क्रूर पुर्तगाली ईसाइयों से हिंदू मंदिरों के विध्वंश का खौफनाक बदला लेने वाले 'चिमाजी अप्पा', चर्चों की घंटियां तोड़ कर महादेव मंदिरों में टांग के समंदर किनारे लहराया सनातन का अजेय भगवा

क्रूर पुर्तगाली ईसाइयों से हिंदू मंदिरों के विध्वंश का खौफनाक बदला लेने वाले ‘चिमाजी अप्पा’, चर्चों की घंटियां तोड़ कर महादेव मंदिरों में टांग के समंदर किनारे लहराया सनातन का अजेय भगवा

बहुत कम लोग जानते हैं की 16वीं और 17वीं सदी में पुर्तगाली ईसाइयों ने महाराष्ट्र के ‘कोंकण’ समुद्री तटों को साक्षात नरक बना दिया था। समंदर से व्यापार के बहाने घुसे इन विदेशी मिशनरियों ने ठाणे, साष्टी और वसई पर अपना खूनी कब्ज़ा जमा लिया था।

इन विदेशी मिशनरियों ने हिंदू धर्म पर प्रहार करने के लिए ‘इनक्विजिशन’ (Inquisition) के नाम पर ऐसे क्रूर नियम बनाए की इंसानियत भी कांप जाए। इन्होंने ऐलान कर दिया की कोंकण के किसी भी हिंदू के घर में ‘तुलसी’ का पौधा नहीं होना चाहिए।

अगर किसी आंगन में तुलसी दिख जाती, तो ये पुर्तगाली सैनिक घर में घुसकर पूरे परिवार को कोड़ों से पीट-पीटकर अधमरा कर देते थे। शंख बजाने और हिंदू रीति-रिवाज़ से शादियां करने पर परमानेंट बैन लगा दिया गया।

क्रूरता की हद तो तब पार हो गई जब ये पुर्तगाली दरिंदे हिंदू बस्तियों में घुसते और ज़बरदस्ती गरीब हिंदुओं और ब्राह्मणों के मुंह में गोमांस और सूअर का मांस ठूंस देते थे ताकि उनका धर्म भ्रष्ट हो जाए।

अगर किसी हिंदू परिवार में माता-पिता मर जाते, तो पुर्तगाली पादरी उस अनाथ बच्चे को उठाकर ले जाते और उसे ज़बरदस्ती ईसाई बना देते।

कोंकण के सैकड़ों प्राचीन महादेव और देवी मंदिरों को इन गोरे आक्रांताओं ने बारूद से उड़ा दिया और उन्हीं पर अपने बड़े-बड़े चर्च खड़े कर दिए। पूरा का पूरा कोंकण त्राहि-त्राहि कर रहा था।

बाजीराव के वीर भाई ‘चिमाजी अप्पा’ की खौफनाक प्रतिज्ञा, जब पुर्तगालियों के संहार के लिए इस मराठा शेर ने उठाई भवानी तलवार

कोंकण के उन सताए हुए हिंदुओं की चीखें और तोड़े गए मंदिरों की वो दर्दभरी आवाज़ें आखिरकार पेशवा बाजीराव के छोटे भाई ‘चिमाजी अप्पा’ तक पहुंच गईं।

चिमाजी अप्पा एक ऐसे खूंखार और अजेय योद्धा थे जिनकी तलवार जब म्यान से बाहर आती थी, तो दुश्मनों की लाशों के पहाड़ लग जाते थे।

चिमाजी अप्पा ने जब सुना की गोरे मिशनरी हमारे बच्चों का ज़बरन धर्मांतरण कर रहे हैं और हमारे महादेव के मंदिरों पर चर्च बना रहे हैं, तो उन्होंने एक खौफनाक प्रतिज्ञा ली।

उन्होंने कसम खाई की “जब तक मैं कोंकण की इस पवित्र धरती से इन गोरे ईसाइयों की चमड़ी उधेड़ कर इन्हें समंदर में नहीं डुबो दूंगा, तब तक मैं चैन की सांस नहीं लूंगा।”

साल 1737 की शुरुआत में बिना किसी देरी के, मराठा सेना ने अपनी रणभेरी बजा दी। चिमाजी अप्पा ने अपने भगवा झंडे उठाए और “हर हर महादेव” के उन गगनभेदी नारों के साथ कोंकण की तरफ कूच कर दिया।

कोंकण की लाल मिट्टी पर बिछी पुर्तगालियों की लाशें और मराठा सेना के बवंडर ने कुचला ईसाईयों का गुरूर

पुर्तगालियों को लगता था की उनके पास यूरोप की सबसे मॉडर्न तोपें हैं और उनके किले इतने मज़बूत हैं की ये मराठे उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। लेकिन उनका ये गुरूर बहुत जल्द उनके ही खून में बहने वाला था।

मार्च 1737 में मराठों ने सबसे पहला और खौफनाक प्रहार ‘ठाणे’ के किले पर किया। पुर्तगाली सेनापति अपनी तोपों के पीछे छुपकर बैठे थे, लेकिन चिमाजी अप्पा की मराठा फौज एक भयंकर बवंडर की तरह उन पर टूट पड़ी।

मराठा कमांडरों ने अपनी तलवारों से पुर्तगाली सैनिकों की वो दुर्गति की, जिसे देखकर अच्छे-अच्छों की पैंट गीली हो जाए। इन वीर मराठा शेरों ने विदेशी सैनिकों को काटना शुरू कर दिया।

