आज के दौर की राजनीति देखकर कभी-कभी बहुत हंसी आती है। आज नेताओं को लगता है की Twitter पर दो-चार तीखे पोस्ट कर दिए, या टीवी डिबेट में आकर चिल्ला दिए, तो बस बन गए ‘मास लीडर’!
चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाले इन हवा-हवाई नेताओं को लगता है की राजनीति में बस सामने वाले पर जुबानी हमले कर के पब्लिक का वोट लिया जा सकता है।
लेकिन जब इनका सामना नरेंद्र मोदी नाम के उस सियासी पहाड़ से होता है, तो ये चारों खाने चित्त हो जाते हैं।
और मज़े की बात तो ये है की हारने के बाद भी इस विपक्ष को ये समझ नहीं आता की आखिर मोदी ने उन्हें किस दांव से धो डाला!
विपक्ष को आज तक यही गलतफहमी है की मोदी सिर्फ इसलिए चुनाव जीतते हैं क्योंकि वो बहुत अच्छा बोलते हैं। उन्हें लगता है की मोदी की असली ताकत उनकी भाषणबाज़ी, उनका कैमरा एंगल या उनके कपड़े हैं।
लेकिन असल में नरेंद्र मोदी की ताकत उनका 45 साल का वो भयंकर ज़मीनी तजुर्बा है, जिसने उन्हें हिंदुस्तान के आम आदमी की रग-रग का डॉक्टर बना दिया है।
नरेंद्र मोदी के इस 45 साल के सफर को अगर हम तीन हिस्सों में बांटें, तो ये 15-15-15 साल का एक ऐसा चक्रव्यूह बनता है, जिसे आज का कमजोर विपक्ष भेद ही नहीं पाता।
पहले 15 साल उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक आम प्रचारक के रूप में अपना पूरा जीवन समाज को समझने में झोंक दिया। साइकिलों पर घूमे, बसों के धक्के खाए, अनजान लोगों के घरों में रातें बिताईं और हिंदुस्तान की असली नब्ज़ को टटोला।
इसके बाद अगले 15 साल उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) में संगठन मंत्री के तौर पर काम किया। इन 15 सालों में उन्होंने सीखा की एक पॉलिटिकल पार्टी कैसे खड़ी की जाती है, बूथ मैनेजमेंट क्या होता है, कार्यकर्ताओं के अंदर आग कैसे भरी जाती है और एक चुनावी मशीनरी कैसे काम करती है।
और फिर आखिरी 15 साल (2014 तक) उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता चलाई। वहां उन्होंने सीखा की सरकार कैसे चलती है और नीतियां ज़मीन पर कैसे उतारी जाती हैं।
अब आप खुद सोचिए! जिस इंसान के पास समाज को समझने के 15 साल, पार्टी संगठन को चलाने के 15 साल, और सत्ता चलाने के 15 साल का ऐसा लगातार और अटूट अनुभव हो, उसके सामने ये आज के ‘पैराशूट नेता’ कहां टिकेंगे?
मैं डंके की चोट पर कह सकता हूँ की मोदी और BJP को हराना मुश्किल नहीं है.. जरुरत है तो बस ऐसे विपक्ष की जो जमीनी तौर पे पसीना बहा कर लोगों से जुड़ सके!
आप आज के हिंदुस्तान के विपक्ष के राजनेताओं को देख लीजिए, आपको एक भी ऐसा नेता नहीं मिलेगा जिसके पास ज़मीन से लेकर तख्त तक का ऐसा मुकम्मल अनुभव हो।
1972 से 1987 का वो दौर जब एक मामूली प्रचारक ने गाँव-गाँव की खाक छानकर पढ़ ली थी हिंदुस्तान के आम आदमी की नब्ज़
शुरुवात करते हैं मोदी जी के बचपन से। 17 सितंबर 1950 को गुजरात के एक छोटे से कस्बे वड़नगर के एक बेहद गरीब घांची (OBC) परिवार में नरेंद्र का जन्म हुआ था।
जब आज के कई एलीट नेताओं के बाप-दादा दिल्ली के सत्ता के गलियारों में राज कर रहे थे, तब बचपन में नरेंद्र अपने पिता दामोदरदास के साथ वड़नगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेच रहे थे। गरीबी को उन्होंने अपनी हड्डियों में महसूस किया था।
बचपन से ही स्वामी विवेकानंद के विचारों का उनपर ऐसा गहरा असर पड़ा की महज 8 साल की उम्र में वो संघ की शाखाओं में जाने लगे थे।
आपको जानकर हैरानी होगी की 1965 की भारत-पाक जंग के दौरान यही लड़का रेलवे स्टेशन से गुज़रने वाले फौजी जवानों को दौड़-दौड़ कर चाय पिलाने का काम करता था।
