अंग्रेजों की चापलूसी और सुभाष चंद्र बोस से गद्दारी, नेताजी की 'आजाद हिंद फौज' का बेशकीमती खज़ाना लूट कर 'नेहरू' की कांग्रेस सरकार ने सैनिकों को छोड़ा लावारिस

अंग्रेजों की चापलूसी और सुभाष चंद्र बोस से गद्दारी, नेताजी की ‘आजाद हिंद फौज’ का बेशकीमती खज़ाना लूट कर ‘नेहरू’ की कांग्रेस सरकार ने सैनिकों को छोड़ा लावारिस

दशकों तक हमारे बच्चों को स्कूलों में एक बहुत ही चालाकी भरा और सफेद झूठ रटाया गया। हमें बताया गया की “दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल…” अरे भाई, क्या आज़ादी सच में सिर्फ चरखा चलाने और भूख हड़ताल करने से मिल गई थी?

क्या उन गोरे अंग्रेज़ों ने किसी के अनशन से डरकर भारत छोड़ दिया था? ये इस देश के इतिहास का सबसे बड़ा फ्रॉड है जिसे एक खास राजनीतिक परिवार को चमकाने के लिए रचा गया।

ज़मीनी हकीकत तो ये है की अंग्रेज़ों की हेकड़ी कांग्रेस के धरनों से नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनकी ‘आज़ाद हिंद फौज’ (INA) की बंदूकों की गर्जना सुनकर निकली थी।

जब नेताजी के वीरों ने बर्मा और इंफाल के जंगलों से होते हुए अंग्रेज़ों पर गोलियां बरसानी शुरू कीं, और जब 1946 में उसी INA के प्रभाव से रॉयल इंडियन नेवी के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया, तब जाकर उन गोरों को समझ में आया की अब भारत में रुकने का मतलब है अपनी लाशें बिछवाना।

लेकिन हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये रहा की जब हमें आज़ादी मिली, तो दिल्ली के तख्त पर वो लोग बैठ गए जिन्हें अंग्रेज़ों की चापलूसी करनी थी।

इन काले अंग्रेज़ों ने और सत्ता के लोभियों ने एक ऐसी खौफनाक गद्दारी रची जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके उन 40 हज़ार से ज़्यादा वीर सैनिकों के खून का सरेआम सौदा कर दिया।

ये भारत के इतिहास की वो सबसे बड़ी डकैती है जहाँ अंग्रेज़ों ने नहीं, बल्कि कांग्रेस सरकार के संरक्षण में बैठे हमारे ही देश के सफेदपोश गद्दारों ने नेताजी के बेशकीमती खज़ाने को लूटा और आज़ाद हिंद फौज के वीरों को सड़क पर भीख मांगने के लिए लावारिस छोड़ दिया।

आज उसी गद्दार इतिहास के पन्ने पलटने का वक्त आ गया है।

मातृभूमि के लिए सुभाष चंद्र बोस को दान किया गया वो अथाह खज़ाना जिसे खून पसीना बेचकर विदेश में बैठे हिन्दुस्तानियों ने दिया

अब ज़रा उस खौफनाक डकैती की गहराई में जाने से पहले उस ‘खज़ाने’ का जन्म कैसे हुआ, ये समझना बहुत ज़रूरी है।

जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया (सिंगापुर, रंगून, मलाया) में जाकर आज़ाद हिंद फौज की कमान संभाली, तो उनके पास अंग्रेज़ों से लड़ने के लिए कोई बहुत बड़ा सरकारी फंड नहीं था।

नेताजी ने वहां बसे हिंदुस्तानियों को एक हुंकार भरी- “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।”

भाई साहब, नेताजी की उस एक दहाड़ पर वहां बसे हिंदुस्तानियों ने जो किया, वो सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रबर के बागानों में काम करने वाले गरीब मज़दूरों ने अपनी रोज़ की दिहाड़ी नेताजी के कदमों में रख दी।

अमीर भारतीय व्यापारियों ने अपनी तिजोरियां खोल दीं। और सबसे भावुक मंज़र तो वो था जब भारत माता की उन सनातनी बेटियों और महिलाओं ने अपने गले से मंगलसूत्र, कानों की बालियां और हाथों के सोने के कंगन उतार कर नेताजी के तराज़ू में तौल दिए थे।

