500 साल पुरानी जिहादी सोच का 'देवभूमि' उत्तराखंड में अंतिम संस्कार, 1 जुलाई से 'मदरसा बोर्ड' पर परमानेंट सरकारी 'ताला', पूरे देश में 'शरिया' के इन अड्डों को उखाड़ फेंकने का आ गया वक्त

500 साल पुरानी जिहादी सोच का ‘देवभूमि’ उत्तराखंड में अंतिम संस्कार, 1 जुलाई से ‘मदरसा बोर्ड’ पर परमानेंट सरकारी ‘ताला’, पूरे देश में ‘शरिया’ के इन अड्डों को उखाड़ फेंकने का आ गया वक्त

उत्तराखंड बाकी राज्यों से बहुत अलग है दोस्तों। ये बदरी-केदार की पवित्र धरती है, ये वो देवभूमि है जहाँ कण-कण में हमारे देवी-देवताओं का वास है।

लेकिन ज़रा सोचिए, पिछले कुछ दशकों में इन कुर्सी के भूखे कांग्रेसी नेताओं ने हमारी इस पवित्र देवभूमि का क्या हाल कर दिया था?

अपने मुस्लिम वोटबैंक को पालने-पोसने और सत्ता हथियाने के लालच में इन गद्दारों ने पहाड़ों की शांत वादियों में ‘मदरसा’ नाम की जेहादी फैक्टरियों का ऐसा खौफनाक जाल बिछा दिया था की देवभूमि की पूरी डेमोग्राफी ही खतरे में पड़ गई थी।

ये मदरसे क्या हैं? सच कहूं तो कांग्रेस राज में बने ये मदरसे सिर्फ और सिर्फ जिहादियों की वो नर्सरी थे, जहाँ हमारे टैक्स के पैसों से ऐसी जाहिल पीढ़ी तैयार की जा रही थी।

इनका काम सिर्फ फतवे मानना, मुल्लों की गुलामी करना और मौका मिलने पर काफिरों (हिंदुओं) पर पत्थर बरसाना था।

कांग्रेस ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड बनाकर इन शांतिदूतों को एक तरह से पूरी खुली छूट दे दी थी की तुम जो चाहो पढ़ाओ, जैसा चाहो ज़हर घोलो, कोई सरकारी नुमाइंदा तुमसे सवाल नहीं पूछेगा।

लेकिन इस पाप का घड़ा आखिरकार फूट ही गया। और देवभूमि में इन जिहादियों का वो घड़ा सिर्फ फूटा ही नहीं है, बल्कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उस पर ऐसा खौफनाक हथौड़ा मारा है की शांतिदूतों का वो घड़ा अब दोबारा कभी बन नहीं पायेगा।

धामी सरकार ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया है की 1 जुलाई 2026 से उत्तराखंड में ‘मदरसा बोर्ड’ नाम के इस कैंसर को हमेशा के लिए उखाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया जाएगा।

ये कोई छोटा-मोटा फैसला नहीं, ये सीधे तौर पर उन मुल्लों और मजहबी ठेकेदारों की छाती पर बूट रखने जैसा है, जो सोचते थे की देवभूमि में उनका शरिया कानून चलेगा।

धामी ने साफ कर दिया है की उत्तराखंड एक हिंदू राज्य है, यहाँ हमारी सनातन संस्कृति चलेगी। यहाँ मुल्लों के फतवे या तुष्टिकरण की गंदी राजनीति के लिए अब कोई जगह नहीं बची है।

धामी सरकार का ये ऐतिहासिक हथौड़ा सिर्फ उत्तराखंड के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष के लिए एक असली हिंदू राज का ‘रोल मॉडल’ बन गया है।

1 जुलाई से ‘मदरसा बोर्ड’ का नामोनिशान हमेशा के लिए खत्म, और मुल्लों की 500 साल पुरानी जाहिल तालीम का होगा परमानेंट अंतिम संस्कार

अब ज़रा धामी सरकार के इस खौफनाक एक्शन की पूरी डिटेल समझते हैं जिसे सुनकर इन कट्टरपंथियों के पसीने छूट रहे हैं।

सरकार ने इस फैसले को ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान विधेयक 2025’ विधानसभा से पास करवा लिया है और अब इस पर राज्यपाल की मुहर भी लग चुकी है।

इसका सीधा सा मतलब ये है की 1 जुलाई 2026 की तारीख वो दिन होगा जब उत्तराखंड से इस मनहूस ‘मदरसा बोर्ड’ का कानूनी रूप से अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा।

मुख्यमंत्री धामी ने जो बात कही है ना, वो हर सच्चे हिंदू के दिल में उतर गई है। धामी ने खुले मंच से दहाड़ते हुए कहा है की मदरसों में अब ये ‘500 साल पुरानी कबायली और जिहादी सोच’ नहीं पढ़ाई जाएगी।

मतलब समझ रहे हैं आप? वो मजहबी किताबें, वो मौलवियों के ज़हरीले भाषण जो छोटे-छोटे बच्चों के दिमाग में दूसरे धर्म (हिंदुओं) के प्रति नफरत का ज़हर भरते थे, अब उन सब पर सरकारी डंडा चल गया है। अब कोई भी दाढ़ी वाला मुल्ला उठकर ये तय नहीं करेगा की बच्चे क्या पढ़ेंगे।

मदरसा बोर्ड की कब्र खोदकर उसकी जगह एक नया ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USAME) बना दिया गया है। और मज़ा तो अब आएगा भाई!

