कभी खुद को कहता था 'पूर्वांचल का सुल्तान', आज बुढ़ापे में आगरा की काल कोठरी में गुजार रहा अपनी अँधेरी रातें, दिहाड़ी मज़दूर के बेटे से सबसे खूंखार माफिया बनने वाला बाहुबली 'विजय मिश्रा'

कभी खुद को कहता था ‘पूर्वांचल का सुल्तान’, आज बुढ़ापे में आगरा की काल कोठरी में गुजार रहा अपनी अँधेरी रातें, दिहाड़ी मज़दूर के बेटे से सबसे खूंखार माफिया बनने वाला बाहुबली ‘विजय मिश्रा’

वो वेब सीरीज़ ‘मिर्ज़ापुर’ तो आपने ज़रूर देखी होगी। उसमें जो ‘कालीन भैया’ का किरदार था, उसे देखकर हर किसी को लगता था की यार क्या भौकाल है बंदे का!

पूरे शहर पर राज, पुलिस और नेता सब उसकी जेब में। लेकिन पर्दे पर दिखने वाली ये कहानी तो महज़ एक फिक्शन (Fiction) थी।

आज हम आपको उस असली ‘कालीन भैया’ की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसका खौफ टीवी स्क्रीन पर नहीं, बल्कि असल ज़िंदगी में यूपी की सड़कों पर बोलता था।

एक ऐसा आदमी जिसके नाम से कभी पूरा पूर्वांचल कांपता था, जिसके दरबार में बड़े-बड़े अफसर हाज़िरी लगाते थे और जो खुद को ‘पूर्वांचल का सुल्तान’ कहता था।

दिहाड़ी मज़दूर के घर पैदा हुआ वो लड़का जिसने भदोही में रखा कदम और बन गया खौफ का दूसरा नाम ‘कालीन भैया’

पैसे और पावर की भूख इंसान से क्या कुछ नहीं करवाती, ये बात अगर किसी पर सबसे सटीक बैठती है तो वो है विजय मिश्रा।

इस आदमी की शुरुआत कोई राजघरानों से नहीं हुई थी। साल 1957 की बात है, प्रयागराज के हंडिया इलाके में एक बहुत ही छोटे से गांव में इसका जन्म हुआ था।

इसके पिता रामदेव मिश्रा एक बेहद गरीब दिहाड़ी मज़दूर थे। घर में दो वक़्त की रोटी के भी लाले पड़े रहते थे। जैसे-तैसे गरीबी में धक्के खाकर विजय ने पढ़ाई की और 1976 में बीए (B.A.) पास कर लिया।

लेकिन भाई, इस लड़के की आँखों में जो चमक और भूख थी, वो किसी सरकारी नौकरी से बुझने वाली नहीं थी। इसे तो बड़ा आदमी बनना था, चाहे रास्ता कोई भी हो।

इसी पैसे की तलाश में साल 1978 में विजय मिश्रा ने यूपी की ‘कालीन नगरी’ यानी भदोही में कदम रखा।

शुरुआत में वो वहां काम ढूंढने लगा और उसकी मुलाकात ‘अब्बू’ नाम के एक बड़े कालीन कारोबारी से हो गई।

अब्बू को एक ऐसे लड़के की तलाश थी जो बाज़ार से उसके फंसे हुए पैसों की ‘वसूली’ कर सके। विजय में जिगरा तो था ही, उसने ये काम अपने हाथ में ले लिया।

बस यहीं से शुरू हुआ भदोही के असली ‘कालीन भैया’ के बनने का खेल। विजय मिश्रा ने वसूली के लिए मारपीट, धमकियां और रंगदारी का ऐसा नंगा नाच शुरू किया की कुछ ही सालों में भदोही के बड़े-बड़े व्यापारी उसके नाम से खौफ खाने लगे।

जो लड़का कल तक पाई-पाई को मोहताज़ था, वो अब भदोही के कालीन बाज़ार का बेताज़ बादशाह बन चुका था। उसका एक ही उसूल था- या तो पैसे दो, या फिर जान दो!

कचहरी के अंदर दिन-दहाड़े बिछाई लाश और 46 सालों तक कानून को अपनी जेब में रखकर नाचता रहा ये बाहुबली

वसूली और रंगदारी से शुरू हुआ ये खेल अब खून-खराबे तक पहुंच चुका था। विजय मिश्रा को ये बात समझ आ गई थी की अगर इस क्राइम की दुनिया में लंबा टिकना है, तो लोगों के दिलों में अपना खौफ इस कदर बैठाना होगा की कोई उसके खिलाफ आँख उठाने की जुर्रत ना करे।

और फिर आई तारीख 11 फरवरी 1980। ये वो मनहूस दिन था जब विजय मिश्रा ने पूरे यूपी को अपने खौफ का असली ट्रेलर दिखाया।

प्रयागराज की कचहरी… जहां जज बैठते हैं, वकील होते हैं, पुलिस का कड़ा पहरा होता है। उसी कचहरी परिसर में दिन-दहाड़े इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र ‘प्रकाश नारायण पांडेय’ को सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया गया।

बीच कचहरी में दिन-दहाड़े लाश बिछा दी गई!

