तेजपुर के पास एक गाँव है, दह परबतिया। ऊपर अहोम काल की ईंट का मंदिर भूकंप में गिरा। नीचे एक प्रस्तर द्वारपट निकला, लगभग छठी सदी का। गुप्त छाया वाला अलंकरण। शिव का नाम द्वार पर चिल्लाता नहीं। पत्थर चुपचाप कहता है कि इस घाटी में देवस्थान राजवंश की अंतिम कथा से पहले खड़ा था।
कामरूप का शैव धर्म पर्यटन पुस्तिका का अचानक चमत्कार नहीं है। वह तीन जगह से एक साथ आता है। बाणभट्ट लिखते हैं, कुमार भास्करवर्मन बचपन से शिव के चरणों के सिवा किसी को प्रणाम न करने का संकल्प रखता था। निधनपुर का ताम्रपत्र पिनाकधारी, चंद्रमौलि शिव को प्रणाम से खुलता है। ह्वेनसांग उसी दरबार में सौ देव मंदिर गिनता है और एक भी संघाराम नहीं पाता। तीन स्रोत एक स्वर नहीं गाते। तीन स्रोत एक भूमि बताते हैं। देवों की भूमि। लिंग और बलि की भूमि। विहार की नहीं।
यहाँ विकास सीधी रेखा नहीं है। पहले लोक का शिव। फिर दरबार का इष्ट। फिर शक्ति के साथ बैठा कामेश्वर। फिर नीलाचल के परिसर का स्थायी साथी। जो आज योनि पीठ के पास पंच शिव देखता है, वह नई इमारत नहीं देख रहा। वह पुरानी आदत का बचा रूप देख रहा है।
वह भिक्षु जो एक दरबार में नहीं रुका
चांगआन से नालंदा तक
ह्वेनसांग 629 में तांग चीन से निकला। वह युवा भिक्षु था और उसका सवाल जिद्दी था। बौद्ध ग्रंथों के चीनी अनुवाद एक दूसरे से नहीं मिलते थे। वह मूल चाहता था। आधिकारिक सीमा बंद थी। वह फिर भी गया।
उसने गोबी पार की। हिंदुकुश की बर्फ पार की। मध्य एशिया के राज्य पार किए। चलते चलते भाषाएँ सीखीं। उन विहारों में शास्त्रार्थ किए जहाँ चांगआन का भिक्षु कभी नहीं आया था। रास्ता कानूनी अनुमति से नहीं खुला था। रास्ता जिद से खुला था।
जब वह गंगा के मैदान पहुँचा, तब तक वह अधिकांश राजाओं से ज्यादा दुनिया देख चुका था। उसके पास पासपोर्ट नहीं था। उसके पास प्रश्न था। प्रश्न ने उसे नगर दर नगर खींचा, यहाँ तक कि मगध के सबसे बड़े विहार के द्वार तक।
नालंदा ने उसे थाम लिया। शीलभद्र बूढ़े और विद्वान थे। वे उसके गुरु बने। विहार ने उसे खिलाया, जगह दी, शास्त्रार्थ करने दिया। राजा रसद भेजते थे। सेवक साथ चलते थे। परिसर में हाथी पर चलने का दुर्लभ सम्मान मिला। यह सम्मान कुछ ही निवासी विद्वानों के लिए था। वह वर्षों रहा। वह घूमता पर्यटक नहीं था। वह विद्यार्थी था। वह किताबें घर ले जाना चाहता था। चीन से निकले विवाद यहीं सुलझाने चाहता था। नालंदा एक दरबार भी था, यद्यपि राजा का नहीं। यहाँ भी नियम थे। यहाँ भी दावे थे। यहाँ भी कोई मेहमान हमेशा तक नहीं रह सकता था।
वह वहीं मर सकता था। बहुत भिक्षु वहीं रह जाते हैं। पूर्व की ओर खींचने वाली चीज बेचैनी नहीं थी। वह एक ऐसा नाम था जो ऐसे दरबार में बोला गया था जिसे उसने कभी देखा नहीं था।
एक ब्राह्मण घर लौटा, एक नाम लेकर
धर्म के चीनी आचार्य की खबर पूर्व की ओर उसी तरह चली जैसे उस सदी में खबर चलती थी। मुँह से। लौटते विद्यार्थियों से। उन लोगों से जो शास्त्रार्थ हार गए थे और कहानी बंद नहीं कर पा रहे थे।
कामरूप का एक ब्राह्मण नालंदा आया। वह शास्त्रार्थ में उतरा। वह हार गया। घर जाकर उसी विदेशी भिक्षु की चर्चा करने लगा जिसने उसे हराया था। हार अक्सर चुप हो जाती है। यह हार बोली। इतना काफी था।
जो दरबार विद्या को मानता हो, मगध से आया नाम भेजकर बुलाने लायक पुरस्कार होता है। भास्करवर्मन का दरबार वैसा ही था। राजा स्वयं बौद्ध नहीं था। फिर भी वह विशिष्ट विद्या वाले पुरुषों का प्रेमी था। एक हारा हुआ शास्त्रार्थ पूरे पूर्व में एक निमंत्रण बन गया।
भास्करवर्मन ने निमंत्रण भेजे। एक नहीं। कई। ह्वेनसांग ने बाद में लिखा कि संदेश तीन बार आया और फिर भी उसने माना नहीं। इनकार आलस्य नहीं था। इनकार एक और दावे की वजह से था।
शीलभद्र ने पहले मना किया। तीर्थयात्री हर्ष के लिए है, उन्होंने कहा। कन्नौज के राजा का पहले से दावा था। नालंदा उसी राजनीतिक मौसम में जीता था। विहार स्वतंत्र लगता है। विहार राजाओं के बीच खड़ा रहता है। एक मेहमान को पूर्व भेजना पश्चिम के राजा को नाराज कर सकता था।
वह निमंत्रण जो लगभग धमकी बन गया
दूसरा निमंत्रण आया। फिर सुर बदला। कामरूप के राजा ने कहला दिया कि अगर विहार भिक्षु को रोकेगा तो वह सेना और हाथी लेकर नालंदा को धूल में मिला देगा। विद्या का निमंत्रण अब सेना की भाषा में आया। यह कुरूप था। यह प्रभावी भी था।
शीलभद्र ने धमकी को धर्म फैलाने के कर्तव्य के साथ तौला। उन्होंने शिष्य से व्रत की भाषा में कहा। तुमने बुद्ध के प्रति कृतज्ञता दिखानी चाही। तो सच्चे धर्म को फैलाओ। कुमारराज का कुल नास्तिक मत मानता है, फिर भी वह श्रमण को बुलाता है। यह अच्छा है। शायद वह बदल रहा है।
तुमने एक बार अकेले देशों में घूमने की प्रतिज्ञा की थी, जीवन की परवाह किए बिना, जगत के हित में धर्म खोजने के लिए। अपना देश भूलो। मृत्यु के लिए तैयार रहो। पहले दूसरों को सोचो।
गुरु का वाक्य दरबार बदलने का आदेश नहीं था। वह प्रतिज्ञा याद कराने वाला वाक्य था। ह्वेनसांग चीन से निकला था क्योंकि अनुवाद पूरे नहीं थे। अब उसे पूर्व जाना था क्योंकि एक राजा नाम लेकर पूछ रहा था। दोनों यात्राएँ एक ही जिद से जुड़ी थीं। ठहरना आसान था। चलना प्रतिज्ञा थी।
उन्होंने ह्वेनसांग से कहा कि जाओ। तीर्थयात्री धर्म के लिए चलने की प्रतिज्ञा कर चुका था। जो राजा बौद्ध नहीं था, वह फिर भी एक विद्वान श्रमण चाहता था। वही द्वार था। हाथियों की धमकी कुरूप थी। उसके नीचे निमंत्रण सच्चा था।
तो भिक्षु नालंदा की सुरक्षा छोड़कर पूर्व मुड़ा। वह बौद्ध दरबार में नहीं जा रहा था। वह शैव दरबार में जा रहा था जिसने कभी विहार नहीं बनवाया था। वह दरबार देवों को बलि देता था और अपने थोड़े से बौद्धों को छिपकर रखता था।
वह यह जानकर गया। उसे कोई छिपा बौद्ध साम्राज्य नहीं दिखने वाला था। उसे एक ऐसा राजा दिखने वाला था जो मंदिर बनाता है, हाथी रखता है, और फिर भी विद्वान को नाम लेकर माँगता है। यात्रा का अर्थ धर्म परिवर्तन कराना नहीं था। यात्रा का अर्थ एक दरबार में बैठना था जो अपने देव रखता है और मेहमान की किताब भी चाहता है।
