मोहम्मद गौरी को भारत में सबसे पहली और सबसे भयानक हार देने वाली हिन्दू शेरनी 'नायकी देवी', जब बच्चे को पीठ पर बांधकर गुजरात की मिट्टी में किया जिहादियों का खुल्ला नरसंहार

मोहम्मद गौरी को भारत में सबसे पहली और सबसे भयानक हार देने वाली हिन्दू शेरनी ‘नायकी देवी’, जब बच्चे को पीठ पर बांधकर गुजरात की मिट्टी में किया जिहादियों का खुल्ला नरसंहार

भारत का इतिहास कोई हारने वालों का इतिहास नहीं है भाई! जब-जब इस पवित्र भूमि पर जिहादी आक्रांताओं ने अपनी नापाक नज़रें डालीं, तब-तब इसी मिट्टी से ऐसी खूंखार और भयंकर ज्वाला भड़की जिसने उन लुटेरों को उन्हीं के खून में नहला दिया।

एक ऐसा ही खौफनाक जिहादी आक्रांता था मोहम्मद गौरी। वही मोहम्मद गौरी जिसके नाम का खौफ उत्तर भारत के मैदानों में फैला हुआ था।

ये वो दौर था (12वीं सदी का अंतिम चरण) जब मोहम्मद गौरी ने मुल्तान और उच्च पर कब्ज़ा कर लिया था और उसके जिहादी सिपहसालार हिंदुओं को काटते हुए आगे बढ़ रहे थे।

गौरी को ऐसा लगने लगा था की भारत तो बस एक खुली चरागाह है जहाँ वो जब चाहेगा, आएगा, हमारे मंदिरों को तोड़ेगा, हमारी धन-दौलत लूटेगा और हमारी औरतों को गुलाम बनाकर गजनी ले जाएगा।

उसका घमंड सातवें आसमान पर था। उसे लगता था की इस्लाम की तलवार के आगे कोई भी काफिर (हिंदू) टिक नहीं पाएगा। लेकिन उस जाहिल सुल्तान को ये नहीं पता था की जिस राजपूताने और गुजरात की तरफ वो अपने कदम बढ़ा रहा है, वहां की मिट्टी में कैसा बारूद छुपा हुआ है।

अक्सर हमें रटाया जाता है की मोहम्मद गौरी को सिर्फ पृथ्वीराज चौहान ने हराया था। लेकिन डंके की चोट पर ये सच जान लीजिए की मोहम्मद गौरी को भारत की ज़मीन पर सबसे पहली, सबसे खौफनाक और सबसे ज़िल्लत भरी हार किसी राजा या सम्राट ने नहीं दी थी।

उसे वो भयानक हार दी थी एक अकेली हिंदू क्षत्राणी ने, एक विधवा महारानी ने! उस शेरनी का नाम था- महारानी नायकी देवी। ये वो नाम है जिसे सुनकर गजनी में बैठे सुल्तानों की भी रूह कांप जाती थी।

दिल्ली से चला मोहम्मद गौरी, चालुक्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठी एक विधवा हिन्दू रानी को कमज़ोर समझने की वो सबसे बड़ी भूल

अब ज़रा इस महासंग्राम की उस पृष्ठभूमि को समझिए, जिसने मोहम्मद गौरी को गुजरात पर हमला करने का लालच दिया था। गुजरात में चालुक्य (सोलंकी) वंश का राज था, जो पूरे पश्चिम भारत का एक बेहद समृद्ध और ताकतवर साम्राज्य था।

लेकिन अचानक से वहां के वीर राजा अजयपाल का अचानक निधन हो गया। पूरे राज्य में हाहाकार मच गया। राजा के जाने के बाद गद्दी का वारिस कौन था?

उनका एक नन्हा सा नवजात बेटा- मूलराज द्वितीय। एक ऐसा बच्चा जो अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था, वो अब चालुक्य साम्राज्य का राजा था।

चारों तरफ दुश्मनों की नज़रें गड़ गईं। ऐसे खौफनाक वक्त में राजा अजयपाल की विधवा पत्नी, महारानी नायकी देवी (जो गोवा के कदंब वंश की बेटी थीं) ने अपने आंसू पोंछे, अपने दुख को सीने में दफन किया और राजमाता के रूप में गुजरात की सत्ता अपने हाथों में ले ली। एक औरत, वो भी विधवा, और गोदी में एक छोटा सा बच्चा!

