क्या आप कल्पना कर सकते हैं की इस देश के अंदर 100, 200 या 1000 नहीं, बल्कि पूरे 75,000 मासूम हिंदू और वनवासी बच्चों को उनके मां-बाप से छीन लिया गया? जी हां!
75 हज़ार बच्चे! ये कोई मनगढ़ंत आंकड़ा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल पीआईएल (PIL) और खुफिया जांच एजेंसियों की फाइलों में ये आंकड़ा चीख-चीख कर गवाही दे रहा है की भारत के 5 राज्यों से 75 हज़ार मासूम बच्चों को रातों-रात गायब कर दिया गया।
और उन्हें किडनैप करके किसी फैक्ट्री में मज़दूरी करने के लिए नहीं ले जाया गया था। उन्हें बाकायदा एक बहुत बड़े जिहादी मकरजाल के तहत केरल के उन खौफनाक ‘यतीमखानों’ (Orphanages) और मदरसों में बंधक बनाकर रखा गया था, जहाँ उनके साथ वो बर्बरता हुई जिसे सुनकर रूह कांप जाए।
ज़रा एक मिनट के लिए सोचिए। 75 हज़ार बच्चे अगर किसी देश से गायब हो जाएं, तो वहां की सरकारें गिर जानी चाहिए, वहां तहलका मच जाना चाहिए! लेकिन हमारे देश में सन्नाटा पसरा रहा।
ये सनातन की आने वाली नस्लों को जड़ से उखाड़ फेंकने का गज़वा-ए-हिंद का सबसे खौफनाक रूप है।
असम से लेकर बंगाल तक शिकार होते गरीब हिन्दू बच्चे, 5 राज्यों से मासूमों को उठाने वाला ये खौफनाक ‘ट्रैफिकिंग जिहाद’
अब ज़रा इस खौफनाक नेटवर्क की गहराई को समझिए। इस जिहादी सिंडिकेट ने बहुत ही चालाकी से उन राज्यों को अपना शिकार बनाया जहाँ गरीबी ज़्यादा थी, जहाँ हिंदू समाज जातियों में बंटा हुआ था और जहाँ सेक्युलर सरकारें वोटबैंक के लालच में अंधी हो चुकी थीं।
इन सुअरों ने असम, ओडिशा, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल को अपना सबसे बड़ा चरागाह बना लिया।
इस धर्मांतरण माफिया के दलाल गांव-गांव, गली-गली घूमते थे। वो हमारे सीधे-सादे, गरीब और वनवासी हिंदू परिवारों को निशाना बनाते थे।
इन दलालों ने उन बेबस मां-बापों को एक बहुत ही मीठा और ज़हरीला लालच दिया। इन्होंने कहा की-
“तुम्हारा बच्चा यहाँ भूखा मर रहा है, इसे हमारे साथ केरल भेज दो। वहां के बड़े-बड़े अनाथालयों और स्कूलों में इसे एकदम मुफ्त और बेहतरीन शिक्षा मिलेगी। तुम्हारा बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बनकर लौटेगा और तुम्हारी गरीबी दूर कर देगा।”
वो बेचारा गरीब हिंदू बाप, जो दिन भर पसीना बहाकर भी अपने बच्चे को दो वक्त की रोटी नहीं दे पा रहा था, वो इन जिहादी दलालों की मीठी बातों में आ गया।
उसने अपने जिगर के टुकड़े को इस उम्मीद में उनके हवाले कर दिया की शायद उसके बच्चे की ज़िंदगी संवर जाएगी।
लेकिन उसे क्या पता था की वो अपने बच्चे को स्कूल नहीं, बल्कि कट्टरपंथ की उस भट्टी में धकेल रहा है जहाँ से वो कभी वापस लौट कर नहीं आएगा।
और सबसे बड़ा सवाल ये है की जब असम से लेकर बंगाल तक रोज़ हज़ारों बच्चे गायब हो रहे थे, बसों और ट्रेनों में भर-भर कर ले जाए जा रहे थे, तो इन राज्यों की तत्कालीन सेक्युलर सरकारें क्या कर रही थीं?