वह गया क्योंकि राजा ने नाम लेकर बुलाया था। और क्योंकि गुरु ने कहा था कि बुद्ध के प्रति कृतज्ञता उन जगहों पर चलकर भी निभती है जहाँ बुद्ध का सार्वजनिक सम्मान नहीं होता।
करतोया पर पार
जमीन पर नौ सौ ली कैसी लगती थी
पुंड्रवर्धन से ह्वेनसांग लगभग नौ सौ ली पूर्व चला। उस समय ली पैदल नाप थी, आज के किलोमीटर जैसी नहीं। फिर भी दूरी असली थी। नीचे का देश। गीले खेत। घाट। फिर एक बड़ी नदी जो हर काफिले को रोकती थी और मल्लाहों से बात करवाती थी।
नौ सौ ली कोई कविता का आंकड़ा नहीं है। यह चलने वाले आदमी का हिसाब है। सुबह निकलना। दोपहर की कीचड़। शाम का गाँव। अगले दिन फिर वही मैदान। उत्तर बंगाल का यह हिस्सा सूखा पठार नहीं था। यह पानी वाला देश था। जो चलता था, वह नदी गिनता था।
तांग शु ने बाद में उस नदी का नाम का-लो-तु लिखा। विद्वान उसे करतोया मानते हैं, कामरूप की पुरानी पश्चिमी सीमा। उसने 642 या 643 के आसपास उसे पार किया। नाम चीनी कान से छना हुआ है। नदी वही है। पश्चिम में एक राज्य खत्म होता था। पूर्व में दूसरा शुरू होता था।
उत्तर बंगाल के ज्ञात नगर से नौ सौ ली कोई अस्पष्ट सजावट नहीं है। यह मार्च का अनुमान है। यह राज्य का पश्चिमी द्वार वहीं रखता है जहाँ बाद की असमिया स्मृति भी रखती है। एक नदी जो एक गीले मैदान को दूसरे से बाँटती थी।
उस पार राज्य शुरू हुआ। वह भटका तीर्थयात्री बनकर नहीं आया। दूत पहले ही उसका नाम ले चुके थे। दरबार जानता था कि वह आ रहा है। पार करना आखिरी साधारण मील था। उसके बाद हर भोजन और हर सवाल उसी राजा का था जिसने उसे बुलाया था।
नदी केवल भूगोल नहीं थी। नदी दरवाजा थी। जो नाव से उतरता था, वह अब कामरूप की नजर में था। करतोया के पश्चिम वह नालंदा का विद्यार्थी रह सकता था। करतोया के पूर्व वह कुमारराज का मेहमान बन गया।
दस हजार ली में नापा गया राज्य
उसने लिखा कि कामरूप देश लगभग दस हजार ली की परिधि का है। बाद के पाठकों ने इस आंकड़े को ब्रह्मपुत्र घाटी, सुरमा घाटी, तथा उत्तर बंगाल और मैमनसिंह के कुछ भागों तक पढ़ा है। वृत्तांत के परिधि आंकड़े गोल और उदार होते हैं। फिर भी आशय साफ है।
वह किसी पहाड़ी जेब का वर्णन नहीं कर रहा था। वह नदी मोड़ के एक किले का वर्णन नहीं कर रहा था। वह एक बड़े वर्षा राज्य का वर्णन कर रहा था जिसकी नाप की जा सकने वाली सीमा थी। पश्चिम में नदी। पूर्व में पहाड़। बीच में खेती योग्य निचली भूमि।
दस हजार ली का मतलब यह नहीं कि उसने खुद चारों ओर घूमकर रस्सी डाली। मतलब यह है कि उसने पूछा, सुना, और एक बड़ा आकार लिखा। विदेशी भिक्षु के लिए आकार राजनीतिक बात है। छोटा राज्य मेहमान रखता है। बड़ा राज्य दूत भेजता है, हाथी चलाता है, और कन्नौज से संधि करता है।
तीस ली की राजधानी
राजधानी, उसने कहा, लगभग तीस ली की परिधि की थी। उस नगर को प्रायः पुराने प्राग्ज्योतिषपुर से जोड़ा जाता है, आज के गुवाहाटी के प्रदेश में। तीस ली कन्नौज जैसा विशाल साम्राज्य नगर नहीं है। यह काम करने वाली राजधानी है।
दीवारें। जल। बाजार। मंदिर। और एक ऐसा महल जो विदेशी मेहमान को एक महीना रख सके। यहाँ आकार काम का प्रमाण है। इतनी छोटी राजधानी भी हाथी रख सकती है। ताम्रपत्र निकाल सकती है। चित्र वाले बक्सों के साथ पश्चिमी सम्राट के पास दूत भेज सकती है।
सातवीं सदी की शक्ति हमेशा महानगर नहीं दिखती थी। कभी वह नदी के नगर जैसी दिखती थी जो सेना पालना और विद्वान का सत्कार करना जानता हो। करतोया पार करने के बाद ह्वेनसांग इसी नगर की ओर बढ़ा। पुस्तिका पहले नदी नापती है। फिर देश नापती है। फिर राजधानी नापती है। नापने वाला आदमी पहले सीमा देखता है। सीमा करतोया थी।
नीची भूमि, समृद्ध भूमि, नियमित फसल
कटहल, नारियल, और नगरों के चारों ओर जल
भूमि, उसने लिखा, नीची है पर समृद्ध है और नियमित रूप से जोती जाती है। यह एक वाक्य प्रशंसा के एक पृष्ठ से ज्यादा काम करता है। नीची और नम। नियमित फसल। जंगल नहीं। काटने और जलाने वाला सीमांत नहीं। बसा हुआ कृषि देश।
नीची भूमि का अर्थ है पानी रुकता है। मानसून आता है तो मैदान भरता है। जो राज्य यहाँ टिकता है, वह बाढ़ से भागता नहीं। वह नाले बनाता है। तालाब बाँधता है। फसल का हिसाब रखता है। ह्वेनसांग ने यही देखा। भूमि गीली है, फिर भी नियमित जोती जाती है। यानी किसान जानता था कि कब बोना है। राज्य जानता था कि कर कहाँ से आएगा।
वे कटहल यानी पनस और नारियल यानी नारिकेल खूब उगाते थे। पेड़ बहुत थे और फिर भी बहुमूल्य माने जाते थे। उसने दोनों फलों के नाम लिखे। यह उस आदमी की आदत है जो देखता है कि लोग मेज पर क्या रखते हैं और बाग में क्या बचाते हैं। बहुत होना और मूल्यवान होना एक साथ कम मिलता है। कामरूप में दोनों मिले। इसलिए उसने केवल पेड़ नहीं गिने। उसने बताए कि पेड़ पूजे जाते हैं।
नदियों और बाँध कर बनाए तालाबों से जल नगरों के चारों ओर ले जाया जाता था। सिंचाई बाद की सोची हुई चीज नहीं थी। वह बस्तियों के पास बहती थी। खाई। नाला। जलाशय। नगर पानी से घिरा रहता था क्योंकि नगर पानी से डरता भी था और पानी से जीता भी था। जो राज्य अनाज में कर लेता है, वह ऐसे नगर चाहता है जो डूबें नहीं।
जलवायु कोमल और सम थी। मध्य एशिया की सर्दी पार करने वाले आदमी के लिए यह राहत थी। भारत के मैदान की गर्मी पार करने वाले आदमी के लिए यह संतुलन था। वह ऐसी घाटी लिख रहा था जो दरबार पाल सके। हाथियों की सेना पाल सके। आने वाले विद्वानों को भी पाल सके। मौसम के बीच भूखे न रह जाए। समृद्ध भूमि राजनीतिक भूमि होती है। नियमित फसल छाल की पांडुलिपि का खर्च उठाती है। उसे ढोने वाले दूत का भी।
तीस ली की राजधानी उसी गीली समृद्धि में बैठी थी। इसे प्रायः प्राग्ज्योतिषपुर कहा जाता है, आज के गुवाहाटी के प्रदेश में। तीस ली कन्नौज नहीं है। यह काम करने वाली राजधानी है। दीवारें। जल। बाजार। मंदिर। और एक महल जो विदेशी मेहमान को एक महीना रख सके।