नरेंद्र पर देश को जानने की ऐसी धुन सवार हुई की महज़ 17 साल की उम्र में उसने अपना घर-बार छोड़ दिया और संन्यासियों की तरह हिमालय की कंदराओं से लेकर बेलूर मठ तक देश की असलियत को खंगालने निकल पड़ा।
हिमालय की इसी यात्रा से लौटने के बाद, असली कहानी शुरू होती है 1972 से। वापस लौटकर नरेंद्र ने पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को अपना जीवन सौंप दिया।
एक प्रचारक बनना कोई 9 से 5 की सरकारी नौकरी नहीं होती! इसमें ना बैंक बैलेंस होता है, ना परिवार, और ना ही कोई सुख-सुविधा।
झोले में दो जोड़ी कपड़े, सुबह उठकर शाखा लगाना, अपने कपड़े खुद धोना, और फिर निकल पड़ना अनजान रास्तों पर। मोदी ने लगातार 15 साल यही किया।
इसी दौर में एक ऐसी घटना घटी जिसने मोदी को अंदर से फौलाद बना दिया और उनके अंदर वो धैर्य पैदा किया जो आज विपक्ष को परेशान कर देता है।
वो था 1975 का वो काला दौर, जब इंदिरा गांधी ने देश पर ‘आपातकाल’ (Emergency) थोप दिया था। उस वक्त संघ पर पूरी तरह से बैन लगा दिया गया था। पुलिस और प्रशासन चुन-चुन कर संघ के नेताओं को जेल में ठूंस रहे थे।
लेकिन इस खौफनाक माहौल को युवा नरेंद्र मोदी ने खुद को तराशने के लिए इस्तेमाल किया। मोदी ने अंडरग्राउंड होकर इस तानाशाही के खिलाफ लड़ाई लड़ने का फैसला किया।
पुलिस की नज़रों से बचने के लिए उन्होंने कई भेष बदले। कभी वो सिर पर पगड़ी बांधकर और दाढ़ी बढ़ाकर एक सिख (सरदारजी) बन जाते, तो कभी संन्यासी के भेष में घूमते।
भेष बदल-बदल कर मोदी गुजरात के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक खुफिया तरीके से पर्चे बांटते थे, साहित्य पहुंचाते थे और जॉर्ज फर्नांडीस से लेकर नानाजी देशमुख जैसे बड़े नेताओं की अंडरग्राउंड मीटिंग्स करवाते थे।
इसी अंडरग्राउंड मूवमेंट ने मोदी के अंदर ‘क्राइसिस मैनेजमेंट’ का वो बीज बोया, जो आज उन्हें दुनिया के सबसे बड़े और जटिल संकटों में भी शांत खड़े रहना सिखाता है।
विपक्ष आज भी इस बात पर माथा पीटता है की मोदी को गुस्सा क्यों नहीं आता? वो रिएक्ट क्यों नहीं करते? अरे भाई, जिसने जवानी में आपातकाल की पुलिस और आईबी (IB) को चकमा दिया हो, वो तुम्हारे दो-चार बयानों से कैसे भड़क जाएगा!
अपनी इसी गज़ब की मेहनत, संगठन की समझ और दिन-रात एक कर देने वाले जुनून की बदौलत मोदी संघ में बहुत तेज़ी से ऊपर चढ़े।
जो आदमी 1972 में एक आम प्रचारक था, उसे 1978 आते-आते संघ ने ‘विभाग प्रचारक’ की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दे दी। और महज़ दो साल बाद, 1980 में उन्हें ‘संभाग प्रचारक’ बना दिया गया।
ये वो दौर था जब मोदी के जिम्मे पूरे के पूरे ज़िले और इलाके आ गए थे। यहां उन्होंने लोगों को जोड़ना सीखा।
उन्होंने सीखा की कैसे अलग-अलग विचारों, जातियों और तबकों के लोगों को एक ही धागे में पिरोकर एक ‘संगठन’ के लिए खड़ा किया जाता है।
वो लोगों की बातें सुनते थे। घंटों-घंटों तक चुपचाप बैठकर कार्यकर्ताओं की शिकायतें, उनके मन की भड़ास और उनकी उम्मीदें सुनते थे। इसी ‘लिसनिंग स्किल’ (Listening Skill) ने उन्हें ये समझने में मदद की कि पब्लिक असल में चाहती क्या है।
1987 आते-आते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शीर्ष नेतृत्व यह पूरी तरह समझ चुका था की नरेंद्र मोदी के अंदर संगठन को खड़ा करने, मैनेजमेंट करने और राजनीतिक नब्ज़ पकड़ने का जो हुनर है, वो सिर्फ शाखाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। संघ को एहसास हो गया था की इस हीरे को अब राजनीति के मैदान में उतारने का वक्त आ गया है।
