इतिहास के पन्नों में जब भी शूरवीरों और योद्धाओं की बात होती है, तो दक्षिण भारत की धरती का वो खौफनाक और खून से सना हुआ इतिहास अक्सर हमारे सामने आता है जिसे सुनकर किसी भी सच्चे सनातनी की रगों में उबलता हुआ खून दौड़ने लगे।
बात 16वीं सदी के अंत और 17वीं सदी की शुरुआत की है। तालीकोटा के भयंकर युद्ध के बाद जब दक्षिण भारत का सबसे महान और अजेय ‘विजयनगर साम्राज्य’ बिखर रहा था, तब दिल्ली से लेकर दक्कन तक बैठे इस्लामिक सुल्तानों की बांछें खिल गई थीं।
बीजापुर की आदिल शाही सल्तनत और गोलकुंडा के कुतुब शाही सुल्तानों को लगने लगा था की अब दक्षिण भारत में कोई ऐसा हिन्दू शेर नहीं बचा जो उनकी जिहादी आंधी को रोक सके।
लेकिन सुल्तानों को ये नहीं पता था की सनातन धर्म में जब भी कोई विपत्ति आती है, तो एक ऐसा महाकाल जन्म लेता है जो असुरों का पूरा का पूरा वंश ही धरती में गाड़ देता है।
मैसूर के वाडियार राजवंश की गद्दी पर 1638 में एक ऐसे ही खूंखार, जन्मजात योद्धा और महापराक्रमी हिन्दू शेर का राज्याभिषेक हुआ, जिसका नाम था- ‘रणधीरा कंठीरवा नरसराज वाडियार’।
कंठीरवा नरसराज के बाहुबल और उनकी तलवारबाज़ी के किस्से पूरे दक्षिण भारत में खौफ का दूसरा नाम बन चुके थे। ये वो राजा थे जिन्होंने त्रिची के नवाब के दरबार में जाकर वहां के सबसे खूंखार और अजेय माने जाने वाले पहलवान को अखाड़े में नंगे हाथों से चीर कर रख दिया था।
कंठीरवा नरसराज का शरीर फौलाद का बना था और उनके सीने में अपनी मातृभूमि और सनातन धर्म के लिए एक ऐसा धधकता हुआ ज्वालामुखी था, जो किसी भी जिहादी सेना को पलक झपकते ही राख करने की ताकत रखता था।
40 हज़ार की खूंखार आदिल शाही फौज और श्रीरंगपट्टनम को मिट्टी में मिलाने का वो जिहादी मंसूबा
बीजापुर के सुल्तान मुहम्मद आदिल शाह ने जब देखा की मैसूर की गद्दी पर एक नया और युवा हिन्दू राजा बैठा है, तो उसके भीतर का वो मज़हबी फितूर जाग उठा।
उसने मैसूर को मटियामेट करने, वहां के मंदिरों को ज़मीनदोज़ करने और वहां की औरतों और बच्चों को गुलाम बनाने के लिए एक बहुत ही खौफनाक जिहादी मंसूबा तैयार किया।
इस खूनी काम को अंजाम देने के लिए सुल्तान ने अपने सबसे क्रूर, सबसे ज़ालिम और खूंखार कमांडर ‘रणदुल्ला खान’ को चुना।
रणदुल्ला खान को सुल्तान ने 40,000 की एक बहुत ही भारी-भरकम और खूंखार जिहादी सेना दी। इस सेना में अरब और तुर्क के भाड़े के हत्यारे, तेज़ दौड़ने वाले घुड़सवार, बड़े-बड़े हाथी और दीवारों को पल भर में राख कर देने वाला विनाशकारी तोपखाना शामिल था।
रणदुल्ला खान इस 40 हज़ार की जिहादी फौज को लेकर बीजापुर से मैसूर की तरफ बढ़ा। रास्ते में जितने भी छोटे हिन्दू राज्य पड़े, उसने उन सब को बेरहमी से कुचल दिया।
उसने वहां के मंदिरों को तोड़ा, संपत्तियां लूटीं और काफिरों का कत्लेआम करते हुए वो एक आंधी की तरह मैसूर की सीमाओं तक आ पहुंचा।
रणदुल्ला खान की वो खूंखार सेना कावेरी नदी के तट पर बसे मैसूर की अजेय राजधानी ‘श्रीरंगपट्टनम’ की तरफ मौत का साया बनकर मंडराने लगी।
कंठीरवा नरसराज ने सुल्तान आदिल शाह की गुलामी पर थूका और श्रीरंगपट्टनम के किले को बना दिया इस्लामियों की मौत का कुआँ