नगरों के चारों ओर जल का अर्थ केवल सुंदरता नहीं था। अर्थ था योजना। बाढ़ आएगी। नहर चलेगी। नाव लगेगी। हाथी पीएगा। रसोई जल मांगेगी। जो राजा यहाँ बैठता था, वह सूखे किले से नहीं बोलता था। वह नदी और तालाब वाले नगर से बोलता था। इसी नगर से वह कन्नौज को अगरु की छाल पर लिखा लेख भेज सकता था। इसी नगर से वह नालंदा को हाथियों की धमकी भी भेज सकता था। दोनों काम एक ही आधार से आते थे। गीले खेत। लकड़ी। युद्ध के हाथी।
चीन की ओर पहाड़, दक्षिण-पूर्व की ओर हाथी
खेती वाले केंद्र के पूर्व में भूमि पहाड़ियों में उठती थी। वहाँ बड़े नगर नहीं थे। समृद्ध घाटी यहीं तक घनी थी। उसके बाद पहाड़ शुरू होते थे। सीमा दक्षिण-पश्चिम चीन के यी, मान और लाओ लोगों से लगती थी। रीतियाँ, उसे बताया गया, मान लोगों जैसी हैं।
स्थानीय लोगों ने कहा कि दो महीने की यात्रा से शु यानी सिचुआन तक पहुँचा जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि लगभग कोई क्यों नहीं जाता। पहाड़ और नदियाँ रास्ता रोकते हैं। विषैली हवा। जहरीले वाष्प। घातक साँप। नाशक वनस्पति। मृत्यु के कारण रास्ते पर बिखरे रहते हैं। पुस्तिका का नक्शा उसी चेतावनी पर रुक जाता है। कामरूप चीन की ओर देखता था। सुरक्षित चलकर वहाँ पहुँच नहीं सकता था। पूर्व में दीवार भूगोल ने खड़ी की थी।
राज्य के दक्षिण-पूर्व में जंगली हाथियों के झुंड जंगलों में घूमते थे। इसलिए, उसने लिखा, उस प्रदेश में उन्हें मुख्यतः युद्ध में काम में लाते हैं। दरबार के पास मजबूत गजसेना थी। यह रोमान नहीं था। यह सैन्य पूँजी थी। गीली भूमि अनाज देती थी। जंगल हाथी देते थे। दोनों मिलकर राजा को गंगा तक बराबरी से चलने देते थे।
जब भास्करवर्मन बाद में पश्चिम बढ़ा, वह पैदल याचक नहीं था। वह उन हाथियों में से पाँच सौ पर कवच पहनाकर चला। दक्षिण-पूर्व के जंगल उस सवारी की व्याख्या करते हैं। नीची भूमि केवल खेत नहीं थी। वह राज्य का भंडार थी। नियमित फसल बिना हाथियों की सेना भूखी रहती। हाथियों की सेना बिना नियमित फसल खड़ी नहीं रहती। ह्वेनसांग ने दोनों को एक ही देश में देखा। इसलिए उसने लिखा, भूमि नीची है, समृद्ध है, नियमित जोती जाती है।
पुस्तिका में लिखे लोग
छोटा कद, गहरा पीला रंग, गंभीर विद्यार्थी
लोग, उसने लिखा, छोटे कद के हैं और रंग गहरा पीला है। स्वभाव सरल और ईमानदार है। प्रकृति उतावली या जंगली है। स्मरण शक्ति अच्छी है। वे अध्ययन में गंभीर हैं।
यह सावधान चित्र है, व्यंग्य चित्र नहीं। उसने उन्हें बर्बर नहीं कहा। संत भी नहीं कहा। उसने ईमानदारी और जंगलीपन को एक ही अनुच्छेद में रखा और दोनों को खड़ा रहने दिया। उसने लिखा कि भाषा मध्य भारत से थोड़ी ही भिन्न है। मगध से आया आदमी समझा जा सकता था। जो चीनी भिक्षु मध्य देश की बोली पहले सीख चुका था, वह पूर्व की बातचीत चुप बैठे बिना समझ सकता था। दूर देशों के विद्वान उसी दरबार में बैठकर सुने जा सकते थे। पुस्तिका वाणी को राजनीतिक तथ्य मानती है। जिस राज्य की भाषा गंगा के पास की भाषा के करीब हो, वह गंगा की कूटनीति में बैठ सकता है।
सौ देव मंदिर और कोई विहार नहीं
धर्म का वर्णन भी उतना ही सादा है। वे देवों की आराधना और बलि करते थे। बुद्ध में उनकी श्रद्धा नहीं थी। इसलिए जब से बुद्ध जगत में आए तब से उस समय तक पुरोहितों के एकत्र होने के लिए एक भी संघाराम नहीं बना था। देव मंदिर लगभग सौ थे। विभिन्न पंथों के अनुयायी कई हजार थे।
शुद्ध श्रद्धा वाले थोड़े से शिष्य छिपकर प्रार्थना करते थे, बस इतना ही। उसने कोई छिपा बौद्ध साम्राज्य नहीं गढ़ा। उसने उलटा लिखा, और वही ईमानदारी इस पृष्ठ की बात है। जिस तीर्थयात्री का पूरा जीवन संघ था, उसने संघ की अनुपस्थिति दर्ज की। मेजबान को खुश करने के लिए उसने उसे नरम नहीं किया।
सार्वजनिक आस्था खुले में, बौद्ध धर्म छिपकर
सार्वजनिक आस्था देवों की पूजा और बलि का धुआँ थी। निजी आस्था, थोड़े लोगों की, बुद्ध का नाम था जो दृष्टि से दूर दोहराया जाता था। राजा स्वयं बौद्ध नहीं था। फिर भी वह विद्वान श्रमणों का आदर करता था। सार्वजनिक पूजा और निजी शिष्टाचार के बीच की यही दरार यात्रा संभव बनाती है। सौ मंदिर बनाने वाला दरबार भारत का सबसे अच्छा आगंतुक विद्वान अपने छत के नीचे चाह सकता था। मंदिर क्षितिज समझाते हैं। छिपी प्रार्थनाएँ बताती हैं कि कुछ लोग मेहमान का काम पहले से जानते थे। राजा का आदर बताता है कि मेहमान उपेक्षित क्यों नहीं हुआ, ठहराया क्यों गया।
कुमार भास्करवर्मन, वह युवा जो पूर्व पर राज्य करता था
सूर्य-कवच, ब्राह्मण राजा, विद्या का प्रेमी
राजा का नाम भास्करवर्मन था। अर्थ है सूर्य-कवच। उपाधि थी कुमार, युवा। वह ब्राह्मण वर्ण का था, नारायण-देव की पुरानी पंक्ति का। जब से इस कुल ने भूमि ली और शासन ग्रहण किया, लोग कहते थे, तब से इस राजा तक एक हजार पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं। वह वर्मन वंश का अंतिम बड़ा शासक था। वह अविवाहित राजा था। चीनी विवरण में कोई रानी नहीं बैठती। जिस दरबार ने तीर्थयात्री को लिया, वह एक आदमी की किताबों और मेहमानों की रुचि के चारों ओर इकट्ठा था।
जब भिक्षु पहुँचा, कुमारराज ने पहले बात की। यद्यपि मैं स्वयं प्रतिभाहीन हूँ, उसने कहा, मैं सदा विशिष्ट विद्या वाले पुरुषों का प्रेमी रहा हूँ। आपकी कीर्ति सुनकर मैंने आपको यहाँ बुलाने का साहस किया। ह्वेनसांग ने उत्तर दिया कि उसकी प्रज्ञा साधारण है और उसे आश्चर्य है कि उसकी मामूली ख्याति इतनी दूर चली गई। शिष्टाचार औपचारिक है। उसके नीचे एक तथ्य है। राजा ने विद्वान का दो राज्यों तक पीछा किया था और यह दिखावा नहीं किया कि उसने यह विद्या के सिवा किसी और कारण से किया।
