जिस खूंखार 'महमूद गजनवी' के खौफ से कांपता था आधा एशिया, उसे हराने वाले एकलौते हिंदू सम्राट 'विद्याधर चंदेल', जीत के जश्न में बनाया खजुराहो का विश्व प्रसिद्ध कंदारिया महादेव मंदिर

जिस खूंखार ‘महमूद गजनवी’ के खौफ से कांपता था आधा एशिया, उसे हराने वाले एकलौते हिंदू सम्राट ‘विद्याधर चंदेल’, जीत के जश्न में बनाया खजुराहो का विश्व प्रसिद्ध कंदारिया महादेव मंदिर

11वीं सदी की शुरुआत का वो खौफनाक दौर याद करिए। अरब और अफगानिस्तान के रेगिस्तानों से उठी नफरत की वो जिहादी आंधियां पूरे एशिया को खून से नहला रही थीं।

महमूद गजनवी नाम का वो दरिंदा एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में इस्लाम का झंडा लेकर भारत की तरफ दौड़ा था।

वो जहाँ से गुज़रता, वहां लाशों के पहाड़ लग जाते और खून की नदियां बहने लगतीं। हमारे लाखों बेगुनाह हिंदुओं का सिर सिर्फ इसलिए कलम किया जा रहा था क्योंकि वो उसके मज़हब के हिसाब से ‘काफिर’ थे।

गजनवी की इस बर्बर जिहादी दहशत ने पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में मौत का नंगा नाच मचा रखा था। बड़े-बड़े राजा उस खूंखार लुटेरे का नाम सुनकर ही खौफ से कांप जाते थे।

गजनवी को लगने लगा था की पूरे भारतवर्ष में कोई ऐसा माई का लाल नहीं पैदा हुआ जो उसकी इस अंधी मज़हबी आंधी को रोक सके। उसका घमंड सातवें आसमान पर था।

लेकिन उस खूंखार दरिंदे को ये नहीं पता था की मध्य भारत की पवित्र धरती पर एक ऐसा हिंदू सूरज तप रहा है, जिसकी लौ से टकराने की उसकी कोई औकात नहीं है।

वहां के तख्त पर विराजमान थे चंदेल वंश के महान और खूंखार सम्राट- विद्याधर चंदेल! विद्याधर महादेव के परम भक्त और उस वक्त पूरे भारत के सबसे ताकतवर, सबसे क्रूर और सबसे प्रतापी हिंदू सम्राट थे।

उनकी रगों में वो शुद्ध राजपूती और सनातनी खून दौड़ रहा था जो मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान दे भी सकता था और इन विदेशी जिहादियों की बोटी-बोटी काट कर चीलों को खिला भी सकता था।

गजनवी पूरे भारत में भले ही मौत का सौदागर बनकर घूम रहा हो, लेकिन सम्राट विद्याधर चंदेल के सामने वो महज़ एक डरपोक गीदड़ था।

और जब इस अजेय सनातनी शेर और उस जिहादी गीदड़ का आमना-सामना हुआ, तो मध्य भारत की धरती पर वो खौफनाक तांडव हुआ जिसने गजनवी का सारा जिहादी गुरूर हमेशा-हमेशा के लिए जूतों तले कुचल कर रख दिया।

महमूद गजनवी के आगे घुटने टेकने वाले कायर राजा राज्यपाल का काटा गया सिर, ‘विद्याधर चंदेल’ का वो खौफनाक फरमान

अब ज़रा इस महासंग्राम की उस बैकग्राउंड स्टोरी को समझिए जिससे विद्याधर चंदेल का खून खौल उठा था। साल था 1018 ईस्वी।

महमूद गजनवी अपनी लाखों की जिहादी फौज लेकर उत्तर भारत में घुसा और उसने कन्नौज पर भयानक हमला बोल दिया। कन्नौज उस वक्त गुर्जर-प्रतिहार वंश की राजधानी हुआ करता था और वहां का राजा था ‘राज्यपाल’।

जब गजनवी की फौज कन्नौज के दरवाज़े पर पहुंची, तो उस राजा राज्यपाल ने जो किया, उसने पूरे हिंदू समाज और राजपूताने के माथे पर कलंक लगा दिया।

राज्यपाल ने बिना लड़े, बिना अपनी तलवार म्यान से निकाले और बिना एक भी जिहादी का खून बहाए, गजनवी के डर से कायरों की तरह घुटने टेक दिए। उसने उस लुटेरे की अधीनता स्वीकार कर ली और अपनी जान की भीख मांग ली।