पुलिस क्या कर रही थी? चाइल्ड वेलफेयर कमेटियां (CWC) क्या भांग खाकर सो रही थीं?
अरे भाई, ये सब मिले हुए थे! इन राज्यों में बैठे भ्रष्ट बाबू और नेता चंद रुपयों की दलाली के लिए इन जिहादियों को खुली छूट दे रहे थे।
उन्हें पता था की ये बच्चे केरल के उन यतीमखानों में जा रहे हैं जहाँ से फंडिंग आती है। हमारी ही सरकारों ने हमारे बच्चों का सौदा उन कट्टरपंथियों के हाथों कर दिया जो भारत की डेमोग्राफी को बदलने का सपना देख रहे थे।
पलक्कड़ रेलवे स्टेशन का वो भंडाफोड़, जब ट्रेनों में जानवरों की तरह ठूंस कर लाए गए 600 मासूम हिन्दू बच्चे
अगर आपको लगता है की मैं कोई मनगढ़ंत कहानी सुना रहा हूँ, तो ज़रा इतिहास के उस पन्ने को पलटिए जिसने इस पूरे जिहादी इकोसिस्टम की नींव हिला कर रख दी थी। बात मई 2014 की है। केरल का पलक्कड़ रेलवे स्टेशन (Palakkad Railway Station)।
रेलवे पुलिस फोर्स (RPF) को एक गुप्त सूचना मिली थी। जब पटना-एर्नाकुलम एक्सप्रेस और गुवाहाटी-त्रिवेंद्रम एक्सप्रेस पलक्कड़ स्टेशन पर आकर रुकीं, तो पुलिस ने बोगियों में छापा मारा।
और भाई साहब, बोगियों के अंदर का जो नज़ारा था, उसे देखकर पुलिस वालों के भी आंसू निकल आए। उन ट्रेनों की खचाखच भरी बोगियों में 600 से ज़्यादा मासूम बच्चों को भेड़-बकरियों और जानवरों की तरह ठूंस कर लाया गया था।
वो बच्चे गर्मी से तड़प रहे थे, उनके पास ना तो टिकट था, ना खाने को कुछ था और ना ही पीने के लिए पानी। वो डरे हुए थे और रो रहे थे।
जब पुलिस ने उन बच्चों को लाने वाले दलालों को कॉलर से पकड़कर नीचे उतारा और उनके कागज़ात चेक किए, तो इस देश के ‘सेक्युलर फ्रॉड’ का सबसे खौफनाक चेहरा सामने आ गया।
उन छोटे-छोटे मासूम बच्चों के पास से फर्जी आधार कार्ड मिले! बिहार और झारखंड के पंचायत घरों और CWC के फर्जी अनुमति पत्र (Fake Consent Letters) मिले, जिनमें साफ-साफ झूठ लिखा गया था की ये बच्चे अपनी मर्ज़ी से आ रहे हैं।
पूछताछ में पता चला की इन 600 से ज़्यादा बच्चों को कोझीकोड के मुक्कम मुस्लिम यतीमखाना (Mukkam Muslim Orphanage) और ऐसे ही दर्जनों जिहादी यतीमखानों में ले जाया जा रहा था।
पुलिस की जांच में ये भी सामने आया की ये जो 600 बच्चे पकड़े गए, ये तो सिर्फ एक इकलौती ट्रेन की कहानी थी! ऐसी ना जाने कितनी ही ट्रेनें पिछले कई सालों से बिहार, झारखंड और बंगाल से मासूम हिंदू बच्चों को भरकर केरल के इन बूचड़खानों में पहुंचा चुकी थीं।
ये कोई बाल मज़दूरी का मामला नहीं था। ये एक ऐसा ‘डेमोग्राफिक युद्ध’ था जिसे केरल में बैठे कट्टरपंथी मौलानाओं और विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ ने भारत के खिलाफ छेड़ रखा था।
ये हमारे ही बच्चों की फौज तैयार कर रहे थे जिन्हें कल को हमारे ही खिलाफ खड़ा किया जाना था।
यतीमखानों की काल कोठरी और रूह कंपाने वाला सच, 75 हज़ार बच्चों का ज़बरन खतना और अरबी नामों वाला धर्मांतरण
अब ज़रा अपने दिल को मज़बूत कर लीजिए, क्योंकि उन यतीमखानों की काल कोठरियों के अंदर जो हुआ, वो सुनकर किसी भी सनातनी का खून खौल उठेगा।