वह विद्या का प्रेमी था। प्रजा भी उसकी नकल में वैसी ही थी। दूर प्रदेशों के उच्च प्रतिभा वाले पुरुष परदेशी बनकर उसके राज्य में आते थे। जो दरबार अपने राजा की पढ़ने की आदत की नकल करे, वह चीनी तीर्थयात्री को बिठा सकता है और उससे तांग सम्राट के बारे में पूछ सकता है। ऊपर का शौक नीचे आदत बन जाता है। इसी तरह सुदूर पूर्वी राजधानी उन विद्वानों से भर गई जो वहाँ पैदा नहीं हुए थे।
अगरु की छाल और चित्रित बक्सों के उपहार
कन्नौज के हर्षवर्धन के साथ गौड़ के शशांक के विरुद्ध संधि पहले ही हो चुकी थी। भिक्षु के आने तक यह पुराना सौदा था। बाणभट्ट ने पहला संपर्क लिखा। दूत हंसवेग उपहार लेकर गया। उनमें यह सामग्री थी:
- पके खीरे के रंग की अगरु छाल पर लिखा महीन लेख।
- चित्र के डिब्बे।
- कुंचियाँ।
- तुम्बियाँ।
यह पहाड़ी मुखिया का सामान नहीं है। यह साक्षर दरबार का सामान है जो पांडुलिपियाँ बनाता था और चाहता था कि उन्हें सराहा जाए। पके खीरे के रंग की छाल वही विवरण है जो राजकवि रखता है। यह वस्तु का तथ्य भी है। कामरूप ने लेख मित्रता के रूप में भेजा।
एक दरबार जो पश्चिम में कन्नौज देखता था और पूर्व में चांगआन
निधनपुर के ताम्रपत्र कर्णसुवर्ण के विजयी शिविर से निकले। वे ब्राह्मण परिवारों को दिए पुराने भूमिदान का नवीकरण हैं और वर्मन कुल की वंशावली रखते हैं। भास्करवर्मन की 643 की मुहर नालंदा में हर्ष की मुहरों के साथ मिली। ताँबा और मिट्टी दोनों लेखकों की बात की पुष्टि करते हैं। कामरूप का राजा उत्तर भारतीय राजनीति के किनारे का दर्शक नहीं था। वह कमरे में था। उसने जीते हुए पश्चिमी प्रदेश के शिविर से आदेश दिए और मगध के सबसे बड़े विहार की मिट्टी में अपना नाम छोड़ दिया।
राजा पहले से महाचीन के त्सिन राजा का प्रचलित गीत जानता था। भारत के राज्यों में, उसने कहा, बहुत लोग उन विजयों के गीत गाते हैं। मैं बहुत पहले से सुनता आया हूँ। क्या सच है कि यही आपका सम्मानित जन्मस्थान है। ह्वेनसांग ने कहा कि हाँ, और गीत उसके स्वामी के गुण गाते हैं। कुमारराज ने कहा कि वह उस देश की रीति और व्यवस्था का सदा आदर करता रहा है। मैं बहुत काल से पूर्व की ओर देखता रहा हूँ, उसने कहा, पर बीच के पहाड़ और नदियाँ स्वयं जाने से रोकती रही हैं।
उसने तांग सम्राट के बारे में उसी तरह पूछा जैसे एक राजा दूसरे राजा के बारे में पूछता है। वह संधि और युद्ध के लिए पश्चिम में कन्नौज देखता था। वह घातक पहाड़ियों के पार पूर्व में उस दरबार की ओर देखता था जिसे उसने कभी देखा नहीं था और जिसे समझना फिर भी चाहता था। बाद में वह ताओ-ते-चिंग का संस्कृत अनुवाद चाहता था और लाओजी का चित्र। ब्रह्मपुत्र घाटी का शैव राजा लाओजी माँगे, यह चमत्कार नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि उसकी जिज्ञासा अगली नदी के पार तक जाती थी। वह दो महीने में शु तक सुरक्षित नहीं चल सकता था। वह उसी दिशा से एक पुस्तक और एक चेहरा माँग सकता था।
राजधानी में एक महीना, फिर पश्चिम की सड़क
संगीत, भोज, और मेहमान का घर
ह्वेनसांग लगभग एक महीना रहा। राजा प्रतिदिन संगीत और भोज रखता था, फूल और धूप की धार्मिक भेंट के साथ। मेहमान के लिए विशेष निवास तय था। भिक्षु महल के कोने में नहीं छोड़ा गया। उसे दरबार के सामने उस व्यक्ति के रूप में दिखाया गया जिसे राजा ने विहार धमकाने जितना चाहा था।
महीना खाली अनुष्ठान नहीं था। दोनों चीन की बात करते थे। राजा ने सुना कि शीलादित्य राज तब कजूघिर देश में है, बड़ी दान-सभा करने और पाँचों इंडी की विद्वत्ता बटोरने वाला है। उसने अब मुझे बुलाया है, कुमारराज ने कहा। प्रार्थना है कि आप मेरे साथ चलें। कामरूप की यात्रा पहले ही पश्चिम की साझी यात्रा बनने लगी थी।
उसने वर्षा और ठंड से बचने के लिए केवल एक चर्म टोपी ली। सोना और रेशम ठुकरा दिए। इन्कार का विवरण मायने रखता है। जो तीर्थयात्री खजाना नहीं लेता, उसे खरीदना कठिन है और उस पर विश्वास आसान है। भास्करवर्मन ने सरकारी अनुरक्षण का प्रस्ताव रखा यदि तीर्थयात्री गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा से दक्षिण समुद्री मार्ग चुने। पश्चिमी बुलावा आने के समय भी यह प्रस्ताव मेज पर था। पूर्व का राजा पानी से विदा करने को तैयार था यदि मेहमान पानी चुने।
वह मेरा सिर ले सकता है
फिर हर्ष ने तीर्थयात्री को तुरंत माँगा। वह तट की ओर अभियान कर कजूघिर लौट रहा था, राजमहल के पास काजांगल। वह चीनी धर्म के आचार्य को अपनी सभा में चाहता था। भास्करवर्मन के नाम संदेश सीधा था। चीन के पुरोहित को अभी भेजो।
भास्करवर्मन को यह सुर पसंद नहीं आया। उसने उत्तर दिया कि हर्ष उसका सिर ले सकता है पर धर्म के आचार्य को अभी नहीं ले सकता। गर्वीला वाक्य था। खतरनाक भी था। हर्ष ने सेवकों को बुलाकर कहा कि कुमारराज उसे तुच्छ समझता है। अगला संदेश और छोटा था। सिर भेजो। कामरूप के राजा ने फिर सोचा। शशांक के विरुद्ध संधि उसे पहले सिखा चुकी थी कि हर्ष के क्रोध की कीमत क्या होती है। उसने हाथियों और नौकाओं की बड़ी शक्ति सजाई, तीर्थयात्री को साथ लिया, और मिलन स्थल के लिए गंगा ऊपर चला। गर्व ने पहले बात की। हिसाब दूसरे क्रम में चला।
गंगा के दो तटों पर दो राजा
वे काजांगल के पास मिले और मन बनाए। भास्करवर्मन ने तीर्थयात्री को उत्तर तट के चलते मंडप में छोड़ा और मंत्रियों के साथ स्वयं हर्ष से मिलने गया। अभिवादन शिष्ट था। प्रश्न तुरंत था। चीनी पुरोहित कहाँ ठहरा है। जो झगड़ा एक सिर को लेकर था, वह एक ही दोपहर में साझी यात्रा बन गया।
फिर दोनों राजा समानांतर चले। हर्ष गंगा के एक तट पर लाखों की भीड़ के साथ बढ़ा। भास्करवर्मन दूसरे तट पर पाँच सौ कवचधारी हाथियों और हजारों अनुयायियों के साथ बढ़ा। नदी बीच में रही। वे कदम मिलाकर चले। मेहमान उस प्रदर्शन के मध्य बैठा रहा जो दिखाता था कि दो दरबार साथ चल सकते हैं बिना एक दूसरे को निगले। उस सदी में समानता दो पंक्तियों और एक धारा जैसी दिख सकती थी।
कन्नौज में इंद्र और ब्रह्मा
