आज 24 अगस्त है। आज भारत माता के उस फौलादी और सिरफिरे बेटे की 118वीं जयंती है, जिसके नाम की दहशत से ही अंग्रेजी हुकूमत के अफसरों की नींद हराम हो जाया करती थी!
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं शिवराम हरि ‘राजगुरु’ की!
ज़रा सोचिए, एक लड़का जिसके एक हाथ में वेदों और संस्कृत का ज्ञान हो, जो भगवान परशुराम का पक्का भक्त हो, और जब वही लड़का अपनी मातृभूमि के लिए दूसरे हाथ में पिस्तौल उठा ले, तो वो क्या तबाही मचा सकता है!
राजगुरु का जीवन इसी भयंकर तबाही और अदम्य साहस की कहानी है। यहाँ पर ये जानना बेहद जरुरी है की राजगुरु महज़ ‘भगत सिंह के साथी’ नहीं थे, उनकी अपनी एक अलग और विराट पहचान भी थी ।
आज हम उस बागी ब्राह्मण के फौलादी जज़्बे की पूरी जन्मकुंडली खोलेंगे, जिसने महज़ 20 साल की उम्र में पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा दी थी।
पुणे की मिट्टी में पला वो बागी ब्राह्मण जो घर छोड़कर सीधे काशी के अखाड़ों में जा पहुंचा
इस बारूदी कहानी की शुरुआत होती है महाराष्ट्र से। 24 अगस्त 1908 को पुणे के पास ‘खेड़’ नाम के एक छोटे से गांव में इस वीर सपूत का जन्म हुआ था। (आज उसी गांव को हम फख्र से ‘राजगुरुनगर’ कहते हैं)।
राजगुरु बचपन से ही एकदम मस्तमौला, निडर और बागी स्वभाव के थे। जो ठान लिया, वो करना ही है, चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए। बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया था, लेकिन उन्होंने कभी हालात के आगे घुटने नहीं टेके।
एक दिन घर में किसी बात पर छोटी सी अनबन हुई और ये लड़का बिना किसी को बताए चुपचाप घर से निकल गया। मंज़िल क्या थी? मोक्ष की नगरी काशी (वाराणसी)!
वो संस्कृत पढ़ने के लिए काशी चले गए। वहां जाकर उन्होंने वेदों, उपनिषदों और व्याकरण के सबसे कठिन ग्रंथ ‘सिद्धांत कौमुदी’ का ऐसा घोर अध्ययन किया की बड़े-बड़े पंडित भी उनका लोहा मानने लगे।
उन्हें संस्कृत के श्लोक ऐसे कंठस्थ थे जैसे किसी सैनिक को अपनी बंदूक के पुर्जे याद होते हैं।
लेकिन वो कोई महज़ किताबी कीड़ा नहीं थे। उनका मानना था की सिर्फ दिमाग से आज़ादी नहीं मिलेगी, शरीर में फौलाद होना भी ज़रूरी है।
काशी के घाटों पर वो घंटों अखाड़े की धूल फांकते थे। जमकर कुश्ती लड़ना, सीना ठोककर मल्लखंभ करना और दंड-बैठक लगाना उनका रोज़ का रूटीन था।
इसी अखाड़े की मिट्टी ने उनके शरीर को ऐसा गठीला और लोहे जैसा बना दिया था की कोई भी हट्टा-कट्टा अंग्रेज पुलिसवाला अगर उनसे भिड़ जाए, तो राजगुरु उसे एक ही हाथ में ज़मीन पर सुला दें।
अंदर से शास्त्रों का ज्ञान और बाहर से फौलादी शरीर… काशी ने शिवराम हरि राजगुरु को एक ऐसा योद्धा बना दिया था, जो अब बस रणभूमि में उतरने को बेताब था।
‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ का सबसे खूंखार शूटर जिसका निशाना कभी नहीं चूकता था