जब ये खबर आग की तरह फैलते हुए मध्य भारत के कालिंजर किले में बैठे सम्राट विद्याधर चंदेल के कानों तक पहुंची, तो उस सनातनी शेर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। विद्याधर की आंखें लाल हो गईं।

उन्होंने अपने दरबार में अपनी तलवार ज़मीन पर पटकते हुए डंके की चोट पर एक ऐसा ऐतिहासिक फरमान सुनाया जिसने पूरे भारत के राजाओं की रूह कंपा दी।

विद्याधर ने गरजते हुए कहा- “एक हिंदू राजा, एक क्षत्रिय किसी विदेशी जिहादी और लुटेरे के सामने अपनी तलवार कैसे डाल सकता है?

अगर हमारी मातृभूमि पर हमला हुआ है, तो हमें लड़ते हुए कट जाना मंज़ूर है, लेकिन किसी म्लेच्छ के सामने सिर झुकाना हमारे सनातन धर्म और हमारे स्वाभिमान का सबसे बड़ा चीरहरण है।”

विद्याधर कोई सिर्फ बातें बनाने वाले नेता नहीं थे, वो एक्शन लेने वाले महाकाल थे। उन्होंने तुरंत अपनी खूंखार सेना तैयार की।

उन्होंने ग्वालियर के कछवाहा राजा अर्जुन और अन्य मित्र राजाओं को अपने साथ मिलाया और सीधे उस गद्दार और कायर राजा ‘राज्यपाल’ पर हमला बोल दिया।

विद्याधर की सेना ने कन्नौज के उस कायर राजा को बीच मैदान में घेर लिया। उसे उसकी कायरता की वो खौफनाक सज़ा दी गई की दुनिया देखती रह गई।

विद्याधर के राजपूत शेरों ने उस राज्यपाल को वहीं काट डाला और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

ये पूरे भारतवर्ष के लिए सम्राट विद्याधर चंदेल का वो सीधा और खौफनाक मैसेज था की “अगर कोई भी हिंदू राजा अपनी ज़मीन या अपना धर्म बचाने से पीछे हटा, या किसी जिहादी आक्रांता के आगे झुका, तो विद्याधर की तलवार उसे ज़िंदा नहीं छोड़ेगी!”

इस घटना ने पूरे एशिया में तहलका मचा दिया। सबको समझ आ गया था की मध्य भारत में एक ऐसा महाकाल बैठा है जो ना तो खुद झुकेगा और ना ही किसी को झुकने देगा।

रामगंगा नदी के किनारे गजनवी की जिहादी फौज और चंदेलों की खूंखार सेना का वो ऐतिहासिक आमना सामना

जब कन्नौज के राजा के मारे जाने की ये खबर उड़ते-उड़ते अफगानिस्तान में बैठे महमूद गजनवी तक पहुंची, तो वो तिलमिला उठा। उसे लगा की उसकी इज़्ज़त पर सीधा तमाचा मारा गया है।

गजनवी को लगने लगा की अगर उसने विद्याधर चंदेल को खत्म नहीं किया, तो भारत में उसका जो खौफ बना हुआ है, वो हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाएगा।

अपनी उसी मज़हबी बौखलाहट और अहंकार में चूर होकर, साल 1019 ईस्वी में गजनवी ने अपनी अब तक की सबसे बड़ी और सबसे खूंखार जिहादी फौज तैयार की।

वो पूरी तैयारी के साथ सम्राट विद्याधर चंदेल का सिर काटने के इरादे से बुंदेलखंड की तरफ निकल पड़ा। उसे लगा था की जैसे उसने बाकी राजाओं को डरा दिया था, वैसे ही वो इस चंदेल राजा को भी कुचल देगा।

इतिहास के पन्ने बताते हैं की रामगंगा नदी के मैदानों में दोनों सेनाओं का वो ऐतिहासिक आमना-सामना हुआ।

एक तरफ गजनवी की वो खूंखार लुटेरी फौज थी जो अब तक ना जाने कितने बेगुनाहों का खून पी चुकी थी, और दूसरी तरफ खड़े थे सनातन धर्म की ढाल बने सम्राट विद्याधर चंदेल!

