‘राम मोहम्मद सिंह आज़ाद’ बनकर अंग्रेजों की आँखों में झोंकी धूल, और जलियांवाला बाग के कसाई का उसी के घर में घुसकर किया कत्लेआम, भारत माँ के वीर सपूत ‘उधम सिंह’ को शहीदी दिवस पर कोटि-कोटि नमन

आज 31 जुलाई है। आम दिनों की तरह शायद ये दिन भी कैलेंडर में चुपचाप बदल जाता, लेकिन हम हिंदुस्तानियों के लिए ये कोई मामूली तारीख नहीं है भाई।

आज ही के दिन 1940 में, लंदन की एक खौफनाक जेल में हमारे देश का एक पागल आशिक़ हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया था।

और पागल भी ऐसा-वैसा नहीं… ऐसा पागल जिसने पूरे 21 साल तक अपनी नींद हराम कर रखी थी। ये बंदा 21 साल तक एक ही आग में जलता रहा।

इस शेर ने अपनी आँखों के सामने जलियांवाला बाग में हज़ारों बेगुनाह हिंदुस्तानियों को अंग्रेजों की गोलियों से भुनते हुए देखा था।

उसी दिन खून से सनी मिट्टी हाथ में लेकर इसने कसम खाई थी की जब तक इस कत्लेआम के असली गुनहगार, अंग्रेज़ अफसर माइकल ओ’ड्वायर को उसी के घर में घुसकर नहीं मारूँगा, तब तक चैन की सांस नहीं लूँगा।

और इस शेर ने अपना वो वादा निभाया भी! सात समंदर पार कर लंदन पहुँचा, किताब के पन्नों में पिस्तौल छिपाई और भरे हॉल में अंग्रेजों के बीच खड़े ओ’ड्वायर की छाती छलनी कर दी।

आज उसी अमर बलिदानी, भारत माँ के सच्चे सपूत सरदार उधम सिंह जी का शहीदी दिवस है।

आज जब हम खुली हवा में आज़ादी की सांस ले रहे हैं, तो ये उन जैसे ही सिरफिरे दीवानों की बदौलत है जिन्होंने अपनी जवानी फांसी के फंदों पर कुर्बान कर दी।

अनाथालय में पले उस शेर की कहानी जिसे नियति ने जलियांवाला बाग का बदला लेने के लिए ही पैदा किया था

किसी ने सच ही कहा है की सोना जितना आग में तपता है, वो उतना ही कुंदन बन कर निखरता है। उधम सिंह की ज़िंदगी भी बचपन से ही दुखों की एक ऐसी भट्टी थी, जिसने उन्हें अंदर से फौलाद बना दिया था।

कहानी शुरू होती है पंजाब के संगरूर ज़िले के एक छोटे से गाँव सुनाम से। 26 दिसंबर 1899 को यहीं पर टहल सिंह के घर एक बच्चे ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया शेर सिंह।

टहल सिंह जी रेलवे क्रॉसिंग पर चौकीदार की नौकरी करते थे। घर में गरीबी का डेरा था, लेकिन फिर भी रोटी-वोटी का जुगाड़ हो ही जाता था।

लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंज़ूर था। जब शेर सिंह (उधम सिंह) बहुत छोटे थे, तभी उनकी माँ का साया उनके सिर से उठ गया।

पिता टहल सिंह ने जैसे-तैसे अपने दोनों बेटों- मुक्ता सिंह और शेर सिंह- को पालने की कोशिश की, लेकिन मुसीबतें कहाँ पीछा छोड़ने वाली थीं। कुछ ही सालों बाद, 1907 में पिता टहल सिंह का भी देहांत हो गया।

अब ये दोनों छोटे-छोटे अनाथ भाई इस दुनिया की भीड़ में बिल्कुल अकेले रह गए थे। रिश्तेदारों ने इन दोनों भाइयों को अमृतसर के ‘सेंट्रल खालसा अनाथालय’ में छोड़ दिया।

यहीं अनाथालय की चारदीवारी के बीच शेर सिंह को सिख धर्म की दीक्षा दी गई और उनका नया नाम पड़ा- उधम सिंह। बड़े भाई मुक्ता सिंह का नाम साधू सिंह रखा गया।

अनाथालय की वो ठंडी दीवारें, सुबह-शाम की प्रार्थनाएं और माता-पिता के बिना कटने वाले वो अकेले दिन… कोई आम बच्चा होता तो टूट कर बिखर जाता।

