हिन्दुओं की लाशों पर टिकी कांग्रेस की कुर्सी, जब कांग्रेस संरक्षण में ‘गढ़मुक्तेश्वर’ में गंगा स्नान कर रहे श्रद्धालुओं और गर्भवती हिन्दू महिलाओं का जिहादियों ने किया दर्दनाक नरसंहार

हमें स्कूलों में जलियांवाला बाग पढ़ाया गया, लेकिन हमारे ही देश में, हमारी ही पवित्र गंगा नदी के किनारे जो एक ऐसा खौफनाक और बर्बर कत्लेआम हुआ था, जिस पर आज तक सन्नाटा पसरा हुआ है, उसका नाम लेने से भी ये कांग्रेसी हरामखोर घबराते हैं।

ये नवंबर 1946 का वो खून से सना हुआ सच है जिसे हर सनातनी को जानना ही चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा का वो पवित्र महीना था। उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर में गंगा के किनारे एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक मेला लगा हुआ था।

दूर-दूर से लाखों की संख्या में सीधे-सादे, गरीब और निहत्थे हिंदू श्रद्धालु, गर्भवती औरतें और बच्चे अपनी आस्था के साथ गंगा मैया में डुबकी लगाने पहुंचे थे। किसी के हाथ में पूजा की थाली थी, तो कोई अपने छोटे-छोटे बच्चों को नहला रहा था। पूरे मेले में भजन-कीर्तन का माहौल था।

लेकिन उन निहत्थे सनातनियों को क्या पता था की जिस कांग्रेसी सरकार के भरोसे वो अपने घर से निकले हैं, उसी सरकार की शह पर मौत के साए उनके चारों तरफ मंडरा रहे हैं। अचानक से माहौल बदला और अल्लाह-हू-अकबर के नारे गूंजने लगे।

हथियारों से लैस जिहादियों की एक बहुत बड़ी भीड़ ने उन नहाते हुए हिंदुओं पर हमला बोल दिया। जो लोग पानी के अंदर थे, उन्हें वहीं काट डाला गया। हमारी पवित्र गंगा मैया का वो साफ पानी उस दिन हमारे ही पूर्वजों, हमारे भाइयों और हमारी माताओं के खून से बिल्कुल लाल हो गया था।

लोग अपनी जान बचाने के लिए पानी से बाहर भागे, लेकिन घाटों पर भी मौत उनका इंतज़ार कर रही थी। ये सनातन आस्था पर, हमारी हिंदू पहचान पर अब तक का सबसे विकराल और सबसे गंदा प्रहार था, जिसे कांग्रेस ने अपनी नीच राजनीति के तहत बड़ी आसानी से छुपा लिया।

मुस्लिम लीग के गुंडों की वो सोची समझी साज़िश, मेलों में हथियारों के साथ घुसे जिहादी और निहत्थे सनातनियों का किया शिकार

अगर किसी कांग्रेसी दलाल को ये लगता है की ये हमला अचानक हो गया था या किसी मामूली कहासुनी का नतीजा था, तो उसके मुंह पर इतिहास का वो खौफनाक सच मारना बहुत ज़रूरी है।

ये कोई अचानक भड़की हुई आग नहीं थी मेरे भाई! ये मुस्लिम लीग के जिहादी गुंडों द्वारा हफ्तों पहले रची गई एक बहुत ही खौफनाक और सोची-समझी साज़िश थी।

रिकॉर्ड्स बताते हैं की इस कत्लेआम को अंजाम देने के लिए रोहतक और आसपास के इलाकों से कट्टरपंथी और जिहादी गुंडे बाकायदा ट्रकों और बैलगाड़ियों में भरकर गढ़मुक्तेश्वर लाए गए थे।

उन्होंने बड़ी ही चालाकी से अपने हथियार (तलवारें, भाले, छुरे और पेट्रोल बम) मेलों के तंबुओं और बैलगाड़ियों के नीचे छुपा कर रखे हुए थे। वो बस उस सही मौके का इंतज़ार कर रहे थे जब हिंदू पूरी तरह से पूजा-पाठ में मगन हो जाएं और निहत्थे हों।

जैसे ही इशारा मिला, इन जिहादियों ने अपना असली हैवान वाला रूप दिखा दिया। इन्होंने सबसे पहले उन हिंदू पुरुषों को निशाना बनाया जो गंगा नहा रहे थे या घाटों पर पूजा कर रहे थे।

