हमें बचपन से स्कूलों में एक ही मीठी गोली खिलाई गई की ताजमहल तो ‘मोहब्बत की निशानी’ है। शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज़ की याद में इसे बनवाया था।
ये दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे सफेद झूठ है। मुगलों के इस ‘रोमांटिक फ्रॉड’ का नंगा सच क्या है, ये इस देश का बिकाऊ सिस्टम कभी नहीं बताता।
ज़रा अपना लॉजिक लगाइए। मुमताज़ की मौत 1631 में मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में हुई थी। अगर शाहजहां को अपनी उस बेगम से इतनी ही मोहब्बत थी, तो उसने मुमताज़ को वहीं क्यों नहीं दफनाया?
इसके पीछे मुगलों की वो जिहादी और खौफनाक डकैती छुपी है जिसे सुनकर आज हर सच्चे सनातनी का खून खौल उठेगा।
शाहजहां के ही अपने दरबारी इतिहासकार मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपनी किताब ‘बादशाहनामा’ में डंके की चोट पर सच लिखा है।
उस किताब के पन्नों में साफ-साफ दर्ज है की मुमताज़ की लाश को दफनाने के लिए आगरा में जयपुर के महाराजा जयसिंह का एक बेहद भव्य और आलीशान महल छीना गया था।
जी हाँ! ये कोई खाली ज़मीन नहीं थी जहाँ रातों-रात कोई अजूबा खड़ा कर दिया गया। ये हमारे भगवान शिव का वो प्राचीन और भव्य मंदिर था, जिसे सदियों से ‘तेजोमहालय’ कहा जाता था।
शाहजहां ने अपनी सत्ता, अपनी सेना और अपने खौफ का इस्तेमाल करके महाराजा जयसिंह को डरा-धमका कर उनका वो पुश्तैनी शिव मंदिर हड़प लिया।
मोहब्बत का चोला ओढ़ाकर इस देश के हिंदुओं की छाती पर मुगलों ने वो मुगलिया कलंक खड़ा कर दिया जिसे आज दुनिया ‘ताजमहल’ कहती है। ये कोई प्यार की निशानी नहीं, बल्कि हिंदुओं की आस्था पर डाला गया मुगलों का सबसे बड़ा जिहादी डाका है।
ताजमहल के 22 बंद कमरों का वो खौफनाक रहस्य जिसे खोलने से कांपता है पूरा का पूरा मुगलिया पैरोकार
अब ज़रा उस खौफनाक रहस्य की तरफ चलते हैं जिससे इस देश का पूरा का पूरा लिबरल इकोसिस्टम और मुगलों की चापलूसी करने वाले गद्दार थर-थर कांपते हैं।
वो है- ताजमहल के नीचे बने 22 बंद तहखानों का सच! आखिर उन 22 कमरों के अंधेरे में ऐसा क्या दफन है जिसे ये सेक्युलर सरकारें दशकों से दुनिया की नज़रों से छुपाती आ रही हैं?
मई 2022 का वो दिन याद कीजिए, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में उन 22 तहखानों को खोलने और उनकी वीडियोग्राफी कराने की ऐतिहासिक याचिका लगाई गई थी।
भाई साहब, जैसे ही ये याचिका कोर्ट में पहुंची, पूरे देश के जिहादियों और इस अर्बन नक्सल इकोसिस्टम की पैंट गीली हो गई। वो छाती पीटने लगे की “अरे, ये तो बस एक मकबरा है, कमरों को मत खोलो।”
लेकिन एक आम सनातनी का सीधा सा सवाल है- अगर वो सच में सिर्फ एक मकबरा है और उसके नीचे कुछ नहीं है, तो फिर उन कमरों के ताले खोलने में तुम्हारे पसीने क्यों छूट जाते हैं?
जब हिंदू शोधकर्ता वहां जाकर जांच करने की बात करते हैं, तो भारत का पुरातत्व विभाग (ASI) आनन-फानन में लीपापोती क्यों शुरू कर देता है?