644 की कन्नौज सभा में बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा बड़े हाथी पर छत्र के नीचे चली। हर्ष इंद्र का वेश धरे एक ओर छत्र लिए चला। भास्करवर्मन ब्रह्मा का वेश धरे दूसरी ओर सफेद चँवर हिलाता चला। अठारह सामंत राजा उपस्थित थे। राजकुमार, मंत्री और प्रमुख पुरोहित लगभग तीन सौ हाथियों पर दोहरी पंक्ति में चले, चलते गाते हुए। धर्म के आचार्य को हाथी पर बिठाकर राजाओं के पीछे स्थान दिया गया।
बाद में वही मंडली प्रयाग में नदियों के बीच महादान के लिए इकट्ठी हुई। हर्ष भंडार खाली करता रहा। भास्करवर्मन उसी मैदान में खड़ा रहा। वेश नाटक थे। राजनीति नहीं थी। कामरूप का राजा ब्रह्मा की भूमिका में कन्नौज के राजा के इंद्र रूप के साथ खड़ा था। उत्तर भारत देख रहा था। चीनी भिक्षु देख रहा था और लिख रहा था।
ह्वेनसांग ने घर जाते दक्षिण समुद्री मार्ग नहीं लिया, यद्यपि डेल्टा से अनुरक्षण का प्रस्ताव बना रहा। वह उन्हीं स्थल मार्गों की ओर मुड़ा जिन्हें वह जानता था। राजा सोना, चाँदी और सूती वस्त्र थमाते रहे। उसने मार्ग जितना चाहिए लिया, शेष छोड़ दिया। 645 में वह चांगआन पहुँचा और राज्यादेश के अधीन महान तांग के पश्चिमी प्रदेशों का वृत्तांत लिखने लगा।
हर्ष की मृत्यु के बाद भी वर्मन राजा वांग श्वानत्से के चीनी मिशन से व्यवहार करता रहा। वंश उसी पर समाप्त हुआ। जो विवरण यहाँ काम का है उसमें कोई पुत्र नामित नहीं है। पुस्तिका वंश से अधिक जीवित रही। अच्छे मैदानी नोटों का यही हाल होता है। राजा मरते हैं। पन्ने चलते हैं।
कामरूप के देव मंदिरों का विवरण
ह्वेनसांग ने कामरूप के मंदिरों की सूची नहीं बनाई। उसने मूर्ति की ऊँचाई नहीं नापी। उसने किसी मंदिर का नाम नहीं लिखा। उसने जो लिखा, वह गिनती और आदत है। लगभग सौ देव मंदिर। देवों की आराधना और बलि। बुद्ध में सार्वजनिक श्रद्धा नहीं। बुद्ध के समय से उस दिन तक एक भी संघाराम नहीं। जो थोड़े बौद्ध हैं, वे छिपकर प्रार्थना करते हैं। विभिन्न पंथों के अनुयायी कई हजार।
यही साक्ष्य है। इससे आगे जो नाम जोड़े जाएँ, वे बाद की कथा हैं, 643 का दृश्य नहीं।
सौ मंदिर का अर्थ
सौ एक गोल आंकड़ा है। कन्नौज या मगध में वह अक्सर विहार भी गिनता था, स्तूप भी गिनता था, सूर्य और महेश्वर के मंदिर अलग नाम से लिखता था। कामरूप में वह वैसा नहीं करता। यहाँ विहार नहीं था, इसलिए पृष्ठ का केंद्र देव मंदिर बन जाता है। सार्वजनिक आकाश देवों का था। बौद्ध प्रार्थना निजी थी।
देव मंदिर का मतलब पत्थर का एक ही रूप नहीं। उस सदी में देवस्थान यज्ञशाला भी हो सकता था। ग्राम का छोटा मंदिर भी। राजधानी का बड़ा प्रासाद भी। ह्वेनसांग इनमें फर्क नहीं करता। वह केवल इतना कहता है कि लोग देवों को पूजते हैं, बलि देते हैं, और ऐसे स्थान लगभग सौ हैं।
बलि शब्द हल्का नहीं है। वह पूजा को केवल आरती नहीं बताता। वह कर्मकांड बताता है। अग्नि। पशु या नैवेद्य। पुरोहित। वह दृश्य संघाराम के विपरीत है। संघाराम में भिक्षु इकट्ठा होते हैं। देव मंदिर में देव को अर्पित किया जाता है। कामरूप में पहला नहीं बना। दूसरा फैला हुआ था।
राजा का धर्म, मंदिर का मौसम
भास्करवर्मन बौद्ध नहीं था। कुल नारायण-देव की पुरानी पंक्ति से जोड़ा गया। वह ब्राह्मण वर्ण का कहा गया। विद्या का प्रेमी था। विद्वान श्रमण का आदर करता था। आदर का अर्थ धर्मांतरण नहीं। आदर का अर्थ मेहमान को घर देना है। मंदिर उसी राजा के राज्य में खड़े थे। मेहमान उन्हीं मंदिरों के बीच एक महीने रहा।
निधनपुर के ताम्रपत्र मंदिर का भ्रमण नहीं हैं। वे भूमिदान हैं। फिर भी वे दरबार का स्वर बताते हैं। पत्र की शुरुआत चंद्रमौलि शिव को प्रणाम से होती है। पिनाकधारी। भस्म से विभूषित। फिर परमेश्वर के उस रूप की जय है जिसने दृष्टि मात्र से काम को भस्म किया। वंश नारक और भगदत्त से चलता है, चक्रधारी विष्णु की कथा से जुड़ता है। ब्राह्मणों को ग्राम दिए गए। वैदिक गोत्र गिने गए। कुछ अंश अनंत नारायण की पूजा और सत्र के लिए भी रखे गए बताए जाते हैं।
इससे एक तस्वीर बनती है। सार्वजनिक धर्म शैव और वैदिक था। कुल की कथा नारायण से जुड़ी थी। राज्य ब्राह्मण बसाता था। ह्वेनसांग का सौ मंदिर इसी मौसम में बैठता है। वह कामाख्या का वर्णन नहीं करता। वह नीलाचल की सीढ़ी नहीं चढ़ता। 643 में जो आँख है, वह केवल इतना देखती है कि देवस्थान बहुत हैं, संघाराम नहीं हैं।
जो वह नहीं देखता
वह मंदिर की सामग्री नहीं बताता। काठ है या पत्थर, यह नहीं कहता। गर्भगृह कैसा है, यह नहीं कहता। पुरोहित किस शाखा के हैं, यह नहीं कहता। शक्तिपीठ की सूची नहीं देता। कालीपुरान और योगिनी तंत्र बाद के ग्रंथ हैं। उनमें कामरूप पर्वत, कुंड और नदी के रूप में देवों का देश बन जाता है। वह देश ह्वेनसांग की पुस्तिका नहीं है।
यह कमी दोष नहीं है। भिक्षु बौद्ध भूगोल लिख रहा था। जहाँ विहार होता, वह रुकता। जहाँ विहार नहीं होता, वह एक वाक्य में धर्म का रंग लिख देता। कामरूप में रंग देव मंदिरों का था। इसलिए पृष्ठ छोटा है। छोटा पृष्ठ ईमानदार है।
छिपी प्रार्थना का मतलब
सौ मंदिर के बीच थोड़े लोग बुद्ध का नाम दोहराते थे। वे शुद्ध श्रद्धा वाले कहे गए। स्थान नहीं दिया गया। विहार नहीं मिला। इसका अर्थ यह नहीं कि बौद्ध धर्म पूरी तरह गायब था। अर्थ यह है कि वह सार्वजनिक भवन नहीं बन सका। देव मंदिर खुले थे। बौद्ध पाठ बंद कमरे में था। राजा श्रमण का सत्कार कर सकता था। प्रजा का बहुमत देवों के पीछे था।
यही तनाव यात्रा को समझाता है। भास्करवर्मन ने नालंदा से भिक्षु मँगाया। राज्य में संघाराम नहीं था। मेहमान देव मंदिरों वाले नगर में ठहरा। संगीत और धूप चले। बौद्ध सभा का नगर यह नहीं था। विद्या का नगर यह था।
कन्नौज के बाद की तुलना
कन्नौज में हर्ष बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा हाथी पर ले गया। भास्करवर्मन ब्रह्मा बना, चँवर हिलाया। वह दृश्य कामरूप का रोज का दृश्य नहीं था। वह पश्चिम की सभा का वेश था। घर लौटकर ह्वेनसांग ने कामरूप को फिर वही लिखा जो पहले देखा था। सौ देव मंदिर। कोई संघाराम नहीं। यात्रा के नाटक ने उस गिनती को नहीं मिटाया।