केरल के अंदर ऐसे 1800 से ज़्यादा यतीमखाने (Orphanages) चल रहे हैं। कागज़ों पर और टीवी विज्ञापनों में ये यतीमखाने खुद को बहुत बड़ी ‘चैरिटी’ (Charity) और समाज सेवा का अड्डा बताते हैं।
लेकिन अंदर से? अंदर से ये मिडिल ईस्ट और अरब देशों से आने वाले करोड़ों डॉलर्स की फंडिंग से चलने वाली कट्टरपंथ की वो खौफनाक फैक्ट्रियां थीं, जिनका एक ही काम हैं- काफिरों (हिंदुओं) का नामोनिशान मिटाना!
जब पुलिस, जांच एजेंसियां और कुछ हिंदूवादी संगठन इन 75,000 गायब हुए बच्चों की तलाश में केरल के इन यतीमखानों तक पहुंचे, तो वहां का सच देखकर पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
सबसे खौफनाक और बर्बर खुलासा तो ये था की जब तक हमारी ये सोई हुई सरकारें और सिस्टम जागता, तब तक उन मासूम हिंदू और वनवासी बच्चों का ज़बरदस्ती ‘खतना’ किया जा चुका था!
ज़रा सोचिए उस भयानक क्रूरता को! 6 साल, 8 साल या 10 साल के उन मासूम हिंदू बच्चों को, जिन्हें ये भी नहीं पता था की उनके साथ क्या हो रहा है, उन्हें पकड़कर उनका खतना कर दिया गया।
उनकी चीखें उन यतीमखानों की मोटी दीवारों के अंदर ही दफन हो गईं। किसी भी मानवाधिकार वाले को उनकी वो चीखें नहीं सुनाई दीं।
ये सिर्फ एक शारीरिक हमला नहीं था, ये उनका पूर्ण रूप से मानसिक और वैचारिक कत्ल था। उन बच्चों के वो जन्म के नाम, जो उनके मां-बाप ने भगवान राम, कृष्ण या शिव के नाम पर रखे थे, उन्हें सरकारी और यतीमखाने के रजिस्टरों से मिटा दिया गया।
उन्हें अरबी और इस्लामिक नाम दे दिए गए। उनके माथे से सनातन का हर एक निशान मिटा दिया गया। उन्हें बताया गया की तुम्हारा पुराना धर्म झूठा था, तुम्हारे मां-बाप काफिर थे और अब तुम्हें सिर्फ इसी नई कट्टरपंथी तालीम को मानना है।
उन्हें दिन-रात कुरान रटाई जाती थी और उनके ज़ेहन में भारत और सनातन संस्कृति के खिलाफ वो ज़हर भरा जा रहा था जिसे आज हम ‘स्लीपर सेल’ के रूप में देखते हैं।
75 हज़ार बच्चे! ये कोई छोटी-मोटी भीड़ नहीं है भाई, ये एक पूरी की पूरी फौज है जिसे जिहादियों ने हमारे ही घर से चुराकर हमारे ही खिलाफ तैयार कर लिया।
ये वो गज़वा-ए-हिंद है जो बिना कोई बम फोड़े, बिना कोई गोली चलाए भारत पर कहर बरसाने के लिए तैयार किया जा रहा है।
सीबीआई जांच का खौफ और सुप्रीम कोर्ट में ‘स्टे’ लगवाने के लिए भागता वामपंथी इकोसिस्टम, जिहादियों को बचाने वाली ये खौफनाक दलाली
जब 75 हज़ार मासूम बच्चों की किडनैपिंग का भांडाफोड़ हुआ और इस खौफनाक बाल-तस्करी का भांडा फूटा, तो पूरे देश में एक भूचाल सा आ गया।
हिंदूवादी संगठनों और कुछ सच्चे राष्ट्रभक्त वकीलों ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया और इस मामले को खींचकर अदालतों तक ले गए।
जब सबूतों के अंबार लगने लगे और इस पूरे ‘कन्वर्जन जिहाद’ की सीबीआई (CBI) जांच के आदेश हुए, तो ज़रा देखिए इस देश के वामपंथी और जिहादी इकोसिस्टम का क्या हाल हुआ!