उधम सिंह के लिए उनके बड़े भाई ही उनके माँ-बाप, उनके दोस्त, उनका सब कुछ थे।

लेकिन किस्मत का क्रूर मज़ाक तो देखिए यार, 1917 में एक भयंकर बीमारी के चलते उनके इकलौते सहारे, उनके बड़े भाई मुक्ता सिंह ने भी अनाथालय में ही दम तोड़ दिया।

अब उधम सिंह इस दुनिया में सच में बिल्कुल अकेले थे। ना माँ, ना बाप, ना भाई। वो पूरी तरह से खाली हो चुके थे।

लेकिन यही वो खालीपन था, जिसने उनके अंदर एक अजीब सी आक्रामकता और निडरता भर दी थी। जब इंसान के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचता, तो वो दुनिया का सबसे खतरनाक इंसान बन जाता है।

उधम सिंह अब जान चुके थे की उनका इस दुनिया में कोई परिवार नहीं है, इसलिए उन्होंने पूरे हिंदुस्तान और भारत माँ को ही अपना परिवार मान लिया था।

अनाथालय से 1918 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और फिर देश सेवा के लिए आज़ादी की लड़ाई वाले माहौल में कूद पड़े।

नियति ने शायद उनसे उनका परिवार इसलिए छीना था क्योंकि उसे उधम सिंह के हाथों जलियांवाला बाग का वो ऐतिहासिक इंतकाम लिखवाना था।

13 अप्रैल 1919 का वो खूनी रविवार, जब जलियांवाला बाग की धरती हो गई लाल, और एक शेर ने उसी खून से सनी मिट्टी की खाई कसम

ये वो दौर था जब पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्से का उबाल अपने चरम पर था। पहला विश्व युद्ध खत्म हो चुका था।

अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों पर ‘रॉलेट एक्ट’ (Rowlatt Act) नाम का एक भयानक और काला कानून थोप दिया था। ये ऐसा कानून था जिसके तहत अंग्रेज़ पुलिस जिसे चाहे, जब चाहे शक के आधार पर उठाकर जेल में ठूंस सकती थी।

पंजाब में इस काले कानून का सबसे ज़्यादा विरोध हो रहा था। अमृतसर सुलग रहा था। अंग्रेजों ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए पंजाब के दो बड़े और लोकप्रिय नेताओं- डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू- को गिरफ़्तार कर लिया और उन्हें किसी गुप्त जगह पर भेज दिया।

इसी गिरफ़्तारी के विरोध में और बैसाखी का पवित्र त्योहार मनाने के लिए 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हज़ारों लोग इकट्ठा हुए थे।

इनमें जवान थे, बूढ़े थे, औरतें थीं और छोटे-छोटे बच्चे भी थे। माहौल एकदम शांत था। लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी सभा कर रहे थे।

उसी भीड़ में 19-20 साल का एक नौजवान उधम सिंह भी मौजूद था, जो अनाथालय की तरफ से वहां आए लोगों को पानी पिलाने की सेवा कर रहा था।

तभी शाम के करीब 5:30 बजे, जनरल रेजिनाल्ड डायर (General Reginald Dyer) अपनी गोरखा और बलूच रेजीमेंट के हथियारबंद सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग के उस संकरे गेट पर पहुँच गया।

जलियांवाला बाग की बनावट ही कुछ ऐसी थी की उसमें बाहर निकलने का सिर्फ एक ही छोटा सा रास्ता था, और उसके चारों तरफ ऊंची-ऊंची दीवारें थीं।

डायर ने आते ही अपनी फौज से उस इकलौते रास्ते को ब्लॉक करवा दिया। उसने भीड़ को तितर-बितर होने की कोई चेतावनी नहीं दी, भागने का कोई मौका नहीं दिया।

उसने सीधा चिल्लाकर हुक्म दिया- “फायर!”