जब गजनवी अपनी सेना लेकर नदी के किनारे पहुंचा और उसने सामने का नज़ारा देखा, तो भाई साहब, उस जिहादी लुटेरे के होश उड़ गए! उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।

विद्याधर चंदेल ने कोई छोटी-मोटी सेना नहीं खड़ी की थी। सामने साक्षात मौत का बवंडर खड़ा था। विद्याधर की सेना में 390 खूंखार और विशालकाय युद्ध वाले हाथी चिंघाड़ रहे थे।

लाखों की तादाद में राजपूत पैदल सैनिक और हवा से बातें करने वाले घुड़सवार अपनी नंगी तलवारें लिए इस बात का इंतज़ार कर रहे थे की कब आदेश मिले और कब वो इन जिहादियों की बोटी-बोटी काट कर चीलों और कौवों को खिला दें।

मैं ये बात हवा में नहीं कह रहा हूँ! उस वक्त गजनवी की सेना में उसका सबसे खास मुस्लिम इतिहासकार ‘इब्न-उल-असीर’ (Ibn-ul-Athir) भी मौजूद था।

उस गजनवी के अपने ही चापलूस इतिहासकार ने अपनी किताब में साफ-साफ लिखा है की विद्याधर चंदेल की उस भयंकर और विशालकाय हिंदू सेना को देखकर महमूद गजनवी के पसीने छूट गए थे।

गजनवी को पहली बार ये एहसास हुआ की उसने एक ऐसे शेर की मांद में हाथ डाल दिया है जहाँ से वो ज़िंदा वापस नहीं जा पाएगा।

जिस गजनवी के नाम से लोग थर-थर कांपते थे, उस दिन रामगंगा के किनारे विद्याधर की सेना देखकर उसकी खुद की रूह कांप रही थी। वो घबराहट के मारे अपने तंबू में जाकर अल्लाह से अपनी जान की भीख मांगने लगा था।

रात के अंधेरे में अपनी जान बचाकर भागा खुद को ‘शेर’ समझने वाला गजनवी, बिना लड़े ही विद्याधर चंदेल के खौफ से किया गीदड़ जैसे सरेंडर

अब ज़रा इस महासंग्राम के उस सबसे मज़ेदार हिस्से को सुनिए। दिन भर दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी रहीं। विद्याधर चंदेल के सैनिक अपनी तलवारें चमकाते हुए गजनवी को ललकार रहे थे की “आओ, हिम्मत है तो युद्ध का बिगुल बजाओ!”

लेकिन गजनवी की पैंट इतनी गीली हो चुकी थी की उसने अपनी सेना को आगे बढ़ने का आदेश ही नहीं दिया।

शाम ढल गई और रात का अंधेरा छा गया। गजनवी अपने कैंप में बैठा थर-थर कांप रहा था। उसे अच्छे से पता था की सुबह होते ही चंदेलों के खूंखार हाथी उसकी सेना को चूहों की तरह कुचल डालेंगे और विद्याधर की तलवार उसकी गर्दन को धड़ से अलग कर देगी।

वो समझ चुका था की भारत को लूटना अलग बात है और एक सच्चे सनातनी योद्धा से आमने-सामने लड़ना बिल्कुल अलग बात है।

और फिर उस रात क्या हुआ? जो महमूद गजनवी दिन के उजाले में इस्लाम का परचम लहराने और काफिरों को मारने की बड़ी-बड़ी डींगें हांक रहा था, वो रात के उस घने अंधेरे में एक डरपोक गीदड़ की तरह अपनी जान बचाकर वहां से भाग खड़ा हुआ!

जी हां भाई, गजनवी युद्ध के मैदान से छुपते-छुपाते दुम दबाकर भाग गया!

वो इतना खौफज़दा था और इतनी हड़बड़ी में भागा की उसने अपना सारा खज़ाना, अपने हथियार, अपने तंबू और यहाँ तक की अपने कैंप का सारा सामान वहीं रामगंगा के किनारे लावारिस छोड़ दिया।

उसने अपनी सेना से कहा की बिना कोई आवाज़ किए चुपचाप यहाँ से निकलो, वरना अगर चंदेलों को भनक भी लग गई तो कोई ज़िंदा नहीं बचेगा।

सुबह जब सूरज उगा और सम्राट विद्याधर चंदेल के सैनिकों ने देखा, तो सामने मैदान खाली था। वहां कोई जिहादी फौज नहीं थी।

गजनवी अपने सैनिकों के साथ रात में ही रफूचक्कर हो चुका था। विद्याधर चंदेल ने बिना अपनी सेना का एक भी कतरा खून बहाए, बिना युद्ध लड़े ही, सिर्फ और सिर्फ अपने नाम के खौफ और अपनी अजेय सेना की धमक से एशिया के सबसे बड़े जिहादी लुटेरे को कुत्ते की तरह खदेड़ दिया था!

