अक्षरधाम मंदिर हमले से लेकर मालेगांव ब्लास्ट तक, जिहादियों का कोर्ट केस लड़ने और ज़मानत दिलाने में सबसे आगे 'जमीयत उलेमा-ए-हिंद', इस खतरनाक संगठन पर परमानेंट बैन आखिर कब

अक्षरधाम मंदिर हमले से लेकर मालेगांव ब्लास्ट तक, जिहादियों का कोर्ट केस लड़ने और ज़मानत दिलाने में सबसे आगे ‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद’, इस खतरनाक संगठन पर परमानेंट बैन आखिर कब

जब देश के किसी कोने में कोई भयंकर बम ब्लास्ट होता है, जब निर्दोष हिन्दू मारे जाते हैं, और सुरक्षा एजेंसियां जान की बाज़ी लगाकर खूंखार जिहादी आतंकवादियों को गिरफ्तार करती हैं… तो क्या होता है?

उन पकड़े गए आतंकियों और कत्ल करने वालों को बचाने के लिए रातों-रात सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सबसे महंगे, करोड़ों रुपये फीस लेने वाले वकीलों की एक पूरी की पूरी फौज खड़ी हो जाती है।

क्या आपने कभी एक पल के लिए भी रुक कर सोचा है की जो जिहादी किसी गली-मोहल्ले के मदरसे से निकला हो, जो साइकिल पंक्चर बनाने का काम करता हो, उसके पास सुप्रीम कोर्ट के इन फाइव-स्टार वकीलों को करोड़ों रुपये देने का पैसा आखिर कहां से आता है?

इस खौफनाक सवाल का जवाब है- ‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद’! जी हां, ये वही संगठन है जो 1919 से इस देश में ‘शांति’, ‘भाईचारे’ और ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का चोला ओढ़े बैठा है। लिबरल कीड़े दिन-रात इस संगठन के नेताओं (महमूद मदनी और अरशद मदनी) को बड़े-बड़े मंचों पर बिठाकर शांति दूत बताते हैं।

कमाल की बात तो ये है की ये संगठन खुद को ‘राष्ट्रवादी’ बताता है। टीवी पर आकर इनके नेता मीठी-मीठी बातें करते हैं, गंगा-जमुनी तहजीब का ज्ञान बांटते हैं। लेकिन पर्दे के पीछे से ये उस ‘गज़वा-ए-हिंद’ का कानूनी कवच बने हुए हैं, जो भारत को भीतर से खोखला कर रहा है।

आज वक्त आ गया है की इस देश का हिंदू जाने की कैसे हमारे ही सिस्टम का इस्तेमाल करके हमारे ही कातिलों को बचाया जा रहा है।

पिछले कुछ दशकों से इस मज़हबी सिंडिकेट का ज़मीन पर सिर्फ और सिर्फ एक ही खौफनाक काम चल रहा है- इस देश के सबसे खूंखार देशद्रोहियों, बम फोड़ने वालों और हिंदुओं का कत्ल करने वालों की ‘कानूनी ढाल’ बनना।

ये सनातन के खिलाफ चल रहे एक बहुत बड़े युद्ध का वो हिस्सा है, जिसके तहत मुसलमानों के दिमाग में ये भरोसा भरा जाता है की “तुम बेखौफ होकर बम फोड़ो, तुम काफिरों का कत्ल करो, तुम दंगे भड़काओ… जब पुलिस तुम्हें पकड़ेगी, तो तुम्हें फांसी के फंदे से बचाने के लिए हमारा इकोसिस्टम और हमारी तिजोरियां पूरी तरह से खुली हुई हैं।”

अक्षरधाम हमले से लेकर बम धमाकों तक, खूंखार आतंकियों को बचाने के लिए करोड़ों लुटाता है ‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद’

अगर आपको लग रहा है की मैं किसी एक-दो केस की बात कर रहा हूं, तो ज़रा गूगल खोलिए और इन गद्दारों की वो खूनी लिस्ट देख लीजिए जिसने भारत की आत्मा को लहूलुहान किया था।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के खुद के आंकड़े सीना ठोक कर कहते हैं की उन्होंने अब तक देश भर में 700 से ज़्यादा आतंकवाद के आरोपियों का केस लड़ा है! जी हां, 700 से ज़्यादा!

