सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस की घिनौनी 'गद्दारी', देश के सबसे बड़े क्रांतिकारी 'सुभाष चंद्र बोस' परिवार की कराई 20 सालों तक 'जासूसी', नेताजी की पत्नी की चिट्ठियां चुराकर 'अंग्रेजों' को भेजते थे नेहरू

सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस की घिनौनी ‘गद्दारी’, देश के सबसे बड़े क्रांतिकारी ‘सुभाष चंद्र बोस’ परिवार की कराई 20 सालों तक ‘जासूसी’, नेताजी की पत्नी की चिट्ठियां चुराकर ‘अंग्रेजों’ को भेजते थे नेहरू

जिस इंसान ने अपना पूरा घर-बार, अपनी जवानी और अपना पूरा जीवन भारत माता के चरणों में झोंक दिया। जिसने ‘आज़ाद हिंद फौज’ (INA) बनाकर अंग्रेजों में ऐसा खौफ पैदा किया की वो दुम दबाकर भारत से भागने पर मजबूर हो गए।

उस महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ आज़ाद भारत में क्या सुलूक हुआ? अगर कोई आम इंसान इस सच को सुनेगा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी।

आज़ाद भारत की गद्दी पर बैठे जवाहरलाल नेहरू को देश के बाहरी दुश्मनों से, पाकिस्तान या चीन से इतना डर नहीं लगता था, जितना खौफ उन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके परिवार से लगता था।

दशकों तक इस देश की जनता से ये गंदा और खौफनाक सच छुपा कर रखा गया। साल 2015 में जब नेशनल आर्काइव्स की दशकों पुरानी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की टॉप सीक्रेट फाइलें सार्वजनिक (Declassify) हुईं, तो इस देश के इतिहास में एक ऐसा भूकंप आया जिसने नेहरू के उस ‘शांति के फरिस्ते’ और ‘चाचा’ वाले नकाब के चिथड़े उड़ा दिए।

फाइलों से जो सच बाहर आया, वो ये था की सत्ता के लालच में अंधी हो चुकी कांग्रेसी सरकार ने आज़ादी के बाद नेताजी के परिवार को क्रिमिनल्स और आतंकवादियों की तरह ट्रीट किया था।

ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं है भाई! जिस आदमी ने तुम्हें आज़ादी की सांस लेने लायक बनाया, तुम उसी के परिवार के पीछे अपने खुफिया कुत्ते छोड़कर बैठे थे?

ये सीधे-सीधे नेताजी की शहादत पर सरेआम थूकने जैसी नीच हरकत थी, जिसने आज़ाद भारत के माथे पर एक ऐसा कलंक पोत दिया है जिसे सदियों तक धोया नहीं जा सकेगा।

1948 से 1968 तक चला जासूसी का खौफनाक खेल, जब सत्ता के लालच में ‘बोस परिवार’ पर छोड़े गए खुफिया कुत्ते

अब ज़रा इस जासूसी के उस खौफनाक टाइमलाइन को देखिए। आप सोच रहे होंगे की शायद एक-दो साल के लिए कोई शक रहा होगा। लेकिन नहीं दोस्तों! ये कोई साधारण निगरानी नहीं थी।

आज़ादी मिलने के ठीक बाद, यानी 1948 से लेकर 1968 तक… पूरे 20 सालों तक आईबी (IB) के जासूसों को बोस परिवार के पीछे किसी भूखे भेड़िये की तरह लगा कर रखा गया था।

ज़रा सोचिए, इन 20 सालों में से 16 साल तक तो देश के प्रधानमंत्री खुद जवाहरलाल नेहरू ही थे। और इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) सीधे प्रधानमंत्री को ही रिपोर्ट करती है। मतलब ये सारा का सारा नंगा नाच सीधे नेहरू के इशारे पर हो रहा था।

खुफिया फाइलों के पन्ने चीख-चीख कर बताते हैं की कोलकाता के दो पतों पर दिल्ली की खास नज़र थी। पहला- ‘1 वुडबर्न पार्क’ और दूसरा- ’38/2 एल्गिन रोड’, जो की नेताजी के बड़े भाई शरत चंद्र बोस का पुश्तैनी घर था।