राज्य के जितने भी 452 से ज्यादा मदरसे हैं, जो कल तक खुद को कानून से ऊपर समझते थे, अब उन सभी को सीधे तौर पर ‘उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड’ (UBSE) के सामने घुटने टेकने होंगे। इन मदरसों को अब सरकारी शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी ही पड़ेगी।

पहले क्या होता था? मदरसों में मौलवी अपनी मर्जी से अरबी-फारसी पढ़ाते थे और सरकार से पैसा ऐंठते थे। सरकार का कोई कंट्रोल नहीं था।

पर अब? अब धामी सरकार ने सीधा अल्टीमेटम दे दिया है- या तो सरकारी सिस्टम के नीचे आओ, या फिर अपने मदरसों पर ताला लगाने के लिए तैयार रहो।

देवभूमि में अब शरिया की तालीम के नाम पर देशद्रोह की नर्सरी नहीं चलने दी जाएगी।

सर पीट रही कांग्रेस और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का दोगलापन, अब मदरसों में शरिया नहीं बल्कि NCERT का सिलेबस ही होगा

जैसे ही पुष्कर सिंह धामी ने मदरसों के सिलेबस पर ये सर्जिकल स्ट्राइक की, वैसे ही दिल्ली से लेकर देहरादून तक पूरे सेक्युलर और जिहादी इकोसिस्टम में हाहाकार मच गया।

जो नियम लागू हुए हैं, उसने इन मौलवियों की पूरी की पूरी दुकान ही बंद कर दी है। अब फरमान ये है की मदरसों में कुरान और हदीस रटवाने की जगह गणित (Maths), विज्ञान (Science), कंप्यूटर और पूरी तरह से NCERT का सरकारी सिलेबस पढ़ाना अनिवार्य होगा।

अब आप ही बताइए, अगर मदरसे का बच्चा साइंस और कंप्यूटर पढ़ेगा, तो वो मौलवियों के फतवों पर आंख मूंदकर यकीन कैसे करेगा? वो पंचर बनाने या पत्थर फेंकने की जगह इंजीनियर या डॉक्टर बनने की सोचेगा ना?

लेकिन ये बात ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और कांग्रेस के दलालों को हजम नहीं हो रही है। जैसे ही ये कानून पास हुआ, ये सारे तुष्टिकरण के ठेकेदार टीवी पर बैठकर रो-रो कर छाती पीटने लगे।

इनका वही पुराना और घिसा-पिटा रोना शुरू हो गया- “हाय अल्लाह! इस्लाम खतरे में है! हमारे धार्मिक अधिकारों का हनन हो रहा है!”

अरे बेशर्मों! जब तुम सरकार का पैसा खाते हो, सरकारी ज़मीन घेर कर बैठते हो, तब तुम्हारा इस्लाम खतरे में नहीं आता?

लेकिन जैसे ही तुम्हें देश के बाकी बच्चों की तरह आधुनिक पढ़ाई करने को कहा जाता है, तो तुम्हारी छाती फटने लगती है? सच तो ये है की कांग्रेस पार्टी और ये मजहबी ठेकेदार कभी चाहते ही नहीं थे की मुस्लिम बच्चे मुख्यधारा से जुड़ें।

कांग्रेस का तो दशकों से यही गंदा गेमप्लान रहा है। मुस्लिम बच्चों को जानबूझकर मदरसों के उस सड़े हुए अंधेरे में रखो, उनके दिमाग में कट्टरपंथ का ज़हर घोलो, ताकि वो कभी अपनी अक्ल का इस्तेमाल न कर सकें।

जब वो अनपढ़ और जाहिल रहेंगे, तभी तो वो मौलवियों के कहने पर आसानी से दंगे करेंगे और कांग्रेस का अंधा वोटबैंक बने रहेंगे!

