“भले ही पीढ़ियां लग जाएं लेकिन मेरी अस्थियां तब तक मत बहाना..”, नाथूराम गोडसे की वो आखिरी इच्छा जिसमें दबा अखंड भारत का सबसे प्रचंड संकल्प

इतिहास के पन्नों में जिस इंसान को सिर्फ और सिर्फ एक ‘कातिल’ और ‘खलनायक’ बनाकर पेश किया गया, क्या आपने कभी सोचा है की उस इंसान के सीने में इस देश के लिए कैसी धधकती हुई आग थी?

आज तक हम उसी नैरेटिव में उलझे रहे जो हमें परोसा गया, लेकिन आज हम उस सच का पर्दाफाश करने जा रहे हैं जिसे इस देश से बहुत ही शातिराना तरीके से छुपा कर रखा गया।

आज हम बात कर रहे हैं उस आखिरी खत की, जो नाथूराम गोडसे ने अपनी फांसी से ठीक कुछ मिनट पहले लिखा था।

एक ऐसा खत जिसमें ना तो मौत का कोई खौफ था, ना परिवार के लिए रोना-धोना, बल्कि उसमें सिर्फ और सिर्फ ‘अखंड भारत’ की वो प्रचंड हुंकार थी, जो आज भी मुर्दे में जान फूंक दे।

ज़रा सोचिए, जिस इंसान की कुछ ही पलों में सांसें रुकने वाली हों, जिसके गले में फांसी का फंदा पड़ने वाला हो, उस वक्त उसके दिमाग में क्या चल रहा होगा?

इस लेख में हम उस सुबह की एक-एक डिटेल और उस आखिरी पत्र के एक-एक शब्द का पोस्टमार्टम करेंगे, जिसे जानकर हर सच्चे हिंदुस्तानी की आँखें खुल जाएँगी और उनका गोडसे के लिए नजरिया हमेशा के लिए बदल जायेगा।

अंबाला जेल की वो सर्द सुबह जब मौत को सामने देखकर भी नाथूराम गोडसे के होठों पर था अखंड भारत का नारा और हाथों में भगवा

बात 15 नवंबर 1949 की है। जगह थी पंजाब की अंबाला सेंट्रल जेल। नवंबर के महीने में उत्तर भारत में कैसी कड़ाके की ठंड पड़ती है, ये तो आप जानते ही होंगे।

उस सर्द और धुंध भरी सुबह में जेल के अंदर का माहौल एकदम भारी था। जेल के वॉर्डन से लेकर बड़े-बड़े अधिकारी तक खामोश थे।

आम तौर पर जब किसी कैदी को फांसी दी जाती है, तो फांसी घर के रास्ते पर कैदी के रोने, गिड़गिड़ाने या खौफ से कांपने की आवाजें आती हैं। इंसान मौत को सामने देखकर अक्सर टूट जाता है।

लेकिन उस दिन अंबाला जेल के अधिकारियों ने जो नज़ारा देखा, उसने उन्हें भी अंदर तक हिला कर रख दिया।

नाथूराम गोडसे और उनके साथी नारायण आप्टे को जब उनकी कोठरी से फांसी के तख्ते की तरफ ले जाया जा रहा था, तो उनके चेहरे पर मौत की कोई शिकन, कोई खौफ या कोई पछतावा नहीं था।

वे ऐसे चल रहे थे जैसे कोई सिपाही अपनी किसी बहुत बड़ी ड्यूटी को पूरा करके लौट रहा हो। उनके कदम बिल्कुल सधे हुए थे।

और सबसे ज्यादा रोंगटे खड़े कर देने वाली बात तो ये थी की उन दोनों के हाथों में हमारा परम पवित्र ‘भगवा ध्वज’ था। जी हां! मौत के मुहाने पर खड़े होकर भी उनके हाथों से भगवा नहीं छूटा था।

रास्ते भर उनके होठों पर श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक गूंज रहे थे। जेल की वो सर्द दीवारें गवाह हैं जब उन दोनों ने एक सुर में ‘अखंड भारत अमर रहे’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाए थे।

उन नारों में इतनी गूंज और इतनी ताकत थी की वहां मौजूद पुलिसवालों के भी रोंगटे खड़े हो गए थे। उन्होंने बहुत ही शांति और गर्व के साथ फांसी के फंदे को चूमा था।

