एक वक्त था जब भारत एक गरीब और कमज़ोर देश हुआ करता था। और इन गोरे अंग्रेज़ों और पश्चिमी देशों को वो रेंगता हुआ भारत बहुत पसंद आता था। तब ये हमारी पीठ थपथपाते थे की “वाह, क्या महान लोकतंत्र है!”
लेकिन आज? आज जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने की राह पर दौड़ रहा है, आज जब 100 करोड़ सनातनी अपनी हज़ारों साल पुरानी पहचान और राम मंदिर पर गर्व कर रहे हैं, तो इन पश्चिमी देशों और लिबरल गिद्धों के पेट में भयंकर मरोड़ उठने लगी है।
अरे भाई, अब इनका जंग का तरीका बदल चुका है। अब ये गोरे और मज़हबी आका भारत पर मिसाइलें या टैंक लेकर हमला नहीं करते। आज का युद्ध लड़ा जा रहा है कीबोर्ड से, कैमरों से और अरबों डॉलर की विदेशी फंडिंग से!
ये एक ऐसा खौफनाक ‘इन्फॉर्मेशन वॉर’ है, जिसका सीधा और इकलौता मकसद है- भारत की चुनी हुई मजबूत राष्ट्रवादी सरकार को दुनिया भर में बदनाम करना और हिंदू समाज को एक ‘विलेन’ या ‘तानाशाह’ साबित कर देना।
ज़रा आंखें खोलकर देखिए की BBC, Al Jazeera, न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट जैसे ये नामी-गिरामी विदेशी मीडिया हाउस असल में कर क्या रहे हैं। ये कोई पत्रकारिता-वत्रकारिता नहीं कर रहे हैं! ये बाकायदा एक ‘टूलकिट’ चला रहे हैं।
ये एक ‘डिजिटल आतंकवाद’ है जहाँ रोज़ सुबह उठकर एक ही एजेंडा सेट किया जाता है की कैसे भारत को एक असहिष्णु देश बताया जाए, कैसे सनातन धर्म को दुनिया के सामने सबसे क्रूर और अंधविश्वासी साबित किया जाए।
BBC का सफेद झूठ और ‘कोलोनियल’ घमंड, भारत का खाकर भारत को ही डसने वाले इस ब्रिटिश भोंपू का नंगा सच
चलिए इस खौफनाक साज़िश की शुरुआत उस ‘बीबीसी’ से करते हैं, जिसे हमारे देश के कुछ लिबरल और काले अंग्रेज़ आज भी पत्रकारिता का भगवान मानते हैं।
बीबीसी यानी ‘ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन’। ज़रा ब्रिटेन की आज की असली औकात तो देखिए! उनका अपना देश आर्थिक कंगाली की कगार पर खड़ा है, वहां के शहरों में कट्टरपंथियों की भीड़ दंगे कर रही है, वहां के लोग रोज़गार के लिए त्राहि-त्राहि कर रहे हैं और उनके प्रधानमंत्री ऐसे बदल रहे हैं जैसे कोई कपड़े बदलता है।
लेकिन इनका औपनिवेशिक घमंड देखिए! ये आज भी उसी खुमारी में जी रहे हैं की ये दुनिया के आका हैं और इन्हें भारत को ‘लोकतंत्र’ का ज्ञान बांटने का पूरा हक़ है।
बीबीसी का असली और नंगा चेहरा तब सामने आया जब इन्होंने ‘द मोदी क्वेश्चन’ (The Modi Question) नाम की एक प्रोपेगेंडा डॉक्यूमेंट्री रिलीज़ की।
अरे भाई, गुजरात दंगों को लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट ने, जो इस देश की सबसे बड़ी और सर्वोच्च न्यायपालिका है, उसने बाकायदा सालों की जांच के बाद प्रधानमंत्री मोदी को पूरी तरह से क्लीन चिट दे दी थी।
लेकिन इस ब्रिटिश भोंपू को भारत की सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं है! ये गोरे लंदन बैठकर अपनी खुद की एक ‘अदालत’ चलाते हैं।
इनका सिर्फ एक ही एजेंडा था- 2024 और उसके बाद के चुनावों से पहले देश का माहौल बिगाड़ना और दुनिया में ये ढिंढोरा पीटना की भारत में मुसलमान खतरे में हैं।
और जब भारत सरकार ने इनकी हेकड़ी निकाली, तो जो सच बाहर आया वो किसी भी सच्चे हिंदुस्तानी का खून खौलाने के लिए काफी है।
जब भारत के इनकम टैक्स विभाग ने बीबीसी के दिल्ली और मुंबई दफ्तरों पर छापा मारा, तो ये पूरा वामपंथी इकोसिस्टम छाती पीट-पीटकर रोने लगा की “हाय रे! प्रेस की आज़ादी खतरे में आ गई।”