और फिर 1987 में संघ ने अपने इस सबसे होनहार सिपाही को ‘भारतीय जनता पार्टी’ (BJP) में भेज दिया। मोदी का ये ट्रांसफर कोई साधारण घटना नहीं थी।
ये हिंदुस्तान की राजनीति में आने वाले उस महा-तूफ़ान की पहली आहट थी, जो अगले डेढ़ दशक में पूरे देश का राजनीतिक भूगोल बदलने वाला था। 15 साल समाज की नब्ज़ पकड़ने के बाद, अब वक्त था संगठन की कमान संभालने का।
लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक, 15 सालों में मोदी ने जमीन पर पसीना बहा कर खड़ी की वो चुनावी मशीनरी जिसे विपक्ष कभी समझ ही नहीं पाया
संघ में 15 साल तक समाज को मथने के बाद, 1987 में नरेंद्र मोदी की एंट्री भारतीय जनता पार्टी (BJP) में हुई। उन्हें गुजरात बीजेपी का संगठन मंत्री (Organization Secretary) बनाया गया।
आज जो बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी नज़र आती है, 1987 के दौर में उसकी हालत ऐसी बिल्कुल नहीं थी।
उस वक्त गुजरात में कांग्रेस का ऐसा एकछत्र राज था की बीजेपी को ढंग के कैंडिडेट तक नहीं मिलते थे। लेकिन मोदी के आने के बाद जो हुआ, उसने हिंदुस्तान की सियासत में ‘पॉलिटिकल मैनेजमेंट’ की पूरी डिक्शनरी ही बदल कर रख दी।
मोदी जब राजनीति में आए, तो वो एक ‘मैनेजर’, एक ‘रणनीतिकार’ और एक ‘संगठन शिल्पी’ बनकर आए थे। उन्होंने आते ही सबसे पहला काम ये किया की पार्टी के भीतर चल रही गुटबाज़ी (Factionalism) का इलाज कर दिया।
मोदी का फंडा बिल्कुल साफ़ था- अगर चुनाव जीतना है, तो नेता को नहीं, कैडर (कार्यकर्ता) को मजबूत करो। आज जो आप हर चुनाव में ‘बूथ मैनेजमेंट’ और ‘पन्ना प्रमुख’ जैसे भारी-भरकम शब्द सुनते हैं ना, इसकी नींव मोदी ने 80 और 90 के दशक में ही गुजरात में रख दी थी।
उन्हें एक-एक कार्यकर्ता का नाम याद रहता था। कौन सा कार्यकर्ता किस बूथ पर काम का है, कौन सा नेता जनता के बीच लोकप्रिय है और कौन सा नेता सिर्फ हवाबाज़ी कर रहा है, मोदी के पास इसका पूरा कच्चा-चिट्ठा होता था।
उन्होंने बीजेपी को एक ढीली-ढाली पार्टी से बदलकर एक खूंखार चुनावी मशीनरी में तब्दील कर दिया। और इसी मशीनरी का नतीजा था की गुजरात में बीजेपी ने पहली बार नगर निगम चुनावों में कांग्रेस को उखाड़ फेंका।
लेकिन मोदी का असली टेस्ट अभी बाकी था। 1990 का साल भारतीय राजनीति का वो टर्निंग पॉइंट है, जिसने देश का पूरा सियासी भूगोल बदल कर रख दिया।
लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक ‘राम रथ यात्रा’ निकालने का ऐलान कर दिया। इस यात्रा ने पूरे देश में हिंदुत्व की वो लहर पैदा की जिस पर सवार होकर बीजेपी आज दिल्ली के तख्त पर बैठी है।
लेकिन क्या आप जानते हैं की इस रथ यात्रा का ‘बैकस्टेज मैनेजर’ कौन था? जी हाँ, वो नरेंद्र मोदी ही थे।
गुजरात के अंदर इस रथ यात्रा का रूट क्या होगा, भीड़ कैसे जुटेगी, रुकने का इंतज़ाम कहाँ होगा, और सुरक्षा कैसे मैनेज होगी- ये सब मोदी के दिमाग की उपज था।
इसी रथ यात्रा ने मोदी को मास मोबिलाइज़ेशन (Mass Mobilization) यानी लाखों की भीड़ को इकट्ठा करने और उसे एक राजनीतिक ताकत में बदलने का वो हुनर सिखाया, जो आज तक विपक्ष के किसी नेता को समझ नहीं आया है।
रथ यात्रा की उस ज़बरदस्त सफलता के ठीक एक साल बाद, 1991 में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक ‘एकता यात्रा’ निकालने का फैसला किया।
मकसद था 26 जनवरी को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराना। ये वो दौर था जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, रोज़ हत्याएं हो रही थीं और लाल चौक पर जाना मौत के मुंह में जाने के बराबर था।
