खान अपनी जान बचाकर वहां से दुम दबाकर पीछे हटने पर मजबूर हो गया।

जिहादियों की गुलामी पर थूका, सीने में उतार ली कटार, हिन्दू वीरांगना का वो सर्वोच्च बलिदान जो खून खौला देगा

उस दिन की शर्मनाक हार के बाद आसफ खान समझ गया था की आमने-सामने की लड़ाई में इस हिंदू शेरनी को हराना मुगलों के बाप के बस की बात नहीं है।

इसलिए अगले दिन (24 जून 1564) मुगलों ने अपनी कायरता और धोखेबाज़ी का वो नंगा खेल खेला जिसके लिए वो जाने जाते थे। आसफ खान ने रातों-रात अपना भारी तोपखाना मंगवा लिया।

रानी दुर्गावती के पास तोपें नहीं थीं, उनकी सेना मुगलों से बहुत छोटी थी। रानी ने दोबारा अपनी सेना की कमान संभाली और मुगलों की तोपों के सामने सीना तानकर खड़ी हो गईं।

इस युद्ध में उनके 19 साल के नौजवान बेटे वीर नारायण ने भी मुगलों के छक्के छुड़ा दिए थे। लेकिन युद्ध करते-करते वीर नारायण गंभीर रूप से घायल हो गए। रानी ने अपने सैनिकों से कहा की मेरे बेटे को सुरक्षित स्थान पर ले जाओ, मैं इन जिहादियों को अकेले ही देख लूंगी।

मुगल दूर से तोपें और तीर चला रहे थे। तभी एक ज़हरीला तीर सनसनाता हुआ आया और रानी दुर्गावती की गर्दन में जा लगा। रानी ने बिना कोई आह भरे उस तीर को अपने हाथों से खींच कर बाहर निकाल फेंका।

कुछ ही देर बाद एक और तीर सीधा उनकी आंख में जा घुसा। रानी ने उस तीर को भी निकाल फेंका, लेकिन उस तीर के साथ उनकी आंख का कुछ हिस्सा भी बाहर आ गया। रानी बुरी तरह से खून से लथपथ हो चुकी थीं।

जब रानी को लगा की अब उनका शरीर जवाब दे रहा है और मुगलों की वो दरिंदे और नापाक जिहादी फौज उनके करीब आ रही है, तो उस हिंदू शेरनी ने वो फैसला लिया जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।

रानी दुर्गावती किसी भी कीमत पर मुगलों के नापाक हाथों में ज़िंदा नहीं पड़ना चाहती थीं। उन्होंने अपने वफादार महावत (आधार सिंह) को आदेश दिया की “आधार सिंह, अपनी तलवार निकालो और मेरा सिर धड़ से अलग कर दो! मैं इन जिहादी कुत्तों के हाथ नहीं आना चाहती।”

लेकिन एक वफादार महावत अपनी ही महारानी का सिर कैसे काट सकता था? उसने रोते हुए मना कर दिया। तब उस रणचंडी ने किसी का इंतज़ार नहीं किया।

रानी दुर्गावती ने खुद अपनी म्यान से अपनी कटार निकाली और मुगलों की गुलामी पर थूकते हुए, उस कटार को अपने ही सीने में घोंप लिया।

भारत माता की उस महान बेटी ने सनातन धर्म, अपने स्वाभिमान और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। लेकिन मरते दम तक उस हिंदू शेरनी ने अकबर की गुलामी स्वीकार नहीं की।

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