ठाणे के किले की प्राचीरें मराठों के नारों से कांप उठीं। साष्टी और आसपास के इलाकों में मराठा सेना ने ऐसा कहर बरपाया की जो पुर्तगाली कल तक निहत्थे हिंदुओं को कोड़े मारते थे, आज वो अपनी जान की भीख मांगते हुए जंगलों में छुपते फिर रहे थे।

साष्टी से पुर्तगालियों को कुत्तों की तरह खदेड़ दिया गया। जो बच गए, वो अपनी जान हथेली पर रखकर अपने सबसे बड़े और आखिरी अजेय ठिकाने ‘वसई के किले’ की तरफ भागने लगे।

वसई के अभेद्य किले में बारूद का खौफनाक तांडव और चिमाजी अप्पा की वो मारक रणनीति जिसने घमंडी पुर्तगालियों को घुटनों पर ला दिया

साष्टी और ठाणे से दुम दबाकर भागे हुए पुर्तगाली वसई के किले में जाकर छुप गए। ये वसई का किला समंदर के किनारे खड़ा एक ऐसा खौफनाक राक्षस था, जिसकी दीवारें इतनी चौड़ी थीं की मराठों की तोप के गोले भी उनसे टकराकर खामोश हो जाते थे।

पुर्तगालियों को घमंड था की दुनिया की कोई भी ताकत इस किले का बाल भी बांका नहीं कर सकती। लेकिन बाहर जो शेर खड़ा था, वो चिमाजी अप्पा था!

साल 1737 से लेकर 1739 तक, पूरे दो साल तक मराठा फौज ने वसई के किले को ज़मीन और समंदर, दोनों तरफ से ऐसा जकड़ लिया की अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।

पुर्तगालियों का राशन-पानी बंद कर दिया गया। जो पुर्तगाली कल तक हिंदुओं का खून पीते थे, वो अब किले के अंदर भूख और प्यास से तड़प-तड़प कर मरने लगे।

जब तोपें काम नहीं आईं, तो मराठों ने अपनी खौफनाक गुरिल्ला रणनीति का इस्तेमाल किया। उन्होंने रातों-रात किले की मोटी दीवारों के नीचे लंबी-लंबी सुरंगें खोद डालीं और उनमें टनों के हिसाब से बारूद भर दिया।

मई 1739 का वो ऐतिहासिक दिन आ ही गया। जैसे ही उन सुरंगों में पलीता लगाया गया, ऐसा खौफनाक धमाका हुआ की वसई के किले की वो घमंडी दीवारें हवा में तिनके की तरह उड़ गईं।

उन धमाकों में कितने ही क्रूर पुर्तगाली कमांडरों के चिथड़े उड़ गए। दीवारें टूटते ही मराठा फौज अपनी नंगी तलवारें लेकर “जय भवानी” की दहाड़ के साथ किले के अंदर घुस गई और पुर्तगालियों का घमंड हमेशा-हमेशा के लिए मटियामेट हो गया।

पुर्तगाली चर्चों के विशाल घंटे उखाड़ कर महादेव के मंदिरों में टांगने वाले चिमाजी अप्पा का खौफनाक बदला

अब ज़रा उस खौफनाक और सनातन इंतकाम की बात करते हैं। 16 मई 1739 को जब पुर्तगाली सेनापति सिल्वेरा डे मेनेजेस ने देखा की अब उसकी गर्दन कटने ही वाली है, तो उसने घुटने टेक दिए और रोते हुए सरेंडर कर दिया।

चिमाजी अप्पा ने उन घमंडी गोरे मिशनरियों को बिना हथियारों के, नंगे पैर किले से बाहर खदेड़ दिया और उन्हें समंदर के रास्ते अपनी जान बचाकर भागने पर मजबूर कर दिया।

लेकिन असली बदला तो अभी बाकी था भाई! इन विदेशी पादरियों ने हमारे सैकड़ों प्राचीन मंदिरों को तोड़ा था और उन पर अपने बड़े-बड़े चर्च खड़े किए थे।

चिमाजी अप्पा ने वो हिसाब चुकता किया और वो भी एकदम डंके की चोट पर। उन्होंने उन पुर्तगाली चर्चों में लगे हुए विशाल और भारी-भरकम ‘पीतल के घंटों’ को जड़ से उखाड़ लिया।

ये पुर्तगाली क्रूरता और उनके धर्मांतरण माफिया के प्रतीक थे। चिमाजी अप्पा ने उन विशाल घंटों को विजय के प्रतीक के रूप में वहां से निकाला और पूरे सम्मान के साथ महाराष्ट्र के भव्य हिंदू मंदिरों में दान कर दिया।

आज भी अगर आप 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ‘भीमाशंकर महादेव’ के दर्शन करने जाएंगे, तो वहां आपको पुर्तगालियों का वो विशाल घंटा टंगा हुआ मिलेगा।

नासिक के प्रसिद्ध ‘नारोशंकर मंदिर’ में और मेनावली के ‘मेनेश्वर मंदिर’ में आज भी वो पुर्तगाली चर्च के घंटे टंगे हुए हैं।

जब-जब हमारे महादेव की आरती होती है, तो उसी पुर्तगाली घंटे की गूंज चीख-चीख कर कहती है की जिन लोगों ने हमारे देवी-देवताओं को मिटाने की साज़िश रची थी, आज उनके चर्च के घंटे हमारे ही भगवान के दरबार में हाज़िरी लगा रहे हैं।

चिमाजी अप्पा ने अकेले दम पर उस विदेशी और क्रूर धर्मांतरण मशीनरी को हमेशा के लिए ज़मीन में गाड़ दिया।

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