भारत का खाकर फिलिस्तीन के गुणगान, हमास के खूंखार जिहादी आतंकवादियों के लिए सर पीटने वाले कांग्रेसी गद्दारों और लिबरल कीड़ों का परमानेंट इलाज जरुरी

भारत का खाकर फिलिस्तीन के गुणगान, हमास के खूंखार जिहादी आतंकवादियों के लिए सर पीटने वाले कांग्रेसी गद्दारों और लिबरल कीड़ों का परमानेंट इलाज जरुरी

इस देश में एक ऐसा दीमक, एक ऐसा खौफनाक गद्दार इकोसिस्टम पल रहा है जो खाता तो भारत का है, लेकिन जिसके दिल की धड़कनें गाज़ा और फिलिस्तीन के खूंखार जिहादियों के लिए धड़कती हैं।

ये वो लोग हैं जिन्हें ‘उम्माह’ की बीमारी लग चुकी है। इनके लिए देश की मिट्टी, देश का संविधान और देश की सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती। इनके लिए सबसे ऊपर है वो मज़हबी कट्टरपंथ, जिसके लिए ये भारत की सड़कों पर आग लगाने से भी पीछे नहीं हटते।

ज़रा उस खौफनाक सुबह को याद कीजिए जब हमास के खूंखार और वहशी जिहादी आतंकियों ने इज़रायल की सीमा में घुसकर बर्बरता की थी! उसे सुनकर आज भी रूह कांप जाती है।

उन जिहादियों ने मासूम बच्चों के गले काटे थे। औरतों के साथ सरेआम दुष्कर्म किया था। लड़कियों की नग्न लाशों को ट्रकों के पीछे बांधकर सड़कों पर घुमाया था और ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे लगाते हुए उस क्रूरता का जश्न मनाया था।

लेकिन ज़रा याद कीजिए की उस दिन हमारे देश का ये लिबरल इकोसिस्टम क्या कर रहा था? वो मानवाधिकार का रोना रोने वाले NGO, वो वामपंथी पत्रकार और JNU के अर्बन नक्सल- उस दिन इन सबके मुंह में दही जम गया था।

जब हमास के आतंकी औरतों के साथ दुष्कर्म कर रहे थे, तब इन फेमिनिस्टों की ज़बान पर ताला लगा हुआ था। किसी के मुंह से हमास के खिलाफ एक शब्द नहीं निकला।

लेकिन जैसे ही इज़रायल ने पलटवार किया, जैसे ही इज़रायल की सेना ने हमास के उन जिहादी कुत्तों को उनके ही बिलों में घुसकर मारना शुरू किया, वैसे ही भारत में बैठे इन गद्दारों के पेट में भयंकर दर्द शुरू हो गया। ये अचानक से मानवाधिकार का झंडा लेकर सड़कों पर उतर आए। ये ‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे लगाने लगे।

ये कोई इंसानियत का दर्द नहीं है भाई। ये उस खौफनाक ‘जिहादी सिंडिकेट’ का हिस्सा है जहाँ एक मज़हब का आतंकी चाहे कितनी भी बड़ी दरिंदगी कर दे, ये लिबरल कीड़े उसे ‘आज़ादी का सिपाही’ बताकर डिफेंड करने आ जाते हैं।

ये लोग भारत में बैठकर उस हमास के लिए सर पीट रहे हैं जो अल-कायदा और लश्कर-ए-तैयबा की ही एक दूसरी खूंखार ब्रांच है।

जो इकोसिस्टम आज गाज़ा के जिहादियों के लिए रो रहा है, वो कल को कश्मीरी आतंकियों के लिए भी रोएगा। इस सड़े हुए और देशद्रोही इकोसिस्टम का परमानेंट इलाज अब देश की सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है।

वोटबैंक के लिए हमास के दरिंदों को बचाने उतरी कांग्रेस, सोनिया और राहुल की वो खौफनाक जिहादी परस्ती

अब ज़रा इस पूरे खेल के उस सबसे बड़े और खतरनाक राजनीतिक मोहरे को देखिए जिसने इस देश को हमेशा जिहादियों के तलवे चाटने पर मजबूर किया है।

वो है- कांग्रेस पार्टी! 7 अक्टूबर के हमले के तुरंत बाद कांग्रेस ने जो अपना असली रंग दिखाया, उसने साबित कर दिया की ये पार्टी सिर्फ और सिर्फ जिहादी वोटबैंक की गुलाम है।