अब विजय को ये गेम समझ आ गया था की क्राइम तो ठीक है, लेकिन अगर पुलिस से बचना है तो ‘खादी’ (नेतागिरी) का चोला पहनना ही पड़ेगा।

उसने राजनीति में एंट्री मारी और अपने धनबल-बाहुबल के दम पर वो लगातार चार बार (2002, 2007, 2012 और 2017) भदोही की ‘ज्ञानपुर’ सीट से विधायक बन गया।

विजय मिश्रा का लालच और खौफ अब भदोही से निकलकर पूरे पूर्वांचल में फैल चुका था। विजय मिश्रा पर हत्या, हत्या के प्रयास, रंगदारी, लूट और ज़मीन कब्ज़ा करने के एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 84 गंभीर मुकदमे दर्ज हुए थे।

लेकिन इस आदमी का सबसे खौफनाक चेहरा साल 2010 में दुनिया के सामने आया। ये वो कांड था जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया था।

विजय मिश्रा को उस वक़्त की मायावती सरकार के कद्दावर मंत्री ‘नंद गोपाल गुप्ता नंदी’ से खुंदक थी। उसे नंदी रास्ते का कांटा लग रहे थे।

एक TVS स्कूटी के अंदर RDX और रिमोट वाला बम फिट करवाया गया और उसे नंदी के घर के पास खड़ा कर दिया गया।

तारीख थी 12 जुलाई 2010… प्रयागराज का बहादुरगंज इलाका। जैसे ही मंत्री नंदी वहां से गुज़रे, एक ज़ोरदार धमाका हुआ।

किस्मत कहिए की मंत्री नंदी इस ब्लास्ट में बुरी तरह घायल होने के बावजूद बच गए, लेकिन वहां मौजूद एक बेगुनाह पत्रकार (राकेश मालवीय) समेत दो लोगों के शरीर के चीथड़े उड़ गए।

खुद के ही खून ने खोदी इस माफिया की कब्र और जान बचाने के लिए दाढ़ी बढ़ाकर साधु के भेष में छिपता फिरा सुल्तान

जब इंसान खुद को भगवान समझने लगता है, तो उसका पतन तय है। विजय का घमंड इतना बढ़ा की उसने अपने ही सगे रिश्तेदारों की ज़मीनें हड़पनी शुरू कर दीं।

लेकिन इसकी किस्मत ख़राब थी की 2020 में यूपी में योगी सरकार आ गयी थी।

इसके सगे रिश्तेदार ‘कृष्ण मोहन तिवारी’ (मुन्ना) ने हिम्मत जुटाई और गोपीगंज थाने में FIR ठोक दी की विजय ने बंदूक की नोक पर उनका पुश्तैनी मकान और कारोबार कब्ज़ा लिया है।

पुलिस का डंडा चला तो 300 गाड़ियों में घूमने वाले इस सुल्तान की हवा टाइट हो गई। जान बचाने के लिए इसने दाढ़ी बढ़ाई और ‘साधु’ का भेष बना लिया। लेकिन अगस्त 2020 में STF ने इस ढोंगी को मध्य प्रदेश के आगर मालवा से दबोच लिया।

जब 85 करोड़ के काले साम्राज्य पर गरजा बुलडोजर और एक महिला के श्राप ने लिख दिया इस खूंखार माफिया का अंत

गिरफ्तारी के बाद योगी सरकार ने इसके 4 दशकों की काली कमाई पर सीधा वार किया। विजय मिश्रा और उसके गुर्गों की 85 करोड़ रुपये से ज़्यादा की संपत्तियां ज़ब्त कर ली गईं। आलीशान कब्ज़ों को बुलडोजर ने मिट्टी में मिला दिया।

पर इसके पाप यहीं खत्म नहीं होते।

2014 में इसने एक लोक गायिका को वाराणसी बुलाकर हथियारों के दम पर उसके साथ दुष्कर्म किया था, जिसमें इसका बेटा भी शामिल था।

उस बेबस औरत का श्राप खाली नहीं गया। नवंबर 2023 में अदालत ने इस दरिंदे को उस गैंगरेप केस में 15 साल की कठोर सज़ा सुना दी। इसके काले साम्राज्य का यह पहला बड़ा अंत था।

विजय मिश्रा का सबसे बड़ा पाप अभी भी अपना हिसाब मांग रहा था। वो 1980 का ‘प्रकाश नारायण पांडेय’ मर्डर केस, जिसे ये 46 सालों से अपनी जेब में रखकर घूम रहा था।

इसे लगा था की केस खत्म हो चुका है। लेकिन भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं! मई 2026 में प्रयागराज की MP-MLA कोर्ट ने 46 साल पुराने सुबूत खंगाले और आख़िरकार विजय मिश्रा को हत्या का दोषी करार दे दिया।

जज ने जब इस बूढ़े माफिया को उम्रकैद की सज़ा सुनाई, तो ये लंगड़ाता हुआ कोर्ट में रोने लगा।

आज ये भदोही का डॉन आगरा जेल की अँधेरी काल कोठरी में ज़मीन पर सोने और सूखी रोटियां चबाने को मज़बूर है।

आप चाहे जितने भी बड़े बाहुबली बन जाएं, एक ना एक दिन आपके पापों का हिसाब इसी धरती पर होता है।

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