केरल में बैठी वामपंथी सरकारों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। क्यों? क्योंकि इनकी सत्ता उसी ‘मुस्लिम लीग’ और कट्टरपंथी संगठनों की बैसाखियों पर टिकी थी जो इन यतीमखानों को चलाते थे।
इन्हें पता था की अगर सीबीआई ने ईमानदारी से जांच कर ली, तो मिडिल ईस्ट और अरब देशों से आने वाली उस करोड़ों डॉलर की फंडिंग का पूरा कच्चा चिट्ठा खुल जाएगा जो इन बच्चों की किडनैपिंग और धर्मांतरण के लिए भेजी जा रही थी।
फिर शुरू हुआ इस देश का सबसे घिनौना ‘लीगल जिहाद’। पूरा का पूरा लिबरल इकोसिस्टम, दिल्ली के वो करोड़ों रुपये फीस लेने वाले नामी-गिरामी वकील और मानवाधिकार का चोला ओढ़े बैठे एनजीओ रातों-रात भागकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।
इनका एक ही मकसद था- किसी भी तरह से इस सीबीआई जांच पर स्टे (Stay) लगवाना। इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जाकर छाती पीटना शुरू कर दिया की “ये तो माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन्स (Minority Institutions) पर हमला है, हमारे यतीमखानों को बेवजह निशाना बनाया जा रहा है।”
ज़रा सोचिए इस गद्दारी के स्तर को! 75 हज़ार मासूम बच्चों का ज़बरन खतना कर दिया गया, उनके नाम बदलकर उन्हें कट्टरपंथी बनाया जा रहा था, और ये वामपंथी वकील उन दरिंदों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दलीलें दे रहे थे!
हालांकि शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देने से मना कर दिया, लेकिन ये इकोसिस्टम आज भी नई-नई अर्जियां डालकर, गवाहों को डरा-धमका कर इस जांच को भटकाने और दफनाने की पूरी कोशिश कर रहा है।
और सबसे बड़ा फ्रॉड तो ये ‘फैक्ट चेकर्स’ कर रहे हैं। ये विदेशी फंडिंग पर पलने वाले डिजिटल गद्दार आज भी इंटरनेट पर लंबे-लंबे आर्टिकल लिखकर इस 75,000 के आंकड़े को ‘झूठ’ और ‘मनगढ़ंत’ साबित करने में लगे हुए हैं।
ये चाहते हैं की देश का हिंदू कभी इस खौफनाक सच्चाई पर यकीन ही ना करे। ये सच को झूठ में बदलने की वो फैक्ट्री चला रहे हैं ताकि इनके जिहादी आका बिना किसी डर के भारत की डेमोग्राफी को निगलते रहें।
गाज़ा-फिलिस्तीन के लिए रोने वाले लिबरल कीड़े हमारे 75 हज़ार हिंदू बच्चों पर गूंगे और बहरे क्यों हो गए
इस पूरे षड्यंत्र का सबसे दर्दनाक हिस्सा वो है, जब हम इस देश के तथाकथित मीडिया और बुद्धिजीवियों की तरफ देखते हैं। लुटियंस दिल्ली में बैठकर मानवाधिकार का ज्ञान बांटने वाले ये पत्रकार और अर्बन नक्सल दुनिया के सबसे बड़े दोगले हैं।