जैसे ही इज़रायल पर वो भयंकर आतंकी हमला हुआ और पूरी दुनिया हमास की निंदा कर रही थी, तब कांग्रेस की वर्किंग कमेटी (CWC) ने एक मीटिंग बुलाई। और उस मीटिंग में क्या पास हुआ? एक ऐसा खौफनाक और शर्मनाक प्रस्ताव जिसने पूरे देश का सिर दुनिया के सामने झुका दिया।

कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने अपने प्रस्ताव में हमास के जिहादी हमले की सीधी निंदा करने से ही साफ इनकार कर दिया! इसके उलट, उन्होंने फिलिस्तीन के समर्थन में और इज़रायल के खिलाफ बयान जारी कर दिया।

मतलब ज़रा इस मक्कारी को समझिए! एक आतंकी संगठन किसी देश में घुसकर लोगों को मार रहा है, औरतों का चीरहरण कर रहा है, और भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी उस आतंकी संगठन का नाम लेने से भी डर रही है?

क्यों? क्योंकि कांग्रेस को पता था की अगर उन्होंने हमास को आतंकवादी कह दिया, तो भारत में बैठा उनका वो कट्टरपंथी मुस्लिम वोटबैंक नाराज़ हो जाएगा जो हमास के आतंकियों को अपना हीरो मानता है।

प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी के X (Twitter) अकाउंट उठाकर देख लीजिए। इन भाई-बहनों ने गाज़ा के जिहादियों के लिए तो खूब लंबे-चौड़े ट्वीट किए।

वहां के मानवाधिकार का खूब रोना रोया। लेकिन जो यहूदी महिलाएं हमास के आतंकियों की हवस का शिकार हुईं, उनके लिए इस ‘मोहब्बत की दुकान’ वालों के मुंह से एक शब्द नहीं निकला।

ये कोई विदेश नीति का मसला नहीं है भाई! ये कांग्रेस की वो खौफनाक और ज़हरीली घरेलू राजनीति है जहाँ वो देश के मुसलमानों को ये साफ मैसेज देना चाहते थे की “देखो, हम हमास के मुद्दे पर तुम्हारे साथ खड़े हैं, इसलिए अपना थोक का वोट हमें ही देना।”

जो पार्टी चंद वोटों के लालच में दुनिया के सबसे क्रूर आतंकवादियों की निंदा करने से डरती हो, वो पार्टी कल को अगर सत्ता में आ गई तो क्या वो लश्कर-ए-तैयबा या इंडियन मुजाहिदीन पर गोली चला पाएगी? बिल्कुल नहीं!

ये वही कांग्रेस है जो 26/11 के बाद पाकिस्तान को क्लीन चिट देकर ‘हिंदू आतंकवाद’ का फर्जी जाल बुन रही थी। सोनिया और राहुल गांधी का ये जिहादी-प्रेम भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक सुलगता हुआ टाइम बम है।

केरल में हमास के जिहादियों की रैली और वामपंथियों का बेशर्म चेहरा, ओवैसी और अखिलेश का देशद्रोही गठजोड़

और बात सिर्फ कांग्रेस तक रुक जाती तो शायद हम झेल भी लेते। लेकिन इस देश का पूरा का पूरा विपक्षी ईकोसिस्टम ही गाज़ा के नाम पर इस जिहादी आतंकवाद के आगे नतमस्तक हो चुका है।

ज़रा केरल की उस खौफनाक घटना को याद कीजिए जिसने इस बात पर मुहर लगा दी की हमारे देश के अंदर ही पाकिस्तान और गाज़ा बन चुका है।

अक्टूबर 2023 के अंत में केरल के मलप्पुरम में एक कट्टरपंथी संगठन ‘सॉलिडेरिटी यूथ मूवमेंट’ ने एक बहुत बड़ी रैली बुलाई। और इस रैली को वर्चुअली (Screen पर) किसने संबोधित किया? हमास के पूर्व चीफ और दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादियों में से एक- ‘खालिद मशाल’ ने!

ज़रा इस बात की गंभीरता को दिमाग में बैठाने की कोशिश कीजिए। एक घोषित विदेशी आतंकवादी, जिसके हाथों पर हज़ारों बेगुनाहों का खून है, वो भारत के एक राज्य में बाकायदा रैली को संबोधित कर रहा है और वहां की पिनाराई विजयन की वामपंथी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है!