इस पूरी एकता यात्रा का जिम्मा भी नरेंद्र मोदी के कंधों पर था। मोदी बिना किसी खौफ के मुरली मनोहर जोशी के साथ कश्मीर गए और आतंकियों की धमकियों के बीच लाल चौक पर तिरंगा फहराया।
इन दो बड़ी यात्राओं ने मोदी को पूरे भारत का राजनीतिक मिज़ाज समझा दिया।
1995 आते-आते गुजरात में मोदी की इसी भयंकर मेहनत और संगठन क्षमता के दम पर बीजेपी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली।
मोदी का लोहा अब दिल्ली में बैठे बीजेपी के बड़े नेता भी मान चुके थे। नतीजतन, उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट करके बीजेपी का राष्ट्रीय सचिव (National Secretary) बना दिया गया और उन्हें गुजरात से निकालकर दिल्ली बुला लिया गया।
दिल्ली आने के बाद मोदी को हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का प्रभार सौंपा गया। यहीं से मोदी ने उत्तर भारत की राजनीति का असली डीएनए (DNA) समझा।
उन्होंने जाटों की राजनीति, राजपूतों का मिज़ाज, और पंजाब के सिखों की ज़मीनी हकीकत को बहुत करीब से देखा। जब वो हरियाणा और हिमाचल के प्रभारी थे, तब उन्होंने वहां के छोटे-से-छोटे गांव के नेताओं से सीधे संपर्क बनाए।
उन्होंने समझा की क्षेत्रीय दलों (Regional Parties) के साथ गठबंधन कैसे किया जाता है, टिकट बंटवारे में जातियों का बैलेंस कैसे रखा जाता है और एक हारे हुए चुनाव को आखिरी 24 घंटों में कैसे पलटा जाता है।
इन 15 सालों (1987-2001) की इस ज़बरदस्त ट्रेनिंग ने मोदी को 1998 में बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बनवा दिया।
यह पार्टी में अध्यक्ष के बाद सबसे ताकतवर पद होता है। अब मोदी के हाथ में पूरे देश की बीजेपी की चाबी थी। उन्होंने देश भर में पार्टी का कैडर खड़ा किया।
आज का विपक्ष अगर मोदी से मात खा रहा है, तो उसकी सबसे बड़ी वजह यही है। राहुल गांधी हों, अखिलेश यादव हों या तेजस्वी यादव- ये सब सीधे सत्ता या पार्टी के शीर्ष पर बैठे हैं।
इन्होंने कभी पोस्टर नहीं चिपकाए, कभी बूथ पर पर्चियां नहीं बांटी और कभी चुनाव लड़वाने की वो ‘पसीने बहाने वाली’ ज़मीनी हकीकत नहीं देखी। जबकि सामने नरेंद्र मोदी खड़े हैं, जिन्होंने 15 साल तक पार्टी का पूरा स्ट्रक्चर अपने हाथों से ईंट-दर-ईंट खड़ा किया है।
2001 में मिली सत्ता तो बन गए सियासत के सबसे बड़े बाज़ीगर, विपक्ष के ‘कट्टर हिंदुत्व’ के ठप्पे को अपना ट्रेडमार्क बनाकर किया ऐसा ज़बरदस्त विकास की हो गयी दरबारियों की स्क्रिप्ट पूरी तरह फ्लॉप
15 साल संघ का झोला उठाकर समाज को पढ़ा और अगले 15 साल संगठन की भट्टी में खुद को गलाकर पार्टी खड़ी की। लेकिन राजनीति का असली इम्तिहान तब शुरू होता है जब आपके हाथ में सत्ता की चाबी आती है।
मंच से खड़े होकर भाषण देना और सिस्टम के अंदर बैठकर ब्यूरोक्रेसी (अफसरशाही) से काम निकलवाना, इन दोनों बातों में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है।
अक्टूबर 2001 में नरेंद्र मोदी के जीवन का यही तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हुआ, जिसने उन्हें ‘संगठन मंत्री’ से ‘सियासत का सबसे बड़ा बाज़ीगर’ बना दिया।
ये वो वक्त था जब गुजरात भयंकर भुज भूकंप की तबाही से कराह रहा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल का सिस्टम फेल हो चुका था और बीजेपी हाईकमान ने रातों-रात नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर भेज दिया।