और फिर जो हुआ, वो इंसानियत के इतिहास का सबसे काला और खौफनाक पन्ना बन गया। सैनिकों ने अपनी मशीनगनें और राइफलें तान लीं और निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियों की बारिश शुरू कर दी।

10 मिनट तक… हाँ दोस्तों, पूरे 10 मिनट तक वहां सिर्फ गोलियों की आवाज़ और लोगों की चीखें गूंजती रहीं।

लोग जान बचाने के लिए दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन दीवारें इतनी ऊंची थीं की वो गोलियां खा-खाकर वापस नीचे गिर रहे थे।

बाग के बीचों-बीच एक कुआं था। गोलियों से बचने के लिए औरतें अपने छोटे-छोटे बच्चों को सीने से चिपकाकर उस कुएं में कूदने लगीं। कुछ ही मिनटों में वो पूरा का पूरा कुआं लाशों से पट गया!

हज़ारों लोग मारे गए, हज़ारों बुरी तरह घायल हो गए। पूरे बाग की मिट्टी खून से लाल हो चुकी थी।

उस वक्त पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था- माइकल ओ’ड्वायर (Michael O’Dwyer)। ये वो क्रूर इंसान था जिसने डायर को ये सब करने की पूरी छूट दे रखी थी।

जब जलियांवाला बाग का कत्लेआम हो गया, तो ओ’ड्वायर ने डायर के एक्शन को बिल्कुल सही ठहराते हुए कहा था, “तुम्हारा एक्शन बिल्कुल करेक्ट है, पंजाब सरकार तुम्हारे साथ खड़ी है।”

जवान उधम सिंह उस मौत के तांडव के बीच वहीं मौजूद था। उसने अपनी आँखों के सामने उन चीखते हुए बच्चों, औरतों और तड़पते हुए बूढ़ों को देखा था।

रात का अँधेरा हो चुका था, पूरे अमृतसर में कर्फ्यू लगा था, लेकिन उधम सिंह वहां से नहीं हिला। उसने नीचे झुककर जलियांवाला बाग की उस खून से सनी लाल मिट्टी को अपने हाथों में उठाया।

उस मिट्टी को अपने माथे पर लगाया और उसी लाशों के ढेर के बीच खड़े होकर एक भयंकर कसम खाई-

“जब तक इस नरसंहार के असली ज़िम्मेदार, उस कसाई माइकल ओ’ड्वायर को उसके घर में घुसकर नहीं मार दूंगा… तब तक मैं चैन की नींद नहीं सोऊंगा!”

ये एक ऐसे खूनी इंतकाम की शुरुआत थी जिसकी गूंज 21 साल बाद लंदन की सड़कों पर सुनाई देने वाली थी।

बदले की आग को 21 साल तक सीने में जलाए रखा और दुश्मन को उसी के घर में मारने के लिए कर गया सात समंदर पार

ज़रा उस आदमी के सीने की जलन को महसूस करके देखिए, उसने पूरे 21 साल… हाँ भाई, पूरे 21 साल तक एक ही आग को अपने अंदर धधका कर रखा!

इस बंदे ने ना शादी की, ना घर बसाया, ना अपनी कोई ज़िंदगी जी। इसके हर दिन का सूरज सिर्फ एक ही मक़सद के साथ उगता था- माइकल ओ’ड्वायर की मौत!

लेकिन ये इंतकाम लेना इतना आसान नहीं था। उधम सिंह एक अनाथ लड़के थे, जिनकी जेब बिलकुल खाली थी। और दुश्मन कहाँ बैठा था?

दुनिया के सबसे ताकतवर ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी- लंदन में! लंदन तक पहुँचने और हथियार खरीदने के लिए बहुत सारे पैसों की ज़रूरत थी।

यहीं से शुरू हुआ उधम सिंह का वो दुनिया भर का संघर्ष, जिसे सुनकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाएं। पैसे कमाने के लिए ये शेर सबसे पहले अफ्रीका गया।

वहां युगांडा रेलवे (Uganda Railway) में एक मज़दूर की तरह पटरियां बिछाने का काम किया। फिर वहां से वो अमेरिका पहुँच गए। अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में उनकी मुलाकात ‘गदर पार्टी’ के क्रांतिकारियों से हुई।

ये वो लोग थे जो विदेशों में बैठकर भारत की आज़ादी के लिए हथियारों और पैसों का जुगाड़ कर रहे थे। उधम सिंह उनके साथ जुड़ गए।

अमेरिका में पेट पालने और अपने खूनी मिशन को फंड (Fund) करने के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया! उन्होंने कारपेंटर का काम किया, फैक्ट्रियों में मज़दूरी की, मैकेनिक बने।