ज़रा याद कीजिए, जब गाज़ा और फिलिस्तीन में कुछ होता है, तो ये पूरा का पूरा वामपंथी इकोसिस्टम कैसे आसमान सिर पर उठा लेता है।
ये लोग टीवी पर बैठकर फिलिस्तीन के बच्चों के लिए घड़ियाली आंसू बहाते हैं। इंडिया गेट पर मोमबत्तियां जलाई जाती हैं, ‘सेव गाज़ा’ (Save Gaza) के पोस्टर लेकर रैलियां निकाली जाती हैं और यूएन (UN) से लेकर जेएनयू (JNU) तक सेमिनार किए जाते हैं।
लेकिन भाई, जब इसी देश के अंदर, बिहार, झारखंड और असम के 75 हज़ार गरीब हिंदू और वनवासी बच्चों को जानवरों की तरह ट्रेनों में भरकर केरल ले जाया गया, जब उन यतीमखानों की काल कोठरियों में उन बच्चों का शारीरिक चीरहरण (खतना) हो रहा था, जब वो मासूम बच्चे अपनी मां को याद करके रो रहे थे… तब ये मानवाधिकार वाले गिद्ध कहां जाकर छुप गए थे? तब इनके मुंह में दही क्यों जम गया था?
अरे, तब किसी रवीश या किसी लिबरल पोर्टल ने एक भी प्राइम टाइम डिबेट क्यों नहीं की? क्योंकि यहाँ कटने वाला और बर्बाद होने वाला बच्चा एक ‘काफिर’ (हिंदू) था, और उसे काटने वाला इनका चहेता वोटबैंक था!
इन वामपंथियों के लिए मानवाधिकार सिर्फ तब जागता है जब किसी कट्टरपंथी या आतंकवादी पर डंडा चलता है। इस देश के बहुसंख्यक हिंदू और उसके बच्चों के लिए इनके इकोसिस्टम में कोई मानवाधिकार नहीं है।
इन्हें फिलिस्तीन के बच्चों का दर्द तो हज़ारों किलोमीटर दूर से दिख जाता है, लेकिन केरल के यतीमखानों में बंधक बनाए गए हमारे अपने बच्चों की चीखें इनके बहरे कानों तक नहीं पहुंचतीं। ये सड़ा हुआ सिस्टम हमें ये एहसास दिलाना चाहता है की हमारी जान की कोई कीमत नहीं है।
अगर आज भी हिंदू समाज अपनी आपसी जातियों को भुलाकर एक मुट्ठी नहीं बना, तो केरल के उन यतीमखानों की तरह ये पूरा का पूरा देश गज़वा-ए-हिंद की आग में निगल लिया जाएगा।
हम आज भी इसी झूठे नशे में सो रहे हैं की हमें कोई नहीं मिटा सकता? जिस देश के 75 हज़ार बच्चों को रातों-रात गायब करके जिहादी बना दिया गया हो और पूरा समाज चुप बैठा हो, उस समाज को मिटने में देर नहीं लगती।
हमें सरकार को डंके की चोट पर मजबूर करना होगा की देश के अंदर चल रहे ऐसे तमाम अवैध यतीमखानों, मदरसों और विदेशी एनजीओ पर ‘योगी मॉडल’ वाला पीला बुलडोज़र चलाया जाए।
इनकी फंडिंग को परमानेंट सील किया जाए और बच्चों का खतना करने वाले उन दरिंदों को देशद्रोह के आरोप में फांसी के फंदे पर लटकाया जाए।
जय श्री राम!
