11वीं सदी! ये वो दौर था जब अफगानिस्तान और मध्य एशिया की बंजर ज़मीनों से निकलकर महमूद गजनवी नाम का एक क्रूर और खूंखार जिहादी लुटेरा भारत की तरफ आंधी की तरह बढ़ रहा था।
खुद को बड़ी शान से ‘बुतशिकन’ यानी मूर्तियां तोड़ने वाला कहने वाले इस जिहादी गजनवी को लगता था की उसकी खूंखार फौज को इस धरती पर कोई भी हिंदू राजा रोक नहीं सकता।
उसे घमंड था की वो अजेय है और जहाँ भी वो अपनी तलवार लेकर जाएगा, वहां उसे सिर्फ जीत और लूटा हुआ खज़ाना ही मिलेगा।
लेकिन इस जिहादी लुटेरे को ये नहीं पता था की भारत के मुकुट ‘कश्मीर’ की पवित्र और बर्फीली वादियों में एक ऐसा खूंखार हिंदू शेर बैठा है, जो इसके इस घमंड को हमेशा-हमेशा के लिए जूतों तले कुचलने वाला है।
जी हां, मैं बात कर रहा हूँ कश्मीर के प्रचंड ‘लोहार वंश’ (Lohara Dynasty) के संस्थापक और अजेय हिंदू सम्राट महाराजा संग्रामराज की।
जब उत्तर भारत के कई राजा गजनवी के इस खौफनाक जिहादी तूफान के आगे संघर्ष कर रहे थे, तब कश्मीर एक अभेद्य हिंदू राष्ट्र के रूप में सीना ताने खड़ा था।
महाराजा संग्रामराज ने अपनी भवानी तलवार से गजनवी को वो खौफनाक और ज़िल्लत भरी मौत का ट्रेलर दिखाया था की दुनिया जीतने का ख्वाब देखने वाला वो लुटेरा कश्मीर का नाम सुनते ही थर-थर कांपने लगा था।
हिन्दू शाही वंश की पुकार और सनातन धर्म की रक्षा के लिए गजनवी की जेहादी फौज से संग्रामराज की सीधी टक्कर
इस महासंग्राम की शुरुआत सीधे कश्मीर से नहीं हुई थी। बात साल 1014 ईस्वी की है। काबुल, गांधार और पंजाब के बॉर्डर पर उस वक्त एक बहुत ही शूरवीर हिंदू राजवंश राज करता था, जिसे ‘हिंदू शाही वंश’ कहा जाता था।
वहां के महान राजा त्रिलोचनपाल सनातन धर्म की रक्षा के लिए गजनवी की खूंखार जिहादी सेना से लगातार लोहा ले रहे थे। गजनवी ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी की किसी तरह वो त्रिलोचनपाल को कुचल दे ताकि भारत के अंदर घुसने का रास्ता पूरी तरह से साफ हो जाए।
जब त्रिलोचनपाल को लगा की गजनवी की सेना बहुत बड़ी है और उन्हें और ज़्यादा सैनिक ताकत की ज़रूरत है, तो उन्होंने अपनी मातृभूमि और सनातन धर्म को बचाने के लिए कश्मीर के लोहार वंश के संस्थापक महाराजा संग्रामराज से मदद की गुहार लगाई।
अब ज़रा महाराजा संग्रामराज का वो खौफनाक राजपूती और सनातनी जज़्बा देखिए! वो चाहते तो चुपचाप कश्मीर के सुरक्षित पहाड़ों में बैठे रह सकते थे।
उन्हें पता था की गजनवी से पंगा लेने का मतलब है एक बहुत बड़े जिहादी तूफान को अपने घर बुलाना। लेकिन एक सच्चा हिंदू राजा कभी धर्म की पुकार को अनसुना नहीं करता।
महाराजा संग्रामराज ने बिना एक पल की देरी किए अपने सबसे खूंखार और तेज़-तर्रार सेनापति ‘तुंग’ (Tunga) को बुलाया।
तुंग के नेतृत्व में एक विशाल और हथियारों से लैस हिंदू फौज गजनवी को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए कश्मीर से नीचे उतर आई।
तोशी नदी के किनारे हिंदू शाही सेना और कश्मीर की इस संयुक्त फौज का सामना गजनवी के उन खूंखार जिहादियों से हुआ।
उस दिन रणभूमि में जो तांडव हुआ, उसने गजनवी के पसीने छुड़ा दिए। कश्मीरी राजपूतों और हिंदू शाही वीरों ने गजनवी की सेना पर ऐसा खौफनाक और जानलेवा प्रहार किया की जिहादियों की लाशें नदी के पानी में तैरने लगीं।
हालांकि युद्ध बहुत लंबा चला और कुछ रणनीतिक गलतियों तथा गजनवी की नई कुमुक आ जाने के कारण हिंदू सेना को पीछे हटना पड़ा, लेकिन इस सीधी टक्कर ने गजनवी के अहंकार को छलनी कर दिया था।
गजनवी बुरी तरह बौखला गया। उसे समझ आ गया की जब तक कश्मीर के तख्त पर संग्रामराज बैठा है, तब तक भारत पर उसका कब्ज़ा कभी पूरा नहीं हो सकता।
उसी बौखलाहट और गुस्से में गजनवी ने कसम खा ली की वो कश्मीर को मिट्टी में मिला देगा।
1015 का लोहारकोट युद्ध, जब कश्मीर की बर्फ में दफन हुई गजनवी की लाखों की जिहादी फौज, कुत्तों की तरह भागा वो लुटेरा, रखी ‘लोहार वंश’ की नींव
गजनवी अपनी बेइज़्ज़ती को भूल नहीं पा रहा था। साल 1015 ईस्वी में उसने अपनी लाखों की खूंखार जिहादी फौज को इकट्ठा किया।