कोई साधारण अपराधी या कातिल इस तरह मौत को गले नहीं लगा सकता। यह जज्बा, यह निडरता सिर्फ उसी इंसान के अंदर हो सकती है जिसका रोम-रोम अपनी मातृभूमि और अपने धर्म के लिए धड़कता हो।

गोडसे को पता था की इतिहास उन्हें शायद गलत समझेगा, लेकिन उन्हें अपने किए पर रत्ती भर भी मलाल नहीं था। वो अपनी आंखों में अखंड भारत का वही सपना लिए फांसी के तख्ते की ओर बढ़ रहे थे।

फांसी के फंदे को चूमने से ठीक पहले अपने भाई दत्तात्रेय को लिखा गया वो आखिरी खत जिसे पढ़कर आज भी झकझोर जाते हैं लोग

अब ज़रा फांसी से ठीक पहले के उन आखिरी पलों की तरफ चलते हैं, जहां इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और सबसे जज़्बाती हिस्सा छुपा है।

फांसी का वक्त मुकर्रर था। उससे कुछ ही मिनट पहले, 15 नवंबर की सुबह लगभग 7:15 बजे, नाथूराम गोडसे ने जेलर से एक कागज़ और कलम मांगी।

ये वो वक्त होता है जब इंसान अमूमन अपनी प्रॉपर्टी, अपनी वसीयत या अपने बीवी-बच्चों के लिए कुछ लिखता है। लेकिन गोडसे की तो पूरी जिंदगी ही राष्ट्र के लिए समर्पित थी। उन्होंने वो खत अपने छोटे भाई दत्तात्रेय विनायक गोडसे के नाम लिखा।

जब आप उस खत के असली दस्तावेज़ (Original copy) को देखते हैं, तो उस पर साफ-साफ 15-11-1949 और समय 7:15 AM लिखा हुआ नज़र आता है।

इस खत में जो कुछ लिखा गया, वो एक ऐसा वसीयतनामा था जिसने ‘अखंड भारत’ के संकल्प को हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। नाथूराम ने बहुत ही शांत दिमाग से वो खत लिखा और जेल प्रशासन को सौंप दिया।

अब आप खुद सोचिए, ये कोई मामूली चिट्ठी तो थी नहीं जिसे बस डाक में डाल दिया जाए। इस खत की अहमियत को जेल प्रशासन भी समझ रहा था।

बाकायदा जेल के मजिस्ट्रेट ने उस खत को पढ़ा, उस पर अपनी आधिकारिक मुहर (Seal) लगाई और फिर पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत उसे उनके भाई दत्तात्रेय को हैंडओवर किया गया।

यहाँ आकर सच में बहुत गुस्सा आता है की जिस खत में इतनी कूट-कूट कर राष्ट्रभक्ति भरी हुई थी, जिस खत का एक-एक शब्द ‘भारत माता’ को समर्पित था, उसे हमारे देश की जनता से क्यों छुपाया गया?

दशकों तक सत्ता पर काबिज रहने वाले इकोसिस्टम ने बड़ी चालाकी से इतिहास की किताबों में सिर्फ वही आधा सच लिखा जिससे उनकी कुर्सी सलामत रहे। उन्होंने कभी नहीं चाहा की इस देश का युवा नाथूराम गोडसे के इस खत को पढ़े।

मौत के मुहाने पर खड़े होकर भी सनातन से अगाध प्रेम और सोमनाथ मंदिर के कलश निर्माण के लिए 101 रुपये का ऐतिहासिक दान

ज़रा एक मिनट के लिए सोचिए। जब किसी इंसान को पता हो की अगले 10 मिनट में उसे फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा, तो वो क्या करता है?