इसी दौरान उनकी ज़िंदगी में एक और बड़ा मोड़ आया। उधम सिंह शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को अपना गुरु, अपना आदर्श मानते थे। वो अपने बटुए में हमेशा भगत सिंह की एक फोटो रखते थे।

जब 1927 में गदर पार्टी के कहने पर उधम सिंह अवैध हथियारों और गोला-बारूद के साथ भारत वापस लौटे, तो पुलिस ने उन्हें अमृतसर में धर दबोचा। उन्हें बिना लाइसेंस हथियार रखने के जुर्म में 5 साल की कड़ी सज़ा हो गई।

जब उधम सिंह जेल की कालकोठरी में सड़ रहे थे, तभी 23 मार्च 1931 को उनके गुरु भगत सिंह को अंग्रेजों ने फांसी दे दी। इस खबर ने उधम सिंह को अंदर से पूरी तरह झकझोर दिया।

अब उनके अंदर जलियांवाला बाग के साथ-साथ भगत सिंह की शहादत का दर्द भी जुड़ गया था। 1931 में जब वो जेल से बाहर आए, तो उनके अंदर का डर पूरी तरह से खत्म हो चुका था।

पुलिस उन पर 24 घंटे नज़र रख रही थी, लेकिन वो कहाँ रुकने वाले थे! वो किसी तरह पुलिस की आँखों में धूल झोंक कर कश्मीर के रास्ते जर्मनी निकल गए, और वहां से शुरू हुआ उनके लंदन का सीधा सफर।

राम मोहम्मद सिंह आज़ाद बनकर गोरे अंग्रेजों की आँखों में झोंकी धूल, और पहुंच गया लंदन की सड़कों पर

अब पुलिस और सीआईडी (CID) उनके खून की प्यासी थी। उधम सिंह अच्छी तरह जानते थे की अगर लंदन पहुँचना है, तो अपनी पहचान छिपानी पड़ेगी।

और भेष बदलने में तो वो मास्टर बन चुके थे! पासपोर्ट बनवाने और दुनिया भर में आज़ाद घूमने के लिए उन्होंने इतने नाम बदले की ब्रिटिश इंटेलिजेंस का दिमाग चकरा गया।

कभी वो ‘फ्रैंक ब्राज़ील’ (Frank Brazil) बनकर Puerto Rico घूमते, तो कभी ‘उदय सिंह’ बन जाते।

लेकिन इन सबमें जो नाम उन्होंने सबसे तगड़ा चुना था, वो था- ‘राम मोहम्मद सिंह आज़ाद’। इस अकेले नाम में इतना भयंकर स्वैग (Swag) था।

उधम सिंह ने अपने इस नाम में राम (हिंदू), मोहम्मद (मुस्लिम) और सिंह (सिख) तीनों को जोड़ दिया, और आख़िर में लगा दिया ‘आज़ाद’ (आज़ादी)। ये नाम चीख-चीख कर कह रहा था की हम सब हिंदुस्तानी एक हैं और हमारा एक ही मक़सद है- तुम्हें इस देश से उखाड़ फेंकना!

अलग-अलग भेष बदलकर, दुनिया की ख़ाक छानते हुए आख़िरकार 1934 में वो घड़ी आ ही गई, जब ये भारत का शेर लंदन की सड़कों पर उतर गया।

उसने दुश्मन की मांद में एंट्री मार ली थी। लंदन के ‘ईस्ट एंड’ इलाके में उन्होंने अपना ठिकाना बनाया। वहां भी उन्होंने अपनी पहचान छिपाए रखी।

लेकिन उधम सिंह जल्दबाज़ी में नहीं थे। वो कोई सड़क छाप गुंडे नहीं थे की बस गए और कहीं भी अँधेरे में गोली मार दी। उन्हें ओ’ड्वायर को ऐसे मारना था की पूरी ब्रिटिश हुकूमत कांप जाए।

इसके लिए उन्होंने एक 6-चैम्बर वाली .44 कैलिबर की ‘स्मिथ एंड वेसन’ (Smith & Wesson) रिवॉल्वर का जुगाड़ किया।

लंदन पहुँचने के बाद भी उन्होंने पूरे 6 साल तक इंतज़ार किया। वो ओ’ड्वायर की परछाई बन चुके थे। वो कहाँ जाता है, किससे मिलता है, किस क्लब में चाय पीता है- उधम सिंह को सब पता था!

