तुलसीदास जयंती: पत्नी के एक कड़वे ताने ने बना दिया श्री राम का अनन्य भक्त, मुगलों के खौफनाक दौर में हनुमान चालीसा और रामचरितमानस लिखकर सनातन का सूरज चमकाने वाले महासंत को सत-सत नमन

आज सावन महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी है। आज वो पावन दिन है जब पूरा हिंदुस्तान, अयोध्या की गलियों से लेकर काशी के घाटों तक, एक ऐसे महासंत के आगे नतमस्तक है जिसके बिना शायद हम अपने आराध्य भगवान राम को इतने करीब से कभी जान ही नहीं पाते।

हम आज जिस शान के साथ मंदिरों में जाते हैं, अपने घरों में रामायण का पाठ करवाते हैं, और डर लगने पर बेखौफ होकर ‘हनुमान चालीसा’ पढ़ने लगते हैं, क्या कभी सोचा है की ये सब हम तक पहुँचाया किसने?

आज से करीब 500 साल पहले जब हमारे देश पर इस्लामिक आक्रांताओं का सबसे खौफनाक साया मंडरा रहा था, तब एक दुबला-पतला फकीर अपनी कलम लेकर उठा था, और उसने अपनी उसी कलम से पूरे हिंदू समाज को टूटने और बिखरने से बचा लिया था।

आज उसी महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती है। तो चलिए आज उस महाकवि के जीवन के उन पन्नों को पलटते हैं, जिनमें दर्द भी है, पागल कर देने वाला प्रेम भी है, और भगवान राम की वो असीम भक्ति भी है।

जब मुगलों की तलवारें हिन्दुओं का धर्म कुचल रही थीं तब इस एक संत ने कलम उठाकर बचाई थी पूरे सनातन की लाज

ज़रा आज से 500 साल पीछे उस 16वीं सदी के हिंदुस्तान में चलिए। ये वो खौफनाक दौर था जब दिल्ली के तख्त पर मुगल बादशाह अकबर बैठा था।

बाहर से आए इन इस्लामिक आक्रांताओं ने सिर्फ हमारी ज़मीन ही नहीं लूटी थी, बल्कि हमारी आत्मा को कुचलने का पूरा इंतज़ाम कर लिया था।

आये दिन हिंदुओं के भव्य मंदिर तोड़े जा रहे थे। तलवारों की नोंक पर गरीब सनातनियों का धर्म छीना जा रहा था।

हिंदू समाज गहरे अंधकार और हताशा में डूबता जा रहा था। लोगों को लगने लगा था की अब हमारा कोई रक्षक नहीं बचा, हमारा धर्म अब बस कुछ ही दिनों का मेहमान है।

ऐसे निराशा भरे भयानक माहौल में सनातन धर्म को बचाने के लिए भगवान ने एक ऐसे गरीब और फक्कड़ ब्राह्मण को भेजा, जिसने बिना कोई हथियार उठाए, सिर्फ अपनी एक कलम से ‘श्रीराम’ का नाम हर हिंदू के खून में ऐसे घोल दिया की मुगलों के सारे नापाक इरादे हमेशा-हमेशा के लिए खाक में मिल गए।

सोचिए उस संत की ताकत! जब मुगलों की तलवारें कह रही थीं की “हमसे डरो”, तब तुलसीदास जी की कलम गा-गाकर कह रही थी- “राम राज बैठे त्रैलोका, हरषित भए गए सब सोका।”

उन्होंने डरे-सहमे हिंदू समाज को ये अहसास दिलाया की तुम्हारे असली राजा दिल्ली के तख्त पर बैठा कोई लुटेरा मुगल नहीं है, बल्कि तुम्हारे असली राजा तो अयोध्या के राम हैं!

इसी एक विश्वास ने सनातनियों को वो संजीवनी दी की मुगलों की सारी ताकतें हमारे धर्म के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गईं।

पैदा होते ही मुंह से निकला राम का नाम और फिर शुरू हुआ अनाथ बचपन से लेकर महान संत बनने का रुला देने वाला सफर

लेकिन जो तुलसीदास बाद में पूरे हिंदुस्तान के खेवनहार बने, उनकी अपनी ज़िंदगी की शुरुआत इतने भारी दर्द और आंसुओं के बीच हुई थी की सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाए।

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले (अब चित्रकूट) में राजापुर नाम का एक छोटा सा गांव है। वहीं पंडित आत्माराम दुबे और माता हुलसी के आंगन में एक बच्चे का जन्म हुआ। लेकिन ये जन्म कोई साधारण जन्म नहीं था भाई!