इन दोनों घरों के बाहर दिन-रात सादे कपड़ों में आईबी के एजेंटों का पहरा रहता था। वहां से कौन निकल रहा है, घर के अंदर कौन जा रहा है, किस नेता ने बोस परिवार से मुलाकात की, ये सारी जानकारी बाकायदा डायरियों में नोट की जाती थी।

सबसे ज़्यादा खौफनाक तरीके से टारगेट किया गया था नेताजी के होनहार भतीजों- शिशिर कुमार बोस और अमिय नाथ बोस को।

ये वही शिशिर कुमार बोस थे जिन्होंने 1941 में नेताजी को अंग्रेजों की नज़रबंदी से भागने (Great Escape) में अपनी कार से मदद की थी।

जिस इंसान ने देश की आज़ादी में अपना इतना बड़ा योगदान दिया, उसे इनाम में क्या मिला? आज़ाद भारत में उसके पीछे जासूस लगा दिए गए!

अमिय नाथ बोस कहां जा रहे हैं, वो किस राजनेता से मिल रहे हैं, विदेशी दौरों पर किससे बात कर रहे हैं, इस बात की एक-एक बारीकी की रिपोर्ट सीधे दिल्ली में बैठे आईबी मुख्यालय को जाती थी और वहां से प्रधानमंत्री की टेबल पर पहुंचती थी।

ये जासूस साये की तरह बोस परिवार का पीछा करते थे। ज़रा सोचिए उस परिवार पर क्या बीतती होगी, जिसे ये महसूस होता होगा की वो अपने ही आज़ाद देश में एक कैदी की तरह जी रहे हैं।

ये किसी लोकतांत्रिक देश की सरकार का काम नहीं था, ये एक डरे हुए और सत्ता के लालची तानाशाह का खौफनाक रवैया था जिसे अपनी गद्दी खिसकने का डर दिन-रात सता रहा था।

नीचता की सारी हदें पार, जब नेहरू की पुलिस ने चुराई थी नेताजी की पत्नी ‘एमिली शेंकल’ की प्राइवेट चिट्ठियां

अगर आपको लग रहा है की जासूसी सिर्फ घर के बाहर खड़े होने तक सीमित थी, तो ज़रा अपने दिल को थाम लीजिए। क्योंकि इस कांग्रेसी सरकार ने नीचता की वो हदें पार कर दी थीं जो गली का कोई गुंडा भी ना करे।

एक प्रधानमंत्री की असुरक्षा इतनी भयंकर हो सकती है की वो एक आज़ादी के महानायक की विधवा पत्नी की निजी ज़िंदगी में झांकने के लिए पोस्ट ऑफिस तक में अपने दलाल बिठा दे? जी हां!

कोलकाता के ‘एल्गिन रोड पोस्ट ऑफिस’ में बाकायदा आईबी के खास एजेंटों को इसी काम के लिए बिठाया गया था की बोस परिवार के नाम से जो भी चिट्ठी आए या जाए, उसे पहले आईबी पढ़ेगी।

नेताजी के भतीजे अमिय नाथ बोस और ऑस्ट्रिया के वियना में बैठी नेताजी की पत्नी (एमिली शेंकल) के बीच जो भी प्राइवेट पत्राचार (Letters) होता था, उस पर दिल्ली की गिद्ध जैसी नज़र थी।

जब भी एमिली शेंकल कोई खत ऑस्ट्रिया से भारत भेजती थीं, तो उस खत को बड़ी चालाकी से खोला जाता था।

आईबी के अफसर उस चिट्ठी को पढ़ते थे, उसकी बाकायदा फोटोकॉपी बनाई जाती थी, और फिर उसे वापस उसी लिफाफे में चिपका कर अमिय नाथ बोस के घर भेज दिया जाता था, ताकि उन्हें ज़रा सी भी भनक ना लगे की उनकी चिट्ठी रास्ते में पढ़ी जा चुकी है।

अरे भाई, क्या इंसानियत और शर्म नाम की कोई चीज़ बची थी इस सिस्टम में? एमिली शेंकल वो महिला थीं जिन्होंने नेताजी के उस मुश्किल दौर में उनका साथ दिया था।

उनकी एक छोटी सी बेटी (अनीता बोस) थी। वो एक विधवा की ज़िंदगी गुज़ार रही थीं। वो अपने भतीजे से जो पारिवारिक बातें लिख रही हैं, जो अपना दुख-दर्द बांट रही हैं, उसे दिल्ली में बैठे बाबू और नेता चाय की चुस्कियां लेते हुए पढ़ रहे थे!

