भारत का वो पूर्व कांग्रेसी PM जिसने वायुसेना जवान को 27 गोलियों से भूनने वाले आतंकी को लगाया गले, अपने जिहादी-प्रेम के लिए देश बेचने वाली गद्दार कांग्रेस

हम लोग अक्सर सोचते हैं की इस देश के नेताओं ने अपनी कुर्सी और अपने जिहादी वोटबैंक के लिए किस हद तक गद्दारी की होगी? क्या उन्होंने ज़मीनें बेचीं? क्या उन्होंने पैसा खाया?

अरे नहीं मेरे भाई! इन गद्दारों ने तो हमारे उन वीर सैनिकों के खून का सौदा कर दिया, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस भारत माता की हिफाज़त में लगा दी थी।

ज़रा सोचिए, एक तरफ हमारी भारतीय वायुसेना (IAF) का एक शूरवीर जवान सड़क पर पड़ा है। उसके शरीर को 27 गोलियों से छलनी कर दिया गया है।

उसकी वर्दी उसके ही खून से लाल हो चुकी है और एक रोती-बिलखती विधवा पत्नी अपने पति के कातिलों को फांसी पर लटकते देखने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही है।

और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ दिल्ली के आलीशान प्रधानमंत्री आवास में एक खूंखार जिहादी आतंकवादी को रेड कार्पेट पर चलाकर अंदर लाया जाता है।

देश का प्रधानमंत्री बड़ी ही बेशर्मी से अपने दांत चियारे हुए उस कातिल के साथ हाथ मिलाता है, उसके साथ फोटो खिंचवाता है और उसे बिरयानी खिलाकर VIP ट्रीटमेंट देता है।

ये उस गद्दार कांग्रेसी सिस्टम का असली चेहरा है जिसने सिर्फ और सिर्फ अपने मुस्लिम वोटबैंक और जिहादी तुष्टिकरण के लिए हमारी सेना के मनोबल को जूतों तले कुचल कर रख दिया था।

एक देश का प्रधानमंत्री अपने ही सैनिकों के कातिल को घर बुलाकर चाय पिला रहा है? क्या दुनिया के किसी भी देश में ऐसा होता है?

अमेरिका या इज़रायल में अगर किसी ने उनके एक सैनिक पर पत्थर भी फेंका हो, तो वो घर में घुसकर उस आतंकी की बोटी-बोटी काट देते हैं। लेकिन हमारे यहाँ? हमारे यहाँ कांग्रेस की सरकारें इन खूंखार जिहादियों के तलवे चाट रही थीं।

ये कांग्रेस द्वारा भारत माता की पीठ में घोंपा गया वो खंजर था जिसका दर्द आज भी हर सच्चे हिंदुस्तानी के सीने में चुभता है।

25 जनवरी 1990 का वो खौफनाक दिन, जब जिहादी यासीन मलिक ने 27 गोलियों से भून डाला वायुसेना के निहत्थे जवान को

अब ज़रा फ्लैशबैक में चलते हैं और उस खौफनाक दिन को याद करते हैं जिसने कश्मीर की वादियों को हमारे जवानों के खून से लाल कर दिया था। तारीख थी 25 जनवरी 1990।

ये वो दौर था जब कश्मीर में जिहादी आतंकवाद पूरी तरह से अपने फन फैला चुका था। मस्जिदों से रोज़ ऐलान होते थे की कश्मीर को पाकिस्तान बनाना है।

सुबह का वक्त था। श्रीनगर का रावलपोरा इलाका। सर्दी अपनी चरम पर थी। भारतीय वायुसेना के कुछ जवान अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए एक बस स्टॉप पर खड़े होकर अपनी बस का इंतज़ार कर रहे थे।

ये कोई युद्ध का मैदान नहीं था। हमारे जवान एकदम निहत्थे थे। उन्होंने उस वक्त वर्दी भी नहीं पहन रखी थी, वो सिविल ड्रेस में थे और उनके हाथों में कोई हथियार नहीं था।

तभी अचानक वहां जिहादियों का एक गिरोह आता है। इस खूंखार जिहादी गिरोह का सरगना कोई और नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का खूंखार आतंकवादी यासीन मलिक था।