धामी सरकार ने सीधा सिलेबस पर जो डंडा मारा है, उसने कांग्रेस के इस दशकों पुराने हिंदू-विरोधी पाप को बीच चौराहे पर नंगा कर दिया है।

अब देवभूमि का कानून एकदम साफ है- जो मदरसा NCERT का सिलेबस नहीं पढ़ाएगा, जो आनाकानी करेगा या अपनी जाहिलियत वाली शरिया तालीम पर अड़ा रहेगा, उसके गेट पर सरकार का ऐसा मोटा ताला जड़ा जाएगा की फिर कोई मुल्ला उसे खोल नहीं पाएगा।

बिना सरकारी मान्यता के फ्री का राशन डकारने वाले मदरसों पर तालाबंदी और अब टैक्स के पैसों से नहीं पलेंगे ये कट्टरपंथी अड्डे

अब ज़रा इस पूरे खेल के उस खौफनाक हिस्से पर आते हैं जिसे सुनकर किसी भी ईमानदारी से टैक्स भरने वाले हिंदू का खून खौल उठेगा। भाई, एक आम भारतीय नागरिक सुबह से शाम तक कोल्हू के बैल की तरह पसीना बहाता है।

वो अपनी गाढ़ी कमाई से इनकम टैक्स भरता है, दाल-रोटी पर जीएसटी (GST) चुकाता है, ताकि देश का विकास हो सके और गरीब बच्चों को ‘पीएम पोषण’ योजना के तहत स्कूलों में मिड-डे मील मिल सके।

लेकिन कांग्रेस ने सालों से क्या गंदा सिस्टम बना रखा था? हमारे खून-पसीने की कमाई का ये पैसा, ये सरकारी मुफ्त का राशन उन अवैध मदरसों में बांटा जा रहा था जो ना तो सरकार के किसी नियम को मानते थे और ना ही जिनका पढ़ाई-लिखाई से कोई लेना-देना था।

मतलब पैसा हमारा, राशन हमारा, और उस राशन को डकार कर देवभूमि के सीने पर जेहाद की फैक्टरियां खड़ी कर रहे थे ये कट्टरपंथी!

ये मदरसे बिना किसी सरकारी मान्यता के धड़ल्ले से चल रहे थे। मौलवी मस्त होकर फ्री का राशन खा रहे थे और बच्चों के दिमाग में शरिया का ज़हर घोल रहे थे।

सरकार इनसे पूछने वाली कोई नहीं थी क्योंकि कांग्रेस ने इन्हें दामाद की तरह सिर पर बिठा रखा था।

पर अब धामी सरकार ने इस ‘हराम की दावत’ पर सीधा बुलडोज़र चला दिया है। नया नियम एकदम साफ और कड़क है- जो मदरसा शिक्षा विभाग से संबद्ध (Affiliated) नहीं होगा, जो सरकारी मान्यता नहीं लेगा और जो NCERT का सिलेबस नहीं पढ़ाएगा, उसे मिड-डे मील (Mid-Day Meal) की एक बोरी तो क्या, सरकारी फंड का एक रुपया भी नहीं मिलेगा।

सीधी सी बात है भाई, अगर तुम्हें अपनी जाहिल और 500 साल पुरानी कबायली सोच ही पढ़ानी है, तो अपने चंदे के पैसों से पढ़ाओ।

हिंदुओं के टैक्स के पैसों पर मजहबी आतंकवाद पालने का वो पुराना कांग्रेसी धंधा अब उत्तराखंड में हमेशा के लिए बंद हो चुका है।

धामी ने इन कट्टरपंथियों की आर्थिक रीढ़ पर ऐसा हथौड़ा मारा है की अब ये दाढ़ी खुजलाते हुए सोच रहे हैं की आगे का खर्चा कैसे चलेगा।

हल्द्वानी दंगों के बाद धामी का खौफनाक एक्शन, 250 अवैध मदरसों को मिट्टी में मिलाकर रच दिया देवभूमि की सुरक्षा का असली इतिहास

अगर आप सोच रहे हैं की धामी सरकार ने ये मदरसा बोर्ड खत्म करने का फैसला रातों-रात बस ऐसे ही हवा में ले लिया, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं। इस खौफनाक एक्शन के पीछे एक ऐसा भयानक सच है जिसने पूरी देवभूमि की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था।

याद है आपको फरवरी 2024 का वो मनहूस दिन? हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में क्या हुआ था? जब प्रशासन सरकारी ज़मीन पर बने अवैध मदरसे और अतिक्रमण को हटाने गया था, तो वहां के शांतिदूतों ने जो नंगा नाच किया था, वो पूरे देश ने टीवी पर देखा था।

छतों से पहले से जमा किए गए बड़े-बड़े पत्थर बरसाए गए, हमारी पुलिस फोर्स पर पेट्रोल बम फेंके गए, महिला पुलिसकर्मियों को ज़िंदा जलाने की कोशिश की गई। वहां जो हिंसा भड़की, वो कोई अचानक हुआ दंगा नहीं था, वो एक पूरी सोची-समझी जेहादी साज़िश थी।