ज़रा उन केसों के नाम सुनिए, आपकी रूह कांप जाएगी। 2002 का वो वीभत्स अक्षरधाम मंदिर हमला, जहाँ जिहादियों ने घुसकर हमारे 30 से ज़्यादा बेगुनाह श्रद्धालुओं और कमांडोज़ को भून डाला था। उन खून के प्यासे दरिंदों को बचाने के लिए जमीयत ने अपने करोड़ों रुपये लुटा दिए।

2006 का मालेगांव ब्लास्ट, पुणे का जर्मन बेकरी ब्लास्ट, और तो और लश्कर-ए-तैयबा और खूंखार ISIS के जो स्लीपर सेल पकड़े जाते हैं, उनके केस भी यही जमीयत लड़ती है!

वो खौफनाक 2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट याद है? जब मुंबई की लोकल ट्रेनों में एक के बाद एक बम फटे थे और 200 से ज़्यादा बेगुनाह लोग अपने ऑफिस से घर लौटते हुए चिथड़ों में उड़ गए थे। उस मामले में पकड़े गए 13 आरोपियों को बचाने के लिए इसी जमीयत ने वकीलों की फौज उतारी थी।

और हम सनातनी काशी के संकट मोचन मंदिर का वो दर्द कैसे भूल सकते हैं? 2006 में जब हमारे आराध्य हनुमान जी के पवित्र मंदिर में इन जिहादियों ने बम फोड़ा था, जब वहां आरती कर रहे दर्जनों बेगुनाह हिंदू खून से लथपथ होकर तड़प-तड़प कर मरे थे।

उस ब्लास्ट के मास्टरमाइंड ‘वलीउल्लाह’ को बचाने के लिए भी इसी जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था। 2021 में यूपी पुलिस की एटीएस (ATS) ने अल-कायदा के जिस खौफनाक मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया था, उनके आतंकियों को ‘बेगुनाह’ बताते हुए भी यही संगठन कोर्ट पहुंच गया था।

जब इन लोगों से पूछा जाता है की तुम इन बम फोड़ने वालों का केस क्यों लड़ते हो, तो ये बड़ी बेशर्मी से एक सेक्युलर डायलॉग चिपका देते हैं- “जब तक कोई कोर्ट से दोषी साबित न हो जाए, तब तक वो बेगुनाह है, और हर बेगुनाह को कानूनी मदद पाने का हक है।”

अरे भाई! ये कैसी समाज सेवा है? क्या इस देश में कोई और गरीब या मजलूम नहीं बचा जिसका केस तुम लड़ सको? क्या तुम्हें पूरे भारत में सिर्फ वही लोग ‘मासूम’ नज़र आते हैं जिनके घरों से आरडीएक्स (RDX), डेटोनेटर और जिहादी पर्चे बरामद होते हैं?

इस देश में लाखों गरीब लोग, पिछड़े लोग छोटी-छोटी बातों में सालों से जेलों में सड़ रहे हैं, उनके पास वकील करने के पैसे नहीं हैं। तब तुम्हारी ये जमीयत उनकी बेल कराने क्यों नहीं जाती? सच्चाई यही है की ये कोई कानूनी मदद नहीं है, ये देश के जिहादियों को बचाने का एक मज़हबी एजेंडा है!

मुझे एक बात समझ नहीं आती की जो संगठन खुलेआम, डंके की चोट पर उन जिहादियों की कानूनी मदद कर रहा है जिनके हाथों पर सैकड़ों बेगुनाह भारतीयों का खून लगा है, वो संगठन आज तक इस देश में चल कैसे रहा है?