वो बस एक सही मौके की तलाश में थे। एक ऐसे मंच की तलाश में, जहां ओ’ड्वायर अंग्रेजों के बीच सीना चौड़ा करके खड़ा हो, और वहीं सबके सामने उसे मौत की नींद सुलाकर जलियांवाला बाग का हिसाब बराबर किया जाए।

किताब के पन्नों में पिस्तौल छिपाकर कॉक्सटन हॉल में घुसा भारत का सपूत उधम सिंह, गोलियों से छलनी कर दी उस क्रूर ओ’ड्वायर की छाती

तारीख थी 13 मार्च 1940। लंदन में हल्की-हल्की ठंड थी और उस दिन कॉक्सटन हॉल (Caxton Hall) में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसाइटी की एक बहुत बड़ी जॉइंट मीटिंग रखी गई थी।

ये वो जगह थी जहाँ लंदन के सबसे बड़े-बड़े गोरे साहब, बड़े अफसर और नेता बैठकर भारत पर राज करने की नीतियां बनाते थे।

और इसी मीटिंग में मुख्य वक्ता के तौर पर बुलाया गया था उसी कसाई को- माइकल ओ’ड्वायर! वही ओ’ड्वायर जो जलियांवाला बाग में हज़ारों हिंदुस्तानियों का खून बहाने के बाद अब लंदन में रिटायरमेंट की ऐश काट रहा था।

लेकिन उस घमंडी कसाई को क्या पता था की मौत आज उसका दरवाज़ा खटखटाने नहीं, बल्कि दरवाज़ा तोड़कर अंदर आने वाली है। उधम सिंह को पता चल चुका था की ओ’ड्वायर इस मीटिंग में आ रहा है।

अब सबसे बड़ा चैलेंज ये था की इतनी कड़ी चेकिंग के बीच कॉक्सटन हॉल के अंदर गन (Gun) कैसे ले जाई जाए?

यहीं पर उधम सिंह ने अपने दिमाग का वो खतरनाक जुगाड़ लगाया। उधम सिंह ने एक मोटी सी अंग्रेज़ी किताब खरीदी।

रात के अँधेरे में बैठकर उन्होंने उस किताब के अंदर के पन्नों को बड़ी बारीकी से बिल्कुल अपनी रिवॉल्वर के सांचे (आकार) में काट लिया।

मतलब किताब बाहर से देखने में एकदम नॉर्मल लग रही थी, लेकिन जब आप उसे खोलते तो पन्नों के बीचों-बीच गन रखने की एक परफेक्ट जगह बनी हुई थी!

अपनी 6-चैम्बर वाली उस मौत बांटने वाली बंदूक को उन्होंने उसी किताब में फिट किया, एक लंबा ओवरकोट पहना और एकदम जेंटलमैन बनकर कॉक्सटन हॉल में एंट्री मार ली।

किसी संतरी, किसी पुलिस वाले की हिम्मत नहीं हुई या उसे शक तक नहीं हुआ की इस हिंदुस्तानी के हाथ में जो किताब है, उसमें 21 साल का खूनी इंतकाम छिपा है!

उधम सिंह हॉल के अंदर जाकर बिल्कुल पीछे वाली कुर्सियों के पास खड़े हो गए। उनकी निगाहें बाज़ की तरह मंच पर बैठे अपने शिकार को घूर रही थीं।

मंच पर माइकल ओ’ड्वायर के अलावा भारत सचिव लॉर्ड ज़ेटलैंड, सर लुईस डेन और लॉर्ड लेमिंगटन जैसे बड़े-बड़े अंग्रेज़ अफसर बैठे थे।

मीटिंग शुरू हुई। जब माइकल ओ’ड्वायर भाषण देने खड़ा हुआ, तो वो बेशर्म आज भी हिंदुस्तानियों को नीचा दिखा रहा था।

उधम सिंह चुपचाप सुनते रहे। उनका खून खौल रहा था, लेकिन उन्होंने अपने गुस्से को बिल्कुल कंट्रोल में रखा, क्योंकि वो एक भी गोली बर्बाद नहीं करना चाहते थे।

जैसे ही मीटिंग खत्म हुई, लोग अपनी कुर्सियों से उठने लगे। ओ’ड्वायर भी मंच से नीचे उतरकर दूसरे अफसरों से हाथ मिलाने लगा। बस, यही वो पल था!