और आपको क्या लगता है की बनभूलपुरा के उन दंगाइयों के दिमाग में ये ज़हर कहाँ से आया था? खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही थी की इन अवैध मदरसों के अंदर ही वो जिहाद की नर्सरी पल रही थी।

इन्हीं मदरसों के अंदर बैठकर मौलवी और मजहबी ठेकेदार देवभूमि की जनसांख्यिकी को बदलने और पुलिस-प्रशासन पर हमला करने की प्लानिंग कर रहे थे।

ये मदरसे इबादत की जगह नहीं, बल्कि हथियार और दंगाई पैदा करने के अड्डे बन चुके थे।

हल्द्वानी के उस दंगे के बाद पुष्कर सिंह धामी ने जो रौद्र रूप दिखाया, उसने इन जेहादियों की रूह कंपा दी। धामी ने बिना किसी मानवाधिकार वाले ड्रामे की परवाह किए, पुलिस और प्रशासन को खुली छूट दे दी।

चुन-चुन कर उन दंगाइयों के घरों के दरवाज़े तोड़े गए, उन्हें घसीट कर जेल की सलाखों के पीछे डाला गया और उनकी संपत्तियां कुर्क की गईं।

लेकिन धामी यहीं नहीं रुके। उन्होंने सीधे इस बीमारी की जड़ पर प्रहार किया। खुफिया रिपोर्ट्स मिलते ही पूरे उत्तराखंड में सघन चेकिंग अभियान चलाया गया और बिना मान्यता के, चोरी-छिपे चल रहे 250 से ज्यादा अवैध मदरसों पर सीधा सरकारी ताला जड़ दिया गया!

250 मदरसे भाई! सोचिए कांग्रेस के राज में देवभूमि के अंदर कैसा खौफनाक जाल बिछाया गया था। धामी के उस बुलडोज़र एक्शन ने ही इस ‘मदरसा बोर्ड’ के खात्मे की नींव रख दी थी।

आज देवभूमि अगर इन जिहादी कीड़ों से बची हुई है, तो वो धामी के उसी निर्मम और खौफनाक एक्शन का नतीजा है।

पूरे देश को अब उत्तराखंड के इसी निर्मम धामी मॉडल की जरूरत, भारत के हर राज्य से इन जेहादी अड्डों को जड़ से उखाड़ फेकना है जरुरी

देवभूमि उत्तराखंड ने पूरे देश के सामने एक ऐसा ‘रोल मॉडल’ खड़ा कर दिया है, जिसे अब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हर राज्य को अपनाना ही पड़ेगा।

जब उत्तराखंड जैसी शांत और छोटी सी जगह पर मदरसों की आड़ में इतना भयंकर जेहादी नेक्सस पनप सकता है, तो ज़रा सोचिए यूपी, बिहार, बंगाल, असम और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों का क्या हाल होगा?

अब वक्त आ गया है की पूरे देश की राज्य सरकारें इस झूठे सेक्युलरिज्म के चोले को उतार कर फेंकें और धामी सरकार की तरह हिम्मत दिखाएं।

भारत कोई इस्लामिक मुल्क नहीं है जहाँ शरिया की जाहिल तालीम देने के लिए सरकारी खजाना लुटाया जाए। अगर तुम्हें मदरसे चलाने हैं तो अपने घरों में चलाओ, मस्जिदों में अपने पैसों से चलाओ। लेकिन भारत का करदाता अब इन मजहबी फैक्टरियों का बोझ उठाने को तैयार नहीं है।

हर राज्य सरकार को तुरंत अपने यहाँ के ‘मदरसा बोर्ड’ को निरस्त करना चाहिए। मदरसों की फंडिंग पूरी तरह से बंद होनी चाहिए।

जो मदरसा NCERT का सिलेबस नहीं पढ़ाता, जो वंदे मातरम गाने से कतराता है, और जहाँ बच्चों के दिमाग में देश-विरोधी ज़हर भरा जाता है, उन सभी जेहादी अड्डों पर ऐसे ही बड़े-बड़े सरकारी ताले जड़ने का अब असली वक्त आ गया है।

जो लोग टीवी पर बैठकर रो रहे हैं की मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है, उन्हें डंके की चोट पर बता दो की इस देश में सिर्फ एक ही कानून चलेगा, और वो है भारत का संविधान।

अब कांग्रेस के वो दिन लद गए जब मुल्लों के फतवों के आगे सरकारें मुजरा करती थीं। धामी ने जो शंखनाद देवभूमि से किया है, अब उसकी गूंज पूरे हिंदुस्तान में सुनाई देनी चाहिए।

जब तक इस देश के कोने-कोने से इन कट्टरपंथी अड्डों और जेहादी फैक्टरियों का परमानेंट इलाज नहीं हो जाता, तब तक हर सच्चे हिंदू को चैन से नहीं बैठना है।

जय श्री राम! भारत माता की जय!

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