काशी के उन्हीं घाटों और अखाड़ों में राजगुरु की ज़िंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट आया। वहां उनकी मुलाकात हुई आज़ादी के दो सबसे बड़े दीवानों से-चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह।
आज़ाद तो खुद एक निडर ब्राह्मण थे, जब उन्होंने राजगुरु के अंदर की वो आग और देशभक्ति का पागलपन देखा, तो वो गदगद हो गए। आज़ाद को समझ आ गया था की ये लड़का लंबी रेस का घोड़ा है।
राजगुरु का निशाना इतना अचूक था की आज़ाद भी उनकी पीठ थपथपाते थे। दौड़ते हुए किसी टारगेट पर सटीक गोली मारना हो या अंधेरे में आवाज़ सुनकर फायर करना हो, राजगुरु का हाथ कभी नहीं कांपता था।
उनकी इसी गज़ब की काबीलियत को देखकर आज़ाद ने उन्हें अपनी नई बनी ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) का मुख्य ‘शूटर’ (Gunman) बना दिया। पार्टी के अंदर उनका एक सीक्रेट कोडनेम रखा गया- ‘रघुनाथ’।
रघुनाथ यानी राजगुरु की देशभक्ति का नशा ऐसा था की वो कभी-कभी आज़ाद से ज़िद्द करने लगते थे।
वो आज़ाद से कहते, “पंडित जी, आप मुझे बस एक पिस्तौल और थोड़े कारतूस देकर अकेले ही भेज दो। मैं वादा करता हूँ की अकेले ही पूरी ब्रिटिश छावनी को उड़ा कर आ जाऊंगा, या तो उन्हें मारूंगा या खुद शहीद हो जाऊंगा।”
आज़ाद हंसकर उन्हें शांत कराते और कहते की भाई, तेरी इस गोली की ज़रूरत सही वक्त पर पड़ेगी।
और वो सही वक्त बहुत जल्द आने वाला था, जब राजगुरु की पिस्तौल से निकलने वाली एक गोली पूरे ब्रिटिश साम्राज्य का गुरूर बीच सड़क पर चकनाचूर करने वाली थी।
लालाजी की मौत का इंतकाम और सांडर्स के माथे को चीरती हुई राजगुरु की वो पहली मौत की गोली
इस पार्टी (HSRA) में शामिल होने के बाद वो दिन भी आ गया जब राजगुरु के फौलादी शरीर और अचूक निशाने की असली परीक्षा होने वाली थी।
साल 1928 था और पूरे देश में साइमन कमीशन का भयंकर विरोध चल रहा था। लाहौर में इस विरोध का नेतृत्व पंजाब केसरी लाला लाजपत राय कर रहे थे।
अंग्रेजों के एक क्रूर अफसर जेम्स ए. स्कॉट ने लालाजी पर इतनी बेरहमी से लाठियां बरसाईं की कुछ ही दिनों बाद लालाजी शहीद हो गए।
इस घटना ने पूरे हिंदुस्तान को रुला दिया था, लेकिन आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु की आँखों में आंसू नहीं, बल्कि खून उतर आया था।
इन्होंने कसम खाई की खून का बदला खून से लिया जाएगा! पूरी प्लानिंग हुई और तारीख तय हुई 17 दिसंबर 1928। निशाना था जेम्स स्कॉट, लेकिन उस दिन लाहौर पुलिस हेडक्वार्टर से बाहर निकला जे.पी. सांडर्स (J.P. Saunders)।
सांडर्स भी लाठीचार्ज करने वाले उन खूंखार अफसरों में से एक था।
जैसे ही सांडर्स अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करने लगा, भगत सिंह ने इशारा किया। और फिर जो हुआ, उसने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दीं।
सबसे पहली गोली भगत सिंह या आज़ाद ने नहीं चलाई थी भाई… वो पहली गोली दागी थी हमारे 20 साल के शेर शिवराम हरि राजगुरु ने!