आज इस विवरण की कीमत
कामरूप के देव मंदिरों का सातवीं सदी वाला चित्र नामों से नहीं भरता। वह अनुपस्थिति से भरता है। विहार की अनुपस्थिति। सार्वजनिक बुद्ध पूजा की अनुपस्थिति। और देवस्थानों की बहुलता। जो बाद में कामाख्या, उमानंद या अन्य पीठों की कथा जोड़ता है, वह अलग इतिहास है। ह्वेनसांग का वाक्य केवल इतना है।
वे देवों की आराधना और बलि करते हैं। मंदिर लगभग सौ हैं। पंथ कई हजार अनुयायी रखते हैं। संघाराम कभी नहीं बना। थोड़े शिष्य छिपकर प्रार्थना करते हैं। राजा बौद्ध नहीं है, श्रमण का आदर करता है।
यही कामरूप के देव मंदिरों का विवरण है जो 643 की पुस्तिका दे सकती है। बाकी टीका है। मंदिर खुले थे। विहार नहीं था। भिक्षु ने यही देखा, और यही लिख गया।
योगिनी तंत्र की विस्तृत समीक्षा
नाम से भ्रम मत खाना। बौद्ध वज्रयान में भी योगिनी तंत्र नाम की एक श्रेणी है, मातृ तंत्रों के भीतर। वह ग्रंथ यह नहीं है। यह पूर्वोत्तर भारत का शाक्त ग्रंथ है। काली और कामाख्या की उपासना का। अज्ञात लेखक। रचनास्थल असम या कूचबिहार। संवाद शिव और पार्वती का।
यह कालीपुरान की अगली पीढ़ी है। कालीपुरान कामरूप को पीठ बनाता है। योगिनी तंत्र उस पीठ को घर घर फैलाता है। प्रसिद्ध वाक्य यही कहता है। अन्यत्र देवी दुर्लभ हैं। कामरूप में घर घर हैं।
रचनाकाल और स्थान
परंपरा इसे अनादि और शिव-प्रोक्त मानती है। इतिहास इसे मध्यकाल के अंत में रखता है। सबसे ठोस संकेत कोच वंश है। ग्रंथ कुवच यानी कोच राजाओं को मेच स्त्री से जन्मा बताता है। विश्वसिंह और नरनारायण सोलहवीं सदी के हैं। इसलिए बहुत विद्वान रचना को सोलहवीं या सत्रहवीं सदी कहते हैं।
कुछ और बाद ले जाते हैं। अध्याय 12 से 14 में अर्ध-ऐतिहासिक कथाएँ हैं। कोई उनमें मीर जुमला के 1662-63 के आक्रमण और अहोम की वापसी तक की गूँज पढ़ता है। अगर वह पाठ मूल है, तो ग्रंथ 1663 के बाद का भी हो सकता है। अगर वह परत बाद में जुड़ी है, तो मूल सोलहवीं सदी का रह सकता है। निष्कर्ष साफ है। यह ह्वेनसांग का ग्रंथ नहीं। यह कालीपुरान का समकालीन भी नहीं। यह कोच-अहोम दुनिया का ग्रंथ है। मंदिर 1565 में फिर उठा, ग्रंथ उसी हवा में लिखा गया।
लेखक का नाम नहीं है। गुरु वंश भी साफ नहीं है। यह तंत्र साहित्य की आम आदत है। अधिकार संवाद से आता है, हस्ताक्षर से नहीं। प्रकाशित पाठों में विश्वनारायण शास्त्री का 1982 का संस्करण महत्त्व रखता है। कई पांडुलिपियाँ भ्रष्ट हैं। अर्थ कई जगह टूटता है। समीक्षा को यह स्वीकार करना चाहिए। हम पूर्ण आदि ग्रंथ नहीं पढ़ रहे। हम बचे हुए, जुड़े हुए, कभी गड़बड़ाए पाठ पढ़ रहे हैं।
आकार और ढाँचा
आम विभाजन दो खंडों का है। पूर्व खंड में लगभग 19 पटल। उत्तर खंड में लगभग 9। कुल लगभग 28 अध्याय। कुछ वर्णनों में उत्तर खंड बड़ा बताया जाता है। संख्या पाठ भेद से बदलती है। स्वर नहीं बदलता। पहले गुरु की महिमा, दीक्षा, मंत्र, आचरण। फिर कामरूप की भूमि, तीर्थ, कामाख्या, काली, योगिनी, वाममार्ग।
तीन नगर बार बार आते हैं:
- काशी।
- गया।
- कामाख्या।
योगिनी तंत्र कामरूप को अकेले द्वीप की तरह नहीं छोड़ता। उसे उत्तर भारत की तीर्थ-पंक्ति में बैठाता है। नदी सूची कालीपुरान से चौड़ी है। नर्मदा और गोदावरी तक नाम आते हैं। क्षितिज बढ़ चुका था। सोलहवीं सदी का लेखक केवल ब्रह्मपुत्र घाटी नहीं देखता। वह अखिल भारतीय शाक्त नक्शा भी देखता है। फिर भी केंद्र नीलाचल ही रहता है।
कालीपुरान से फर्क
यही समीक्षा का सबसे जरूरी द्वार है। दोनों ग्रंथ एक भूमि के हैं। दोनों कामाख्या को सर्वोच्च कहते हैं। कथा अलग है।
कालीपुरान सती की योनि गिराता है। नरक को विष्णु का पुत्र बनाता है। कामाख्या को महामाया से जोड़ता है। वैष्णव चौखट के भीतर शाक्त पूजा बैठती है। राजा की वंशावली और पीठ एक दूसरे को थामते हैं।
योगिनी तंत्र काली को मूल बनाता है। कामाख्या काली से अभिन्न हैं। एक कथा यों चलती है। ब्रह्मा सृष्टि कर अहंकारी हुआ। काली ने केशी दैत्य खड़ा किया। ब्रह्मा और विष्णु भागे। बाद में क्षमा माँगी। काली ने केशी भस्म किया। उस भस्म और तेज से पर्वत और योनिचक्र बना। पीठ काली के तेज से जन्मी, केवल सती के अंग से नहीं।
यह फर्क संयोग नहीं है। सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के पूर्वोत्तर में काली की सार्वजनिक महिमा बढ़ चुकी थी। बंगाल और असम दोनों में। योगिनी तंत्र उसी लहर को कामाख्या तक ले आता है। कालीपुरान जहाँ नरक और विष्णु से राज्य को पवित्र करता है, योगिनी तंत्र काली से पीठ को पवित्र करता है। एक ग्रंथ सिंहासन की भाषा है। दूसरा साधना और देवी-तत्त्व की भाषा है।
किरात धर्म वाला वाक्य भी यहाँ तेज है। कामरूप का पूरा धर्म किरात धर्म कहा गया है। कालीपुरान किरात भूमि को ब्राह्मण व्यवस्था में लाता है। योगिनी तंत्र उस मूल को मिटाता नहीं। वह उसे नाम देता है। स्थानीय देवी शास्त्र में घुली, मूल पूरी तरह गायब नहीं हुई।
पवित्र भूगोल
योगिनी तंत्र कामरूप को चार पीठों में बाँटता है:
- रत्नपीठ
- स्वर्णपीठ
- कामपीठ
- सौमारपीठ
पश्चिम में करतोया। पूर्व में दिक्करवासिनी। उत्तर में कांचनगिरि। दक्षिण में ब्रह्मपुत्र और लक्ष्या का संगम। यह नक्शा ह्वेनसांग के दस हजार ली से मेल खाता है, पर स्वर अलग है। चीनी भिक्षु circumference नापता है। तंत्र तीर्थ नापता है।
नदियाँ, पर्वत, वन, लिंग, कुंड, छोटे देवस्थान:
- मनोधव वन
- कोटिलिंग
- नील पर्वत
बहुत नाम केवल किसी प्रसिद्ध मंदिर के सहारे पहचाने जाते हैं। स्वतंत्र पहचान कठिन है। संस्कृतकरण ने लोक स्थानों को शास्त्रीय नाम दे दिए। धवल पर्वत। भैरवी नदी। गंधमादन। इतिहासकार के लिए यह संपत्ति भी है, जाल भी है। संपत्ति इसलिए कि मध्यकालीन असम अपना नक्शा खुद लिख रहा था। जाल इसलिए कि हर नाम आज की नदी पर ठीक नहीं बैठता।
अर्ध-इतिहास