जब ये खबर मोहम्मद गौरी के जासूसों ने उसे मुल्तान में दी, तो उस जिहादी लुटेरे की बांछें खिल गईं। गौरी ने सोचा की इससे सुनहरा मौका तो मिल ही नहीं सकता। एक औरत और एक दूध पीता बच्चा मेरा क्या बिगाड़ लेंगे?

गौरी के दिमाग में महमूद गजनवी का वो इतिहास नाच रहा था जब गजनवी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर को तोड़ा था और वहां का अथाह खज़ाना लूटा था। गौरी भी बिल्कुल वही करना चाहता था।

वो चाहता था की वो गुजरात पर भूखे भेड़िए की तरह टूटे, सोमनाथ के खज़ाने को फिर से लूटे और चालुक्य साम्राज्य की औरतों को अपने हरम की दासियां बनाए।

इसी नापाक और घिनौने इरादे के साथ मोहम्मद गौरी ने अपनी लाखों की विशाल जिहादी फौज तैयार की।

गौरी अपनी उस विशाल सेना को लेकर थार के तपते रेगिस्तान को चीरता हुआ गुजरात की तरफ उस भूखे गिद्ध की तरह झपटा, जिसे लगा था की शिकार बहुत आसान है। लेकिन उसे नहीं पता था की वो शिकार करने नहीं, बल्कि खुद मौत के मुंह में जा रहा है।

सोमनाथ का खज़ाना और हिन्दू औरतों की मांग करने वाले गौरी के दूत को महारानी का बारूदी जवाब, जिससे कांप उठा मोहम्मद गौरी

जब मोहम्मद गौरी की विशाल सेना गुजरात की सीमाओं के करीब पहुंची, तो उसने अपनी उस पुरानी और नीच फितरत का इस्तेमाल किया जो ये जिहादी हमेशा करते आए थे। गौरी ने अपना एक दूत महारानी नायकी देवी के दरबार में भेजा।

उस जिहादी दूत ने दरबार में आकर पूरे राजपूताने की छाती पर पैर रखने वाली एक खौफनाक और घमंडी शर्त रखी। उसने महारानी की आंखों में आंखें डालकर कहा-

“सुल्तान मोहम्मद गौरी का फरमान है की अपनी सारी दौलत, सोमनाथ मंदिर का सारा खज़ाना, अपने हथियार और अपने राज्य की सारी खूबसूरत औरतों को सुल्तान के हवाले कर दो। अगर तुम ऐसा करोगी, तो सुल्तान तुम्हारी जान बख्श देगा, वरना पूरे गुजरात को आग लगा दी जाएगी और तुम्हारे बच्चों का कत्ल कर दिया जाएगा।”

महारानी नायकी देवी ने उस दूत को वो करारा जवाब दिया जिसने मोहम्मद गौरी के पूरे तंबू में आग लगा दी। महारानी ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया की-

“जाकर अपने सुल्तान से कह दो की हम हिंदू और राजपूत औरतें अपनी इज़्ज़त और अपनी मातृभूमि के लिए चिता की धधकती आग में कूद कर जौहर कर सकती हैं, लेकिन किसी विदेशी लुटेरे के आगे घुटने नहीं टेक सकतीं। अगर सुल्तान को दौलत चाहिए, तो वो रणभूमि में आए, हम उसका स्वागत अपनी तलवारों की धार से करेंगे!”

वो दूत वहां से कांपता हुआ वापस लौटा। महारानी का ये जवाब सुनकर मोहम्मद गौरी आगबबूला हो गया। उसे लगा की एक काफिर औरत की इतनी हिम्मत की वो गजनी के सुल्तान को चुनौती दे?

उधर महारानी नायकी देवी ने पूरे गुजरात और राजपूताने में रणभेरी बजवा दी। उन्होंने साफ कह दिया की ये लड़ाई सिर्फ चालुक्य साम्राज्य की नहीं है, ये लड़ाई हमारे महादेव की है, हमारी औरतों की इज़्ज़त की है और हमारे सनातन धर्म की है।

आबू पहाड़ और राजपूती तलवारों का वो खौफनाक चक्रव्यूह, नायकी देवी ने जिहादी फौज का चूहों की तरह फंसाकर किया शिकार

महारानी नायकी देवी एक बेहद चतुर और खतरनाक रणनीतिकार भी थीं। उन्हें बहुत अच्छी तरह से पता था की मोहम्मद गौरी की ताकत क्या है। गौरी की सेना के पास अरबी घोड़े थे और उनके तीरंदाज़ खुले मैदान में बहुत तेज़ी से हमला करते थे।