यासीन मलिक और उसके गुंडों ने बिना कोई चेतावनी दिए, पीछे से उन निहत्थे जवानों पर अपनी एके-47 राइफलों से अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।

ज़रा उस खौफनाक मंज़र की कल्पना कीजिए! हमारे जवान अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, लेकिन उन दरिंदों ने किसी पर कोई रहम नहीं खाया।

उस हमले में भारतीय वायुसेना के 40 जवान गंभीर रूप से घायल हो गए और हमारे 4 शूरवीर मौके पर ही शहीद हो गए। उन शहीदों में से एक थे- स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना।

यासीन मलिक नाम के उस जिहादी दरिंदे ने स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना के शरीर में एक-दो नहीं, पूरी की पूरी 27 गोलियां उतारी थीं! एक निहत्थे और ज़मीन पर गिरे हुए इंसान के शरीर में 27 गोलियां!

ये उस जिहादी के अंदर भरी हुई सनातन और भारत के प्रति वो नफरत थी जो सीधे तौर पर पाकिस्तान से फंडेड थी।

सड़क पर चारों तरफ सिर्फ खून ही खून था। रवि खन्ना का शरीर गोलियों से ऐसा छलनी हो गया था की देखने वालों का कलेजा फट जाए। उस दिन यासीन मलिक ने सिर्फ 4 जवानों की जान नहीं ली थी, उसने भारत सरकार को एक खुली चुनौती दी थी।

लेकिन उसे क्या पता था की आगे चलकर इस देश की गद्दार सरकारें उसे हथकड़ी पहनाने के बजाय उसे अपना दामाद बनाकर रखेंगी।

2006 में कांग्रेस ने रची इतिहास की सबसे बड़ी गद्दारी, कातिल यासीन मलिक को PM हाउस बुलाकर मनमोहन सिंह ने बताया ‘शांति का फरिस्ता’

अब ज़रा इस दर्दनाक कहानी के उस सबसे काले और शर्मनाक हिस्से पर आते हैं, जिसे सुनकर आज भी हर सच्चे हिंदुस्तानी का सिर गुस्से और शर्म से झुक जाता है। 1990 के उस जिहादी कत्लेआम के 16 साल बीत चुके थे।

साल आया 2006! केंद्र में सोनिया गांधी के रिमोट कंट्रोल से चलने वाली यूपीए (UPA) यानी कांग्रेस की सरकार बैठी थी। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर डॉ. मनमोहन सिंह विराजमान थे।

17 फरवरी 2006! ये वो काला दिन है जिसे इस देश का इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। दिल्ली के 7 रेसकोर्स रोड (प्रधानमंत्री का सरकारी निवास)। जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता, जहाँ इस देश की सबसे कड़ी सुरक्षा होती है, वहां अचानक एक VIP मेहमान आता है।

उसके लिए बाकायदा रेड कार्पेट बिछाया जाता है। वो मेहमान कौन था? वो कोई विदेशी राष्ट्रपति या कोई महान वैज्ञानिक नहीं था। वो मेहमान वही खूंखार जिहादी यासीन मलिक था, जिसके हाथों से हमारे स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना का खून टपक रहा था!

ज़रा इस गद्दारी के लेवल को समझिए भाई! जिस आतंकवादी को तिहाड़ जेल की काल कोठरी में नंगा करके पीटा जाना चाहिए था, उसे कांग्रेस की सरकार ने देश के प्रधानमंत्री के बगल में सोफे पर लाकर बिठा दिया।

और हद तो तब हो गई जब उस कातिल के साथ देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मुस्कुराते हुए हाथ मिला रहे थे। वो तस्वीरें आज भी इंटरनेट पर मौजूद हैं।

जिस कातिल के हाथ हमारे स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और हज़ारों कश्मीरी पंडितों के खून से रंगे हुए थे, उसे कांग्रेस सरकार ने दिल्ली बुलाकर एक ‘शांति दूत’ (Peace Envoy) का दर्ज़ा दे दिया।

ये कोई ‘शांति वार्ता’ नहीं थी। ये कोई कूटनीति नहीं थी। ये सीधे-सीधे जिहादी वोटबैंक के आगे दंडवत प्रणाम था। कांग्रेस पार्टी ने पूरे देश की सेना, हमारे सैनिकों की शहादत और हमारे स्वाभिमान को उस एक जिहादी के पैरों में गिरवी रख दिया था।

ज़रा एक पल के लिए सोचिए, जब रवि खन्ना की विधवा शालिनी खन्ना ने अगले दिन सुबह अखबार उठाया होगा और फ्रंट पेज पर उस यासीन मलिक को देश के प्रधानमंत्री के साथ चाय पीते और मुस्कुराते हुए देखा होगा, तो उस शहीद की विधवा के दिल पर क्या गुज़री होगी?