अध्याय 12 से 14 को कुछ शोधकर्ता अर्ध-ऐतिहासिक कहते हैं। शाप, वंश, राज्य प्राप्ति, कामरूप का अंत और पुनः उदय, भैरव और कुलचार। कथा पुराण की भाषा में है। उसके नीचे कोच और अहोम काल की स्मृति बैठ सकती है। मीर जुमला वाला पाठ अगर प्रामाणिक है, तो ग्रंथ युद्ध के बाद की पीढ़ी का दस्तावेज भी है। मंदिर टूटा, फिर उठा, राज्य हिला, फिर बैठा। तंत्र उसी स्मृति को देव-संवाद बना देता है।
ऐतिहासिक मूल्य यहाँ सीधा नहीं है। राजा की तिथि निकालने के लिए यह पर्याप्त स्रोत नहीं। मानसिकता समझने के लिए यह बहुत काम का है। सोलहवीं-सत्रहवीं सदी का कामरूप अपने को कैसे पवित्र और घायल दोनों मानता था, यह इन्हीं अध्यायों में दिखता है।
साधना का स्वर, समीक्षा की सीमा
ग्रंथ वामचार के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। पंचमकार, दीक्षा, मंडल, गुरु की अनिवार्यता, जाति-बंधन ढीले करना, स्त्री साधिका की स्वतंत्रता के वाक्य। कुल प्रेरणा वाले तंत्रों की यह आम भाषा है। समीक्षा को यहाँ रुकना चाहिए। विधि की नकल इतिहास नहीं है। इतिहास केवल इतना कहता है कि कामाख्या का मध्यकालीन शास्त्र लोकमर्यादा तोड़ने को मोक्ष का द्वार भी कह सकता था, और उसी श्वास में काशी-गया-कामाख्या की तीर्थ मर्यादा भी गा सकता था। तनाव ग्रंथ के अंदर है। उसे छिपाने की जरूरत नहीं। उसे विधि बनाने की भी जरूरत नहीं।
पाठ की कमजोरी
संस्कृत बाद के तंत्र युग की है, कालिदास वाली नहीं। दोहराव है। अध्याय जोड़ जैसे लगते हैं। स्थान सूची कभी ब्रह्मांड बन जाती है, कभी गाँव की पहाड़ी। नरक-कामाख्या की पुरानी कथा बनी रहती है, काली वाली नई कथा उसके ऊपर चढ़ जाती है। यह संकलन की निशानी है। एक लेखक का एक बैठक वाला महाकाव्य कम, पीढ़ियों का जमा तंत्र अधिक।
योगिनी शब्द स्वयं कई परतें रखता है। चौंसठ योगिनी। गर्भगृह की रक्षिकाएँ। कुल की शक्तियाँ। कालीपुरान उन्हें योनि की रखवाली से जोड़ता है। योगिनी तंत्र नाम से पूरा ग्रंथ उन्हीं के लोक में बैठता है। नीलाचल का मंदिर वृत्ताकार योगिनी मंदिर नहीं है। फिर भी पहाड़ी योगिनी केंद्र मानी गई। ग्रंथ उसी मान्यता को शास्त्र देता है।
आज कैसे पढ़ें
योगिनी तंत्र को कालीपुरान का अनुवाद मत समझो। उसे कामाख्या की प्राचीनतम थाती भी मत समझो। उसे सोलहवीं-सत्रहवीं सदी का शाक्त संविधान समझो। भूमि घर घर देवी है। काली और कामाख्या एक हैं। करतोया से दिक्करवासिनी तक पीठ है। कोच वंश कथा में घुसा है। पाठ कहीं टूटा है। इतिहास कहीं देवताओं के कपड़े में छिपा है।
ह्वेनसांग सौ देव मंदिर गिनता है, नाम नहीं लेता। कालीपुरान नाम और नरक देता है। योगिनी तंत्र काली, चार पीठ और घर घर वाली देवी देता है। तीनों एक सीढ़ी हैं। सबसे नीचे आँख का विवरण। बीच में राज्य का पुराण। सबसे ऊपर मध्यकाल का तंत्र। जो प्राचीन इतिहास चाहता है, वह इस सीढ़ी को उलटा न चढ़े। योगिनी तंत्र आखिरी पड़ाव है, पहला नहीं। उसकी कीमत बाद की होने में है। वह बताता है कि कामाख्या केवल खंडहर से उठा मंदिर नहीं रही। वह पूरे कामरूप की भाषा बन चुकी थी।
ह्वेनसांग का महत्त्व कुमार भास्करवर्मन के दरबार में
महत्त्व एक बात में सिमटता है। 642-643 में एक विदेशी विद्वान कामरूप के दरबार में बैठा, जो देखा वही लिखा, और वह पन्ना घर ले गया। बाद की कथा उस पन्ने की जगह नहीं ले सकती।
पूर्वी दरबार लिखित इतिहास में आता है
प्राचीन असम का अधिकतर इतिहास ताम्रपत्र, बाद के पुराण और वंश-स्मृति से जोड़ा जाता है। ह्वेनसांग अलग है। वह दरबारी कवि नहीं था। उसे ग्राम नहीं मिलना था। वह चांगआन से नालंदा तक पैदल आ चुका था। कुमार भास्करवर्मन ने उसे पूर्व बुलाया तो उसने परिधि, राजधानी, फसल, भाषा, मंदिर और राजा का पहला वाक्य लिख लिया।
वह वाक्य काम का है। राजा ने कहा, मैं स्वयं प्रतिभाहीन हूँ, पर विशिष्ट विद्या वाले पुरुषों का सदा प्रेमी रहा हूँ। आपकी कीर्ति सुनकर मैंने बुलाने का साहस किया। सातवीं सदी का ब्रह्मपुत्र घाटी का शासक यहाँ चाटुकार श्लोक में नहीं, अपनी शिष्टता में सुनाई देता है।
कामरूप किनारा नहीं, साझेदार है
पुस्तिका वास्तव में क्या सिद्ध करती है
ह्वेनसांग ने कामरूप लगभग दस हजार ली की परिधि का लिखा। राजधानी लगभग तीस ली की। पुंड्रवर्धन से नौ सौ ली बाद बड़ी नदी पार की। बाद के पाठक उसे करतोया मानते हैं। भूमि नीची, समृद्ध, नियमित जोती हुई। कटहल और नारियल बहुत, फिर भी बहुमूल्य। नदियों और बाँध तालाबों से जल नगरों के चारों ओर। जलवायु कोमल। दक्षिण-पूर्व में युद्ध के हाथी।
लोग छोटे कद के, रंग गहरा पीला, स्वभाव सरल और ईमानदार, प्रकृति उतावली, स्मरण अच्छा, अध्ययन गंभीर। भाषा मध्य भारत से थोड़ी ही भिन्न। अंतिम बात राजनीतिक है। जिस दरबार की जुबान गंगा के मैदान के निकट हो, वह गंगा की कूटनीति में बैठ सकता है।
उसने वह वाक्य भी लिखा जिसे बाद की गर्व-कथा कभी नरम करना चाहती है। बुद्ध में सार्वजनिक श्रद्धा नहीं। बुद्ध के समय से उस दिन तक एक भी संघाराम नहीं बना। जो थोड़े बौद्ध हैं, छिपकर प्रार्थना करते हैं। राजा स्वयं बौद्ध नहीं। विद्वान श्रमणों का आदर करता है।
ईमानदारी यही है। 643 का कामरूप शैव और देव-पूजक राज्य था, जो भारत का सबसे अच्छा आगंतुक विद्वान नाम लेकर माँगता था। विद्या सार्वजनिक थी। बुद्ध सार्वजनिक नहीं थे। यही दरार निमंत्रण और नालंदा की धमकी दोनों को समझाती है। शीलभद्र पहले रोके रहे, तीर्थयात्री हर्ष के लिए है। फिर राजा ने हाथी और सेना की बात कही। विहार झुका। अबौद्ध दरबार भी विद्या बटोरना जानता था।
दरबार दोनों ओर देखता था
भास्करवर्मन महाचीन के त्सिन राजा का गीत पहले से जानता था। तांग सम्राट के विषय में पूछा। पश्चिम में गौड़ के शशांक के विरुद्ध हर्ष से संधि देखी। पूर्व में सिचुआन तक दो महीने का मार्ग सुना, पहाड़, विषैली हवा, साँप और नाशक वनस्पति के कारण घातक। बाद में ताओ-ते-चिंग का संस्कृत अनुवाद और लाओजी का चित्र भी चाहता था।