जब उन निहत्थे आदमियों को काट कर गिरा दिया गया, तो इन भेड़ियों की नज़र उन तंबुओं और शिविरों की तरफ घूमी जहाँ हमारी हिंदू महिलाएं, बूढ़े और छोटे-छोटे बच्चे अपने परिवार वालों का इंतज़ार कर रहे थे।

अरे! इन जिहादियों ने तो उन तंबुओं में बैठे लाचार और बेबस परिवारों को चारों तरफ से घेर लिया। उनके पास भागने का कोई रास्ता नहीं था। जिस मेले में कुछ घंटे पहले खिलौने बिक रहे थे और बच्चे हंस-खेल रहे थे, वहां अब सिर्फ और सिर्फ खून की नदियां बह रही थीं और हिंदुओं की चीखें गूंज रही थीं।

ये है इस मज़हबी नफरत का वो खौफनाक चेहरा, जिसे सेक्युलरिज्म का चश्मा पहनने वाली कांग्रेस ने हमेशा जायज़ ठहराने की कोशिश की। जिहादियों ने चुन-चुन कर सनातनियों का शिकार किया, और वो भी तब जब हमारे लोग अपने सबसे पवित्र धार्मिक कार्य (गंगा स्नान) में लीन थे।

जिहादियों की खौफनाक दरिंदगी, गर्भवती हिन्दू औरतों के पेट काटे और बच्चों को भाले पर टांगा

अब ज़रा दिल थाम कर इस कत्लेआम के उस सबसे रूह कंपा देने वाले हिस्से को सुनिए। जब मैं इस बारे में पढ़ता हूं, तो मुझे समझ नहीं आता की कोई इंसान इतना नीच और दरिंदा कैसे हो सकता है!

इन जिहादियों के अंदर इंसानियत नाम की कोई चीज़ बची ही नहीं थी। इन्होंने गढ़मुक्तेश्वर के उस मेले को साक्षात जहन्नुम में तब्दील कर दिया था।

जब ये भेड़िए उन हिंदू तंबुओं में घुसे, तो इन्होंने हमारी हिंदू महिलाओं की इज़्ज़त को सरेआम तार-तार कर दिया। उनके साथ सरेआम दुष्कर्म किया गया। लेकिन इनकी दरिंदगी सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी।

इतिहास के वो खौफनाक पन्ने जो कांग्रेस ने छुपा दिए, वो चीख-चीख कर बताते हैं की इन राक्षसों ने गर्भवती हिंदू महिलाओं को भी नहीं बख्शा।

उन जिहादियों ने अपनी तलवारों और छुरों से हमारी गर्भवती माताओं के पेट ज़िंदा ही फाड़ दिए! और ज़रा सोचिए उस खौफनाक मंज़र को, उन्होंने उन औरतों के पेट से निकले हुए अजन्मे बच्चों को अपने भालों और तलवारों की नोंक पर टांग कर अल्लाह-हू-अकबर के नारों के साथ जश्म मनाया!

अरे लानत है ऐसे मज़हब पर और लानत है ऐसी सोच पर जो एक अजन्मे बच्चे को भाले पर टांगने में अपनी जीत समझती हो!

जो औरतें अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रही थीं, उन्हें ज़िंदा ही आग के हवाले कर दिया गया। छोटे-छोटे बच्चों के सिर उनके धड़ से अलग कर दिए गए।

मेले के उस विशाल मैदान में जिधर भी नज़र जाती थी, वहां सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं की कटी हुई लाशों के अंबार लगे हुए थे। जो बेबस और लाचार हिंदू अपनी जान बचाने के लिए वापस गंगा की तरफ भागे, उन्हें उन जिहादियों ने पानी के अंदर खींच कर डुबो-डुबो कर मार डाला।

पानी के अंदर ही उनके गले रेत दिए गए। हजारों की संख्या में हिंदू वहां तड़प-तड़प कर मरे। वो कोई मेला नहीं रह गया था भाई, वो हिंदुओं का एक ऐसा शमशान बन गया था जहाँ बिना चिता के ही हज़ारों लोगों को जलाकर और काटकर राख कर दिया गया था।

और ये सब कुछ हमारे ही देश में, हमारी ही पवित्र गंगा के किनारे हो रहा था।

हिन्दुओं की लाशों पर सत्ता की मलाई चाटने वाली कांग्रेस, जब कत्लेआम रोकने के बजाय गद्दार नेताओं ने पुलिस को रोक दिया

सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की जब गढ़मुक्तेश्वर में हज़ारों हिंदुओं का ये खौफनाक कत्लेआम चल रहा था, तो उस वक्त इस देश की सरकार क्या कर रही थी? पुलिस कहां थी? प्रशासन क्या कर रहा था?