उस पर परमानेंट बैन क्यों नहीं लगा? अगर कोई आदमी किसी आतंकवादी को पनाह दे या उसे हथियार दे, तो उसे तुरंत देशद्रोह में जेल में डाल दिया जाता है।

लेकिन जो संगठन उस आतंकवादी को कानून से बचाने के लिए करोड़ों की फंडिंग कर रहा हो, वो ‘एनजीओ’ का बोर्ड लगाकर शान से कैसे घूम सकता है? ये हमारे कमज़ोर सेक्युलर सिस्टम के गाल पर एक बहुत बड़ा तमाचा है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की फंडिंग के दो सबसे बड़े सोर्स, आतंकवादियों की फीस भरने के लिए कैसे लूटा जाता हमारा बाज़ार

अब सबसे बड़ा और खौफनाक सवाल ये उठता है की 700 से ज़्यादा आतंकवादियों का केस सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लड़ने के लिए जो अरबों रुपये लगते हैं, वो जमीयत के पास आते कहां से हैं? आसमान से तो पैसे बरसते नहीं हैं! तो भाई, अपनी कुर्सी थाम कर बैठिए, क्योंकि ये सच आपके ही घर की रसोई से जुड़ा हुआ है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की फंडिंग के दो सबसे बड़े और खौफनाक सोर्स हैं- ‘हलाल सर्टिफिकेशन’ और ‘ज़कात’।

ज़कात इस्लाम का एक नियम है जिसमें अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान किया जाता है। जमीयत के नेता सरेआम कहते हैं की ज़कात का पैसा ‘कैदियों को छुड़ाने’ में लगाया जा सकता है।

लेकिन इस ज़कात से भी बड़ा जो कैंसर है, वो है हलाल इकॉनमी! जमीयत का अपना एक ‘हलाल ट्रस्ट’ है। पहले हलाल का मतलब सिर्फ मांस तक सीमित था की जानवर कैसे काटा जाए। लेकिन आज इन जिहादियों ने इसे एक पूरा का पूरा आर्थिक सिंडिकेट बना दिया है।

आजकल आप बाज़ार से कोई नमकीन खरीदें, बिस्किट खरीदें, दवाइयां खरीदें या लिपस्टिक और कॉस्मेटिक्स खरीदें… हर चीज़ पर ‘हलाल सर्टिफाइड’ का एक ठप्पा लगा होता है।

पतंजलि, हल्दीराम और हिमालय जैसी बड़ी-बड़ी हिंदू कंपनियों को अपना माल बाज़ार या विदेशों में बेचने के लिए इस जमीयत से ‘हलाल सर्टिफिकेट’ लेना पड़ता है। और ये सर्टिफिकेट कोई मुफ्त में नहीं मिलता भाई!

इसके लिए इन कंपनियों को हर साल करोड़ों रुपये की भारी-भरकम फीस (हलाल टैक्स) जमीयत को चुकानी पड़ती है।

मतलब ज़रा इस खौफनाक साज़िश को समझिए। एक हिंदू अपनी मेहनत की कमाई से बिस्किट या नमकीन खरीदता है। उस नमकीन की कीमत का एक हिस्सा हलाल फीस के रूप में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के पास जाता है।

और फिर जमीयत उसी हिंदू के दिए हुए पैसों से किसी शाहिद आज़मी या किसी बड़े वामपंथी वकील को हायर करती है ताकि वो उस जिहादी आतंकवादी को जेल से बाहर निकाल सके जिसने कल किसी हिंदू मंदिर पर बम फोड़ा था!

मासूम युवाओं का विक्टिम कार्ड और वामपंथी वकीलों की फौज, देश के न्याय तंत्र को हाईजैक करने की इनकी खौफनाक साज़िश

जब जमीयत के पास हलाल और ज़कात का अथाह पैसा आ जाता है, तो फिर शुरू होता है इनका वो खौफनाक ‘लीगल और मीडिया टेररिज्म’। जैसे ही कोई जिहादी पकड़ा जाता है, इस पूरे इकोसिस्टम का स्लीपर सेल एक्टिव हो जाता है।

सबसे पहले वो ‘द वायर’ (The Wire), ‘स्क्रॉल’ (Scroll) जैसे वामपंथी मीडिया ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना शुरू करते हैं। ये एक नरेटिव बनाते हैं की “देखो, एक होनहार, मासूम मुस्लिम नौजवान को पुलिस ने झूठे आतंक के केस में फंसा दिया है।

ये मुसलमान होने की सज़ा भुगत रहा है।” इस शोर-शराबे से एक ऐसा माहौल बनाया जाता है की पुलिस और जांच एजेंसियां ही कटघरे में खड़ी हो जाएं।

