जब गांव से निकलकर किसी गरीब किसान या मज़दूर का बच्चा रात-रात भर जागकर मेहनत करता है और NEET या JEE जैसी देश की सबसे मुश्किल परीक्षा निकाल लेता है ना, तो उस कामयाबी की कोई एक जाति नहीं होती।
वो सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे गांव की जीत होती है। घर में खुशी का माहौल होता है, बधाइयों का तांता लग जाता है। लेकिन सच कहूं तो एक गरीब पिता की ये खुशी चंद घंटों में ही दम तोड़ देती है।
जैसे ही उसे पता चलता है की बेटे या बेटी का नाम तो लिस्ट में आ गया, लेकिन अब सरकारी कॉलेज के एडमिशन काउंटर पर जाते ही उसे शुरुआत में ही 50-60 हज़ार या लाख रुपये की एकमुश्त फीस जमा करनी पड़ेगी, तो उस बाप के चेहरे की हवाइयां उड़ जाती हैं।
गरीबी और संघर्ष किसी का सर्टिफिकेट देखकर नहीं आते। जब दो बच्चे एक जैसी टूटी हुई छत के नीचे, एक जैसी आर्थिक तंगी में पढ़ते हैं, तो उनकी पीड़ा साझी होती है।
ऐसे में सिस्टम की ये ज़िम्मेदारी बनती है की वो बिना किसी भेदभाव के हर उस टैलेंट का हाथ थामे जिसकी जेब खाली है।
लेकिन विडंबना देखिए की हमारे सिस्टम ने ‘सामाजिक न्याय’ की परिभाषा को इतना उलझा दिया है की अब न्याय भी जाती देखकर बंटा जाने लगा है।
अभी हाल ही में, सितंबर 2026 की शुरुआत में ओडिशा सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है, जो SC/ST वर्ग के लिए तो बहुत लुभावना है..
लेकिन उसी एक फैसले ने देश के सबसे बड़े तबके यानी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के करोड़ों परिवारों के मन में एक गहरा दर्द और एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
सवाल ये की आखिर एक ही देश, एक ही सिस्टम और एक ही जैसी गरीबी होने के बावजूद OBC के होनहार बच्चों के साथ आरक्षण के नाम पे ये सौतेलापन क्यों किया जा रहा है?
ओडिशा सरकार का वो ताज़ा फैसला जिसने आरक्षण के नाम पे SC/ST वर्ग को दे दी सारी मलाई, और OBC को कर दिया किनारे
ज़रा इस पूरे मामले को तथ्यों के साथ समझते हैं। अभी 1 सितंबर 2026 को ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने राज्य के छात्रों के लिए एक बहुत बड़ी घोषणा की।
ऐलान यह हुआ की ओडिशा के जितने भी सरकारी मेडिकल (MBBS) और इंजीनियरिंग (BTech/OJEE) कॉलेज हैं, वहां जब अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के बच्चे एडमिशन लेने जाएंगे, तो उन्हें शुरुआत में कोई भी फीस नहीं देनी होगी।
न तो उनसे एडमिशन फीस मांगी जाएगी और न ही ट्यूशन फीस ली जाएगी।
इस फैसले के पीछे ओडिशा सरकार ने जो लॉजिक दिया, वो बहुत ही प्रैक्टिकल था। सरकार ने कहा की SC और ST वर्ग के जो गरीब बच्चे अपनी मेहनत से एंट्रेंस एग्जाम तो निकाल लेते हैं, उनके पास एडमिशन के वक्त एकमुश्त मोटी फीस भरने के पैसे नहीं होते।
हालांकि सरकार इन बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाती है और उन्हें सरकारी स्कॉलरशिप भी मिलती है, लेकिन तकनीकी दिक्कतों के कारण वो स्कॉलरशिप का पैसा एडमिशन के 4 से 6 महीने बाद उनके बैंक खातों में आता है।
अब जब तक स्कॉलरशिप नहीं आती, तब तक वो गरीब बच्चा शुरुआत में फीस कहां से भरेगा?