कहा जाता है की बच्चा जब पैदा होता है तो सबसे पहले रोता है, लेकिन ये बच्चा बिल्कुल नहीं रोया। पैदा होते ही इसके नन्हे से मुंह से जो पहला शब्द निकला, वो था ‘राम’!

और सबसे बड़ी हैरानी की बात तो ये थी की उस नवजात शिशु के मुंह में पूरे 32 दांत मौजूद थे। आस-पास की औरतें और गांव वाले ये देखकर सन्न रह गए।

लेकिन उस जमाने में लोग अंधविश्वासों में बहुत जकड़े हुए थे। ज्योतिषियों और पंडितों ने पंचांग खोला और फरमान सुना दिया की अरे! ये बच्चा तो ‘अभुक्त मूल नक्षत्र’ में पैदा हुआ है, ये तो पूरे परिवार और माता-पिता के लिए भारी अशुभ है! ये उन्हें खा जाएगा!

आप सोचिए एक माँ के कलेजे पर क्या बीती होगी। माता हुलसी ने रोते-रोते अपने कलेजे के टुकड़े को, अपने उस 4-5 दिन के नवजात बच्चे को चुनिया नाम की एक दासी को सौंप दिया ताकि उसकी जान बच सके।

माँ बाप ने उसे अशुभ मानकर त्याग दिया। चुनिया दासी ने उस बच्चे का नाम रखा ‘रामबोला’, क्योंकि वो पैदा होते ही राम बोला था।

अभी वो मासूम रामबोला साढ़े पांच साल का ही हुआ था की नियति ने एक और क्रूर मज़ाक किया। उसे पालने वाली वो दासी चुनिया भी अचानक एक दिन इस दुनिया से चल बसी।

अब वो बच्चा पूरी तरह अनाथ हो गया। कोई सगा नहीं, कोई छत नहीं। वो छोटा सा रामबोला भगवान की बनाई इस बड़ी सी दुनिया में एकदम अकेला था।

दोस्त, जो इंसान आगे चलकर पूरी दुनिया को ‘राम’ का खज़ाना बांटने वाला था, वो बचपन में एक-एक रोटी के टुकड़े के लिए मोहताज हो गया।

वो दर-दर जाकर दरवाजे खटखटाता, जूठन खाता और मंदिरों के बाहर सीढ़ियों पर सो जाता। लोग उसे अशुभ मानकर दुत्कार देते थे। कई बार तो उसे भूखे पेट ही रात गुज़ारनी पड़ती।

लेकिन कहते हैं ना की जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान होता है। भगवान राम तो बचपन से ही अपने इस अनन्य भक्त को तराश रहे थे।

भटकते-भटकते उस अनाथ रामबोला की किस्मत उसे रामानन्द सम्प्रदाय के एक महान संत श्री नरहरिदास जी के पास ले गई।

नरहरिदास जी ने जब उस मैले-कुचैले बच्चे को देखा, तो वो पहचान गए की ये कोई साधारण बच्चा नहीं है, ये तो राम का वो हीरा है जिस पर अभी धूल चढ़ी हुई है।

उन्होंने रामबोला को गले लगाया, उसे अपना शिष्य बनाया और उसका नाम रखा- ‘तुलसीदास’। नरहरिदास जी ने ही सबसे पहले तुलसीदास को भगवान राम की कथा सुनाई और उन्हें शास्त्रों का ज्ञान दिया।

और यहीं से शुरू हुआ एक भीख मांगने वाले अनाथ रामबोला का दुनिया का सबसे महान संत बनने का वो अद्भुत सफर, जिसने आगे चलकर इतिहास के पन्ने हमेशा के लिए बदल दिए।

मुर्दे पर बैठकर उफनती नदी पार की और सांप को रस्सी समझकर चढ़ गए… फिर पत्नी के उस एक ताने ने बदल दिया भारत का इतिहास

गुरु नरहरिदास की छत्रछाया में आकर तुलसीदास जी बड़े हुए, पढ़े-लिखे और एक विद्वान पंडित बन गए।

लेकिन जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही उनके जीवन में एक ऐसा तूफान आया जिसने उन्हें पूरी तरह से अंधा कर दिया था- और वो तूफान था उनकी अपनी पत्नी ‘रत्नावली’ के प्रति उनका पागल कर देने वाला प्रेम।