पूरी तैयारी के साथ, हथियारों और रसद से लदी हुई ये भारी-भरकम जिहादी सेना ‘तोशामैदान दर्रे’ (Tosamaidan Pass) के रास्ते कश्मीर घाटी में घुसने के लिए आगे बढ़ी।
लेकिन इस जिहादी लुटेरे को ये नहीं पता था की कश्मीर की सीमा पर साक्षात यमराज उसका इंतज़ार कर रहे हैं। रास्ते में कश्मीर का सीना तानकर खड़ा था ‘लोहारकोट का किला’ (Loharkot Fort)।
ये एक ऐसा अभेद्य और खौफनाक हिंदू सुरक्षा चक्र था जिसे पार करना किसी भी इंसान के बस की बात नहीं थी। महाराजा संग्रामराज ने अपनी सेना को इसी किले और इसके आस-पास के पहाड़ों में तैनात कर रखा था।
जैसे ही गजनवी की जिहादी फौज किले के पास पहुंची, संग्रामराज के वीरों ने उन पर वो कहर बरपाया की लुटेरों की रूह कांप गई।
गजनवी ने पूरी ताकत लगा दी, उसने अपने सबसे खूंखार कमांडरों को किले पर हमला करने भेजा, लेकिन लोहारकोट की एक ईंट भी नहीं हिली।
एक पूरा महीना बीत गया। गजनवी के सैनिक किले के बाहर भूखे और प्यासे मरने लगे। और तभी प्रकृति ने भी सनातनियों का साथ दिया।
कश्मीर के उन भयंकर पहाड़ों में अचानक से भारी बर्फबारी शुरू हो गई। रास्ते बंद हो गए। ठंड और भूख से जिहादी सैनिक तड़पने लगे।
और इसी मौके का फायदा उठाकर महाराजा संग्रामराज की सेना ने किले से बाहर निकलकर वो खौफनाक कत्लेआम मचाया की जिहादियों की लाशों से कश्मीर की सफेद बर्फ पूरी तरह से लाल हो गई।
कश्मीरी राजपूतों की नंगी तलवारों ने उन आक्रांताओं को काट कर रख दिया। गजनवी के बड़े-बड़े कमांडर अपनी जान की भीख मांगते हुए मारे गए।
अपनी आधी से ज़्यादा लाखों की फौज को लोहारकोट की उसी बर्फ में दफन करवा कर, गजनवी पहली बार एक कायर कुत्ते की तरह अपनी जान बचाकर वहां से दुम दबाकर भागा।
महाराजा संग्रामराज ने गजनवी को सिर्फ हराया ही नहीं था, बल्कि उन्होंने कश्मीर के तख्त पर उस ‘लोहार वंश’ की वो खौफनाक नींव रखी थी, जो आने वाले 300 सालों तक सनातन धर्म की रक्षा के लिए एक लोहे की दीवार बनकर खड़ी रही।
1021 ईस्वी में गजनवी का दूसरा हमला और महाराजा संग्रामराज के वीरों की तलवारों से दोबारा घुटने टेक कर भागा वो खूंखार दरिंदा
गजनवी उस ज़िल्लत भरी हार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। उसे लगने लगा था की अगर उसने कश्मीर को नहीं जीता, तो दुनिया के बाकी सुल्तान उस पर थूकेंगे।
अपनी इसी हार और बेइज़्ज़ती का बदला लेने के लिए, 1015 की हार के ठीक छह साल बाद यानी 1021 ईस्वी में गजनवी ने फिर से एक नई और पहले से भी ज़्यादा खूंखार जिहादी सेना तैयार की।
इस बार उसने और ज़्यादा हथियार, और ज़्यादा रसद और मध्य एशिया के सबसे खूंखार लड़ाकों को अपनी फौज में शामिल किया। वो एक बार फिर उसी तोशामैदान दर्रे के रास्ते कश्मीर की तरफ आंधी की तरह बढ़ा।
लेकिन गजनवी शायद ये भूल गया था की कश्मीर के तख्त पर अभी भी वही हिंदू शेर ‘महाराजा संग्रामराज’ बैठा है, जिसकी दहाड़ से उसकी पैंट पिछली बार गीली हो चुकी थी।
लोहारकोट का वो अभेद्य किला एक बार फिर गजनवी की फौज के लिए मौत का दरवाज़ा बनकर खड़ा था। इस बार संग्रामराज और भी ज़्यादा खूंखार रूप में थे।
जैसे ही गजनवी की फौज किले के पास पहुंची, कश्मीर के उन शूरवीरों ने ऐसा भयंकर और जानलेवा पलटवार किया की जिहादियों के होश उड़ गए।
मुट्ठी भर होने के बावजूद लोहार वंश के उन वीर सैनिकों ने गजनवी की फौज का वो हश्र किया की कश्मीर की नदियां और घाटियां जिहादियों के खून से फिर से लाल हो गईं।
गजनवी के सैनिकों को समझ ही नहीं आ रहा था की वो लड़ें या भागें। हर तरफ से कश्मीरी वीरों के बाण और तलवारें उन लुटेरों को चीर रही थीं।
और फिर वही हुआ जो एक कायर लुटेरे के साथ होना चाहिए था। गजनवी को अपनी बची-खुची सेना लेकर दोबारा घुटने टेकने पड़े।
वो दूसरी बार कश्मीर की पवित्र धरती से एक हारे हुए और ज़लील जानवर की तरह भागने पर मजबूर हुआ।
1021 की उस हार के बाद गजनवी के अंदर इतनी दहशत बैठ गई की उसने अपनी पूरी बची हुई ज़िंदगी में फिर कभी भूलकर भी कश्मीर की तरफ आंख उठाने की हिम्मत नहीं की।