इस सवाल का जवाब कांग्रेस के उस काले इतिहास में छुपा है, जिसे सुनकर आपको इस पार्टी के नाम से ही घिन हो जाएगी।

उस वक्त उत्तर प्रदेश (जिसे तब यूनाइटेड प्रोविंस कहा जाता था) में गोविंद बल्लभ पंत की कांग्रेसी सरकार सत्ता में बैठी थी। और दिल्ली में केंद्र की अंतरिम सरकार के मुखिया बनकर बैठे थे वही ‘शांतिदूत’ जवाहरलाल नेहरू!

जब मेला मैदान में हिंदुओं को काटा जा रहा था, औरतों के पेट फाड़े जा रहे थे, तो वहां मौजूद कांग्रेसी सरकार की पुलिस मूकदर्शक बनकर चुपचाप वो सारा तमाशा देख रही थी।

अरे, पुलिस के पास हथियार थे, बंदूकें थीं, वो चाहते तो एक घंटे के अंदर उन जिहादी गुंडों को भून कर रख सकते थे और हज़ारों हिंदुओं की जान बचाई जा सकती थी। लेकिन पुलिस के हाथ बंधे हुए थे।

क्यों? क्योंकि ऊपर बैठे कांग्रेसी आकाओं का सीधा-सीधा ऑर्डर था की कोई भी पुलिसवाला इन मुस्लिम लीग के जिहादियों पर एक भी गोली नहीं चलाएगा! ज़रा सोचिए इस भयानक गद्दारी को!

अपनी आंखों के सामने अपनी ही हिंदू जनता को कटता हुआ देखकर पुलिस चुप रही, क्योंकि कांग्रेस को अपनी वो सड़ी हुई ‘सेक्युलर छवि’ और अपना वो ‘जिहादी वोटबैंक’ बचाना था।

कांग्रेस को डर लग गया था की अगर हमने पुलिस से इन जिहादियों पर गोली चलवा दी, तो मुसलमान कांग्रेस से नाराज़ हो जाएगा और मुस्लिम लीग को फायदा मिल जाएगा।

अपनी कुर्सी बचाने के लिए, सत्ता की मलाई चाटने के लिए, इन गद्दार कांग्रेसी नेताओं ने उन हज़ारों निहत्थे हिंदुओं को उन दरिंदों के आगे बलि चढ़ाने के लिए छोड़ दिया।

ये कांग्रेस की वो नीच राजनीति थी जिसने इस देश के हिंदुओं को ये बता दिया था की तुम चाहे हमें जितना भी वोट दे दो, तुम चाहे हमारे लिए जितनी भी रैलियां कर लो, लेकिन जब भी चुनाव और सत्ता की बात आएगी, हम तुम्हारी लाशों पर पैर रखकर ही दिल्ली के तख्त तक पहुंचेंगे।

गढ़मुक्तेश्वर के उन हिंदुओं को मुस्लिम लीग के गुंडों ने तो बाद में मारा, असल में उन्हें सबसे पहले तो उस कांग्रेसी सरकार ने मारा था, जिस पर उन्होंने अपनी रक्षा का भरोसा किया था।

मौन बैठे गांधी और क्रूर नेहरू का नंगा सच, जिहादी वोटबैंक को बचाने के लिए कांग्रेस ने कैसे किया हिन्दू खून का सौदा

अब ज़रा इस पूरे खूनी ड्रामे के उन दो सबसे बड़े ‘नायकों’ का नंगा सच देखिए, जिन्हें ये कांग्रेसी दरबारी आज भी भगवान की तरह पूजते हैं।

एक तरफ वो ‘महात्मा’ गांधी थे जो दिन-रात अहिंसा और भाईचारे का राग अलापते थे, और दूसरी तरफ वो जवाहरलाल नेहरू था जिसे ये सेक्युलर इकोसिस्टम ‘शांति का मसीहा’ बताता है।

जब गढ़मुक्तेश्वर में पवित्र गंगा स्नान करने गए हमारे हिंदू भाइयों, गर्भवती महिलाओं और मासूम बच्चों को जिहादी भेड़िए ज़िंदा चीर रहे थे, तब ये दोनों दिल्ली में बैठकर क्या कर रहे थे?