वो अपने परिवार के लिए रोता है, अपनी वसीयत के बारे में सोचता है, या अपने बैंक बैलेंस का हिसाब लगाता है। दुनिया का हर आम इंसान मौत के उस खौफनाक साये में सिर्फ अपने और अपने परिवार के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाता है।

लेकिन नाथूराम गोडसे कोई साधारण इंसान के सांचे में ढले ही नहीं थे! उनके खत का वो हिस्सा पढ़कर सच में दिमाग सुन्न हो जाता है, जब वो अपनी फांसी से चंद मिनटों पहले अपनी जायदाद या परिवार की फिक्र नहीं, बल्कि ‘सोमनाथ मंदिर’ की बात कर रहे थे।

गोडसे ने अपने भाई दत्तात्रेय को लिखे उस आखिरी खत में बाकायदा इस बात का जिक्र किया की वो अपनी तरफ से 101 रुपये का दान दे रहे हैं।

अब आप कहेंगे की 101 रुपये क्या बड़ी बात है? अरे भाई, 1949 के ज़माने में 101 रुपये की बहुत बड़ी कीमत होती थी! और कीमत से ज्यादा अहमियत उस भावना की है, उस जज़्बे की है।

ये दान किस लिए था? खत में गोडसे ने साफ-साफ लिखा था की उनका यह दान पवित्र ‘सोमनाथ मंदिर’ के कलश (गुंबद) के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जाए।

ज़रा इस बात की गहराई को समझिए। सोमनाथ मंदिर सनातन धर्म का वो पवित्र ज्योतिर्लिंग है, जिसे महमूद गजनवी से लेकर न जाने कितने ही विदेशी जिहादी लुटेरों ने बार-बार तोड़ा, लूटा और तबाह किया।

आजादी के तुरंत बाद, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने उस मंदिर के गौरव को वापस लौटाने और उसके पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया था।

नाथूराम गोडसे का शरीर भले ही अंबाला की जेल में कैद था, उनके सामने फांसी का फंदा झूल रहा था, लेकिन उनका दिल और उनकी आत्मा उस वक्त भी गुजरात के सोमनाथ मंदिर में धड़क रही थी।

ये दान साबित करता है की गोडसे का रोम-रोम सनातनी था। उनका धर्म-प्रेम कोई दिखावा नहीं था।

वे चाहते थे की जिस सोमनाथ को आक्रांताओं ने मिट्टी में मिलाने की कोशिश की, उसका कलश जब दोबारा आसमान को चूमे, तो उसमें उनके खून-पसीने की एक छोटी सी आहुति भी शामिल हो।

इतिहास की किताबों में जिसे एक ‘कट्टरपंथी’ और ‘कातिल’ कहकर गालियां दी गईं, वो असल में सनातन का एक ऐसा सच्चा सिपाही था, जो आखिरी सांस तक सिर्फ भारतवर्ष और उसके मंदिरों के खोए हुए गौरव को वापस पाने का सपना देख रहा था।

वेदों की जन्मस्थली सिंधु नदी और अखंड भारत का वो अकल्पनीय महासंकल्प जिसके बिना गोडसे ने अपनी अस्थियों के विसर्जन से कर दिया था साफ इनकार

खैर, सोमनाथ के दान वाली बात तो बस शुरुआत थी। अब मैं आपको उस खत के उस हिस्से की तरफ ले चलता हूँ, जो इस पूरे खत की असली जान है।

यही वो हिस्सा है जिसे पढ़कर टुकड़े-टुकड़े गैंग के पसीने छूट जाते हैं, क्योंकि इसमें ‘अखंड भारत’ की वो प्रचंड हुंकार है जो देश के विभाजन को सिरे से नकारती है।

नाथूराम गोडसे ने अपने भाई दत्तात्रेय को बहुत ही कड़े और स्पष्ट शब्दों में अपने अंतिम संस्कार के निर्देश दिए थे।

उन्होंने लिखा की “अगर सरकार तुम्हें मेरे शरीर का अंतिम संस्कार करने की अनुमति दे, तो तुम उसे किसी भी विधि से कर सकते हो।”

यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन इसके ठीक बाद गोडसे ने जो शर्त रखी, उसने इतिहास में एक ऐसा पन्ना जोड़ दिया जिसे कोई कभी मिटा नहीं पाएगा।

उन्होंने लिखा, “किंतु, मैं यहां अपनी एक विशेष इच्छा व्यक्त करना चाहता हूँ।” गोडसे ने अपने भाई को कसम देते हुए कहा की मेरी अस्थियों का विसर्जन किसी आम नदी में मत करना।

उन्होंने सिंधु नदी (Indus River) का ज़िक्र किया। वही सिंधु नदी, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के हिस्से में चली गई थी।

गोडसे ने खत में सीना ठोक कर लिखा की “सिंधु नदी, जिसके तट पर हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों ने बैठकर वेदों की रचना की थी, वही हमारे भारतवर्ष की असली और भौगोलिक सीमा है।”