मोदी जब गांधीनगर के सचिवालय में बैठे, तो उन्होंने ब्यूरोक्रेट्स (IAS/IPS) के पेंच कसना शुरू किए। उन्हें पता था की सरकारी बाबू काम अटकाने में माहिर होते हैं। मोदी ने रेड टेप (Red Tape) यानी लालफीताशाही को काटकर सीधा ‘रेड कार्पेट’ बिछा दिया।
इसका सबसे बड़ा और ऐतिहासिक उदाहरण है ‘वाइब्रेंट गुजरात’ (Vibrant Gujarat) ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट।
जब पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने ममता बनर्जी के साथ मिलकर रतन टाटा को ‘नैनो’ कार की फैक्ट्री लगाने से खदेड़ दिया था, तब मोदी ने सिर्फ एक SMS भेजकर टाटा को गुजरात बुला लिया।
महज़ 3 दिन के अंदर सिंगूर से साणंद तक पूरी फैक्ट्री शिफ्ट हो गई। इस एक घटना ने देश और दुनिया के उद्योगपतियों को मैसेज दे दिया की मोदी कोई आम राजनेता नहीं है, ये बंदा काम करना और करवाना जानता है।
यहीं से मोदी ने राजनीति का वो ‘डेडली कॉकटेल’ तैयार किया जिसका तोड़ आज तक विपक्ष नहीं निकाल पाया है। ये कॉकटेल था- ‘कट्टर हिंदुत्व’ और ‘ज़बरदस्त विकास’ का।
विपक्ष और सेक्युलर मीडिया मोदी को 2002 के दंगों के बाद ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कहकर घेरने की कोशिश कर रहा था। उन्हें लगा की मोदी को सिर्फ एक कट्टरपंथी नेता साबित कर देंगे तो ये राष्ट्रीय स्तर पर कभी स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
लेकिन मोदी ने उनके इसी दांव को धोबिया पछाड़ में बदल दिया। उन्होंने अपनी ‘हिंदू हृदय सम्राट’ वाली छवि को बरकरार रखते हुए उस पर ‘विकास पुरुष’ का ऐसा तगड़ा कवर चढ़ाया की विपक्ष का दिमाग ही सुन्न हो गया।
अगर कोई हार्डकोर वोटर था, तो वो मोदी के हिंदुत्व पर फ़िदा था, और जो मिडिल क्लास या युवा डिबेट करता था, वो मोदी की 24 घंटे बिजली, नर्मदा के पानी और चौड़ी सड़कों (गुजरात मॉडल) का मुरीद बन गया।
विपक्ष को समझ ही नहीं आ रहा था की मोदी पर हमला कहाँ से करें! विकास पर करें या हिंदुत्व पर?
और फिर आया 2014 का वो ऐतिहासिक चुनाव। जब मोदी गुजरात से निकलकर दिल्ली की तरफ बढ़े, तो उनके पास सिर्फ वादे नहीं थे, बल्कि 15 साल सरकार चलाने का एक सॉलिड ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ था।
दिल्ली की गद्दी पर बैठने के बाद मोदी ने अपने उसी 45 साल के तजुर्बे का इस्तेमाल किया। उन्होंने कोई नई थ्योरी नहीं लगाई, बल्कि वो किया जो उन्होंने 1970 और 80 के दशक में गरीब की झोपड़ी में बैठकर महसूस किया था।
मोदी जानते थे की इस देश के गरीब को वादों से ज़्यादा उस चीज़ की ज़रूरत है जो उसकी रोज़मर्रा की तकलीफें कम करे। यहीं से जन्म हुआ ‘लाभार्थी वर्ग’ (Beneficiary Class) का। ये मोदी का वो मास्टरस्ट्रोक है जिसने जाति और धर्म की सारी पुरानी राजनीति को ज़मींदोज़ कर दिया।
उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों घरों में गैस सिलेंडर पहुंचाना, स्वच्छ भारत के तहत वॉशरूम बनवाना, जन-धन खाते खुलवाना, पीएम आवास योजना और 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन।
ये सिर्फ सरकारी स्कीमें नहीं थीं, ये सीधे तौर पर उस आम आदमी के दर्द का इलाज था जिसे मोदी ने अपने प्रचारक जीवन में बहुत करीब से देखा था।
मोदी ने महिलाओं (साइलेंट वोटर्स) का एक ऐसा अटूट वोटबैंक तैयार कर लिया जिसे आज विपक्ष की कोई गारंटी या रेवड़ी नहीं तोड़ पा रही है।
इसके साथ ही, उन्होंने उस बहुसंख्यक हिन्दू समाज की सांस्कृतिक नब्ज़ को पकड़ा जो 70 सालों से अपने ही देश में घुटन महसूस कर रहा था। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण और कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति।