इनका दोगलापन देखकर तो शैतान को भी शर्म आ जाए। जब बंगाल के नोआखली में जिहादियों ने हिंदुओं का एकतरफा कत्लेआम किया, तो गांधी जी ने बेशर्मी से कहा की “हिंदुओं को बहादुरी से कट जाना चाहिए, लेकिन हथियार नहीं उठाना चाहिए।”

लेकिन जब बिहार में हिंदू ने अपने बचाव में हाथ उठाया, तो गांधी जी ने हिंदुओं को ‘पापी’ कह दिया और आमरण अनशन की धमकी दे दी। और गढ़मुक्तेश्वर?

यहाँ तो हिंदुओं ने कोई पलटवार भी नहीं किया था, वो तो बस अपनी आस्था के साथ गंगा मैया की पूजा कर रहे थे। फिर भी गांधी के मुंह से उन जिहादी कातिलों के खिलाफ एक शब्द नहीं निकला। उन्होंने एक बार भी उन दरिंदों को पापी नहीं कहा।

और वो क्रूर नेहरू? जो नेहरू बिहार के हिंदू किसानों पर हवाई जहाज़ से बम गिराने की धमकियां दे रहा था, जो अपनी ही सेना से हिंदू किसानों को मशीनगन से भुनवा सकता था, उस नेहरू को गढ़मुक्तेश्वर में गंगा किनारे पड़ी हज़ारों हिंदुओं की कटी हुई लाशें दिखाई ही नहीं दीं।

नेहरू ने इस इतने भयंकर नरसंहार को महज़ एक ‘छोटी सी स्थानीय घटना’ बताकर फाइल ही बंद कर दी। उसे कोई दुख नहीं था, कोई अफसोस नहीं था।

ये कांग्रेस की उस खौफनाक और सोची-समझी नीच राजनीति की शुरुआत थी, जहाँ जिहादी वोटबैंक को बचाने के लिए हिंदू खून का सरेआम सौदा किया गया।

कांग्रेस को ये अच्छे से पता था की अगर उन्होंने इन जिहादी गुंडों को सज़ा दी, या पुलिस से गोलियां चलवाईं, तो वो एक मुश्त मिलने वाला ‘मुस्लिम वोट’ उनके हाथ से खिसक जाएगा।

इसलिए उन्होंने उन हज़ारों हिंदू श्रद्धालुओं की चिताओं पर अपनी सत्ता की रोटियां सेंकीं। ये वो गद्दार थे जिन्हें हिंदुओं के खून से कोई बदबू नहीं आती थी, बल्कि उस खून पर पैर रखकर ही इन्होंने दिल्ली के तख्त की सीढ़ियां चढ़ी थीं।

प्रेस पर सेंसरशिप और लाशों को गायब करने का खेल, कांग्रेस की उस नीच राजनीति का पर्दाफाश जिसने इतिहास से मिटाया ये नरसंहार

जब कोई मुजरिम इतना बड़ा कत्लेआम करता है, तो वो सबसे पहले अपने खून से सने हुए सुबूत मिटाता है। गढ़मुक्तेश्वर में जब कांग्रेस के संरक्षण में जिहादियों ने हिंदुओं की लाशों के अंबार लगा दिए, तो कांग्रेसी सरकार को डर सताने लगा।

यूपी में बैठे कांग्रेसी मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत और दिल्ली में बैठे उनके आकाओं की पैंट गीली हो गई की अगर इस कत्लेआम का असली सच और गंगा नहाने गए हिंदुओं की मौतों का सही आंकड़ा पूरे देश के सामने आ गया, तो पूरे भारत का हिंदू भड़क उठेगा।

उन्हें मालूम था की कांग्रेस का वो ‘सेक्युलर और अहिंसा’ वाला नकाब हमेशा के लिए तार-तार हो जाएगा।

फिर इन गद्दारों ने क्या किया? इन्होंने इतिहास का सबसे खौफनाक और क्रिमिनल फ्रॉड किया। कांग्रेसी सरकार ने रातों-रात पूरे उत्तर प्रदेश के अखबारों और प्रेस पर सबसे भयंकर ‘सेंसरशिप’ लगा दी।