तुलसीदास जी की शादी रत्नावली नाम की एक बेहद खूबसूरत और संस्कारी कन्या से हुई थी। भाई सच बता रहा हूँ, वो अपनी पत्नी के रूप-रंग और उसके मोह में इस कदर गिरफ्तार थे की एक पल के लिए भी अपनी आँखें उससे दूर नहीं कर पाते थे।

लोग उन्हें ‘जोरू का गुलाम’ कहकर ताने मारते, लेकिन तुलसीदास जी को किसी की कोई परवाह नहीं थी। उनके लिए तो रत्नावली ही उनकी दुनिया, उनका धर्म और उनका सब कुछ बन चुकी थी।

और फिर आई वो ऐतिहासिक रात, जिसने भारत के इतिहास की दिशा हमेशा के लिए मोड़ दी! एक बार ऐसा हुआ की रत्नावली अपने भाई के साथ अपने मायके चली गईं।

उन्होंने तुलसीदास जी को बिना बताए इसलिए जाना ठीक समझा क्योंकि वो जानती थीं की ये उन्हें एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ेंगे।

लेकिन जैसे ही शाम हुई और तुलसीदास जी घर लौटे… रत्नावली को ना पाकर उनका तो दिमाग ही सुन्न हो गया! वो इस कदर बैचेन हो उठे जैसे बिना पानी के कोई मछली तड़प रही हो।

उन्होंने आव देखा ना ताव, रात के उसी अंधेरे में अपनी पत्नी से मिलने मायके की तरफ निकल पड़े। आसमान से मूसलाधार बारिश हो रही थी, बिजलियां ऐसे कड़क रही थीं जैसे आसमान फट पड़ेगा, और सामने यमुना नदी पूरे उफान पर थी।

बाढ़ का पानी डरा रहा था और कोई मल्लाह अपनी नाव लेकर जाने को तैयार नहीं था। लेकिन एक आशिक़ को मौत कहां दिखाई देती है!

तुलसीदास जी ने बिना कुछ सोचे-समझे नदी में छलांग लगा दी। वो तैरते-तैरते थक गए, तभी उन्हें एक बड़ा सा लट्ठा (लकड़ी) तैरता हुआ दिखाई दिया।

उन्होंने झट से उसे पकड़ लिया और उसी के सहारे नदी पार कर ली। लेकिन किनारे पर पहुंचकर जब बिजली चमकी, तो उनका तो खून ही सूख गया!

जिसे वो लकड़ी समझकर पार कर रहे थे, वो लकड़ी नहीं, बल्कि एक बहती हुई फूली हुई लाश (मुर्दा) थी! लेकिन पत्नी के मोह ने उस डर को भी हावी नहीं होने दिया।

भीगते-कांपते वो किसी तरह आधी रात को अपने ससुराल पहुंचे। दरवाज़ा अंदर से बंद था। उन्होंने पीछे की तरफ से घर में घुसने की सोची।

वहां उन्हें एक मोटी सी रस्सी लटकती हुई दिखाई दी। उन्होंने उसी रस्सी को पकड़ा और चढ़कर सीधे रत्नावली के कमरे की खिड़की में कूद गए।

जब रत्नावली की आँख खुली और उन्होंने आधी रात को अपने भीगे हुए पति को वहां खड़ा देखा, तो वो सन्न रह गईं!

रत्नावली ने पूछा- “इतनी भयानक बाढ़ में और इस दीवार पर चढ़कर आप कैसे आए?” तुलसीदास जी ने गर्व से कहा- “उसी रस्सी के सहारे जो तुमने मेरे लिए लटका रखी थी।”

रत्नावली ने जब बाहर जाकर देखा… तो वो कोई रस्सी नहीं थी! वो एक बेहद खतरनाक और ज़हरीला सांप था जो दीवार पर चिपका हुआ था!

एक इंसान अपनी पत्नी के मोह में इतना अंधा हो चुका था की उसे ना मुर्दे से डर लगा और ना ही सांप से!

रत्नावली ये सब देखकर अंदर तक हिल गईं। उन्हें अपने पति की इस मूर्खता पर भयंकर क्रोध आया और उसी क्रोध में उन्होंने वो ऐतिहासिक और कड़वा ताना मारा, जो आज भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। उन्होंने तुलसीदास की आँखों में आँखें डालकर कहा-

“धिक्कार है तुम पर! ये मेरा शरीर क्या है? सिर्फ हड्डियों और मांस-चमड़े का एक ढांचा ही तो है ना! इस शरीर से इतना अंधा प्यार करते हो? अरे, जितना प्यार और पागलपन तुम इस हाड़-मांस के लिए दिखा रहे हो, अगर इसका आधा भी तुमने भगवान राम के लिए दिखाया होता, तो तुम्हें मोक्ष मिल जाता और तुम्हारी ज़िंदगी तर जाती!”