जनवरी 1639 का वो वक्त जब सर्दियों की सर्द हवाओं के बीच रणदुल्ला खान की 40 हज़ार की जिहादी सेना ने श्रीरंगपट्टनम के भव्य किले को चारों तरफ से घेर लिया।
किले के बाहर तोपों के मुंह खोल दिए गए थे और हाथियों की चिंघाड़ से पूरा इलाका गूंज रहा था। इसे इतिहास में ‘श्रीरंगपट्टनम की घेराबंदी’ (Siege of Srirangapatna) कहा जाता है।
रणदुल्ला खान ने अपने दूत के ज़रिए किले के अंदर महाराजा कंठीरवा नरसराज को एक पैगाम भेजा।
पैगाम बहुत ही घमंड से भरा हुआ था-
“या तो सुल्तान मुहम्मद आदिल शाह की गुलामी कबूल कर लो, भारी भरकम जज़िया चुकाओ और अपने राज्य को हमें सौंप दो, वरना किले की एक-एक ईंट को मिट्टी में मिला दिया जाएगा और किसी भी काफिर को ज़िंदा नहीं छोड़ा जाएगा।”
महाराजा कंठीरवा ने उस रणदुल्ला खान की अधीनता पर सीधे तौर पर थूक दिया और अपनी भवानी तलवार म्यान से बाहर निकाल कर ऐलान कर दिया की-
“सनातन का सिर कट सकता है, युद्ध के मैदान में टुकड़े-टुकड़े हो सकता है, लेकिन किसी सुल्तान के आगे झुकेगा नहीं। अगर रणदुल्ला खान को मैसूर चाहिए, तो उसे मेरी लाश से गुज़रना होगा!”
महाराजा कंठीरवा ने किले के अंदर एक अभेद्य चक्रव्यूह रच दिया था। उन्होंने श्रीरंगपट्टनम के किले की मज़बूत दीवारों पर अपनी तोपें और बंदूकचियों को तैनात कर दिया था।
किले के अंदर महीनों तक टिकने के लिए भरपूर राशन और पानी का इंतज़ाम था। रणदुल्ला खान ने बौखलाहट में आदेश दिया की किले पर गोलाबारी शुरू की जाए।
आदिल शाही तोपों ने आग उगलना शुरू कर दिया। लगातार कई दिनों तक भयंकर बमबारी होती रही, लेकिन श्रीरंगपट्टनम का वो हिन्दू किला इतना मज़बूत था की जिहादी सेना उसकी एक ईंट तक नहीं हिला सकी।
महीनों बीतने लगे। रणदुल्ला खान की फौज किले के बाहर भूखी-प्यासी डेरा डाले बैठी थी। उन्हें लगा था की घेराबंदी के कारण किले के अंदर राशन खत्म हो जाएगा और हिन्दू राजा तड़प कर अपने आप दरवाज़े खोल देगा।
रणदुल्ला खान को अपनी विशाल सेना पर इतना घमंड हो गया था की वो और उसके सेनापति रात के वक्त अपनी छावनी में शराब और कबाब का जश्न मनाने लगे थे।
रात के अंधेरे में कंठीरवा नरसराज का वो खौफनाक पलटवार, जब सोते हुए जिहादियों को उनके ही खून से नहलाया
रणदुल्ला खान इस बात से बिल्कुल अनजान था की किले के अंदर बैठा वो खूंखार हिन्दू शेर सिर्फ मरने का इंतज़ार नहीं कर रहा था।
बल्कि वो इन 40 हज़ार जिहादियों के लिए मौत का एक ऐसा खौफनाक जाल बुन रहा था जिसे इतिहास सदियों तक याद रखने वाला था।
महाराजा कंठीरवा नरसराज ने तय किया की वो दुश्मन को उसी के कैंप में घुसकर मारेंगे।
ये रात के घने अंधेरे और सन्नाटे का वक्त था। आदिल शाही सेना के कैंप में ज़्यादातर जिहादी सैनिक गहरी नींद में खर्राटे ले रहे थे।
तभी अचानक श्रीरंगपट्टनम के किले के भारी-भरकम दरवाज़े बिल्कुल खामोशी से खुले। महाराजा कंठीरवा नरसराज अपनी सबसे खूंखार हिन्दू बटालियन के साथ काल भैरव की तरह किले से बाहर निकले।
बिना कोई आवाज़ किए, बिना किसी ढोल-नगाड़े के, कंठीरवा की सेना ने सीधे रणदुल्ला खान की छावनी पर धावा बोल दिया।
सोते हुए जिहादियों को संभलने या हथियार उठाने का मौका ही नहीं मिला। कंठीरवा के वीरों ने आदिल शाही सैनिकों को उनके ही बिस्तरों और तंबुओं में काटना शुरू कर दिया।