उसके तो ज़िंदा ही प्राण निकल गए होंगे! वो औरत 16 साल से इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही थी, और उसके पति का कातिल, जिसने 27 गोलियां मारी थीं, वो पीएम हाउस का VIP मेहमान बना हुआ था!

ये कांग्रेस की उसी सड़ी हुई और जिहादी-परस्त मानसिकता का नंगा सबूत है, जो मानती है की अगर मुल्लों और कट्टरपंथियों को खुश करना है, तो उन्हें सर-आंखों पर बिठाना पड़ेगा, चाहे उनके हाथ हमारे सैनिकों के खून से ही क्यों न सने हों।

उस दिन मनमोहन सिंह ने सिर्फ यासीन मलिक से हाथ नहीं मिलाया था, बल्कि उन्होंने रवि खन्ना की आत्मा को एक बार फिर से उन्हीं 27 गोलियों से छलनी कर दिया था।

कांग्रेसी इकोसिस्टम का वो नंगा सच जिसने एक खूंखार जिहादी हत्यारे को बना दिया था गांधीवादी ‘यूथ आइकॉन’

अगर आप सोच रहे हैं की ये सब सिर्फ कांग्रेस के नेताओं ने किया, तो आप उस पूरे इकोसिस्टम की ताकत को अंडरएस्टिमेट कर रहे हैं जो इस देश को दीमक की तरह चाट रहा है।

इस पूरी गद्दारी में कांग्रेस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे वो कांग्रेस को समर्थन देने वाले पत्रकार और अर्बन नक्सल।

इन्होंने यासीन मलिक की इमेज को सुधारने के लिए बाकायदा एक बहुत बड़ा पीआर (PR) स्टंट चलाया। अरुंधति रॉय जैसी वो अर्बन नक्सल लेखिकाएं, जिन्हें हमारे सेना के जवानों में बलात्कारी नज़र आते हैं, उन्होंने यासीन मलिक को एक ‘गांधीवादी’ (Gandhian) और ‘शांति का मसीहा’ बताना शुरू कर दिया।

ये लोग टीवी पर बैठकर दिन-रात ज्ञान बांटते थे की “यासीन मलिक तो अब मुख्यधारा में आ गया है, उसने हथियार छोड़ दिए हैं, हमें उसका स्वागत करना चाहिए।”

अरे बेशर्मों! जिसने 27 गोलियां एक निहत्थे फौजी के सीने में उतारी हों, वो गांधीवादी कैसे हो गया? क्या किसी सीरियल किलर को तुम सिर्फ इसलिए माफ कर दोगे क्योंकि वो कह रहा है की अब वो और मर्डर नहीं करेगा?

इन मीडिया वालों का दोगलापन तो देखिए! आज इंडिया टुडे (India Today) जैसे बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल खुद को बहुत बड़ा देशभक्त बताते हैं, लेकिन उसी दौर में इन्हीं चैनलों के ‘कॉन्क्लेव’ (Conclave) में यासीन मलिक को एक वीआईपी गेस्ट की तरह बुलाया जाता था।

उसे बकायदा एक ‘यूथ आइकॉन’ (Youth Icon) बताकर पेश किया जाता था। बड़े-बड़े लिबरल पत्रकार उसके सामने बैठकर ऐसे सवाल पूछते थे जैसे वो कोई बहुत बड़ा क्रांतिकारी हो।

हद तो तब हो गई जब यासीन मलिक ने बीबीसी (BBC) के एक इंटरव्यू में कैमरे के सामने डंके की चोट पर, बिना किसी खौफ के ये बात कबूल की थी कि हाँ, उसने जज नीलकंठ गंजू को मारा है, उसने वायुसेना के जवानों को मारा है।