राजगुरु ने बिना पलक झपकाए, अपनी पिस्तौल निकाली और सीधा सांडर्स के माथे के बीचों-बीच मौत का ऐसा तिलक लगाया की वो अंग्रेज अफसर अपनी मोटरसाइकिल समेत वहीं ज़मीन पर ढेर हो गया।
राजगुरु का निशाना इतना अचूक था की सांडर्स को संभलने का एक सेकंड भी नहीं मिला। इसके बाद भगत सिंह ने उस पर गोलियां बरसाकर लालाजी की मौत का पूरा हिसाब चुकता कर दिया।
भेष बदलने का वो शातिर दिमाग जिसने हजारों पुलिसवालों की आंखों में धूल झोंककर लाहौर से किया था सेफ एग्जिट
सांडर्स के वध के बाद पूरे लाहौर में हड़कंप मच गया। पुलिस वालों के पसीने छूट रहे थे। पूरे शहर को एक पुलिस छावनी में बदल दिया गया।
चप्पे-चप्पे पर नाकेबंदी थी, हर रेलवे स्टेशन पर सैकड़ों अंग्रेज पुलिसवाले इन क्रांतिकारियों को ढूंढ रहे थे। सबको लग रहा था की अब ये तीनों यहाँ से ज़िंदा नहीं बच पाएंगे।
लेकिन भाईसाहब, राजगुरु सिर्फ शरीर से फौलाद नहीं थे, उनका दिमाग भी किसी शातिर जासूस से कम नहीं था। यहाँ से निकलने के लिए इन शेरों ने जो भेष बदला, वो आज भी किसी हॉलीवुड थ्रिलर फिल्म से ज़्यादा रोमांचक लगता है।
भगत सिंह ने अपने बाल कटवाए, शानदार सूट-बूट पहना और एक ‘विदेशी साहब’ बन गए। महान क्रांतिकारी दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) उनकी पत्नी बनीं और उन्होंने अपने बच्चे को गोद में ले लिया।
और हमारे राजगुरु? वो बन गए इस ‘साहब’ के अनपढ़, गंवार और लड़खड़ाते हुए नौकर! फटे-पुराने कपड़े, सिर पर अजीब सी टोपी और कंधों पर साहब का भारी-भरकम सामान।
राजगुरु इस ‘नौकर’ वाले रोल में इतने घुस गए की स्टेशन पर खड़े हजारों पुलिसवाले उन्हें देखकर धोखा खा गए।
पुलिस की आँखों में आंखें डालकर, भारी बक्से उठाते हुए, राजगुरु अपने ‘साहब’ के पीछे-पीछे ट्रेन में बैठ गए और अंग्रेज अफसर हाथ मलते रह गए।
ये किस्सा बताता है की राजगुरु का कॉन्फिडेंस और नसों पर कंट्रोल कितना ज़बरदस्त था।
फांसी के फंदे पर भगत सिंह से पहले झूलने की वो दीवानगी जो आज भी हिंदुस्तानियों के रगों में आग भर देती है
लाहौर से निकलने के बाद राजगुरु चुप नहीं बैठे। वो पूरे देश में घूम-घूम कर बम और हथियार इकट्ठा करने लगे।
आख़िरकार 1929 में पुणे के एक हथियार डिपो में वो अंग्रेजों के हत्थे चढ़ गए। उन्हें उसी जेल में डाल दिया गया जिसमे भगत सिंह और सुखदेव भी कैद थे।
जब उन्हें लाहौर सेंट्रल जेल लाया गया, तो जेल के अंदर का माहौल देखकर अंग्रेज अफसर भी पगला गए थे।
ये लड़के जेल में रोने-गिड़गिड़ाने या माफ़ी मांगने के बजाय ठहाके मारते थे! जेल के अंदर राजगुरु और भगत सिंह के बीच अक्सर एक ही बात पर झगड़ा होता था।
राजगुरु ज़िद्द करते थे की “भाई, फांसी के फंदे को सबसे पहले मैं चूमूंगा!” ज़रा सोचिए यार, मौत सामने खड़ी है, और ये दीवाने इस बात पर लड़ रहे हैं की भारत माँ के लिए पहले कौन मरेगा!
आख़िरकार वो मनहूस दिन आ गया। 23 मार्च 1931… अंग्रेजों को इतना खौफ था की कहीं पब्लिक जेल तोड़कर इन शेरों को आज़ाद ना करा ले, इसलिए नियम तोड़कर तय तारीख से एक दिन पहले ही, शाम के वक्त इन तीनों को फांसी देने का फैसला किया गया।
जब राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव को फांसी के तख्ते की तरफ ले जाया जा रहा था, तो उनके चेहरों पर खौफ की एक लकीर तक नहीं थी। वे तीनों मस्त होकर ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गा रहे थे।
फांसी के तख्ते पर खड़े होकर 22 साल के उस फौलादी ब्राह्मण राजगुरु ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ का ऐसा प्रचंड नारा लगाया की जेल की दीवारें भी कांप उठीं।
और फिर हंसते-हंसते इस देश के सबसे बड़े शूटर और भारत माँ के सच्चे सपूत ने फांसी के फंदे को गले लगा लिया।
आज 24 अगस्त 2026 को हम उस महान शिवराम हरि राजगुरु की 118वीं जयंती मना रहे हैं।
राजगुरु का वो अचूक निशाना, उनका वो फौलादी बाहुबल और देश के लिए मर मिटने का वो पागलपन हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो चुका है।
जब तक हिंदुस्तान के आसमान में सूरज और चांद रहेंगे, तब तक इस बागी ब्राह्मण और भारत माता के इस वीर सपूत का नाम आदर, खौफ और भयंकर गर्व के साथ लिया जाता रहेगा।
आज उस महान आत्मा को पूरे देश का शत-शत नमन और कोटि-कोटि प्रणाम।
इंकलाब जिंदाबाद! भारत माता की जय!