अगर राजपूती सेना गौरी से किसी खुले और बड़े मैदान में लड़ती, तो गौरी के घुड़सवार उन पर भारी पड़ सकते थे।

इसलिए महारानी ने तय किया की वो मोहम्मद गौरी को अपनी शर्तों और अपनी चुनी हुई ज़मीन पर लड़वाएंगी। उन्होंने गौरी को फंसाने के लिए माउंट आबू की तलहटी में स्थित ‘कास्रदा’ नाम की एक बेहद संकरी, पथरीली और बीहड़ घाटी को चुना।

ये जगह एक ऐसा प्राकृतिक मौत का कुआं थी जहाँ गौरी के तेज़ दौड़ने वाले अरबी घोड़े किसी काम के नहीं रह जाते। वहां की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर घुड़सवारी करना नामुमकिन था और संकरे रास्तों के कारण गौरी अपनी पूरी लाखों की सेना को एक साथ मैदान में नहीं उतार सकता था।

गौरी को इस चक्रव्यूह में फंसाने के लिए महारानी ने एक और बहुत बड़ा ऐतिहासिक काम किया। उन्होंने आस-पास के सभी हिंदू राजाओं को सनातन धर्म की रक्षा के लिए एक झंडे के नीचे इकट्ठा कर लिया।

जालोर के वीर शासक कीर्तिपाल चौहान, नाडोल के राजा केल्हणदेव और आबू के परमार राजा धारवर्ष- ये सभी शूरवीर अपनी-अपनी फौजों के साथ महारानी नायकी देवी की आवाज़ पर खिंचे चले आए।

उन सभी राजाओं ने इस बात को सहर्ष स्वीकार किया की आज धर्म की रक्षा के लिए उनकी सेना का नेतृत्व एक महिला- महारानी नायकी देवी करेंगी।

एक तरफ से गौरी अपनी सेना लेकर पूरे घमंड के साथ उस घाटी की तरफ बढ़ रहा था, और दूसरी तरफ पहाड़ों की चोटियों पर, खाइयों में और पेड़ों के पीछे राजपूती सेना अपनी धनुष-बाण और नंगी तलवारें लेकर उस जिहादी लुटेरे का इंतज़ार कर रही थी।

कास्रदा की वो घाटी एक ऐसा खौफनाक चक्रव्यूह बन चुकी थी जिसका एक ही दरवाज़ा था, और उस दरवाज़े के अंदर मौत साक्षात मुंह खोले खड़ी थी।

गौरी को लगा की वो शिकार करने जा रहा है, लेकिन उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था की वो खुद एक ऐसी शेरनी की गुफा में घुस चुका है जो उसके खून की प्यासी है।

पीठ पर नन्हा बेटा और हाथ में भवानी तलवार, साक्षात चंडी बनकर जिहादियों की छाती चीरने वाली हिन्दू शेरनी नायकी देवी का वो रौद्र रूप

जैसे ही मोहम्मद गौरी की वो घमंडी और विशाल विदेशी फौज कास्रदा की उस संकरी और पथरीली घाटी में घुसी, उसे लगा की वो बहुत आसानी से गुजरात की सीमा में प्रवेश कर जाएगा।

गौरी के सैनिकों को दूर-दूर तक कोई सेना नज़र नहीं आ रही थी। वो अपनी जीत के नशे में चूर होकर हंस रहे थे। लेकिन उन्हें क्या पता था की आबू पहाड़ की उन खाइयों और जंगलों के पीछे साक्षात मौत उनका इंतज़ार कर रही है।

तभी अचानक पहाड़ों के बीच से रणभेरी और शंखनाद की वो गगनभेदी आवाज़ गूंजी जिसने गौरी के सैनिकों के कानों के पर्दे फाड़ दिए। “हर हर महादेव” और “जय भवानी” के नारों से पूरा आबू पहाड़ कांप उठा।

और फिर रणभूमि में जो नज़ारा दिखा, वो भारत के इतिहास का वो सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाला मंज़र था, जिसे देखकर खुद देवताओं ने भी आसमान से पुष्प बरसाए होंगे।