उधम सिंह धीरे-धीरे भीड़ को चीरते हुए मंच की तरफ आगे बढ़े। जैसे ही वो ओ’ड्वायर के बिल्कुल करीब (लगभग 3-4 मीटर की दूरी पर) पहुंचे, उनके दिमाग में एक झटके में जलियांवाला बाग का वो खौफनाक नज़ारा कौंध गया।

वो चीखती हुई औरतें, कुएं में कूदते बच्चे, और खून से लाल होती वो मिट्टी… 21 साल का वो पूरा लावा आज फटने वाला था!

शेर ने अपनी वो मोटी किताब खोली। पलक झपकते ही हाथ में पिस्तौल आ गई और ट्रिगर दब गया- धांय… धांय!

लगातार दो गोलियां सीधे माइकल ओ’ड्वायर की छाती को चीरती हुई पार हो गईं!

वो कसाई, जिसने हज़ारों निहत्थों पर गोलियां चलवाई थीं, आज खुद गोलियां खाकर उसी कॉक्सटन हॉल के फर्श पर किसी लावारिस कुत्ते की तरह ढेर हो गया था!

उसकी मौत ऑन द स्पॉट (On the spot) हो गई। उधम सिंह की पिस्तौल रुकी नहीं… उन्होंने बाकी गोलियां भी फायर कीं, जिससे लॉर्ड ज़ेटलैंड, सर लुईस डेन और लेमिंगटन भी बुरी तरह घायल होकर ज़मीन पर गिर पड़े।

21 साल पहले जो गोलियां अमृतसर के जलियांवाला बाग में गूंजी थीं, आज उनकी असली गूंज लंदन के कॉक्सटन हॉल में सुनाई दे रही थी। हिसाब बराबर हो चुका था!

भागने के बजाय सीना तानकर खड़ा रहा भारत का लाल, और हंसते-हंसते चूमा फांसी का फंदा

उस वक्त हॉल में इतनी अफ़रातफ़री और चीख-पुकार मची थी की उधम सिंह चाहते तो बड़ी आसानी से कोट की कॉलर ऊपर करके भीड़ के साथ बाहर निकल सकते थे।

किसी को कानों-कान खबर नहीं होती। लेकिन वो कोई कायर नहीं थे! वो भारत माँ के बेटे थे!

उन्होंने भागने की कोई कोशिश नहीं की। जब उनकी पिस्तौल की सारी गोलियां खाली हो गईं, तो उन्होंने वो धुआं उगलती हुई गन वहीं फर्श पर फेंक दी।

उनके चेहरे पर ना कोई डर था, ना कोई पछतावा। बस एक अजीब सा सुकून था, एक ऐसी शांति थी जैसे आज उनके कंधों से सदियों का भारी बोझ उतर गया हो।

वो वहीं उसी जगह पर अपनी जगह से एक इंच भी हिले बिना, सीना तानकर मुस्कुराते हुए खड़े रहे।

कुछ देर बाद जब पुलिस और सिक्योरिटी वाले कांपते हुए आगे आए, तो उधम सिंह ने खुद अपने हाथ आगे कर दिए। उनकी आँखों में वो गुरूर था जो जीत के बाद किसी योद्धा की आँखों में होता है।

1 अप्रैल 1940 को उन पर लंदन के ओल्ड बेली (Old Bailey) कोर्ट में मुकदमा शुरू हुआ। अंग्रेजों ने उन्हें मौत की सज़ा सुनाई।

और फिर वो दिन आ गया… 31 जुलाई 1940 (जी हाँ, आज ही की वो खूनी तारीख)।

लंदन की पेंटनविले जेल में सुबह का वक़्त था। जल्लाद फंदा तैयार कर चुका था। जब उधम सिंह अपनी कोठरी से बाहर निकले, तो उनकी चाल में वही पुराने शेर वाली ठसक थी।

सीना चौड़ा, चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान और होंठों पर सिर्फ एक ही नारा- “इंकलाब ज़िंदाबाद!”

उन्होंने मौत को ऐसे गले लगाया जैसे कोई बरसों बाद अपनी महबूबा से मिल रहा हो।

बिना किसी खौफ, बिना किसी पछतावे के, भारत माँ का वो वीर सपूत 31 जुलाई 1940 को हमेशा-हमेशा के लिए उस फांसी के फंदे पर झूल कर अमर हो गया।

भारत माता की जय! वन्दे मातरम! इंकलाब ज़िंदाबाद!

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