एक जिहादी सरेआम अपना जुर्म कबूल कर रहा है, और फिर भी ना तो कांग्रेस की पुलिस ने उसे हथकड़ी लगाई और ना ही इस मीडिया ने उसके खिलाफ कोई मुहिम चलाई।

इन गद्दारों ने हमारे बच्चों के सामने एक आतंकवादी को हीरो बनाकर पेश किया ताकि कल को कश्मीर का कोई और युवा भी यही सोचे की अगर वो बंदूक उठाएगा और हिंदुओं को मारेगा, तो उसे भी दिल्ली के ए.सी. कमरों में बिठाकर यूथ आइकॉन का अवार्ड दिया जाएगा।

ये कांग्रेसी इकोसिस्टम जिहादियों की पीआर एजेंसी की तरह काम करता था। इन्होंने उस जिहादी को बचाने के लिए जो नंगा नाच किया है, इतिहास उसके लिए इन्हें कभी माफ नहीं करेगा।

नया भारत और राष्ट्रवादी सरकार का हथौड़ा, जब उस जिहादी यासीन मलिक को तिहाड़ की काल कोठरी में सड़ाकर मिला परमानेंट इलाज

लेकिन कहते हैं ना भाई, की पाप का घड़ा चाहे कितना भी बड़ा हो, एक दिन वो फूटता ज़रूर है। दशकों तक कांग्रेस की बिरयानी खाने वाले इन जिहादियों को लग रहा था की ये देश तो इनके बाप की जागीर है।

लेकिन 2014 के बाद जब दिल्ली के तख्त पर सत्ता पलटी और देश में एक प्रखर राष्ट्रवादी सरकार आई, तो इन अलगाववादियों और जिहादी कुत्तों की उल्टी गिनती शुरू हो गई।

जैसे ही नया भारत अपने असली फॉर्म में आया, सबसे पहले सरकार ने इन जिहादी नेताओं की वो वीआईपी (VIP) सिक्योरिटी छीनी जो इन्हें कांग्रेसी राज में मिली हुई थी। रातों-रात इनकी सुरक्षा हटाकर इन्हें इनकी असली औकात दिखा दी गई।

जो यासीन मलिक कल तक ‘शांति दूत’ बनकर टीवी पर ज्ञान बांटता था, उसकी फाइलें धड़ाधड़ खुलनी शुरू हो गईं।

देश की सबसे खूंखार जांच एजेंसी एनआईए NIA ने अपना डंडा उठाया। एनआईए ने यासीन मलिक को टेरर फंडिंग और पाकिस्तान से पैसा लेकर कश्मीर में दंगे भड़काने के केस में कॉलर से दबोच लिया।

जब एनआईए ने उसे अरेस्ट करके दिल्ली की तिहाड़ जेल में ठूंसा, तो इस पूरे कांग्रेसी और लिबरल इकोसिस्टम की पैंट गीली हो गई। वो सब जो कल तक यासीन को ‘गांधीवादी’ बताते थे, उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

मई 2022 का वो ऐतिहासिक दिन कौन भूल सकता है! जब एनआईए कोर्ट ने यासीन मलिक को टेरर फंडिंग केस में दोषी करार दिया। कोर्ट रूम में वो जिहादी गिड़गिड़ा रहा था, लेकिन जज साहब ने उसे सीधे उम्रकैद की सज़ा सुना दी।

और बात सिर्फ उम्रकैद तक नहीं रुकी भाई। जो केस कांग्रेस ने सालों से ठंडे बस्ते में डाल रखा था- हमारी वायुसेना के जवानों की शहादत का केस- उस केस को इस राष्ट्रवादी सरकार ने फिर से री-ओपन करवाया।

30 साल बाद, जम्मू की टाडा (TADA) कोर्ट में यासीन मलिक और उसके गुंडों के खिलाफ स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और तीन अन्य जवानों की हत्या के मामले में बाकायदा चार्ज फ्रेम किए गए। निर्मल खन्ना जी के उन आंसुओं का हिसाब होना शुरू हो गया।

जो कातिल कल तक प्रधानमंत्री आवास में बैठकर चाय पीता था, आज वो तिहाड़ की काल कोठरी में एक-एक सांस के लिए मोहताज है। ये होता है न्याय! ये होता है एक असली राष्ट्रवादी सरकार का हथौड़ा!