महत्त्व गुप्त बौद्ध साम्राज्य नहीं है। महत्त्व यह है कि पूर्वी राज्य पहले से उपमहाद्वीप भर सोच रहा था, और गीत तथा प्रश्न में हिमालय के पार भी।
एक महीने के बाद
रहना लगभग एक महीना। संगीत, भोज, धूप, विशेष निवास। ह्वेनसांग ने वर्षा और ठंड के लिए केवल चर्म टोपी ली। सोना और रेशम ठुकरा दिए। राजा ने कहा, समुद्री मार्ग चुना तो डेल्टा से सरकारी अनुरक्षण मिलेगा। भिक्षु स्थल मार्ग से लौटा। 645 में चांगआन पहुँचा और पश्चिमी प्रदेशों का वृत्तांत लिखा।
हर्ष की मृत्यु के बाद भी भास्करवर्मन वांग श्वानत्से के चीनी मिशन से जुड़ा रहा। वर्मन वंश उसी पर समाप्त हुआ। पुस्तिका वंश से अधिक चली।
बाद के रंग से यह पन्ना भारी क्यों है
बाद की सदियाँ मंदिर, तंत्र और नए राजवंश देंगी। कालीपुरान और योगिनी तंत्र कामाख्या का नाम लेंगे, पहाड़ियों को पीठ बनाएँगे। ह्वेनसांग ने वह नाम नहीं लिखा। उसकी कीमत उसी सीमा में है जो उसने स्वीकार की। काम करने वाली राजधानी। गीले खेत। सौ देव मंदिर। कोई विहार नहीं। नारायण-देव की पंक्ति का अविवाहित ब्राह्मण राजा। और गंगा के दो तटों पर कदम मिलाती दो सेनाएँ।
इसीलिए सातवीं सदी के चौथे दशक का कामरूप खाली पूर्व नहीं कहा जा सकता, जो बाद के राज्यों की प्रतीक्षा कर रहा हो। एक अजनबी ने महाद्वीप पार किया, कुमार भास्करवर्मन के दरबार में बैठा, और ऐसा साक्ष्य छोड़ गया जिसे ताँबा, मिट्टी की मुहर और बाणभट्ट आज भी बाहर से पुष्ट करते हैं।
यह साक्ष्य आज भी क्या सिद्ध करता है
पहाड़ी किनारा नहीं, हाथियों और पांडुलिपियों वाला वर्षा राज्य
ह्वेनसांग ने ऐसा पहाड़ी किनारा नहीं लिखा जो बाद के राज्यों की प्रतीक्षा कर रहा हो ताकि उसे आकार मिले। उसने नीची, नम, नियमित जोती भूमि लिखी, कटहल और नारियल की बहुलता, नगरों के चारों ओर ले जाया जल, तीस ली की राजधानी, दस हजार ली की परिधि, दक्षिण-पूर्व के जंगली हाथी, और गंगा पर कवच पहनकर चलने लायक युद्ध गजसेना। उसने राजकीय उपहार बनी अगरु छाल की पांडुलिपियाँ लिखीं। उसने ऐसी भाषा लिखी जो मध्य भारत के इतनी निकट हो कि शास्त्रार्थ चल सके। यह प्रशासन, लेखन विभाग और विदेश नीति वाला वर्षा राज्य है। पश्चिम में द्वार के लिए नदी थी, पूर्व में दीवार के लिए पहाड़ थे, और इतनी बचत थी कि उन सीमाओं के बाहर जन्मे विद्वान भी पल सकें।
शैव दरबार जो फिर भी भारत का सबसे अच्छा आगंतुक विद्वान चाहता था
उसने सौ देव मंदिर और कोई विहार भी लिखा। राजा बौद्ध नहीं था। थोड़े बौद्ध छिपकर प्रार्थना करते थे। फिर भी वही राजा बार बार निमंत्रण भेजता रहा, वांछित विद्वान पाने के लिए बड़े विहार को धमकाया, उसे संगीत और धूप के साथ एक महीना ठहराया, तांग सम्राट के बारे में पूछा, और पहली माँग पर उसे सौंपने के बजाय हर्ष से झगड़े का जोखिम लिया। उस दरबार में विद्या सार्वजनिक मूल्य थी, भले बुद्ध सार्वजनिक देव न हों। श्रमण का आदर धर्म परिवर्तन नहीं माँगता था। वह ऐसे राजा को माँगता था जो जानता हो कि विशिष्ट विद्या एक और स्वर्ण हार से अधिक मूल्य रखती है।
यह पृष्ठ बाद की कथा से अधिक क्यों है
बाद की सदियाँ रंग, राजवंश और वे कहानियाँ जोड़ देंगी जो सातवीं सदी के पृष्ठ में नहीं हैं। इस विवरण की कीमत यही है कि वह वे जोड़ अस्वीकार करता है। वह कद देता है, रंग देता है, फसल देता है, मंदिर देता है, अविवाहित राजा का पहला वाक्य देता है, नदी पार देता है, संगीत का महीना देता है, दो तटों पर दो राजा देता है। बाणभट्ट पके खीरे के रंग की छाल और चित्र के डिब्बे जोड़ता है। निधनपुर के पत्र कर्णसुवर्ण का विजयी शिविर जोड़ते हैं।
साथ मिलकर वे सिद्ध करते हैं कि 640 के दशक का कामरूप उपमहाद्वीप की कूटनीति में पहले से समान साझेदार था। हर्ष प्रसिद्ध है। जो पूर्वी राजा उसके सामने चला, कन्नौज में ब्रह्मा बना, और चीनी भिक्षु से तांग सम्राट के बारे में पूछा, उसे भुलाना आसान रहा है। पुस्तिका उसे नहीं भूलती। वह उसे उसी तरह नापती है जैसे फल के पेड़ को नापती है। उस चीज से जो सावधान अजनबी के देखने पर वहाँ थी।
वह पुस्तिका जो घर लौटी
ह्वेनसांग किताबें, स्मृतियाँ और का-लो-तु नाम की नदी का वर्णन लेकर चांगआन लौटा। सम्राट ताइजॉन्ग पश्चिमी प्रदेशों का विवरण चाहता था। भिक्षु बैठा और देश दर देश वही लिखा जो उसने देखा था। हर दरबार को प्रवचन नहीं बनाया। उसे कामरूप का बौद्ध होना जरूरी नहीं था। राजा का बोधिसत्त्व होना जरूरी नहीं था। उसे भूमि का इतना ठहरना काफी था कि नापी जा सके। परिधि, राजधानी, फसल, मंदिर, वाणी, और उस दरबार का स्वभाव जो विद्या से इतना प्रेम करता था कि अजनबी को नाम लेकर बुलाए।
एक महीना छोटी यात्रा है। कई सदियों तक बचने वाली पुस्तिका लंबी यात्रा है। इसीलिए यह पृष्ठ आज भी काम का है। एक प्रत्यक्षदर्शी ने महाद्वीप पार किया, असम में बैठा, और ऐसा विवरण छोड़ा जिसकी ताम्रपत्र और नालंदा की मुहर आज भी पुष्टि कर सकते हैं। शेष टीका है। घर आई चीज पुस्तिका है।
शैव धर्म कामरूप में अतिथि बनकर नहीं आया। वह उस राज्य के पहले लिखित दरवाजे पर खड़ा था। वंश की कथा नरक और नारायण से चली। शासन की भाषा शिव से चली। ह्वेनसांग ने मंदिर के नाम नहीं लिखे। उसने गिनती लिखी। बाण और ताम्रपत्र ने नाम दिया। कालीपुरान ने जोड़ा बैठाया। कोच और अहोम ने टूटे शिखर पर वही जोड़ा फिर उठाया।
इतिहास का काम यह नहीं कि हर खंडहर को कामाख्या बना दे। काम यह है कि परतें अलग रहें। छठी सदी का द्वारपट एक परत है। सातवीं सदी का सौ देव मंदिर दूसरी है। नवमी सदी का हटाकशूलिन तीसरी है। दसवीं सदी का कामेश्वर-महागौरी चौथी है। 1565 का नीलाचल पाँचवीं है। जो इन परतों को एक नारे में पिघला देता है, वह भक्ति गा सकता है। वह विकास नहीं लिख सकता।
कामरूप का शिव अंत में अकेला नहीं रह गया। वह देवी के बिना अधूरा माना गया। यह हार नहीं है। यह उसी भूमि का स्वभाव है जहाँ लिंग और योनि एक पहाड़ी पर साथ बैठते हैं। पुस्तिका वहीं बंद होती है। मंदिर अभी खुला है।