लेकिन छापे में मिला क्या? वहां मिली करोड़ों रुपयों की टैक्स चोरी! ये लोग भारत की ज़मीन का इस्तेमाल कर रहे थे, भारत के संसाधनों से अरबों रुपये कमा रहे थे, और जब टैक्स देने की बारी आती थी, तो विदेशी कंपनियों के ज़रिए पैसों की हेराफेरी कर देते थे।
मतलब, भारत का खाएंगे, भारत का पैसा लूटेंगे और उसी पैसे से भारत की ही पीठ में खंजर घोंपेंगे! ये पत्रकारिता नहीं है भाई, ये एक बिकाऊ और गद्दार सिस्टम है जिसे ब्रिटेन के बैठे आका भारत को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
Al Jazeera का खौफनाक एजेंडा, कतर के पैसो पर पलने वाला ये जिहादी चैनल कैसे भारत और सनातन के खिलाफ उगल रहा ज़हर
अगर बीबीसी वामपंथियों का भोंपू है, तो ज़रा उस ‘अल जज़ीरा’ (Al Jazeera) के खौफनाक एजेंडे को भी समझ लीजिए जो सीधे तौर पर जिहादियों का ग्लोबल पीआर (PR) एजेंट बनकर काम कर रहा है।
ये चैनल कोई आज़ाद मीडिया हाउस नहीं है। ये पूरी तरह से कतर (Qatar) के राजशाही परिवार के पेट्रो-डॉलर (Petro-dollars) पर पलने वाला एक भौंकता हुआ माइक है।
ज़रा इस दोगलेपन की इंतेहा देखिए! जिस कतर देश में लोकतंत्र नाम की कोई चीज़ नहीं है, जहाँ राजा का हुक्म ही आखिरी कानून है, जहाँ महिलाओं को सिर से पैर तक काले बोरे में कैद करके रखा जाता है, जहाँ मज़दूरों को जानवरों की तरह मारकर स्टेडियम बनवाए जाते हैं… उस देश का सरकारी चैनल आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र (भारत) को मानवाधिकार और ‘अल्पसंख्यक अधिकारों’ पर ज्ञान बांट रहा है!
अल जज़ीरा का भारत को लेकर एक फिक्स एजेंडा है। जब भी इस देश में कोई त्योहार होता है, चाहे वो रामनवमी हो या हनुमान जयंती, और जब जिहादियों की भीड़ हमारी शोभा यात्राओं पर छतों से पत्थर और पेट्रोल बम बरसाती है, तो अल जज़ीरा की न्यूज़ रिपोर्टिंग क्या कहती है?
ये बेशर्म चैनल उन पत्थरबाज़ों को ‘मज़लूम’ और ‘पीड़ित’ बताता है! ये अपनी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में ऐसा नैरेटिव सेट करते हैं मानो भारत के बहुसंख्यक हिंदू बिना बात के उन बेचारों को डरा रहे हैं।
इनका मकसद बहुत ही खौफनाक और ज़हरीला है। ये अरब देशों में बैठे अपने आकाओं और वहां की कट्टरपंथी जनता को भड़काने के लिए दिन-रात भारत के खिलाफ झूठी और भड़काऊ खबरें चलाते हैं।
ये चाहते हैं की खाड़ी देशों के साथ भारत के रिश्ते खराब हो जाएं। ये चाहते हैं की भारत में जो विदेशी निवेश आ रहा है, वो रुक जाए। ये भारत की इकॉनमी की कमर तोड़ना चाहते हैं।
जब भी भारत में कोई जिहादी संगठन बैन होता है (जैसे PFI), तो अल जज़ीरा सबसे पहले रोने-धोने वाला आर्टिकल छापता है। ये चैनल पत्रकारिता के नाम पर सीधे-सीधे भारत के खिलाफ मज़हबी युद्ध लड़ रहा है, और हमारे देश के कुछ लिबरल गद्दार इनके आर्टिकल्स को शेयर करके तालियां बजाते हैं।
पश्चिमी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स से लेकर वाशिंगटन पोस्ट तक रची जा रही सनातन को झुकाने की साज़िश
इन मीडिया घरानों के पीछे का असली बाप कौन है? वो कौन है जो इन लिबरल और मज़हबी नैरेटिव्स को अरबों डॉलर का ऑक्सीजन दे रहा है? उसका नाम है- जॉर्ज सोरोस (George Soros)।
ये अमेरिका में बैठा वो 90 साल से ऊपर का खूसट और शातिर अरबपति है, जिसने खुलेआम दुनिया के सामने ये ऐलान कर दिया है की वो भारत की राष्ट्रवादी सरकार को उखाड़ फेंकेगा।