चारों तरफ तलवारों की खचाखच आवाज़ें और उन जिहादियों की दर्दनाक चीखें गूंजने लगीं। जो भी अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश करता, उसे वहीं बीच से चीर दिया जाता।
महाराजा कंठीरवा खुद रणभूमि में दोनों हाथों में तलवारें लेकर साक्षात यमराज की तरह घूम रहे थे। उनकी तलवार जिधर घूमती, उधर आदिल शाही सैनिकों की गर्दनें कटकर ज़मीन पर गिर जातीं।
कोई रहम नहीं दिखाया गया, कोई युद्ध के नियम नहीं माने गए। पूरी रात श्रीरंगपट्टनम के मैदान में सिर्फ मौत का खौफनाक तांडव होता रहा और 40 हज़ार जिहादियों की वो विशाल फौज एक ही रात में कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचल कर रख दी गई।
जान बचाकर भागा रणदुल्ला खान और रणभूमि में बिछी 40 हज़ार जिहादियों की लाशें, सनातन की दक्षिण भारत में वो सबसे खौफनाक जीत
जब सुबह की पहली किरण फूटी, तो श्रीरंगपट्टनम के मैदान में दूर-दूर तक सिर्फ आदिल शाही जिहादियों की कटी हुई लाशें बिछी हुई थीं।
कटे हुए सिर और टूटे हुए हथियार कावो अंबार बता रहा था की मैसूर के इस हिन्दू राजा ने रात के अंधेरे में क्या भयंकर कहर बरपाया था।
रणदुल्ला खान ने जब कंठीरवा नरसराज के उस रौद्र रूप और अपनी सेना की इस भयानक तबाही को देखा, तो उसका सारा जिहादी घमंड श्रीरंगपट्टनम की धूल में मिलकर राख हो गया।
उसे समझ आ गया की अगर वो एक पल भी और रुका, तो ये खूंखार हिन्दू राजा उसकी भी गर्दन काटकर किले के दरवाज़े पर लटका देगा।
रणदुल्ला खान को अपनी जान की भीख मांगनी पड़ी। वो अपने घुटनों पर आ गिरा और उसने महाराजा कंठीरवा नरसराज के सामने शांति संधि की भीख मांगी।
उसने अपने अल्लाह की कसम खाई की वो अब ज़िंदगानी में कभी मैसूर की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखेगा।
कंठीरवा ने उस कायर जिहादी कमांडर को ज़िल्लत के साथ वहां से भागने दिया, ताकि वो बीजापुर जाकर अपने सुल्तान को ये बता सके की मैसूर की गद्दी पर कोई कायर नहीं, बल्कि एक ऐसा हिन्दू शेर बैठा है जो जिहादियों की छाती फाड़कर उनका खून पीना जानता है।
रणदुल्ला खान अपनी बची-खुची इज़्ज़त और बचे हुए सैनिकों को लेकर वहां से दुम दबाकर बीजापुर की तरफ भाग खड़ा हुआ।
ये दक्षिण भारत के इतिहास की वो सबसे भयंकर और ऐतिहासिक जीत थी जिसने बीजापुर के आदिल शाही सुल्तानों के सपनों को हमेशा-हमेशा के लिए ज़मीन में गाड़ दिया।
इस महा-विनाशकारी युद्ध के बाद महाराजा कंठीरवा नरसराज ने किसी भी सुल्तान का नाम लेने या उसे कर देने से साफ इंकार कर दिया।
उन्होंने खुद को एक ‘स्वतंत्र हिन्दू सम्राट’ घोषित किया और मैसूर में सनातन का वो भगवा झंडा लहराया जिसकी छांव में पूरा दक्षिण भारत सुरक्षित महसूस करने लगा।
उन्होंने अपने नाम के सिक्के चलाए, जिन्हें ‘कंठीराया फनम’ (Kanthiraya Fanam) कहा जाता था।
ये सिक्के इस बात का प्रतीक थे की अब मैसूर की अर्थव्यवस्था और सत्ता पर किसी इस्लामी सुल्तान का कोई अधिकार नहीं है। एक सच्चे सनातनी राजा की तरह, उन्होंने अपनी जीत का सारा श्रेय अपने इष्ट देवों को दिया।
उन्होंने श्रीरंगपट्टनम में भगवान नरसिंह और श्रीरंगनाथ स्वामी के भव्य मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और उन मंदिरों को अथाह संपत्तियां दान कीं जिन्हें जिहादी तोड़ना चाहते थे।