अरे गद्दारों! तुम किसे बेवकूफ बना रहे हो? उन कमरों की दीवारों के पीछे, उन तहखानों के अंधेरे में हमारे आराध्य महादेव के वो साक्षात प्रमाण छुपे हैं जो अगर एक बार बाहर आ गए, तो इस मोहब्बत की झूठी कहानी के हमेशा के लिए परखच्चे उड़ जाएंगे।
मुगलों के इन जिहादी फरेबों को बचाने के लिए पूरा का पूरा सिस्टम आज भी पहरा दे रहा है। वो जानते हैं की अगर कमरे खुले, तो मुगलों की औकात और उनकी डकैती दुनिया के सामने नंगी हो जाएगी।
त्रिशूल कलश और कमल के फूल, तेजोमहालय की दीवारों पर चीख चीख कर गवाही देते हमारे सनातन के साक्ष्य
अगर कोई आपको बोले की ताजमहल तो इस्लामिक वास्तुकला (Architecture) का अजूबा है, तो उसके मुंह पर ज़रा ऐतिहासिक तथ्यों का ये करारा तमाचा मारिएगा।
दुनिया में 50 से ज़्यादा इस्लामिक देश हैं, ज़रा इन मुल्लों से पूछिए की अरबी या फारसी डिक्शनरी में ‘महल’ शब्द कहां से आ गया? दुनिया के किसी भी इस्लामिक देश में ‘महल’ नाम की कोई इमारत नहीं होती। ये ‘महल’ शुद्ध रूप से एक संस्कृत शब्द है जो हमारे ‘तेजोमहालय’ से चुराया गया है।
ज़रा उस इमारत की दीवारों और गुंबदों को ध्यान से देखिए, वो खुद चीख-चीख कर अपने हिंदू होने की गवाही दे रहे हैं। मुख्य गुंबद के ठीक ऊपर क्या लगा है? एक हिंदू कलश और त्रिशूल!
इस्लामी इमारतों पर तो हमेशा चांद-तारा होता है, फिर मुमताज़ की कब्र के ऊपर कलश और त्रिशूल क्या कर रहा है? दीवारों पर कमल के फूल उकेरे गए हैं, धतूरे के फूल की नक्काशी है।
और सबसे बड़ी बात, उन गुप्त कमरों में वेंटिलेशन (हवा पास होने) का जो सिस्टम बना है, वो हूबहू वैसा ही है जैसा हमारे प्राचीन हिंदू मंदिरों के गर्भगृह में होता है ताकि दीये का धुआं बाहर निकल सके।
महान इतिहासकार पी.एन. ओक (P.N. Oak) ने अपनी ऐतिहासिक रिसर्च में डंके की चोट पर साबित किया था की ये भव्य शिव मंदिर 1155 ईस्वी में राजा परमर्दिदेव द्वारा बनवाया गया था।
लेकिन कांग्रेस की पुरानी सरकारों ने क्या किया? उन्होंने पी.एन. ओक की उस किताब पर ही बैन लगा दिया ताकि मुगलों की इज़्ज़त बची रहे और हिंदुओं को कभी उनके तेजोमहालय का सच पता ना चल सके। ये इतिहास के नाम पर हमारे साथ किया गया सबसे बड़ा आतंकवाद है।
आगरा कोर्ट में गूंजी सनातन की सबसे बड़ी हुंकार, 2024 की उस ऐतिहासिक याचिका ने उड़ा दी जिहादियों की नींद
लेकिन कहते हैं ना की सच को चाहे कितने भी गहरे तहखानों में दफना दो, वो एक ना एक दिन ज़मीन फाड़कर बाहर आ ही जाता है।
अयोध्या में रामलला अपने भव्य महल में विराजमान हो चुके हैं, ज्ञानवापी के वज़ूखाने में हमारे साक्षात महादेव मिल चुके हैं, और मध्य प्रदेश की भोजशाला में मां सरस्वती का राज वापस आ चुका है।
इन ऐतिहासिक जीतों ने आज के सोए हुए हिंदू समाज के अंदर एक ऐसी आग भर दी है की अब वो किसी के रोके रुकने वाला नहीं है।
इसी सनातन की गूंज अब आगरा कोर्ट में सुनाई दे रही है। अप्रैल 2024 में वकील अजय प्रताप सिंह ने आगरा की अदालत में जो ऐतिहासिक और धाकड़ याचिका दायर की थी, उसने मुगलों के इन पैरोकारों की रातों की नींद हराम कर दी है।
इस याचिका में बिना किसी लाग-लपेट के, डंके की चोट पर ये मांग की गई है की तेजोमहालय (ताजमहल) के परिसर में चल रही नमाज़ और तमाम इस्लामी गतिविधियों को तुरंत प्रभाव से रोका जाए।
ये कोई मामूली कोर्ट केस नहीं है भाई! ये सनातनी धरोहरों को वापस छीनने का शंखनाद है। सदियों से जिस जगह पर हमारे महादेव का अपमान होता रहा, जहाँ मुगलों ने अपनी क्रूरता और जिहादी डकैती का जश्न मनाया, वहां आज नमाज़ पढ़कर हिंदुओं को चिढ़ाया जाता है। लेकिन अब हिंदू जाग चुका है। अब वो अदालतों के दरवाज़े तोड़ रहा है।
जिहादी सिंडिकेट आज खौफ में है क्योंकि उन्हें पता है की अगर ज्ञानवापी और भोजशाला की तरह यहाँ भी एएसआई (ASI) का साइंटिफिक सर्वे और कार्बन डेटिंग हो गई, तो ज़मीन के नीचे से जो निकलेगा वो मुगलों के इस सबसे बड़े फरेब को हमेशा के लिए मिट्टी में मिला देगा।
हर हर महादेव!