क्या ये किसी भी लोकतांत्रिक देश में शोभा देता है? तुम उस नेताजी की पत्नी की जासूसी करा रहे हो, जिसने तुम्हारे लिए, इस देश के लिए अपना सुहाग कुर्बान कर दिया! ये सीधे-सीधे नेताजी की शहादत का सरेआम अपमान।

ये खत पढ़ने के पीछे सिर्फ एक ही खौफ था की कहीं एमिली शेंकल को नेताजी के ज़िंदा होने या उनके रूस में होने के बारे में कोई जानकारी तो नहीं है।

सरकार हर कीमत पर ये जानना चाहती थी की क्या बोस परिवार को नेताजी के ठिकानों के बारे में कोई ऐसा राज़ पता है जो दिल्ली की सत्ता में भूकंप ला सकता है।

अंग्रेजों की गुलामी का वो खौफनाक नंगा सच, जब नेहरू की ‘IB’ नेताजी के राज़ ‘ब्रिटिश एजेंसी MI5’ को सौंप रही थी

अब ज़रा इस जासूसी कांड के सबसे काले, सबसे गद्दार और सबसे देशद्रोही पन्ने को खोलते हैं। ये एक ऐसा सच है जिसे पढ़कर हर हिंदुस्तानी का सिर शर्म से झुक जाएगा और गद्दारों के खिलाफ नफरत की आग भड़क उठेगी।

आज़ादी मिलने के बाद, 15 अगस्त 1947 को हमने मान लिया था की हम आज़ाद हो गए हैं और अब हम अंग्रेजों के गुलाम नहीं हैं।

लेकिन डीक्लासिफाइड फाइलों का वो एक पन्ना चीख-चीख कर बता रहा है की दिल्ली के तख्त पर बैठे लोग दिमागी रूप से आज भी अंग्रेजों के तलवे ही चाट रहे थे।

तारीख थी अक्टूबर 1947! देश को आज़ाद हुए मुश्किल से दो महीने ही हुए थे। भारत की खुफिया एजेंसी ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (IB) के डिप्टी डायरेक्टर बालकृष्ण शेट्टी (Balakrishna Shetty) ने ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी ‘MI5’ के एजेंट के.एम. बॉर्न (K.M. Bourne) को एक सीक्रेट चिट्ठी लिखी।

ज़रा सोचिए! आज़ाद भारत की खुफिया एजेंसी का टॉप अफसर, अंग्रेजों के जासूस को चिट्ठी लिख रहा है! और उस चिट्ठी में क्या था?

उस चिट्ठी में बालकृष्ण शेट्टी ने नेताजी के सबसे वफादार और आज़ाद हिंद फौज के अहम सिपाही ए.सी.एन. नांबियार (A.C.N. Nambiar) की पूरी खुफिया जानकारी ब्रिटिश आकाओं को सौंपी थी।

नांबियार उस वक्त यूरोप में थे और आईबी ने MI5 से बाकायदा मदद मांगी थी की “आप नांबियार पर नज़र रखिए और हमें उसकी जानकारी दीजिए।”

अरे भाई! ये गद्दारी नहीं तो और क्या है? तुमने आज़ादी का जश्न तो मना लिया, लेकिन तुम उसी ब्रिटिश एजेंसी को रिपोर्ट कर रहे थे जिसने दशकों तक हमारे क्रांतिकारियों के नाखून उखाड़े, उन्हें फांसी पर लटकाया और हमारे देश को लूटा।

अंग्रेजों के लिए नेताजी और आज़ाद हिंद फौज के सिपाही ‘दुश्मन’ थे, लेकिन आज़ाद भारत की सरकार के लिए तो वो हीरो होने चाहिए थे ना? तो फिर तुम अपने ही हीरोज़ की जासूसी करवाकर वो रिपोर्ट लंदन क्यों भेज रहे थे?