बस! यही वो एक पल था! पत्नी के मुंह से निकला वो एक कड़वा ताना तुलसीदास जी के दिल के पार हो गया। जैसे किसी सोए हुए इंसान पर अचानक खौलता हुआ पानी डाल दिया गया हो।

उसी एक पल में उनके अंदर वैराग्य की वो भयंकर आग जली की वो बिना एक शब्द बोले, उसी बारिश की रात में जो घर से उल्टे पांव लौटे, तो फिर जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

रत्नावली का वो ताना एक आम इंसान को खत्म कर चुका था, और अब जन्म हो चुका था सनातन के सबसे बड़े महासंत ‘गोस्वामी तुलसीदास’ का!

काशी के पंडितों का विरोध और संस्कृत से ऊपर उठकर कैसे श्रीरामचरितमानस रच कर श्री राम को अवधी भाषा में हर झोपड़ी तक पहुंचाया

घर छोड़ने के बाद तुलसीदास जी ने अपना पूरा जीवन भगवान राम के चरणों में समर्पित कर दिया। वो तीर्थ यात्राओं पर निकल पड़े और दिन-रात बस राम-राम जपने लगे। लेकिन उस दौर में एक बहुत बड़ी समस्या थी।

भगवान राम की जो असली कथा (वाल्मीकि रामायण) थी, वो शुद्ध संस्कृत भाषा में लिखी हुई थी। और उस समय संस्कृत सिर्फ कुछ मुट्ठी भर ऊंचे दर्ज़े के ब्राह्मणों और पढ़े-लिखे लोगों तक ही सीमित थी।

आम जनता, खेत में काम करने वाला किसान, मज़दूर, महिलाएं और दलितों को तो संस्कृत समझ ही नहीं आती थी।

इसलिए भगवान राम महलों और मंदिरों के अंदर तो थे, लेकिन आम आदमी की झोपड़ी और उसके आँगन तक उनकी पहुँच ही नहीं थी।

तुलसीदास जी ने इस दर्द को समझा। और फिर अयोध्या की पावन धरती पर उन्होंने अवधी भाषा (जो उस समय आम लोगों की बोलचाल की भाषा थी) में ‘श्रीरामचरितमानस’ लिखना शुरू किया।

उन्होंने राम की कथा को दोहों और चौपाइयों में ऐसे पिरोया की कोई अनपढ़ आदमी भी उसे आसानी से गा और समझ सके।

लेकिन जब आप कोई बहुत बड़ा बदलाव लाते हैं, तो सबसे पहले आपके अपने ही आप पर पत्थर मारते हैं!

जब काशी के मठाधीशों और बड़े-बड़े पंडितों को पता चला की तुलसीदास ‘गंवारों की भाषा’ (अवधी) में रामायण लिख रहे हैं, तो उनके पेट में मरोड़ उठने लगे।

उन्हें लगा की अगर राम सीधे आम जनता के पास पहुँच गए, तो हमारी ‘संस्कृत की चौधराहट’ और हमारा धंधा तो बंद हो जाएगा!

इन पंडितों ने तुलसीदास जी का भयंकर विरोध किया। उन्हें नीचा दिखाया गया, उन्हें पागल कहा गया। यहाँ तक की उन्होंने चोर और गुंडे भेजकर तुलसीदास जी की लिखी हुई पोथी (किताब) को फाड़ने और चुराने की कई बार साज़िशें रचीं।

लेकिन जब रक्षक खुद भगवान हों, तो ये पाखंडी क्या उखाड़ लेते? काशी के विश्वनाथ मंदिर में एक बहुत बड़ा चमत्कार हुआ।

इन अड़ियल पंडितों ने शर्त रखी की तुलसीदास की रामायण को सबसे नीचे रखेंगे और उसके ऊपर वेद-पुराण और बाकी संस्कृत के ग्रंथ रखेंगे।

अगर सुबह तुलसीदास की रामायण सबसे ऊपर मिली, तो हम उसे असली मान लेंगे। मंदिर के पट बंद कर दिए गए। और दोस्त, जब अगली सुबह मंदिर के दरवाज़े खोले गए, तो सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं!