गजनवी का सारा छूटा हुआ खज़ाना और हथियार विद्याधर की सेना ने ज़ब्त कर लिए और वो विजय शंखनाद करते हुए अपनी राजधानी लौट आए।

ज़रा सोचिए! ये हमारे सनातन इतिहास की वो सबसे बड़ी और सबसे गौरवशाली जीत थी जिसे हर हिंदू बच्चे की ज़ुबान पर होना चाहिए ।

1022 ईस्वी में कालिंजर का अजेय किला और विद्याधर चंदेल के हाथों गजनवी की एक बार फिर जलालत, कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं बचा कायर

रामगंगा के मैदान से दुम दबाकर भागने के बाद महमूद गजनवी की जो जलालत पूरे एशिया में हुई थी, वो उसके गले की हड्डी बन गई थी।

जो गजनवी खुद को ‘बुत्तशिकन’ (मूर्तियां तोड़ने वाला) और इस्लाम का सबसे बड़ा गाज़ी कहता था, उसकी पैंट एक हिंदू सम्राट के सामने गीली हो गई थी।

गजनवी को रात-दिन यही सपना सताता था की अगर उसने विद्याधर चंदेल को नहीं हराया, तो बाकी हिंदू राजा भी बगावत कर देंगे और भारत को लूटने का उसका जिहादी सपना हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाएगा।

अपनी उसी जलालत और बेइज़्ज़ती का बदला लेने के लिए, तीन साल बाद 1022 ईस्वी में गजनवी फिर से एक खौफनाक और भारी-भरकम जिहादी फौज लेकर बुंदेलखंड की तरफ निकला। इस बार उसका टारगेट था विद्याधर चंदेल का अजेय दुर्ग- ‘कालिंजर का किला’।

विंध्य की पहाड़ियों पर बना कालिंजर का वो किला उस वक्त पूरे भारत का सबसे अभेद्य और खौफनाक सुरक्षा चक्र था, जिसे भेदना किसी इंसान तो क्या, साक्षात मौत के लिए भी नामुमकिन था।

गजनवी अपनी पूरी जिहादी फौज, अपनी तोपों और हाथियों के साथ कालिंजर के दरवाज़े पर पहुंचा और उसने किले को चारों तरफ से घेर लिया।

उसे लगा की वो किले की घेराबंदी करके राजपूतों को भूखा मार देगा और विद्याधर को सरेंडर करने पर मजबूर कर देगा।

लेकिन गजनवी भूल गया था की वो किससे पंगा ले रहा है! सम्राट विद्याधर चंदेल पूरी तैयारी के साथ किले के अंदर बैठे थे।

जैसे ही जिहादियों ने किले की दीवारों पर चढ़ने की कोशिश की, विद्याधर के खूंखार राजपूत सैनिकों ने ऊपर से खौलते हुए तेल, बड़े-बड़े पत्थरों और ज़हरीले तीरों की वो भयानक बारिश की कि गजनवी की सेना वहां तिल-तिल कर मरने लगी।

किले की दीवारों से टकराकर जिहादियों की लाशें बिछने लगीं। हफ्तों बीत गए, फिर महीने बीतने लगे, लेकिन गजनवी कालिंजर किले की एक ईंट भी नहीं हिला पाया।

गजनवी के सैनिकों में भुखमरी और खौफ फैल गया। वो समझ गए की अगर वो यहाँ कुछ दिन और रुके, तो विद्याधर चंदेल किले के दरवाज़े खोलकर उन सबको काट डालेंगे।

गजनवी का वो सारा जिहादी अहंकार, वो सारा गुरूर कालिंजर की उन मजबूत दीवारों से टकराकर चकनाचूर हो चुका था।

जब गजनवी को अपनी मौत बिल्कुल सामने खड़ी नज़र आने लगी, तो जानते हैं उस खूंखार लुटेरे ने क्या किया? उसने विद्याधर चंदेल के सामने घुटने टेक दिए और अपनी जान की भीख मांगी!