उसके बाद एंट्री होती है जमीयत के उस खौफनाक ‘लीगल एड सेल’ की। ये लोग कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे और ऐसे ही करोड़ों की फीस लेने वाले बड़े-बड़े वामपंथी वकीलों की फौज कोर्ट में उतार देते हैं।

ये वकील कानून के हर छोटे से छोटे छेद का फायदा उठाते हैं। ये गवाहों को पलट देते हैं, सबूतों में खामियां निकालते हैं और सालों-सालों तक केस को लटकाते हैं ताकि सबूत कमज़ोर हो जाएं।

और जब 10 या 15 साल बाद, सबूतों के अभाव में या बेनिफिट ऑफ डाउट के कारण कोई जिहादी बरी हो जाता है, तो ये जमीयत के नेता (जैसे महमूद मदनी और अरशद मदनी) प्रेस कॉन्फ्रेंस करके छाती पीटने लगते हैं।

ये कहते हैं की “देखो, हमने कहा था ना कि हमारा लड़का बेकसूर है! इस देश की पुलिस ने हमारे निर्दोष बच्चे के 15 साल बर्बाद कर दिए।”

कोर्ट ने उसे इसलिए बरी नहीं किया क्योंकि वो संत था। कोर्ट ने उसे इसलिए छोड़ा क्योंकि इन लोगों ने अपने अथाह पैसों और महंगे वकीलों के दम पर सबूतों को अदालत में टिकने ही नहीं दिया!

ये एक पूरी की पूरी साज़िश है इस देश के न्याय तंत्र को हाईजैक करने की। ये लोग देश को ये मैसेज देना चाहते हैं की “तुम बम फोड़ो, तुम जिहाद करो, तुम्हें घबराने की ज़रूरत नहीं है।

तुम्हारे पीछे जमीयत उलेमा-ए-हिंद खड़ी है। हम तुम्हें बचा लेंगे।” ये जो कानूनी सुरक्षा की गारंटी है ना, यही सबसे ज़्यादा नए-नए जिहादियों को पैदा कर रही है। जब किसी आतंकी को पता होता है की उसका केस लड़ने के लिए करोड़ों की संस्था बैठी है, तो उसका खौफ खत्म हो जाता है।

दारुल उलूम देवबंद की कट्टरपंथी विचारधारा और गज़वा ए हिन्द का सपना, पर्दे के पीछे से भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का षड्यंत्र

अब ज़रा इस ‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद’ की उन वैचारिक जड़ों को खोद कर देखते हैं, जहाँ से इस पूरे मज़हबी सिंडिकेट को खाद और पानी मिलता है।

जब भी आप इनके नेताओं- महमूद मदनी या अरशद मदनी- को टीवी पर या किसी बड़े मंच पर देखेंगे, तो ये बहुत ही मीठी भाषा में बात करेंगे। ये लोग ‘कौमी एकता’, ‘सेक्युलरिज्म’ और ‘भारत के संविधान’ की कसमें खाएंगे। ये डंके की चोट पर कहेंगे की “हमने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी, भारत हमारा है।”

लेकिन भाई, इन सफेदपोश गद्दारों के इस मीठे ज़हर में मत फंस जाना। इनकी असली जड़ें उत्तर प्रदेश के ‘दारुल उलूम देवबंद’ (Darul Uloom Deoband) में धंसी हुई हैं। ये वही देवबंदी विचारधारा है जिसे पूरी दुनिया में कट्टरपंथ और इस्लामिक चरमपंथ की सबसे बड़ी फैक्ट्री माना जाता है।

आपको जानकर हैरानी होगी की अफगानिस्तान में तबाही मचाने वाले तालिबान के आतंकी भी इसी देवबंदी विचारधारा से ही अपना खौफनाक ज्ञान लेते हैं। और ये जमीयत उलेमा-ए-हिंद उसी देवबंद का एक राजनीतिक और कानूनी विंग (Legal Wing) बनकर भारत में काम कर रहा है।

जब ये लोग कहते हैं की “भारत हमारा है”, तो इनका मतलब ये नहीं होता की ये इस देश के लोकतंत्र से प्यार करते हैं। इनका असली और खौफनाक मतलब ये होता है कि की भारत को दारुल-हरब (काफिरों का देश) से बदलकर दारुल-इस्लाम (इस्लामी मुल्क) बनाना चाहते हैं।