इसी परेशानी को दूर करने के लिए सरकार ने कहा की हम SC/ST बच्चों को एडमिशन के वक्त फीस से पूरी तरह छूट दे रहे हैं, ताकि पैसों की कमी के कारण किसी टैलेंटेड बच्चे की पढ़ाई न रुके।
सरकार का ये तर्क और ये फैसला सुनने में तो बहुत नेक है। लेकिन असली दर्द तो यहीं से शुरू होता है।
जब सरकार यह पॉलिसी बना रही थी, तो क्या उन्हें ये नहीं पता था की ओडिशा और पूरे भारत में जो OBC वर्ग के गरीब छात्र हैं, उनकी स्कॉलरशिप भी 4 से 6 महीने बाद ही आती है?
क्या OBC के बच्चों के खाते में स्कॉलरशिप का पैसा रातों-रात किसी जादू से पहुंच जाता है? बिल्कुल नहीं!
स्कॉलरशिप के इंतज़ार का जो दर्द और जो सरकारी लेटलतीफी SC-ST के बच्चे झेलते हैं, बिल्कुल वही इंतज़ार और वही परेशानी OBC का बच्चा भी झेलता है।
फिर जब राहत बांटने की बारी आई, जब एक शानदार पॉलिसी बनी, तो उसमें से OBC के छात्रों को इतनी बेदर्दी से किनारे क्यों कर दिया गया? क्या उनके पिता के पास एडमिशन के वक्त देने के लिए रुपयों के पेड़ लगे हैं?
2600 OBC जातियों का वो कड़वा सच जो नीति निर्माताओं को कभी दिखाई नहीं देता
हमारे देश की पॉलिसी बनाने वाले जो लोग दिल्ली या राज्यों की राजधानियों में बैठते हैं, उन्हें शायद OBC वर्ग की ज़मीनी हकीकत का कोई अंदाज़ा ही नहीं है।
सिस्टम ने एक ऐसा भ्रम पाल लिया है की शायद OBC के लोग सोने की खदानों पर बैठे हैं या उनके घरों में पैसों की बारिश होती है।
ज़रा ग्राउंड रियलिटी पर आइए। पूरे भारत में (केंद्र और राज्य की सूचियों को मिला लें तो) OBC वर्ग के अंतर्गत लगभग 2600 से ज़्यादा जातियां आती हैं।
इनमें कुनबी, कुर्मी, यादव, लोधी, मौर्य, कुशवाहा, साहू, तेली, गुर्जर, कुम्हार, विश्वकर्मा, नाई, बढ़ई जैसी हज़ारों जातियां शामिल हैं। ये जातियां देश का सबसे बड़ा कामकाजी और मेहनतकश वर्ग हैं।
आज भी इन जातियों के करोड़ों परिवार गांवों में खेती-किसानी कर रहे हैं, दूसरों के खेतों में दिहाड़ी मज़दूरी कर रहे हैं, पशुपालन कर रहे हैं या छोटे-मोटे दस्तकारी के कामों से अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं।
इन 2600 जातियों की असली गरीबी कभी किसी फाइल में दर्ज नहीं होती।
सच तो ये है की जब किसी कुम्हार या किसी दिहाड़ी मज़दूर कुर्मी का बच्चा मेडिकल कॉलेज में अपनी जगह पक्की करता है, तो उसके घर में जश्न से ज़्यादा इस बात की टेंशन होती है की एडमिशन काउंटर पर जो 60-70 हज़ार रुपये मांगे जाएंगे, वो कहां से आएंगे।
सिस्टम को ये कड़वा सच क्यों नहीं दिखता की एक OBC पिता को अपने होनहार बेटे या बेटी का एडमिशन कराने के लिए अपनी आजीविका का एकमात्र साधन यानी अपनी थोड़ी बहुत खेती की ज़मीन गांव के साहूकार के पास गिरवी रखनी पड़ती है।
किसी मां को अपने गले का मंगलसूत्र या हाथों के कंगन सुनार की दुकान पर बेचने पड़ते हैं, तब जाकर वो अपने बच्चे का भविष्य बचा पाते हैं।
आर्थिक तंगी का यह सच क्या नीति निर्माताओं की फाइलों तक नहीं पहुंचता? जब टैलेंट बराबर का है और जेब दोनों की ही खाली है, तो फिर सरकार की रियायतों में यह कैसा बंटवारा है?