सत्ता के इस 15 साल के तजुर्बे ने मोदी को बता दिया था की अगर इतिहास के पन्नों में अमर होना है, तो सिर्फ हाईवे और एयरपोर्ट बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों को सींचना होगा।
इस 45 साल की भयंकर तपस्या के दम पर मोदी आज एक ऐसे मुकाम पर खड़े हैं, जहाँ वो इस देश के मिज़ाज को कंट्रोल करने वाले सबसे बड़े जननायक बन चुके हैं।
लेकिन मोदी का सफर इतना आसान नहीं होता, अगर उनके सामने खड़ा विपक्ष थोड़ी भी अकल लगाता।
अपने 45 साल के तजुर्बे से मोदी ने जो चक्रव्यूह रचा था, उसमें विपक्ष के इलीट नेताओं ने खुद ही घुसकर ऐसे भयंकर Self-Goals करे, जिसने मोदी को 100 गुना बड़ा नेता बना दिया।
‘मौत का सौदागर’ और ‘चौकीदार चोर’ जैसे बयानों ने कैसे किया मोदी का फायदा, विपक्ष की उन भयंकर गलतियों का कच्चा चिट्ठा जिसने मोदी को जननायक बना दिया
सियासत का एक बहुत पुराना नियम है- कई बार आप सिर्फ अपनी मेहनत से बड़े नहीं बनते, बल्कि आपको बड़ा बनाने में आपके दुश्मनों की बेवकूफी का भी बहुत बड़ा हाथ होता है।
नरेंद्र मोदी के इस 45 साल के अजेय सफर में अगर किसी ने उनके लिए खाद-पानी का काम किया है, तो वो है चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ हमारा इलीट (Elite) विपक्ष।
सच कहूं तो, इन नेताओं ने खुद अपने हाथों से अपने पैरों पर ऐसी भयंकर कुल्हाड़ियां मारी हैं, जिसका सीधा फायदा मोदी ने दोनों हाथों से बटोरा।
चलिए ज़रा विपक्ष की उन भयंकर गलतियों (Self-goals) का कच्चा-चिट्ठा खोलते हैं, जिन्होंने मोदी को महज़ एक नेता से उठाकर ‘जननायक’ के सिंहासन पर बिठा दिया।
शुरुआत करते हैं साल 2007 से। गुजरात में विधानसभा चुनाव थे और मोदी अपने विकास कार्यों (वाइब्रेंट गुजरात) के दम पर मैदान में थे।
तभी दिल्ली से सोनिया गांधी गुजरात आती हैं और एक भरी रैली में नरेंद्र मोदी को “मौत का सौदागर” कह देती हैं।
कांग्रेस के दरबारियों को लगा की मैडम ने क्या गज़ब का डायलॉग मारा है, अब तो मोदी खत्म!
लेकिन मोदी ने क्या किया? उन्होंने उस 45 साल के तजुर्बे का इस्तेमाल किया और उस गाली को तुरंत ‘गुजरात के अपमान’ से जोड़ दिया।
मोदी ने पूरे सूबे में घूम-घूम कर कहा की “देखो, ये दिल्ली वाली सल्तनत मुझे नहीं, आप 5 करोड़ गुजरातियों को मौत का सौदागर कह रही है।” नतीजा? कांग्रेस गुजरात में औंधे मुंह गिरी और मोदी पहले से भी ज़्यादा प्रचंड बहुमत के साथ वापस लौटे।
लेकिन विपक्ष को अकल कहाँ आने वाली थी! 2014 के लोकसभा चुनाव का माहौल बन रहा था। दिल्ली में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था।
तभी कांग्रेस के सबसे इलीट और अंग्रेज़ीदां नेता मणिशंकर अय्यर के अंदर का अहंकार जाग उठा। उन्होंने टीवी कैमरों के सामने घमंड से सीना चौड़ा करके कहा की, “नरेंद्र मोदी इस देश का प्रधानमंत्री कभी नहीं बन सकता… हां, अगर वो चाहे तो हम उसे कांग्रेस के दफ्तर के बाहर चाय बेचने की जगह दे सकते हैं।”
भाईसाहब, इस एक बयान ने पूरे 2014 के चुनाव का नैरेटिव ही पलट कर रख दिया। मणिशंकर अय्यर को पता ही नहीं था की उन्होंने किस दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
लेकिन मोदी जानते थे! मोदी ने इस ‘चायवाला’ वाले तंज को तुरंत लपका और उसे अपनी छाती पर सबसे बड़े मेडल की तरह सजा लिया।
बीजेपी ने पूरे देश में ‘चाय पे चर्चा’ (Chai Pe Charcha) कैंपेन शुरू कर दिया। मोदी ने हर रैली में चीख-चीख कर कहा की, “हाँ, मैं चायवाला हूँ, और इन नामदारों को यही दर्द है की एक गरीब का बेटा, एक चाय बेचने वाला इनके दिल्ली के तख्त को चुनौती कैसे दे रहा है!”