ये लोग भारत के संविधान को सिर्फ तब तक मानते हैं, जब तक वो इनके जिहादी एजेंडे में रुकावट नहीं बनता। जैसे ही कोई बात इनके शरिया कानून के खिलाफ जाती है, ये तुरंत संविधान को लात मारकर सड़कों पर नंगा नाच शुरू कर देते हैं।

जमीयत का असल एजेंडा इस देश के आम मुसलमानों को मुख्यधारा से जोड़ना है ही नहीं। अगर ऐसा होता, तो ये लोग तालीम, रोज़गार और बच्चों के भविष्य पर पैसा खर्च करते। लेकिन नहीं!

इनका करोड़ों का फंड सिर्फ और सिर्फ बम फोड़ने वाले जिहादियों को बचाने, कट्टरपंथी मदरसों को पालने और देवबंद के फतवों को लागू करवाने में खर्च होता है।

ये पर्दे के पीछे से उसी गज़वा-ए-हिंद का खौफनाक खाका तैयार कर रहे हैं, जिसका सपना देखकर विदेशी आक्रांता भारत आए थे। इनकी मीठी-मीठी ‘भाईचारे’ वाली बातों के पीछे सनातन धर्म को मिटाने की एक बहुत गहरी साज़िश चल रही है, जिसे ये लिबरल मीडिया कभी नहीं दिखाएगा।

PFI और सिमी के बाद अब इस खौफनाक जिहादी संगठन पर बैन क्यों नहीं

अगर आपको लग रहा है की जमीयत का काम सिर्फ बड़े-बड़े बम धमाके करने वाले जिहादियों को बचाना है, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं।

ये मज़हबी संगठन सड़क पर उतरकर दंगा करने वाले हर उस छोटे-बड़े गुंडे का भी सबसे बड़ा ‘गॉडफादर’ है जो हिंदू समाज पर पत्थर उठाता है।

ज़रा याद कीजिए दिल्ली का वो खौफनाक दंगा! जब इस देश की राजधानी की सड़कों पर सीएए (CAA) के विरोध के नाम पर आगजनी की जा रही थी, जब हमारे आईबी (IB) के अफसर अंकित शर्मा को चाकू से गोद-गोद कर बेरहमी से मार डाला गया था, और जब पुलिस के जवानों पर गोलियां चलाई गई थीं।

उस दंगे को भड़काने वाले मास्टरमाइंड्स, उस ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और उन कट्टरपंथी दंगाइयों को बचाने के लिए सबसे पहले कौन आगे आया था? यही जमीयत उलेमा-ए-हिंद!

जब इस देश में कट्टरपंथी और देश-विरोधी गतिविधियों के लिए सिमी (SIMI) जैसे संगठनों को बैन किया गया, जब केरल से लेकर दिल्ली तक आतंक मचाने वाले PFI के ठिकानों पर NIA ने छापे मारे और उसे परमानेंट बैन कर दिया, तो फिर ये जमीयत उलेमा-ए-हिंद अभी तक कैसे बचा हुआ है?

PFI भी तो यही करता था ना! वो भी ‘समाज सेवा’ का चोला ओढ़कर जिहादियों को कानूनी और आर्थिक मदद देता था। जमीयत भी बिल्कुल वही काम कर रही है, बस इनका तरीका थोड़ा ज़्यादा चालाक और सफेदपोश है।

जो संगठन डंके की चोट पर आतंकवादियों का 700 से ज़्यादा बार कोर्ट में बचाव कर चुका हो, उस संगठन पर UAPA लगाकर उसे बैन क्यों नहीं किया गया? सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की ये ढिलाई इस देश के हिंदुओं को बहुत भारी पड़ने वाली है।

अब देश के हर सनातनी और हिंदू को अपने दिमाग से वो ‘सेक्युलर नींद’ की खुमारी उतार कर फेंकनी होगी। हमें सिर्फ बॉर्डर पार वाले आतंकवादियों से नहीं लड़ना है, बल्कि हमारे अपने ही सिस्टम के अंदर बैठे इन सूट-बूट वाले ‘लीगल जिहादियों’ से भी आर-पार की लड़ाई लड़नी है।

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