सामाजिक न्याय के नाम पर महज़ वोटबैंक बनकर रह गया है देश का सबसे बड़ा और संघर्षरत OBC तबका
आज़ादी के इतने दशकों बाद भी अगर हम सिस्टम की नीयत को करीब से देखें, तो एक बहुत ही कड़वा सच उभर कर सामने आता है।
हमारे देश की राजनीति ने OBC वर्ग को सिर्फ एक संख्याबल और रैलियों में भीड़ जुटाने वाले वोटबैंक से ज़्यादा कुछ नहीं समझा।
जब चुनाव आते हैं, तो हर राजनीतिक दल इन 2600 जातियों को लुभाने के लिए बड़े-बड़े वादे करता है। मंचों से गला फाड़-फाड़ कर सामाजिक न्याय की कसमें खाई जाती हैं।
लेकिन जब ज़मीन पर योजनाएं लागू करने की बारी आती है, जब खजाना खोलने की बात आती है, तो हमेशा सिर्फ SC/ST वर्ग की ही झोली में आरक्षण की असली मलाई डाल दी जाती है।
OBC को हमेशा लाइन में सबसे पीछे खड़ा कर दिया जाता है। सच कहूं तो नियम ही कुछ इस चालाकी से डिज़ाइन किए जाते हैं जैसे OBC वर्ग को आरक्षण देकर सिस्टम ने कोई बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो।
आप किसी भी राज्य की नीतियां उठाकर देख लीजिए। हॉस्टल की सुविधा फ्री करनी हो, फॉर्म भरने की फीस माफ करनी हो, या फिर ओडिशा सरकार की तरह कॉलेज में ‘जीरो फीस’ एडमिशन देना हो.. इन सभी ज़मीनी फायदों से OBC वर्ग को बहुत ही खामोशी के साथ बाहर कर दिया जाता है।
क्या हमारे नीति निर्माताओं ने यह मान लिया है की OBC वर्ग इतना संपन्न हो चुका है की उसे अब किसी सरकारी सहारे की कोई ज़रूरत ही नहीं है?
जब समाज का एक इतना बड़ा तबका खेतों में, कारखानों में और सड़कों पर पसीना बहा रहा है, तो फिर उन्हें उनके हक़ से महरूम क्यों रखा जा रहा है?
सामाजिक न्याय का तराजू तब तक बराबर नहीं हो सकता जब तक उस तराजू के एक पलड़े पर बैठे OBC वर्ग को भी वही सहूलियतें न मिलें, जो दूसरे SC/ST वर्गों को मिल रही हैं।
जब तक आप कुनबी, कुर्मी, यादव, लोधी, साहू जैसी हज़ारों जातियों के गरीब बच्चों को सिर्फ ‘ओबीसी’ का ठप्पा लगाकर सुविधाओं से बाहर रखेंगे, तब तक सामाजिक न्याय सिर्फ कागज़ों पर लिखी एक खोखली लाइन ही रहेगा।
ओडिशा सरकार का ताज़ा फैसला पूरे देश के नीति निर्माताओं के लिए एक आईना है।
सरकारें चाहे किसी भी पार्टी की हों, उन्हें अब ये बात समझनी ही होगी की 2600 जातियों की इस विशाल आबादी को आप महज़ एक वोटबैंक समझकर अनदेखा नहीं कर सकते।
अगर आप सच में एक ऐसा सिस्टम बनाना चाहते हैं जहां पैसे की कमी की वजह से किसी होनहार बच्चे के सपने न टूटें, तो आपको योजनाएं उस पिता की खाली जेब देखकर बनानी होंगी, ना कि सिर्फ उसका जाति प्रमाण पत्र देखकर।
ओडिशा सरकार के साथ-साथ देश की तमाम राज्य सरकारों को अपने नियमों में संशोधन करना चाहिए। एक ऐसा सिस्टम खड़ा कीजिए जहां ‘जीरो फीस एडमिशन’ का अधिकार हर उस टैलेंट को मिले जो आर्थिक तंगी से जूझ रहा है।
जब तक OBC के गरीब और होनहार छात्रों को भी SC-ST छात्रों के बराबर एडमिशन के वक्त राहत नहीं मिलेगी, तब तक आरक्षण और सामाजिक न्याय के नाम पर चल रहा यह पक्षपात देश के सीने में एक दर्द की तरह चुभता रहेगा।