वामपंथियों की पुलिस वहां मूकदर्शक बनकर हमास के उस दरिंदे का भाषण सुन रही है। क्या भारत के अंदर ऐसा नंगा नाच बर्दाश्त किया जा सकता है? ये सीधा-सीधा देशद्रोह है!

कम्युनिस्ट पार्टियों (CPM और CPI) के नेता सीताराम येचुरी और डी. राजा जैसे लोग देश की सड़कों पर फिलिस्तीन के झंडे लेकर रैलियां निकाल रहे थे।

इन्हें भारत के तिरंगे से ज़्यादा फिलिस्तीन के झंडे से प्यार है। और क्षेत्रीय दलों की गद्दारी देखिए। असदुद्दीन ओवैसी ने तो बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए भारत की संसद में खड़े होकर शपथ लेते वक्त ‘जय फिलिस्तीन’ का नारा लगा दिया!

अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी दिन-रात इज़रायल को कोसते रहे और दबे-छिपे हमास के उस आतंकी हमले को ‘रेजिस्टेंस’ (प्रतिरोध) का नाम देते रहे।

इन नेताओं के लिए भारत की सुरक्षा, भारत की साख और भारत का संविधान कोई मायने नहीं रखता। ये लोग इस हमास के मुद्दे को हवा देकर भारत के मुसलमानों को भड़का रहे हैं।

ये एक ऐसा खौफनाक गठजोड़ है जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए देश में सिविल वॉर और दंगे करवाने से भी पीछे नहीं हटेगा।

जो लोग भारत में बैठकर हमास के समर्थन में रैलियां निकाल रहे हैं, वो कल को अगर भारत का पाकिस्तान से युद्ध हो जाए, तो वो भारतीय सेना के खिलाफ भी हथियार उठाने से नहीं हिचकिचाएंगे।

हमारे टैक्स से चलने वाली JNU और जामिया में पल रहे जिहादी स्लीपर सेल, भारत को मिटाने की खौफनाक अर्बन नक्सल साज़िश

अब ज़रा इस इकोसिस्टम की सबसे खौफनाक नर्सरी की तरफ नज़र डालते हैं, जो हमारे और आपके खून-पसीने के टैक्स से चलती है। मैं बात कर रहा हूँ JNU, जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) की।

ये कोई शिक्षा के मंदिर नहीं बचे हैं भाई, ये इस वामपंथी और जिहादी इकोसिस्टम के वो ‘स्लीपर सेल’ बन चुके हैं जहाँ से अर्बन नक्सलियों की फौज तैयार की जा रही है।

जैसे ही इज़रायल ने हमास को जूतों से कूटना शुरू किया, इन यूनिवर्सिटियों के अंदर आग लग गई। जामिया और जेएनयू कैंपस के अंदर फिलिस्तीन के समर्थन में रात-रात भर प्रदर्शन होने लगे।

हाथों में बैनर लेकर ये छात्र एक खौफनाक नारा लगा रहे थे- “From the river to the sea, Palestine will be free” (नदी से लेकर समुद्र तक, फिलिस्तीन आज़ाद होगा)।

क्या आपको पता है इस नारे का असली मतलब क्या है? ये हमास और जिहादियों का वो खूंखार नारा है जिसका सीधा-सीधा मतलब है की इज़रायल नाम के देश को पूरी तरह से नक्शे से मिटा दो और वहां रहने वाले हर एक यहूदी को काट कर समंदर में फेंक दो! ये सरेआम यहूदियों के नरसंहार को बुलाने वाला जिहादी नारा है।

और ये नारे कहां लग रहे हैं? भारत की राजधानी दिल्ली में! हमारे टैक्स के पैसों से बनी यूनिवर्सिटी में!