जी हां, गजनवी ने हथियार डाल दिए। अपनी जान और अपनी बची-खुची सेना को वहां से ज़िंदा वापस ले जाने के लिए, गजनवी ने सम्राट विद्याधर को खुश करने की कोशिश शुरू कर दी।

उसने फारसी में विद्याधर के शौर्य की तारीफ करते हुए कुछ कविताएं लिखकर किले के अंदर भिजवाईं।

इतिहासकार साफ लिखते हैं की गजनवी ने विद्याधर चंदेल से गिड़गिड़ा कर एक शांति संधि (Peace Treaty) की भीख मांगी। गजनवी को अपनी हार माननी पड़ी और उसने विद्याधर को 15 बड़े और अहम किले बिना लड़े ही सौंप दिए।

बदले में विद्याधर चंदेल ने एक सच्चे और महान हिंदू सम्राट की तरह उस गिड़गिड़ाते हुए दुश्मन की जान बख्श दी और उसे वहां से ज़िंदा लौट जाने का रास्ता दे दिया।

वो दिन था और गजनवी की ज़िंदगी का आखिरी दिन था, उस जिहादी लुटेरे ने दोबारा कभी भारत के मध्य भाग या चंदेलों की ज़मीन की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं की!

जिहादी राक्षस गजनवी को घुटनों पर लाने और सनातन धर्म की रक्षा की खुशी में विद्याधर चंदेल ने खजुराहो में बनाया भव्य ‘कंदारिया महादेव मंदिर’

जब गजनवी जैसा खूंखार जिहादी राक्षस घुटनों पर आ गया और सनातन धर्म की रक्षा हुई, तो इस महा-विजय का जश्न भी कोई छोटा-मोटा नहीं होने वाला था।

सम्राट विद्याधर चंदेल भगवान शिव के परम भक्त थे। उनका मानना था की गजनवी पर मिली ये ऐतिहासिक जीत उनकी तलवार का नहीं, बल्कि साक्षात देवों के देव महादेव का आशीर्वाद है।

अपनी इसी जीत का डंका पूरी दुनिया में बजाने और महादेव के चरणों में अपना शीश झुकाने के लिए, सम्राट विद्याधर चंदेल ने खजुराहो की पवित्र धरती पर एक ऐसा भव्य और विशाल मंदिर बनवाने का आदेश दिया, जो आसमान का सीना चीर कर खड़ा हो जाए।

इसी आदेश से निर्माण हुआ भारत की वास्तुकला के सबसे बड़े चमत्कार- ‘कंदारिया महादेव मंदिर’ का!

1025 ईस्वी से लेकर 1050 ईस्वी के बीच बना ये मंदिर गजनवी जैसे लुटेरों के मुंह पर जड़ा गया सनातन का वो तमाचा है जिसकी गूंज आज 1000 साल बाद भी पूरी दुनिया में सुनाई देती है।

ज़रा इस मंदिर की भव्यता और इसकी बनावट को तो देखिए! 100 फीट से ज़्यादा ऊंचा इसका विशाल शिखर बिल्कुल भगवान शिव के ‘कैलाश पर्वत’ की तरह बनाया गया है। मंदिर के अंदर और बाहर 800 से ज़्यादा बेहद खूबसूरत और बारीक मूर्तियां तराशी गई हैं।

ये मंदिर एक बहुत बड़ा और कूटनीतिक संदेश भी था। ज़रा सोचिए, एक तरफ महमूद गजनवी था, जिसका पूरा मज़हब और पूरा जिहादी एजेंडा सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ने, मूर्तियों को खंडित करने और हमारी आस्था को मलबे में तब्दील करने पर टिका था।

गजनवी ने सोमनाथ को तोड़ा, मथुरा और कन्नौज को तोड़ा। लेकिन दूसरी तरफ सम्राट विद्याधर चंदेल थे, जिन्होंने उसी गजनवी को जूतों से पीटने के बाद एक ऐसा भव्य और अजेय मंदिर खड़ा कर दिया, जिसे तोड़ने की औकात किसी भी जिहादी सुल्तान या मुगल की नहीं हुई।

आज जब आप खजुराहो जाते हैं और उस कंदारिया महादेव मंदिर के सामने खड़े होते हैं, तो आपको वहां कोई खंडित मूर्ति नज़र नहीं आती।

गजनवी तो कब का मिट्टी के नीचे सड़-गल कर खत्म हो गया, लेकिन वो मंदिर आज भी उसी शान, उसी अकड़ और उसी भगवा ठसक के साथ खड़ा है।

Scroll to Top