हर किसी के मन में बस एक ही आग थी की कैसे भी करके अपनी भारत माता को अंग्रेज़ों की उन ज़ंजीरों से आज़ाद कराना है।

देखते ही देखते नेताजी के पास आज़ाद हिंद बैंक में अथाह खज़ाना इकट्ठा हो गया। रिकॉर्ड्स बताते हैं की उस खज़ाने में 100 किलोग्राम से ज़्यादा शुद्ध सोना, बेशकीमती हीरे-जवाहरात और करोड़ों रुपये का भारी-भरकम फंड जमा था।

ये कोई लूट का माल नहीं था, ये उन देशभक्तों के खून और पसीने की कमाई थी जो सिर्फ और सिर्फ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित थी।

लेकिन फिर अगस्त 1945 का वो मनहूस दिन आया। जापान के आत्मसमर्पण के बाद नेताजी ताइवान (ताइहोकू) से एक विमान में सफर कर रहे थे। उस विमान में उनके साथ 4 बड़े बक्सों में वो बेशकीमती खज़ाना भी था।

और फिर अचानक खबर आती है की विमान क्रैश हो गया। नेताजी के उस रहस्यमयी विमान हादसे के बाद उन सोने और हीरों से भरे संदूकों का रातों-रात गायब हो जाना कोई इत्तेफाक नहीं था।

वो भारत की छाती पर छुरा घोंपने वाली उस खौफनाक लूट की पहली कड़ी थी, जिसे हमारे ही बीच के कुछ ‘जयचंदों’ ने अंजाम दिया था।

एस ए अय्यर और मुंगा राममूर्ति, नेताजी की पीठ में खंजर घोंपने वाले वो जयचंद जिन्होंने डकार लिया खज़ाना

विमान हादसे के बाद वो संदूक कहां गए? वो सोना किसने डकारा? दशकों तक इस देश के लोगों को अंधेरे में रखा गया। वामपंथी इतिहासकारों ने कभी इस लूट पर बात ही नहीं की।

लेकिन जब BJP सरकार ने खुफिया फाइलों को डीक्लासिफाई किया, तो जो नंगा सच बाहर आया, उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। उस खज़ाने को किसी अंग्रेज़ या जापानी ने नहीं लूटा था। उसे लूटा था नेताजी के ही दो सबसे करीबी और गद्दार साथियों ने!

इन गद्दारों के नाम थे- एस.ए. अय्यर (S.A. Ayer) और मुंगा राममूर्ति (Munga Ramamurti)। एस.ए. अय्यर उस वक्त आज़ाद हिंद सरकार का प्रचार मंत्री था, और मुंगा राममूर्ति टोक्यो (जापान) में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का प्रमुख था।

जब विमान हादसे के बाद वो खज़ाने के संदूक टोक्यो लाए गए, तो इन दोनों ने बड़ी ही चालाकी और मक्कारी से उस सोने और हीरों की बंदरबांट कर ली।

ज़रा इनकी नीचता का स्तर देखिए! 1945 के बाद जब जापान पर परमाणु बम गिरे थे, पूरा जापान राख में मिल चुका था। वहां के लोग भुखमरी और गरीबी से मर रहे थे।

लेकिन उसी तबाह हुए टोक्यो शहर की सड़कों पर मुंगा राममूर्ति दो-दो महंगी अमेरिकी लग्ज़री कारों (Cadillac और Studebaker) में बैठकर अय्याशी कर रहा था।

उसके पास इतना पैसा कहां से आया? उसने टोक्यो में अपना एक बहुत बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया। वहीं एस.ए. अय्यर भी उस खज़ाने का एक बहुत बड़ा हिस्सा लेकर रफूचक्कर हो गया।

ये बातें कोई हवा-हवाई नहीं हैं। आज़ादी के बाद 1951 में जापान में भारत के तत्कालीन राजदूत के.के. चेत्तुर (K.K. Chettur) ने दिल्ली में बैठी नेहरू की कांग्रेस को कई सीक्रेट चिट्ठियां लिखी थीं।