जो छात्र आज ‘From the river to the sea’ का नारा लगाकर यहूदियों के खात्मे की बात कर रहे हैं, आप लिख कर ले लीजिए, कल को यही जिहादी छात्र कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक ‘गज़वा-ए-हिंद’ का नारा लगाएंगे और हिंदुओं के खात्मे की बात करेंगे। इनकी मानसिकता में कोई फर्क नहीं है।

एक आम हिंदू बाप अपनी ज़मीन बेचकर टैक्स भरता है ताकि देश में अच्छे कॉलेज बनें, लेकिन उस टैक्स के पैसे से इन यूनिवर्सिटियों में हमास के समर्थक पाले जा रहे हैं।

ये छात्र भारत का इतिहास या भूगोल नहीं पढ़ रहे, ये वामपंथी प्रोफेसरों के संरक्षण में बैठकर आतंकवाद की किताबें चाट रहे हैं। ये लोग सड़कों पर उतरकर हमास को अपना हीरो बताते हैं।

उर्दूवुड के भांड और All Eyes on Rafah का वो खौफनाक फ्रॉड, रियासी और संदेशखाली पर गूंगा रहने वाला बॉलीवुड

अब ज़रा इस पूरे जिहादी इकोसिस्टम के उस सबसे चमचमाते और बिकाऊ चेहरे की तरफ नज़र डालते हैं, जो हमारे ही पैसों से महलों में रहता है लेकिन जिसका ज़मीर दाऊद इब्राहिम और मिडिल ईस्ट की फंडिंग के आगे गिरवी रखा हुआ है।

मैं बात कर रहा हूँ इस देश के बॉलीवुड की, जिसे अब ‘उर्दूवुड’ कहना ही सबसे सही होगा।

मई 2024 का वो इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया का ट्रेंड आपको याद ही होगा। अचानक से रातों-रात इस देश के इन नाचने-गाने वाले भांडों के अंदर इंसानियत का ऐसा भयंकर कीड़ा जागा की ये सब के सब ‘All Eyes on Rafah’ (सभी की नज़रें राफा पर हैं) नाम का एक ही पोस्टर शेयर करने लगे।

आलिया भट्ट, स्वरा भास्कर, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, माधुरी दीक्षित से लेकर वरुण धवन तक- इन सबने एक ही झटके में गाज़ा के उन जिहादियों के लिए अपने आंसू बहाने शुरू कर दिए।

अरे भाई, ज़रा इन सेक्युलर गिद्धों की इस सेलेक्टिव आउटरेज और इनके इस नंगे दोगलेपन को तो देखिए! जब हमास के आतंकवादी इज़रायल में घुसकर औरतों के साथ सरेआम बलात्कार कर रहे थे और उनके नंगे जिस्मों को ट्रकों पर घुमा रहे थे, तब इन बॉलीवुड वालों की आंखें कहां फूट गई थीं? तब किसी ने ‘All Eyes on Israel’ का पोस्टर क्यों नहीं लगाया?

और विदेश तो छोड़िए, ज़रा अपने ही देश की बात कर लेते हैं। मई के अगले ही महीने जून में जम्मू के रियासी में शिवभक्तों से भरी एक बस पर लश्कर के जिहादी आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाईं।

हमारी मासूम हिंदू महिलाओं और बच्चों को तड़पा-तड़पा कर मार डाला गया। बस खाई में गिर गई और वो जिहादी कुत्ते गोलियां चलाते रहे।

तब इन बॉलीवुड के भांडों के मुंह में दही क्यों जम गया था? तब किसी आलिया भट्ट या करीना कपूर की उंगलियों ने ‘All Eyes on Reasi’ या ‘All Eyes on Hindus’ क्यों नहीं टाइप किया?

जब बंगाल के संदेशखाली में टीएमसी के गुंडे और शाहजहां शेख जैसे दरिंदे हमारी हिंदू औरतों को पार्टी ऑफिस में ले जाकर उनके साथ महीनों तक चीरहरण करते हैं, तब इन फेमिनिस्टों की ‘इंसानियत’ किस बिल में जाकर छुप जाती है?

जब पाकिस्तान और बांग्लादेश में 12-12 साल की हिंदू बच्चियों को मंडप से उठाकर ले जाया जाता है और उनका जबरन खतना करके निकाह कर दिया जाता है, तब ये बॉलीवुड वाले अंधे और बहरे क्यों हो जाते हैं?