महारानी नायकी देवी कोई आम रानी नहीं थीं जो युद्ध के वक्त अपने महल के तहखानों में छुपकर बैठ जातीं। उन्होंने अपने उस दूध पीते नवजात बेटे (महाराजा मूलराज द्वितीय) को लिया, उसे एक कपड़े से अपनी पीठ पर कसकर बांधा, अपने हाथों में भवानी तलवार उठाई और साक्षात रणचंडी का रूप धरकर अपने युद्ध वाले हाथी पर सवार हो गईं।

पहाड़ों की चोटियों से राजपूती तीरंदाज़ों ने गौरी की सेना पर तीरों की ऐसी भयंकर बारिश की कि आसमान काला पड़ गया। गौरी के वो मशहूर अरबी घोड़े, जिन पर उसे इतना घमंड था, वो कास्रदा की उस पथरीली और संकरी ज़मीन पर फिसल-फिसल कर गिरने लगे।

गौरी की सेना में भगदड़ मच गई। घोड़े अपने ही सैनिकों को कुचलने लगे। और फिर, पहाड़ों से नीचे उतरकर राजपूती सेना उन जिहादियों पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़ी। तलवारों से तलवारें टकराईं, भालों से सीने चीरे गए।

महारानी नायकी देवी खुद दोनों हाथों से तलवार चलाते हुए दुश्मनों की गर्दनें धड़ से अलग कर रही थीं। कास्रदा की उस घाटी में जिहादियों का वो खुल्ला नरसंहार हुआ की आबू की ज़मीन उनके खून से लाल हो गई। गौरी के सैनिक ऐसे कट रहे थे जैसे खेतों में गाजर-मूली काटी जाती है।

खून से लथपथ होकर जान की भीख मांगता मोहम्मद गौरी, नायकी देवी ने बीच मैदान में सुल्तान का सारा गुरूर जूतों तले कुचल कर खदेड़ा

मोहम्मद गौरी, जो कुछ घंटे पहले तक सोमनाथ का खज़ाना और हिंदू औरतों की मांग कर रहा था, अब उस घाटी में चूहों की तरह फड़फड़ा रहा था। उसका वो सारा घमंड, वो सारा गुरूर उसी कास्रदा की मिट्टी में मिल चुका था।

उसने अपनी जान बचाने के लिए अपने सबसे खूंखार और खास अंगरक्षकों को आगे किया, लेकिन राजपूती तलवारों की उस आंधी के आगे कोई नहीं टिक पाया।

महारानी नायकी देवी की सेना ने गौरी के उस सुरक्षा घेरे को ऐसे चीर दिया जैसे कोई कागज़ फाड़ता है। नायकी देवी की तलवार का एक ऐसा भयानक वार मोहम्मद गौरी को लगा था की वो खून से लथपथ होकर अपने घोड़े से नीचे गिर पड़ा था।

जो सुल्तान पूरे उत्तर भारत में खौफ का दूसरा नाम बना हुआ था, वो आज गुजरात की एक हिंदू शेरनी के सामने अपनी जान की भीख मांग रहा था। वो अधमरा हो चुका था और उसे साक्षात अपनी मौत सामने खड़ी नज़र आ रही थी।

गौरी को समझ आ गया था की अगर वो एक पल भी और इस मैदान में रुका, तो ये राजपूत उसका सिर धड़ से अलग करके आबू के पहाड़ों पर टांग देंगे। अपनी जान बचाने के लिए उस खूंखार जिहादी ने वो नीचता और कायरता दिखाई जो इन विदेशी लुटेरों की असली पहचान थी।

मोहम्मद गौरी ने अपना सुल्तान का मुकुट वहीं ज़मीन पर फेंका, अपना सारा खज़ाना, अपने हथियार और अपनी आधी से ज़्यादा सेना को वहीं मरने के लिए अनाथ छोड़ दिया।

वो अपने कुछ गिने-चुने वफादारों के साथ, खून से लथपथ हालत में अपने घोड़े पर बैठा और पीठ दिखाकर वहां से भाग खड़ा हुआ।

सुल्तान को मैदान छोड़कर भागते देख उसकी बची-खुची फौज का मनोबल टूट गया। जो दरिंदे भारत को लूटने आए थे, वो अब अपनी जान बचाने के लिए पहाड़ों और जंगलों में पागलों की तरह भाग रहे थे।

और पीछे से राजपूती सेना उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर, चुन-चुन कर काट रही थी। मोहम्मद गौरी की वो करारी और ज़िल्लत भरी हार थी जिसे वो मरते दम तक अपनी यादों से नहीं मिटा पाया।

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