आप ज़रा इस आदमी का विज़न देखिए यार! देश का बंटवारा हो चुका था, राजनेताओं ने कागज़ों पर लकीरें खींचकर पाकिस्तान बना दिया था और सत्ता की मलाई खा रहे थे।

लेकिन गोडसे ने उस बंटवारे को अपनी आखिरी सांस तक दिल से कभी स्वीकार नहीं किया। उनके लिए भारत कोई ज़मीन का टुकड़ा नहीं था जिसे काटकर अलग कर दिया जाए, उनके लिए भारत एक जीती-जागती ‘माता’ थी।

उन्होंने अपने भाई को वो रोंगटे खड़े कर देने वाली कसम दी की “मेरी अस्थियों का विसर्जन पवित्र सिंधु नदी में तभी किया जाए, जब वह नदी दोबारा हिंदुस्तान के झंडे (ध्वज) की छत्रछाया में स्वतंत्र रूप से बहे।”

क्या मतलब है इस बात का? इसका सीधा सा मतलब ये है की जब तक पाकिस्तान का वजूद मिट नहीं जाता! जब तक वो खोया हुआ हिस्सा वापस भारत में मिल नहीं जाता!

जब तक सिंधु नदी के पानी पर भारत का तिरंगा शान से नहीं लहराने लगता… तब तक मेरी अस्थियों को मुक्ति मत देना! हिंदू धर्म में अस्थि विसर्जन को ‘मोक्ष’ (Salvation) का रास्ता माना जाता है।

लेकिन गोडसे ने अखंड भारत के लिए अपने मोक्ष को भी ठोकर मार दी। उन्होंने साफ कर दिया की मेरी आत्मा को शांति तभी मिलेगी, जब यह देश दोबारा एक होगा।

ऐसी धधकती हुई देशभक्ति, ऐसा अकल्पनीय संकल्प… क्या आपने इतिहास की किसी और किताब में पढ़ा है? बिलकुल नहीं, क्योंकि ऐसे महासंकल्प सिर्फ वही ले सकता है जिसकी रगों में भारत माता के लिए सच्चा खून उबल रहा हो।

“भले ही पीढ़ियां बीत जाएं पर मेरी अस्थियां तभी बहाना जब सिंधु नदी पर तिरंगा लहराए”, नाथूराम गोडसे की वो आखिरी कसम जो रोंगटे खड़े कर देती है

अब ज़रा गोडसे के उस विज़न और उनके धैर्य को देखिए। उन्हें बहुत अच्छी तरह से मालूम था की जिस ‘अखंड भारत’ का सपना वो देख रहे हैं, वो कोई एक-दो साल या एक दशक में पूरा होने वाला काम नहीं है।

सत्ता के लोभियों ने देश के इतने गहरे टुकड़े किए थे की उन्हें वापस जोड़ने में बहुत लंबा वक्त लगने वाला था। गोडसे इस कड़वी सच्चाई को जानते थे, लेकिन उनका विश्वास देखिए!

उन्होंने अपने खत में दत्तात्रेय को सख्त निर्देश देते हुए लिखा की, “मेरी इस इच्छा को पूरा होने में अगर एक या दो पीढ़ियां (Generations) भी लग जाएं, तो कोई परवाह नहीं! तब तक तुम मेरी इन अस्थियों को सुरक्षित रखना।”

भाईसाहब, एक आदमी अपनी मोक्ष की चिंता छोड़कर, अपने भाई से कह रहा है की अगर तुम्हारी ज़िंदगी में भी सिंधु नदी भारत में वापस ना आ पाए, तो भी कोई बात नहीं… मेरी अस्थियां विसर्जित मत करना!