आज यासीन मलिक जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहा है और ये नया भारत डंके की चोट पर बता रहा है की जो हमारी सेना पर गोली चलाएगा, उसकी सात पुश्तों को भी इस ज़मीन पर चैन की नींद नहीं सोने दिया जाएगा।

जिहादियों के तलवे चाटने वाले इन कांग्रेसी गद्दारों को उखाड़ फेंकने की जरुरत, सनातनियों को लेना चाहिए पाई-पाई का हिसाब

अगर आपको लगता है की यासीन मलिक इकलौता उदाहरण है, तो ज़रा इतिहास के पन्ने और पलट लीजिए। 2008 का वो बटला हाउस एनकाउंटर (Batla House Encounter) याद है आपको?

जब दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर इंडियन मुजाहिदीन के खूंखार जिहादी आतंकियों को मार गिराया था। उस वक्त कांग्रेस के नेताओं ने क्या किया था?

दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे कांग्रेसी नेताओं ने खुलेआम रैलियों में चिल्ला-चिल्ला कर कहा था की “जब बटला हाउस में मारे गए आतंकियों की तस्वीरें सोनिया गांधी जी ने देखीं, तो वो फूट-फूट कर रोई थीं।”

अरे शर्म करो गद्दारों! तुम्हारे पास हमारे शहीद मोहन चंद शर्मा की शहादत पर बहाने के लिए एक आंसू नहीं था, लेकिन जिहादी आतंकियों की लाशें देखकर तुम्हारी पार्टी की अध्यक्ष फूट-फूट कर रो रही थीं?

यही तो वो पार्टी है जिसने 26/11 के मुंबई हमले के असली पाकिस्तानी और जिहादी आतंकियों को बचाने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ (Saffron Terror) का झूठा नैरेटिव गढ़ा था।

इन्होंने बेगुनाह हिंदू साधु-संतों को पकड़कर जेल की काल कोठरियों में सड़ा दिया, ताकि लश्कर-ए-तैयबा के जिहादियों को क्लीन चिट दी जा सके और अपने मुस्लिम वोटबैंक को खुश किया जा सके।

ज़रा एक पल के लिए सोचिए। अगर कल को ये कांग्रेस पार्टी फिर से सत्ता में लौट आई, तो क्या होगा? ये लोग फिर से इन यासीन मलिक जैसे खूंखार आतंकवादियों को जेल से बाहर निकाल लेंगे।

ये फिर से PFI और SIMI जैसे जिहादी संगठनों पर से बैन हटा देंगे और हमारे देश की सड़कों पर फिर से हमारे जवानों और हमारे हिंदू कार्यकर्ताओं का खून बहना शुरू हो जाएगा।

अगर आज भी कोई हिंदू, कोई सच्चा हिंदुस्तानी इस कांग्रेस पार्टी को अपना वोट देता है, तो याद रखना- वो वोट उस कांग्रेसी नेता को नहीं जा रहा, बल्कि वो वोट सीधे तौर पर शहीद स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना के उस 27 गोलियों से छलनी शरीर और भारत माता की पीठ में एक नया खंजर घोंप रहा है। हम अपने शहीदों के गद्दारों को कभी माफ नहीं कर सकते।

अब वक्त आ गया है की इस देश का हिंदू समाज एक हो जाए। हमें उन कांग्रेसी और लिबरल गिद्धों को उनकी असली औकात याद दिलानी होगी जो कल तक एक जिहादी हत्यारे को ‘यूथ आइकॉन’ बनाकर पेश कर रहे थे।

हमें एक-एक वोट का हिसाब लेना होगा। जो पार्टी हमारे रक्षकों के कातिलों को गले लगाती है, जो पार्टी जिहादियों के तलवे चाटती है और जो भगवान राम के अस्तित्व को नकारती है, उसे इस देश की राजनीति से, हर गांव और हर शहर से हमेशा-हमेशा के लिए उखाड़ फेकना चाहिए।

भारत माता की जय!

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