राजदूत चेत्तुर ने अपनी खुफिया रिपोर्ट में चीख-चीख कर दिल्ली को बताया था की “अय्यर और राममूर्ति ने नेताजी का सारा खज़ाना डकार लिया है। ये लोग टोक्यो में अय्याशी कर रहे हैं और इन पर तुरंत क्रिमिनल केस चलाकर इन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए।”

एक भारतीय राजदूत अपनी ही सरकार को सबूतों के साथ लिखित में चेतावनी दे रहा था की भारत माता का वो पवित्र खज़ाना जो हमारे लोगों ने खून बेचकर दिया था, उसे इन दो गद्दारों ने लूट लिया है। लेकिन इसके बाद दिल्ली में बैठे उन सफेदपोशों ने जो किया, वो भारत के इतिहास की सबसे शर्मनाक गद्दारी थी।

नेहरू सरकार की वो खौफनाक गद्दारी, लुटेरों को जेल भेजने के बजाय सरकारी कुर्सी और सत्ता का दिया सम्मान

अब ज़रा उस दिल्ली दरबार के बहरेपन और नेहरूवादी राजनीति की उस खौफनाक गद्दारी को समझिए। जब जापान से भारत के राजदूत की रिपोर्ट दिल्ली पहुंची, तो किसी भी आम देशभक्त सरकार का पहला कदम क्या होता?

वो तुरंत पुलिस भेजती, उन गद्दारों को कॉलर से पकड़कर घसीटते हुए भारत लाती, उन्हें जेल की काल कोठरी में सड़ाती और वो सारा लूटा हुआ खज़ाना वापस सरकारी खज़ाने में जमा करवाती।

लेकिन दिल्ली के तख्त पर बैठे पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनकी कांग्रेस सरकार ने क्या किया? उन्होंने के.के. चेत्तुर की उन सीक्रेट और खुफिया फाइलों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया! मुंगा राममूर्ति के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई।

और सबसे बड़ा सदमा तो एस.ए. अय्यर के मामले में लगा। जिस एस.ए. अय्यर को हथकड़ियां पहनाकर तिहाड़ जेल में डाला जाना चाहिए था, उस गद्दार को पंडित नेहरू ने 1953 में भारत बुलाया।

और सज़ा देने के बजाय, नेहरू ने अय्यर को अपनी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी ‘पंचवर्षीय योजना’ (Five Year Plans) के प्रचार विभाग का मुख्य सलाहकार (Chief Advisor) बना दिया!

ज़रा सोचिए इस बेशर्मी को! जो आदमी भारत माता का सोना लूटकर भागा हो, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पीठ में खंजर घोंप चुका हो, उसे आज़ाद भारत की कांग्रेस सरकार बाकायदा सरकारी कुर्सी पर बिठाती है, उसे एक वीआईपी (VIP) का रुतबा देती है और उसे जनता के टैक्स के पैसों से सैलरी बांटती है।

आखिर क्यों? क्या कांग्रेस सरकार को ये डर सता रहा था की अगर एस.ए. अय्यर या राममूर्ति को गिरफ्तार किया गया, उन पर कोर्ट में केस चला, तो वो कोई ऐसा राज़ उगल देंगे जो दिल्ली में बैठे बड़े-बड़े नेताओं की कुर्सी हिला देगा?

क्या उन्हें डर था की नेताजी के ज़िंदा होने की कोई खबर बाहर आ जाएगी? या फिर उस लूटे हुए खज़ाने का कोई बहुत बड़ा हिस्सा सत्ता के उन गलियारों तक भी पहुंचा था जहाँ से इन लुटेरों को ये खौफनाक संरक्षण मिल रहा था?