ये इस बात का सबसे खौफनाक और पुख्ता सबूत है की सत्ता हस्तांतरण (Transfer of Power) के बाद भी ये तत्कालीन कांग्रेसी सरकार अंग्रेजों की वफादार कठपुतली बनी हुई थी।

उन्हें लगता था की गोरे मालिक भले ही चले गए हों, लेकिन नेताजी और उनके साथियों का खात्मा करने के लिए अंग्रेजों से हाथ मिलाना ज़रूरी है।

आज़ाद हिंद फौज के जिन सिपाहियों को लाल किले के ट्रायल में जनता ने अपने सिर-आंखों पर बिठाया था, उन्हें नेहरू की सरकार ने कभी सेना में वापस नहीं लिया, बल्कि उन्हें हमेशा शक की नज़रों से देखा और विदेशी आकाओं के साथ मिलकर उनकी ज़िंदगी नर्क बना दी।

आखिर दिल्ली के तख्त को क्यों था नेताजी से इतना खौफ, अपनी गद्दी छिनने के डर से कांप रही थी नेहरू की कांग्रेस सरकार

अब एक हिंदुस्तानी के दिमाग में ये सवाल हथौड़े की तरह बजता होगा की आखिर दिल्ली के उस ताकतवर तख्त पर बैठे प्रधानमंत्री को एक ऐसे इंसान के परिवार से इतना खौफ क्यों था, जिसे वो खुद 1945 के एक विमान हादसे में मृत घोषित कर चुके थे?

अगर नेताजी उस ताइवान के विमान हादसे में मारे जा चुके थे, तो फिर उनके भतीजों की जासूसी क्यों? उनकी विधवा पत्नी की चिट्ठियां क्यों पढ़ी जा रही थीं?

इसका जवाब उसी गंदी और नीच राजनीति में छुपा है जिसने इस देश के असली नायकों को हमेशा ज़मीन में गाड़ने की कोशिश की।

असल में नेहरू और उनकी कांग्रेसी सरकार बहुत अच्छी तरह से जानती थी की 1945 के उस विमान हादसे की कहानी पर इस देश की जनता ने कभी यकीन नहीं किया।

उस वक्त बच्चा-बच्चा जानता था की ये कोई हादसा नहीं था, बल्कि एक बहुत बड़ा झूठ था। दिल्ली के तख्त को दिन-रात सपने में भी यही खौफ सताता था की अगर किसी दिन सच में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ज़िंदा लौट आए, या रूस से उनकी कोई खबर आ गई, तो क्या होगा?

मैं बताता हूं क्या होता! अगर नेताजी भारत की ज़मीन पर कदम रख देते, तो इस देश की जनता उस तथाकथित अहिंसा और चरखे वाले इकोसिस्टम को रातों-रात उखाड़ कर अरब सागर में फेंक देती।

जनता अपने खून से नेताजी का राजतिलक करती। लाल किले के ट्रायल (INA Trials) के दौरान पूरे देश ने देखा था की कैसे हिंदू, सिख और मुसलमान सब एक होकर आज़ाद हिंद फौज के सिपाहियों के लिए सड़कों पर उतर आए थे।

नेहरू को पता था की नेताजी का रुतबा, उनका कद और देश के लिए उनका बलिदान इतना विशाल था की उसके सामने नेहरू की पूरी की पूरी राजनीतिक हैसियत एक बौने के समान थी।

अपनी उसी गद्दी को, अपनी उसी कुर्सी को बचाने के लिए ये 20 सालों की खौफनाक जासूसी रची गई थी।

और बात सिर्फ नेताजी के लौटने की नहीं थी। अगर नेताजी नहीं भी लौटते, तो उनका परिवार इस देश में देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका था।

उनके भाई शरत चंद्र बोस और भतीजे अमिय नाथ बोस उस वक्त के कद्दावर और प्रखर राजनेता बनकर उभर रहे थे। वो कांग्रेस की तानाशाही और उनके झूठे वादों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे थे।

ज़रा सोचिए, आज जो कांग्रेसी दरबारी दिन-रात टीवी पर बैठकर छाती पीटते हैं की “देश में अघोषित आपातकाल आ गया है, लोकतंत्र खतरे में है”, ज़रा उन्हें ये आईना दिखाइए!