उन्होंने आगे लिखा की “अगर तुम्हारे जीवनकाल में वह शुभ दिन ना आ पाए, तो मेरी अस्थियों को अपनी आने वाली पीढ़ियों को सौंप देना। उन्हें ये जिम्मेदारी देना की वे मेरी इस आखिरी इच्छा को हकीकत में बदलें।”

क्या कोई आम इंसान ऐसा सोच सकता है? हम और आप तो अपने जीते-जी सब कुछ पा लेना चाहते हैं।

लेकिन गोडसे को आने वाली पीढ़ियों पर, इस देश के युवाओं पर और सनातन की ताकत पर इतना गहरा विश्वास था की उन्हें पता था- आज नहीं तो कल, 50 साल बाद या 100 साल बाद, एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब भारत का नौजवान जागेगा और पाकिस्तान का वजूद मिटाकर सिंधु नदी को वापस भारत माता के चरणों में ले आएगा।

इसी खत के एक और हिस्से में उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी बात भी लिखी थी। उन्होंने दत्तात्रेय को निर्देश दिया की “यदि कभी भविष्य में सरकार कोर्ट में दिए गए मेरे बयान पर से प्रतिबंध (Ban) हटा ले, तो मैं तुम्हें उस बयान को पब्लिश करने (प्रकाशित करने) की अनुमति देता हूँ।”

(बाद में यह बयान “मैंने गांधी को क्यों मारा” / ‘Why I Killed Gandhi’ के नाम से दुनिया के सामने आया)।

गोडसे जानते थे की उस वक्त की डरी हुई सरकार उनके विचारों से कितना खौफ खाती थी, इसीलिए उनके बयान पर बैन लगा दिया गया था।

उन्हें यकीन था की जब भविष्य में यह बैन हटेगा, तो देश की जनता उनका असली सच खुद-ब-खुद समझ जाएगी।

पुणे में एक चांदी के कलश में आज भी सुरक्षित हैं वो अस्थियां जो सात दशकों से कर रही हैं अपने अखंड भारत वाले संकल्प के पूरा होने का इंतज़ार

खत तो 15 नवंबर 1949 को लिखा गया और उसी दिन नाथूराम गोडसे फांसी के फंदे पर झूल गए। लेकिन क्या वो कहानी वहीं खत्म हो गई?

क्या वो खत बस इतिहास के किसी पन्ने में दबकर रह गया? बिल्कुल नहीं! वो खत आज भी जिंदा है और वो संकल्प आज भी धड़क रहा है।

आज सात दशक (75 साल) से ज्यादा का वक्त गुज़र चुका है। आज की ज़मीनी हकीकत ये है की नाथूराम गोडसे और उनके साथी नारायण आप्टे की अस्थियां आज भी पुणे (महाराष्ट्र) में उनके परिवार (गोपाल गोडसे के वंशजों) के पास एक ‘चांदी के कलश’ में पूरे सम्मान के साथ सुरक्षित रखी हुई हैं।

वे अस्थियां आज भी उसी इंतज़ार में हैं की कब वो शुभ घड़ी आए, कब सिंधु नदी पर तिरंगा लहराए और कब उन्हें मुक्ति मिले।

हर साल 15 नवंबर के दिन, जिसे उनके समर्थक ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाते हैं, उनके परिवार के लोग और देशभर से आए राष्ट्रभक्त उस चांदी के कलश के सामने खड़े होते हैं।

वे उस कलश को नमन करते हैं और गोडसे के उस खत को दोबारा पढ़ते हैं। वहां हर साल यह प्रचंड संकल्प दोहराया जाता है की- “हम अखंड भारत का सपना कभी मरने नहीं देंगे। एक दिन सिंधु नदी हमारे तिरंगे के साये में बहेगी और गोडसे जी की आत्मा को सच्ची मुक्ति मिलेगी।”

इतिहास की किताबों ने भले ही नाथूराम गोडसे को एक खलनायक साबित करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी हो, वामपंथी इकोसिस्टम ने भले ही उनके नाम पर हमेशा ज़हर उगला हो, लेकिन जब आप उनके इस आखिरी खत को पढ़ते हैं…

जब आप सोमनाथ मंदिर के लिए दिए गए उस 101 रुपये के दान को देखते हैं… जब आप सिंधु नदी के लिए उनकी उस तड़प को महसूस करते हैं, तो अंदर से एक ही आवाज़ आती है- की ऐसा इंसान देशद्रोही या सिर्फ एक ‘कातिल’ हो ही नहीं सकता!

जिस दिन वो शुभ दिन आएगा, जिस दिन अखंड भारत का वो सपना हकीकत में बदलेगा, उस दिन भारत माता के उस बेटे का सबसे बड़ा संकल्प पूरा होगा।

अखंड भारत अमर रहे! वंदे मातरम!

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