तुलसीदास जी की अवधी में लिखी वो ‘श्रीरामचरितमानस’ सबसे ऊपर रखी हुई थी, और उस पोथी के ऊपर खुद भगवान शिव के हाथों से लिखा हुआ था- “सत्यम शिवम सुंदरम” (यानी यह सत्य है, यह शिव है, और यही सुंदर है)।

बस! इसके बाद तो उन काशी के पंडितों का सारा गुरूर चकनाचूर हो गया और उन्हें तुलसीदास जी के पैरों में गिरकर माफ़ी मांगनी पड़ी। वाल्मीकि के राम अब पूरे हिंदुस्तान की सड़कों, चौराहों और झोपड़ियों में गूंजने लगे थे!

जब दिल्ली के तख्त पर बैठे बादशाह का घमंड चूर-चूर कर दिया और जेल के अंधेरे में रची गयी अजेय हनुमान चालीसा

जब इंसान के सिर पर सीधे भगवान का हाथ हो ना, तो फिर दुनिया की कोई भी ताकत उसका बाल बांका नहीं कर सकती।

तुलसीदास जी की रामभक्ति और उनके चमत्कारों के किस्से जब हवाओं में तैरते हुए दिल्ली और आगरा के मुगल दरबार तक पहुंचे, तो वहां बैठे बादशाह (लोककथाओं के अनुसार अकबर) के पेट में दर्द शुरू हो गया।

उस घमंडी बादशाह को लगा की मेरे राज में मुझसे बड़ा कोई कैसे हो सकता है! उसने तुरंत अपने सिपाहियों को भेजा और तुलसीदास जी को दरबार में पेश होने का फरमान सुना दिया।

जब वो फक्कड़ और गरीब संत उस आलीशान मुगल दरबार में खड़ा हुआ, तो बादशाह ने अपनी पूरी हेकड़ी दिखाते हुए कहा- “सुना है तुम बहुत बड़े चमत्कारी हो? चलो, मुझे कोई जादू या चमत्कार दिखाओ!”

तुलसीदास जी ने जवाब दिया- “मैं कोई जादूगर या मदारी नहीं हूँ जो तुम्हें तमाशा दिखाऊं! मैं तो सिर्फ और सिर्फ अपने भगवान राम का एक अदना सा भिखारी हूँ। चमत्कार दिखाना मेरा काम नहीं, मेरे राम की मर्ज़ी है।”

बस! इतना सुनना था की बादशाह के तन-बदन में आग लग गई। उसने अपने गुरूर में आकर तुलसीदास जी को गिरफ्तार करवा लिया और उन्हें फतेहपुर सीकरी (आगरा) की एक अंधेरी कालकोठरी में फिंकवा दिया।

उसे लगा की जेल के कोड़े और अंधेरा इस संत का गुरूर तोड़ देंगे।

लेकिन उस बेवकूफ बादशाह को क्या पता था की वो जिसे सज़ा समझ रहा है, वो तो सनातनियों के लिए एक बहुत बड़ा वरदान बनने वाली थी!

उसी अंधेरी और सीलन भरी कालकोठरी में तुलसीदास जी ने आँखें बंद कीं और अपने संकटमोचन भगवान हनुमान को याद करना शुरू किया।

उन्होंने जेल के उसी अंधेरे में लगातार 40 दिन तक संकटमोचन की स्तुति लिखी। और दोस्त, इसी स्तुति को आज पूरी दुनिया ‘हनुमान चालीसा’ के नाम से जानती है!

जैसे ही 40वें दिन हनुमान चालीसा का पाठ पूरा हुआ, वैसे ही आगरा के उस किले और पूरे शहर पर लाखों लाल मुंह वाले भयंकर बंदरों की फौज ने हमला कर दिया! मुगलों की सेना में हाहाकार मच गया।

बंदरों ने सैनिकों को नोच डाला, उनके हथियार छीन लिए और पूरे शहर में तांडव मचा दिया। बादशाह की सारी हेकड़ी और घमंड एक झटके में चूर-चूर हो गया।

वो कांपता हुआ तुलसीदास जी के पैरों में गिर पड़ा और माफ़ी मांगते हुए उन्हें पूरे सम्मान के साथ जेल से आज़ाद कर दिया।

सनातन धर्म का वो सूरज, जिसे मुगलों की आंधियां भी नहीं बुझा सकीं, वो गोस्वामी तुलसीदास हमेशा-हमेशा के लिए हर हिंदू के दिल में अमर रहेंगे।

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी को कोटि-कोटि नमन!

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