अखबार के संपादकों और पत्रकारों को पुलिस भेजकर खुली धमकियां दी गईं की अगर किसी ने भी गढ़मुक्तेश्वर में मारे गए हिंदुओं की सही गिनती या वहां हुई जिहादी दरिंदगी की कोई भी खबर छापी, तो उसका अखबार बंद कर दिया जाएगा और उसे सीधा जेल में ठूंस दिया जाएगा।

सच को दफनाने का ये खेल यहीं नहीं रुका। जो लाशें मेला मैदान और घाटों पर बिखरी पड़ी थीं, उनके साथ जो किया गया वो सुनकर किसी की भी रूह कांप जाएगी।

सबूत मिटाने के लिए कांग्रेसी प्रशासन ने ट्रकों में भर-भर कर उन कटे-पिटे हिंदुओं की लाशों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया।

कई लाशों को तो सीधा हमारी उसी पवित्र गंगा मैया में फेंक दिया गया, ताकि सही मौतों का आंकड़ा कभी कोई गिन ही ना सके। कुछ को गुपचुप तरीके से सामूहिक गड्ढों में दफना दिया गया।

आज हमारे बच्चों को स्कूलों में अंग्रेज़ों का जलियांवाला बाग तो खूब पढ़ाया जाता है, लेकिन गढ़मुक्तेश्वर का ये उससे भी कई गुना ज़्यादा भयंकर और वीभत्स कत्लेआम किसी भी इतिहास की किताब में नहीं मिलता।

क्यों? क्योंकि अगर ये इतिहास पढ़ाया जाता, तो इस देश के हिंदुओं को पता चल जाता की आज़ादी के नाम पर कांग्रेस ने उनके पूर्वजों की कितनी बड़ी कीमत वसूली है। ये दरबारी इतिहासकारों और कांग्रेसी हुक्मरानों की वो डकैती है जिसने हमारी आने वाली पीढ़ियों से उनका असली इतिहास ही चुरा लिया।

घर घर पहुंचेगा गढ़मुक्तेश्वर के हिन्दू बलिदानियों का सच, कांग्रेस के इस खूनी नकाब को नोचकर फेंकने का आ गया है वक्त

दशकों तक कांग्रेस और उनके पाले हुए दरबारी इकोसिस्टम ने जो भी कचरा हमारे दिमाग में भरा, हमने उसे ‘सत्य और अहिंसा’ मानकर कबूल कर लिया। लेकिन अब वो ज़माना हमेशा के लिए लद गया है।

आज का युवा, आज का सनातनी अपनी गहरी नींद से जाग चुका है। अब हम अपना इतिहास खुद इन ज़मीनों को खोद कर बाहर निकाल रहे हैं।

हमारी और आपकी ये ज़िम्मेदारी बनती है कि गढ़मुक्तेश्वर में गंगा स्नान करते हुए मारे गए उन हज़ारों अनजान और गुमनाम हिंदू शहीदों की कहानी इस देश के हर एक घर तक पहुंचे।

उस गर्भवती हिंदू मां का दर्द जिसने अपने पेट को जिहादियों के छुरे से फड़ते हुए देखा, उस अजन्मे बच्चे की चीख जिसे भाले पर टांगा गया- ये दर्द हर स्कूल, हर चौपाल और हर मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचना चाहिए।

हमें अपने बच्चों को बताना होगा कि जब तुम गंगा नहाने जाते हो, तो याद रखना कि इसी गंगा के किनारे तुम्हारे पूर्वजों ने सनातन धर्म के लिए अपना खून बहाया था, और वहां की सत्ता पर काबिज़ कांग्रेसी नेता उस खून पर अट्टहास कर रहे थे।

हमें अपने बच्चों को ये सिखाना होगा कि ये सेक्युलरिज्म कोई इंसानियत नहीं है, ये बस हमें निहत्था करके काटने का एक पुराना कांग्रेसी फॉर्मूला है।

जिस पार्टी के हाथ गंगा नहाने गए हिंदुओं के खून से रंगे हों, जिसने जिहादियों को बचाने के लिए अपनी ही पुलिस के हाथ बांध दिए हों, उस गद्दार पार्टी को इस देश की सत्ता तो बहुत दूर की बात है, इस देश की ज़मीन पर खड़े होकर वोट मांगने का भी कोई नैतिक हक़ नहीं है।

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