सच तो ये है की ये कोई इंसानियत-विंसानियत का दर्द नहीं है। ये सीधे-सीधे PR एजेंसियों और खाड़ी देशों से आने वाले पेट्रो-डॉलर्स का कमाल है।

इन बॉलीवुड वालों को अरब देशों से मोटी फंडिंग मिलती है की तुम भारत में बैठकर गाज़ा का नैरेटिव चलाओ ताकि भारत के मुसलमानों को भड़काया जा सके।

ये भांड चंद रुपयों के लिए अपने माँ-बाप को भी बेच सकते हैं, देश की सुरक्षा तो इनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती। ये लोग हमारे ही पैसे से 300 करोड़ की फिल्में बनाते हैं और फिर उसी पैसे से उस ‘ग्लोबल जिहाद’ का हिस्सा बन जाते हैं जो सनातन को मिटाना चाहता है। इन दोगलों को अब इनकी सही औकात दिखानी ही पड़ेगी।

देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा, जो गाज़ा के आतंकियों का सगा है वो कश्मीर के जिहादियों का भी सगा होगा

इस पूरे ‘फिलिस्तीन-प्रेम’ के ड्रामे ने आज इस देश के आम हिंदू की आंखें खोलकर रख दी हैं। ये महज़ कुछ रैलियों या सोशल मीडिया पोस्ट का मामला नहीं है भाई। ये सीधे-सीधे भारत की आंतरिक सुरक्षा और हमारे अस्तित्व पर मंडराता हुआ सबसे खौफनाक खतरा है।

इस बात को बहुत ही गहराई से समझिए की जो मुसलमान या वामपंथी भारत में बैठकर फिलिस्तीन के हमास आतंकियों के लिए रो रहा है, वो असल में किस मानसिकता का शिकार है।

इसे कहते हैं ‘उम्माह’ यानी वैश्विक इस्लामी भाईचारे की बीमारी। इस उम्माह के कीड़े ने इनके दिमाग में ये ज़हर भर दिया है की इनका सबसे पहला वफादार रिश्ता भारत की मिट्टी या भारत के संविधान से नहीं है, बल्कि दुनिया के किसी भी कोने में बैठे उस मुसलमान से है जो जिहाद का झंडा लेकर खड़ा है।

इनके लिए राष्ट्रवाद, देशभक्ति और वंदे मातरम कोई मायने नहीं रखता। इनके लिए हमास का वो खूंखार आतंकवादी अपना सगा भाई है, और भारत का वो हिंदू सैनिक जो बॉर्डर पर खड़ा है, वो इनके लिए पराया है।

ज़रा आंखें बंद कीजिए और उस खौफनाक मंज़र की कल्पना कीजिए! अगर कल को भारत का पाकिस्तान के साथ कोई भयंकर युद्ध हो जाए, या कश्मीर में फिर से जिहादी आतंकवाद अपने चरम पर आ जाए, तो ये गाज़ा के लिए छाती पीटने वाले लोग क्या करेंगे?

क्या ये भारत की सेना का साथ देंगे? बिल्कुल नहीं! ये वामपंथी गद्दार और ये ‘उम्माह’ के गुलाम लोग उसी वक्त भारत की सड़कों पर उतरकर पाकिस्तान और कश्मीर के जिहादियों के समर्थन में रैलियां निकालना शुरू कर देंगे।

ये लोग भारत की सेना पर पत्थर फेंकेंगे, ट्रेनों में आग लगाएंगे और देश को अंदर से पूरी तरह खोखला कर देंगे। जो इंसान आज दुनिया के सबसे खूंखार और बर्बर आतंकी संगठन हमास को ‘आज़ादी का सिपाही’ बता सकता है, वो कल को लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और सिमी के जिहादियों को भी अपना हीरो बताएगा।

ये लोग भारत के अंदर बैठे वो खौफनाक ‘स्लीपर सेल’ हैं जो किसी भी वक्त देश के खिलाफ हथियार उठाने को तैयार बैठे हैं।

भारत को आज इस मामले में इज़रायल से सीखने की बहुत सख्त ज़रूरत है। इज़रायल ने दुनिया को दिखा दिया है की आतंकवाद से कैसे लड़ा जाता है। इज़रायल में अगर कोई हमास का समर्थन करता है, तो उसे सीधे तौर पर देश का दुश्मन माना जाता है।

वहां ‘मानवाधिकार’ का कोई फर्जी रोना नहीं चलता। जब कोई जिहादी तुम्हारे बच्चों के गले काटने आ रहा हो, तो तुम हाथ में संविधान की किताब लेकर नहीं खड़े हो सकते। तुम्हें अपनी बंदूक उठानी ही पड़ेगी।

भारत सरकार को ये बात डंके की चोट पर समझनी होगी की हमास का समर्थन करने वाला हर एक व्यक्ति असल में भारत की बर्बादी का सपना देखने वाला एक गद्दार आतंकवादी ही है, और उसका परमानेंट इलाज बेहद जरुरी है।

भारत माता की जय!

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