जॉर्ज सोरोस ने अपनी संस्था ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन्स’ के ज़रिए एक बिलियन डॉलर से ज़्यादा का फंड सिर्फ इसलिए रखा है ताकि वो उन देशों की सरकारें गिरा सके जो राष्ट्रवाद और अपनी मूल संस्कृति पर चलते हैं।
इसी सोरोस का पैसा घूम-फिर कर भारत के उन एनजीओ (NGOs) और वामपंथी पोर्टल्स तक पहुंचता है जो दिन-रात “संविधान खतरे में है” का रोना रोते हैं।
और अब ज़रा अमेरिका के उन तथाकथित महान अखबारों- ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ (New York Times) और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ (Washington Post)- का नंगा सच सुनिए।
अगर आप इन अखबारों को खोलकर देखेंगे, तो भारत के खिलाफ आग उगलने वाले आर्टिकल्स किसने लिखे होते हैं? क्या वो किसी गोरे अमेरिकी ने लिखे हैं? नहीं! वो आर्टिकल लिखे होते हैं हमारे ही देश के उन ‘काले अंग्रेज़ों’, वामपंथी पत्रकारों और विदेशी टुकड़ों पर पलने वाले दलालों ने।
राना अय्यूब जैसी वो पत्रकार, जिन पर खुद मनी लॉन्ड्रिंग और चंदे की हेराफेरी के केस चल रहे हैं, वो वाशिंगटन पोस्ट में बैठकर भारत को असहिष्णु बता रही होती हैं।
ये विदेशी अखबार चुन-चुन कर उन भारतीय गद्दारों को हायर करते हैं जिन्हें सनातन धर्म और भारत की तरक्की से नफरत है। डॉलर और विदेशी अवॉर्ड्स की लालच में ये ‘जयचंद’ अपनी ही मातृभूमि को सरेआम नीलाम कर रहे हैं।
इन पश्चिमी अखबारों के अंदर ‘हिंदू फोबिया’ इस कदर कूट-कूट कर भरा है की ये सनातन धर्म को खुलेआम ‘फासीवाद’ और ‘अंधराष्ट्रवाद’ कहकर गालियां देते हैं।
जब भारत चंद्रयान जैसे महान मिशन के ज़रिए चांद पर पहुंचता है, तो न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार अपनी खीझ निकालते हुए एक कार्टून छापते हैं, जिसमें एक भारतीय किसान को गाय के साथ पश्चिमी ‘एलीट’ स्पेस क्लब का दरवाज़ा खटखटाते हुए दिखाया जाता है।
ये इनकी असली औकात है! ये गोरे आज भी हमें सपेरों और गाय चराने वालों का देश ही समझना चाहते हैं। जब भारत दुनिया को अपनी ताकत दिखाता है, तो इन लिबरल सूअरों का पूरा इकोसिस्टम बौखला जाता है और ये अपनी भड़ास ऐसे ही नफरत भरे आर्टिकल्स लिखकर निकालते हैं।
Newsclick और लिबरल दलालों का खौफनाक नेटवर्क, विदेशी फंडिंग से पलने वाले इन जयचंदों का पर्दाफाश जो बेच रहे देश का स्वाभिमान
कहते हैं ना की कोई भी बाहरी दुश्मन तब तक आपके घर की दीवार नहीं गिरा सकता, जब तक की आपके अपने घर के अंदर कोई गद्दार या जयचंद ना बैठा हो।
अंग्रेज़ तो 1947 में ही ये देश छोड़कर भाग गए थे, लेकिन वो अपने पीछे दिल्ली के प्रेस क्लब और AC कमरों में ऐसे ‘काले अंग्रेज़’ छोड़ गए, जो आज चंद डॉलरों और विदेशी अवॉर्ड्स की भीख के लिए अपनी ही मातृभूमि का सरेआम चीरहरण कर रहे हैं।
ज़रा न्यूज़क्लिक (NewsClick) नाम के उस लिबरल न्यूज़ पोर्टल का खौफनाक भंडाफोड़ याद कीजिए। जब इस पोर्टल की फंडिंग का नंगा सच दुनिया के सामने आया था, तो पूरे लिबरल इकोसिस्टम की पैंट गीली हो गई थी।
जांच में क्या निकला? पता चला की अमेरिका में बैठा एक विदेशी अरबपति, नेविल रॉय सिंघम (Neville Roy Singham), जिसके तार सीधे-सीधे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे, वो इस न्यूज़ पोर्टल को करोड़ों रुपये की खौफनाक फंडिंग कर रहा था।