असली तानाशाही और फासीवाद तो वो था जब तुमने अपने राजनीतिक विरोधियों और देश के सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को क्रिमिनल और आतंकवादियों की तरह ट्रीट किया था।

अपनी कुर्सी को, अपने खानदान के वंशवाद को बचाने के लिए तुमने एक ऐसे परिवार पर खुफिया कुत्ते छोड़ दिए थे जिनका इस देश की आज़ादी में तुमसे सौ गुना ज़्यादा खून पसीना लगा हुआ था।

दशकों तक इस घिनौनी गद्दारी को कैसे दबाया गया, और 2015 की खुफिया फाइलों ने कैसे खोला कांग्रेस का नंगा सच

इतिहास का ये सबसे खौफनाक और काला सच 70 सालों तक इस देश के आम नागरिक से क्यों छुपा रहा? ये एक ऐसा सवाल है जो हर देशभक्त का खून खौला देगा।

ये सच इसलिए छुपा रहा क्योंकि इस देश के इतिहास को लिखने का ठेका उन दरबारियों, उन चाटुकार इतिहासकारों और उस बिकाऊ इकोसिस्टम को दे दिया गया था जो नेहरू-गांधी परिवार के टुकड़ों पर पलते थे।

इन दरबारी इतिहासकारों ने नेहरू की जैकेट पर लगने वाले गुलाब के फूल पर किताबें लिख दीं, उनके जूतों की तारीफें कर दीं, बच्चों के साथ उनके झूठे किस्से गढ़ दिए।

लेकिन जिस आदमी ने 20 सालों तक एक महान क्रांतिकारी के घर की जासूसी करवाई, जिसने एक विधवा औरत की प्राइवेट चिट्ठियां चुराकर पढ़ीं और अंग्रेजों के जासूसों को रिपोर्ट भेजी… उस क्रूरता पर ये सारे के सारे कलम के कसाई अपनी आंखें मूंद कर बैठ गए।

इन्हें पता था की जिस दिन बोस परिवार की इस जासूसी का सच बाहर आएगा, उस दिन वो ‘चाचा’ वाला नकाब हमेशा के लिए तार-तार हो जाएगा।

लेकिन कहते हैं ना की सत्य को ज़मीन के कितने भी नीचे गाड़ दो, वो ज़लज़ला बनकर एक दिन बाहर आ ही जाता है।

साल 2015 में जब केंद्र की मौजूदा राष्ट्रवादी सरकार ने दशकों से दबी हुई इन आईबी (IB) की टॉप सीक्रेट फाइलों को सार्वजनिक (Declassify) करने का ऐतिहासिक फैसला लिया, तो इस दरबारी इकोसिस्टम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

जब फाइलें दुनिया के सामने आईं, तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं के पसीने छूट गए। उनकी बेशर्मी का आलम ये था की जब टीवी चैनलों पर उन फाइलों को दिखाया जा रहा था, तो कांग्रेस के नेता (पीसी चाको और बाकी प्रवक्ता) कैमरे पर आकर इस जासूसी को सही ठहराने लगे! उन्होंने कहा की “अरे, ये तो आईबी का रूटीन काम है, ये तो मीडिया का बनाया हुआ झूठ है।”

अरे गद्दारों! एक देशभक्त परिवार के घर के बाहर 20 साल तक जासूस बिठाना तुम्हारा ‘रूटीन काम’ था? ब्रिटिश एजेंसी MI5 को रिपोर्ट भेजना तुम्हारी रूटीन ड्यूटी थी?

ये कोई मीडिया का क्रिएशन नहीं था, ये तुम्हारे पापों का वो साक्षात प्रमाण था जिसने पूरे देश को रुला कर रख दिया था।

जब ये फाइलें खुलीं, तो नेताजी के भतीजे चंद्र कुमार बोस और ऑस्ट्रिया में बैठी उनकी बेटी अनीता बोस का जो दर्द छलका, वो इस देश के लिए एक बहुत बड़ा तमाचा था।

उन्होंने रोते हुए पूछा था की “आखिर हमारे परिवार ने ऐसा कौन सा जुर्म किया था जो हमें आज़ाद भारत में भी गुलामों की तरह रखा गया?” इस सवाल का जवाब इस देश का वो सड़ा हुआ इकोसिस्टम आज तक नहीं दे पाया है।

Scroll to Top