ये कोई भूल-चूक नहीं थी। ये उस वामपंथी इकोसिस्टम की एक सोची-समझी साज़िश थी, जिसका एक ही एजेंडा था- नेताजी का नामोनिशान मिटा दो, उनके करीबियों को खरीद लो, और अगर कोई गद्दारी करे तो उसे सत्ता की मलाई चटाकर हमेशा के लिए चुप करा दो।

इसी गद्दार सिस्टम ने देश को ये यकीन दिलाने की कोशिश की कि हमें आज़ादी सिर्फ लाठी और चरखे से मिली है, जबकि असल में आज़ादी की कीमत उन संदूकों में बंद थी जिसे नेहरू सरकार के संरक्षण में सरेआम लूट लिया गया।

आज़ाद हिंद फौज के वीरों का सरेआम अपमान, नेहरू ने अंग्रेज़ों की चापलूसी में सैनिकों को फुटपाथ पर रेंगने के लिए छोड़ दिया

अगर नेताजी के खज़ाने की लूट आपको सिर्फ एक आर्थिक भ्रष्टाचार लग रही है, तो ज़रा उस गद्दारी के पन्ने को पलटिए जो उन 40 हज़ार से ज़्यादा वीर सैनिकों के साथ की गई थी।

वो वीर जिन्होंने अपना घर-बार छोड़कर, अपनी जान हथेली पर रखकर बर्मा, कोहिमा और इंफाल के घने जंगलों में अंग्रेज़ों की छाती पर गोलियां खाई थीं।

जब 1945 के अंत में आज़ाद हिंद फौज (INA) के सैनिकों को अंग्रेज़ों ने बंदी बनाकर दिल्ली के लाल किले में उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया, तो पूरा भारत सड़कों पर उतर आया था। उसी बगावत के खौफ से अंग्रेज़ों को समझ आ गया था की अब भारत पर राज करना नामुमकिन है।

लेकिन 1947 में जब आज़ादी मिली, जब दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फहराया गया, तो उन असली आज़ादी के दीवानों के साथ क्या सुलूक हुआ? देश की नई सरकार बनी।

पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने और उन्होंने देश का पहला गवर्नर-जनरल उसी अंग्रेज़ ‘लॉर्ड माउंटबेटन’ को बना लिया जिसके खिलाफ हमारे वीरों ने खून बहाया था!

जब आज़ाद भारत की नई सेना का गठन हो रहा था, तो पूरे देश को उम्मीद थी की INA के उन युद्ध लड़े हुए और खूंखार शेरों को भारतीय सेना में सबसे ऊंचा मुकाम मिलेगा।

लेकिन नेहरू और उनके अंग्रेज आका माउंटबेटन ने बड़ी ही बेशर्मी से आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों को भारतीय सेना में वापस लेने से साफ इंकार कर दिया।

ज़रा इस गद्दार सिस्टम का तर्क सुनिए भाई! इन्होंने दलील दी की INA के सैनिक “अनुशासनहीन” हैं क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश क्राउन और अंग्रेज़ी सेना के खिलाफ “बगावत” की थी।

अरे लानत है ऐसी सोच पर! जो सैनिक भारत माता को आज़ाद कराने के लिए अंग्रेज़ों की आंख में आंख डालकर लड़े, वो आज़ाद भारत की सरकार की नज़रों में बागी और अनुशासनहीन हो गए?

मतलब आज़ादी के बाद भी दिल्ली के तख्त पर बैठे लोगों का पैमाना यही था की जो अंग्रेज़ों का वफादार कुत्ता है, वो तो सेना में अफसर बनेगा, और जिसने अंग्रेज़ों पर गोली चलाई, वो सड़क पर धक्के खाएगा।

नतीजा क्या हुआ? जिन सैनिकों की दहाड़ से लंदन की संसद कांपती थी, आज़ादी के बाद वो वीर सिपाही दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हो गए।

किसी ने दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाया, कोई कानपुर के चौराहों पर चाय बेचता हुआ मिला, तो कोई फुटपाथ पर भीख मांगते-मांगते गुमनामी की मौत मर गया।

दशकों तक इन वीरों को ना तो स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया गया और ना ही कोई पेंशन दी गई। हमारे देश के असली नायकों को भूखे पेट तड़पने के लिए छोड़ दिया गया और सत्ता की मलाई वो लोग चाटते रहे जो जेलों में बैठकर किताबें लिख रहे थे।

ये इस देश के साथ किया गया वो खौफनाक धोखा था जिसे वामपंथी इतिहासकार आज भी एक ‘प्रशासनिक फैसला’ बताकर जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं।

वामपंथी इतिहासकारों की कलम का कत्लेआम, नेताजी और उनकी फौज के गौरव को किताबों से मिटाने का षड्यंत्र

जब सत्ता गद्दारों के हाथ में आ जाती है, तो उनका सबसे पहला काम होता है इतिहास को बदलना, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कभी सच का पता ही ना चले। और इस काम में कांग्रेस और दिल्ली दरबार की सबसे ज़्यादा मदद की इस देश के उन ‘कलम के कसाई’ वामपंथी इतिहासकारों ने!