अरे भाई! चीन का पैसा, अमेरिका के रास्ते और दिल्ली में बैठे इन वामपंथी पत्रकारों की जेबों में! ये पैसा आखिर क्यों बांटा जा रहा था? क्या ये कोई समाज सेवा कर रहे थे? बिल्कुल नहीं! ये पैसा इसलिए दिया जा रहा था ताकि ये बिकाऊ पत्रकार अपनी कलम से भारत के खिलाफ ज़हर उगल सकें।
इनका टारगेट था की कश्मीर में हमारी सेना को विलेन बताया जाए, भारत की स्वदेशी कोविड वैक्सीन को दुनिया के सामने घटिया और खतरनाक साबित किया जाए, और देश में चल रहे हर बड़े प्रोजेक्ट को कोर्ट में केस डालकर रोक दिया जाए।
ये लोग विदेशी एजेंडे के तहत भारत के अंदर टुकड़े-टुकड़े गैंग और अलगाववादियों को हीरो बनाकर पेश कर रहे थे। जब भारत की एजेंसियां इन गद्दारों का कॉलर पकड़ती हैं, तो ये तुरंत ‘प्रेस की आज़ादी खतरे में है’ का रोना लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं।
ये कोई पत्रकार नहीं हैं भाई! ये विदेशी पे-रोल पर पलने वाले वो अर्बन नक्सल हैं, जिन्हें भारत के कमज़ोर होने पर बोनस मिलता है। जब चीन हमारे बॉर्डर पर आंखें दिखाता है, तो ये ‘डिजिटल गद्दार’ दिल्ली में बैठकर चीन के समर्थन में माहौल बनाते हैं।
ऐसे गद्दारों को तो बीच चौराहे पर खड़ा करके देशद्रोह के मुकदमे में फांसी पर लटका देना चाहिए, लेकिन हमारा सिस्टम इन्हें बेल देकर छोड़ देता है।
अब आर पार का डिजिटल धर्मयुद्ध, भारत सरकार तुरंत इन विदेशी गद्दार पोर्टल्स पर लगाए परमानेंट बैन
आज हमें ये तय करना ही होगा की हम अपने देश की संप्रभुता को इन चंद विदेशी अखबारों और वामपंथी दलालों के हाथों नीलाम नहीं होने देंगे।
अब हिंदू समाज और भारत सरकार को रक्षात्मक रवैया छोड़कर सीधा और आक्रामक हमला करना होगा। हमारी सरकार को डंके की चोट पर कहना होगा की अगर कोई भी विदेशी न्यूज़ पोर्टल या चैनल भारत की अखंडता, हमारी सेना और सनातन समाज के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाएगा, तो उसे इस देश में एक मिनट भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
ऐसे सभी गद्दार पोर्टल्स के आईपी एड्रेस (IP Address) को भारत में हमेशा-हमेशा के लिए ब्लॉक कर देना चाहिए।
अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब ये नहीं है की तुम हमारे देश को बांटने के लिए चीन या किसी अरबपति का पैसा खाकर ज़हर उगलते रहो।
जो भी भारतीय पत्रकार या एनजीओ इन विदेशी पोर्टल्स के लिए आर्टिकल लिखता है, भारत सरकार को उस पर FCRA और UAPA का सबसे कड़क डंडा चलाना चाहिए।
उन सबकी रातों-रात NIA से जांच होनी चाहिए की आखिर उन्हें भारत को गालियां देने का कितना रेट मिल रहा है। जो गद्दारी करे, उसकी सारी संपत्ति ज़ब्त करके उसे काल कोठरी में सड़ा देना ही इस बीमारी का परमानेंट इलाज है।
और सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी आज के इस हिंदू युवा की है। हमें इन गोरों के सर्टिफिकेट की कोई ज़रूरत नहीं है! ये वामपंथी इकोसिस्टम हमें क्या बताएगा की हमारा लोकतंत्र कैसा है?
हम उस सनातन धर्म को मानने वाले हैं जिसने दुनिया को तब ज्ञान दिया था जब ये गोरे गुफाओं में रहते थे। हमें अपने मोबाइलों से इन विदेशी न्यूज़ ऐप्स को उखाड़ फेंकना होगा। हमें इस ‘डिजिटल कचरे’ का पूर्ण रूप से बहिष्कार करना होगा।
भारत अब कोई गुलाम देश नहीं है जो लंदन या वाशिंगटन से आए किसी आर्टिकल को पढ़कर डर जाएगा। भारत अपनी शर्तों पर चलेगा, अपने सनातन मूल्यों पर चलेगा और अपने राष्ट्रवाद के झंडे को और ऊंचा करेगा।
विदेशी टुकड़ों पर पलने वाले इन वामपंथी गद्दारों को अब इस देश की मिट्टी में दफन करने का वक्त आ गया है।
भारत माता की जय!