पूरा का पूरा हिंदुस्तान, जो खुद गरीबी और मिडिल-क्लास की चक्की में पिस रहा था, वो सीधे इस ‘चायवाले’ से कनेक्ट हो गया। कांग्रेस का वो घमंड उनके ही गले की ऐसी फांस बना की पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई।
फिर आया साल 2017 का गुजरात चुनाव। कांग्रेस फिर से उसी गड्ढे में गिरी। मणिशंकर अय्यर ने मोदी को “नीच किस्म का आदमी” कह डाला।
अब आप देखिए की 45 साल का तजुर्बा कैसे काम करता है। मोदी ने इस ‘नीच’ शब्द को तुरंत अपनी पिछड़ी जाति (OBC) और गरीबी के बैकग्राउंड से जोड़ दिया।
उन्होंने रैलियों में कहा की “इन्होंने मुझे नीच कहा क्योंकि मैं गरीब घर से हूँ, क्योंकि मैं पिछड़ी जाति से आता हूँ।” बस! जनता ने फिर से कांग्रेस को वोट की वो चोट दी की उनके सारे रणनीतिकार सिर पकड़ कर बैठ गए।
और 2019 का चुनाव तो आपको याद ही होगा। राहुल गांधी ने राफेल के मुद्दे पर महीनों तक एक ही रट लगाए रखी- “चौकीदार चोर है!” राहुल को लगा की वो बहुत बड़ा क्रांतिकारी नारा दे रहे हैं।
लेकिन मोदी ने फिर से वही ज़मीनी दांव खेला। उन्होंने कहा, “हाँ, मैं चौकीदार हूँ… इस देश की तिजोरी का, इस देश की सरहदों का!” रातों-रात पूरे देश में “मैं भी चौकीदार” (Main Bhi Chowkidar) का सैलाब आ गया।
ट्विटर पर करोड़ों हिंदुस्तानियों ने अपने नाम के आगे ‘चौकीदार’ लगा लिया। राहुल गांधी का वो पूरा का पूरा कैंपेन उनके ही मुंह पर तमाचा बनकर फूट गया और 2019 में मोदी 300 के पार चले गए।
ये सब हवा में नहीं हुआ दोस्त। ये कोई तुक्का नहीं था। ये मोदी के उस 45 साल के तजुर्बे की ताकत थी। जब विपक्ष मोदी पर कीचड़ उछालता था, तो वो उसे पोंछते नहीं थे, बल्कि उस कीचड़ से कमल खिलाने का हुनर जानते थे।
विपक्ष के नेताओं की सबसे बड़ी ट्रैजडी (Tragedy) यही है की उन्होंने समाज को सिर्फ किताबों की थ्योरीज़ में पढ़ा है। उन्हें पता ही नहीं की भारत के गांव की चौपाल पर बैठा आदमी क्या सोचता है।
मोदी के सामने आज जो विपक्ष खड़ा है, वो पूरी तरह से दिवालिया हो चुका है। ना उनके पास कोई विज़न है, ना कोई ज़मीनी कैडर, और ना ही जनता का मूड भांपने की वो ताकत। वो आज भी वही घिसी-पिटी राजनीति कर रहे हैं जिसे मोदी 20 साल पहले ही एक्सपोज़ कर चुके हैं।
लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या मोदी का सफर इतना ही आसान होता, अगर आज उनके सामने खड़ा विपक्ष इतना कमज़ोर और ढीला-ढाला ना होता?
क्या होता अगर आज नरेंद्र मोदी के सामने राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे की जगह 70 के दशक वाली ‘इंदिरा गांधी’ खड़ी होतीं?
चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए आज के नेताओं में नहीं है मोदी से लड़ने का दम, अगर सामने इंदिरा गांधी जैसी कड़क नेता होतीं तो दिल्ली का तख्त नहीं होता इतना आसान
राजनीति के अखाड़े का एक बहुत ही सीधा सा उसूल है। जब अखाड़े में एक हैवीवेट (Heavyweight) चैंपियन उतरता है और उसके सामने लड़ने के लिए कोई हल्का-फुल्का पहलवान खड़ा कर दिया जाए, तो मुकाबला एकतरफा होना ही है।
नरेंद्र मोदी की 45 साल की ज़मीनी तपस्या और उनकी मेहनत 100 प्रतिशत सच है, इस बात में कोई रत्ती भर भी शक नहीं है।
लेकिन अगर हम आज की सियासत का एक्स-रे करें, तो एक बहुत बड़ा और कड़वा सवाल सामने खड़ा हो जाता है।
क्या नरेंद्र मोदी का दिल्ली के तख्त तक पहुँचने और सालों-साल तक एकतरफा जीत का सफर इतना ही आसान होता, अगर उनके सामने खड़ा विपक्ष इतना कमज़ोर, लाचार और दिशाहीन ना होता?
ज़रा आज के विपक्ष की तरफ नज़र दौड़ाइए। आज चाहे हम पूरे ‘इंडी गठबंधन’ (INDIA Alliance) की बात कर लें या कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की, इनके पास ऐसा कौन सा नेता है जिसने सड़कों की धूल फांकी हो?
राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव… ये सब वो नाम हैं जिन्हें सत्ता और पार्टी की कुर्सी विरासत में, चांदी की तश्तरी में सजाकर मिली है। इन्होंने राजनीति की शुरुआत पोस्टर चिपकाने या बूथ पर पर्चियां बांटने से नहीं की, बल्कि सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष या मुख्यमंत्री पद से की है।
आज का विपक्ष चुनाव हारने के बाद जनता के बीच जाकर अपनी कमियां सुधारने के बजाय छुट्टियां मनाने विदेश चले जाते हैं। मोदी की मेहनत अपनी जगह है, लेकिन इस ‘बेहोश विपक्ष’ ने मोदी की राह में रेड कार्पेट बिछाने का काम किया है।
अब ज़रा इस तस्वीर को पलट कर देखिए। क्या होता अगर आज नरेंद्र मोदी के सामने राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे की जगह 1970 के दशक वाली ‘इंदिरा गांधी’ खड़ी होतीं?
इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति की वो ‘आयरन लेडी’ (Iron Lady) थीं जिन्हें मास पॉलिटिक्स (Mass Politics) और नैरेटिव हाईजैक (Narrative Hijack) करने का हुनर आता था।
अगर आज नरेंद्र मोदी के सामने इंदिरा गांधी जैसा कोई कद्दावर और ज़मीनी विपक्ष होता, तो यकीनन राजनीति का ये सिकंदर बनने के लिए मोदी को भी पसीने छुड़ाने वाली टक्कर का सामना करना पड़ता। और हो सकता था की मोदी इस लड़ाई में हार का सामना करते।
इसे एक उदाहरण से समझिए। 1977 में इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी चुनाव में बहुत बुरी तरह हारी थीं। जनता ने उन्हें सत्ता से उखाड़ फेंका था।
आज का कोई एलीट नेता होता, तो हार के बाद प्रेस कांफ्रेंस करके ईवीएम (EVM) का रोना रोता। लेकिन इंदिरा ने ऐसा नहीं किया। उसी साल बिहार के बेलछी (Belchi) गांव में दलितों का नरसंहार हुआ।
वहां बाढ़ आई हुई थी, सड़कों पर कीचड़ और पानी भरा था। कोई गाड़ी वहां नहीं जा सकती थी। लेकिन इंदिरा गांधी वहां पहुंचीं! जब जीप नहीं जा पाई, तो वो एक हाथी पर बैठीं और कीचड़-पानी चीरते हुए बेलछी गांव के उन पीड़ितों के बीच जा पहुंचीं।
हाथी पर बैठी इंदिरा गांधी की उस एक तस्वीर ने पूरे देश की राजनीति को रातों-रात पलट कर रख दिया था। उस एक घटना ने जनता के मन में यह बैठा दिया की सत्ता में कोई भी हो, लेकिन जनता की असली रखवाली इंदिरा ही है।
तीन साल के अंदर ही इंदिरा गांधी प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली के तख्त पर वापस लौट आई थीं। इसे कहते हैं ज़मीनी राजनीति! इसे कहते हैं विपक्ष का असली तेवर!
अगर आज मोदी के सामने इंदिरा गांधी जैसी कोई कड़क विपक्ष की नेता होती, जो जनता की रग-रग पहचानती हो, जो हाथी पर बैठकर बाढ़ के पानी में उतरने का माद्दा रखती हो, तो सोचिए मुकाबला कितना कांटे का होता!
मोदी जो आज कोई भी नैरेटिव (चाहे वो राम मंदिर हो, सर्जिकल स्ट्राइक हो या लाभार्थी योजनाएं हों) सेट करते हैं और विपक्ष उस जाल में फंस जाता है, इंदिरा गांधी कभी उस जाल में नहीं फंसतीं।
वो उसी नैरेटिव को पलटकर मोदी के सामने एक नया चक्रव्यूह खड़ा कर देतीं। मोदी का 45 साल का संघ और संगठन का तजुर्बा जब इंदिरा के उस ‘पॉलिटिकल सिक्स्थ सेंस’ (Political Sixth Sense) से टकराता, तो दिल्ली के तख्त की राह में मोदी को भी लोहे के चने चबाने पड़ जाते।
लेकिन आज की हकीकत यही है की ना तो आज के विपक्ष में बेलछी जाने वाली इंदिरा गांधी की परछाई है और ना ही वो ज़मीनी जुड़ाव।
आज विपक्ष के पास कोई विज़न नहीं है, वो सिर्फ ‘मोदी-विरोध’ की अंधी नफरत में राजनीति कर रहे हैं। और जब आपकी राजनीति का इकलौता मकसद किसी एक इंसान को गालियां देना रह जाए, तो आप जनता का दिल कभी नहीं जीत सकते।
आखिरकार बात वहीं आकर रुकती है। नरेंद्र मोदी अगर देश के जननायक और सियासत के सिकंदर बने हुए हैं, तो इसके पीछे उनका वो पसीना है जो उन्होंने पिछले 45 सालों में इस देश की मिट्टी में बहाया है।
और दूसरी तरफ एक ऐसा विपक्ष है जो आज भी अपने महलों की बालकनी से नीचे उतरने को तैयार नहीं है।
सियासत में कोई शॉर्टकट नहीं होता। मोदी ने अपना रास्ता खुद बनाया है। जब तक विपक्ष अपनी इलीट मानसिकता नहीं छोड़ेगा, जब तक वो 45 साल वाले उस ज़मीनी तजुर्बे का सामना सड़कों पर उतर कर नहीं करेगा, तब तक नरेंद्र मोदी और BJP के सामने उनकी हर बाजी फीकी ही पड़ती रहेगी।