इन काले अंग्रेज़ों ने एक सोची-समझी साज़िश के तहत आज़ादी का सारा का सारा क्रेडिट सिर्फ एक परिवार, एक चरखे और एक राजनीतिक पार्टी के चरणों में लाकर रख दिया।

इन्होंने एनसीईआरटी (NCERT) और स्कूलों की किताबों का पूरा का पूरा सिलेबस ऐसे डिज़ाइन किया जैसे अंग्रेज़ तो बस सत्याग्रह और अनशन देखकर खुद ही अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर भाग गए हों।

ज़रा याद कीजिए अपने स्कूल के दिन! क्या आपको कभी इतिहास की किताबों में इंफाल की उस खूनी जंग के बारे में पढ़ाया गया जहाँ आज़ाद हिंद फौज के हज़ारों सैनिकों ने भारत की ज़मीन पर तिरंगा फहराने के लिए अपनी जान दी थी? क्या आपको कोहिमा के युद्ध का वो खौफनाक सच बताया गया? नहीं!

और हद तो तब हो गई जब इन लिबरलों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर ‘फासीवाद’ का ठप्पा लगाने की कोशिश की। इन्होंने लिखा की नेताजी ने जापान और जर्मनी जैसे देशों से हाथ मिलाया था जो की लोकतंत्र के खिलाफ थे।

अरे बेशर्मों! जब भारत माता के पैरों में बेड़ियां पड़ी थीं, जब अंग्रेज़ रोज़ हमारे लोगों को गोलियों से भून रहे थे, तब नेताजी का एक ही लक्ष्य था- “दुश्मन का दुश्मन हमारा दोस्त”!

उन्होंने अपने खून का सौदा करके विदेशी ज़मीन पर एक पूरी की पूरी भारतीय सेना खड़ी कर दी थी, और तुम उनकी नीयत पर सवाल उठा रहे हो?

अब इस गद्दारी के पन्ने पलटने का आ गया है वक्त, नेताजी और उनकी फौज को मिले इंसाफ

आज देश में एक ऐसी राष्ट्रवादी सरकार बैठी है जिसने दशकों से बंद पड़ी उन 37 से ज़्यादा खुफिया फाइलों को डीक्लासिफाई करके जनता के सामने रख दिया है। फाइलों ने तो सच उगल दिया है, लेकिन हमारी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

दिल्ली के इंडिया गेट पर आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की वो भव्य और विशाल मूर्ति ज़रूर लग गई है, जिसने उस गद्दार जॉर्ज पंचम की खाली छतरी को हमेशा के लिए भर दिया है।

लेकिन क्या सिर्फ एक मूर्ति लगा देने से उन 40 हज़ार सैनिकों के आंसुओं का हिसाब हो जाएगा जो फुटपाथ पर एड़ियां रगड़ कर मरे थे? क्या सिर्फ फाइलें खोल देने से एस.ए. अय्यर और मुंगा राममूर्ति जैसे गद्दारों के पाप धुल जाएंगे जिन्हें नेहरू सरकार ने सत्ता का मज़ा चखाया था? बिल्कुल नहीं!

भारत के इतिहास को इन वामपंथी और मैकाले की औलादों के चंगुल से पूरी तरह आज़ाद किया जाए। इतिहास की किताबों को दोबारा लिखा जाए। उन किताबों में डंके की चोट पर एस.ए. अय्यर को एक ‘लुटेरा और देशद्रोही’ घोषित किया जाए।

किताबों में लिखा जाए की आज़ादी के बाद की कांग्रेस सरकार ने कैसे नेताजी के खज़ाने को लूटने वालों को बचाया और देश के असली नायकों को सड़क पर भीख मांगने के लिए मजबूर किया।

वंदे मातरम! जय हिंद!

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