उन्हें सतलुज में इसलिये फेंका गया कि चिता न जले, भीड़ न जुटे, हरियाणा भूल जाए। शरीर बह गया। नाम नहीं बहा। बारवास का लड़का जुलानीवाला बनकर आल्ह में खड़ा रहा। फाइल ने उसे डाकू लिखा। गाँव ने सवा शेर कहा। दोनों लिखाइयाँ एक ही रस्सी से बँधी हैं।
उसे सतलुज में इसलिए फेंका ताकि हरियाणा भूल जाए
उन्होंने उसका शरीर रात के अंधेरे में सतलुज में फेंक दिया ताकि हरियाणा में चिता न जले और जेल के फाटक पर भीड़ न लगे। कोई सार्वजनिक विदाई नहीं हुई। कोई अंतिम दर्शन नहीं हुआ। कोई पंडित नहीं बैठा। कोई कफन परिवार के हाथ में नहीं आया। गाँव की स्मृति कहती है कि 27 जुलाई 1936 को अंग्रेजों ने फिरोजपुर जेल के अंदर हरफूल जाट जुलानीवाला को फाँसी दी और शव नदी में छोड़ दिया।
फाँसी दिखाने के लिए दी जाती है। राज रस्सी को नाटक बनाता था। लोग देखें। डरें। घर लौटें। बच्चे को बताएँ कि सिर उठाने की कीमत यही है। यह फाँसी उलटी थी। यह दिखाने की नहीं थी। मिटाने की थी।
जींद और पुरानी नैन पट्टी के लोक-कथन कहते हैं कि स्थानांतरण ही पहली सजा थी। पहले उसे जींद थाने में रखा गया। थाना उसके अपने इलाके का था। वहाँ खबर फैलती। खाप सुनती। स्त्रियाँ द्वार पर आतीं। इसलिए चुपके फिरोजपुर भेज दिया गया। पंजाब की जेल हरियाणा की आवाज से दूर थी। फाटक पर भीड़ न लगे। गीत न उठे। रस्सी चुप रहे।
शव परिवार को नहीं दिया गया। सतलुज में इसलिए डाला गया कि न अंतिम संस्कार हो, न अस्थि बचे, न समाधि बने, न मेला लगे। चिता सार्वजनिक दावा है। आग कहती है, यह आदमी हमारा था। बिना विधि का जल कहता है, कोई नहीं था। साम्राज्य ने जल चुना।
नदी को कब्र बनाया गया। कब्र पर नाम नहीं लिखा जाता जब शरीर ही न मिले। बिना अस्थि के श्राद्ध अधूरा रह जाता है। अधूरा श्राद्ध घर को सालों साल काटता है। राज यही चाहता था। घर रोए, पर इकट्ठा न हो। आल्ह उठे, पर जगह न मिले जहाँ दीया रखा जाए।
फाइल ने उसे डाकू लिखा। गाँव ने उसे गौ-पुत्र कहा। एक ही शरीर पर दो नाम थे। अंग्रेजी कागज हरफूल सिंह सिख डाकू तक गया। गाँव की जुबान हरफूल जाट जुलानीवाला, सवा शेर, गौ-पुत्र तक गई। नदी दोनों नामों को साथ ले गई। कागज एक नाम डुबोना चाहता था। गाँव दूसरा नाम बचाना चाहता था।
जो लड़का बाद में जुलानीवाला बना, उसी साम्राज्य से तह करने वाली बंदूक ले चुका था जिसने बाद में उसे फाँसी दी। वर्दी पहनकर दुनिया देखी। कर्नल के बच्चों को दुश्मनों के घेरे से निकाला। जब पूछा गया उपहार क्या चाहिए, तब सिर्फ तह करने वाली बंदूक मांगी। वह बंदूक घर लौटी। मन नहीं मुड़ा। बची हुई उम्र उसने कसाईखाने तोड़ने में, गरीब किसान और विधवा के साथ खड़े रहने में, और गौ माता को दूसरी माँ मानने में बिताई।
साम्राज्य समझता था कि शरीर नदी में चला गया तो कहानी भी चली जाएगी। वह चूक गया। शरीर जल के साथ बहता है। नाम गाँव की जुबान के साथ ठहरता है। आल्ह आज भी उसे याद रखती है। गौशाला बलिदान दिवस कहती है। पाठ्यपुस्तक चुप है।
यही सवाल बाकी रह जाता है। उसे सतलुज में इसलिए फेंका ताकि हरियाणा भूल जाए। हरियाणा भूला नहीं। नदी कुछ नहीं भूली। गीत नहीं भूला। केवल किताब भूली। किताब क्यों भूली, यह आगे की कहानी है। पहले वह लड़का देखिए जो बारवास की पीली मिट्टी से उठा और जुलानीवाला बनकर फाटक तक गया।

बारवास का लड़का जो जुलानीवाला बना
हरफूल जाट जुलानीवाला श्योराण जाट थे। जन्म 1892 में हुआ। गाँव बारवास। तहसील लोहारू। जिला भिवानी। आज का हरियाणा। तब का सूखा, कर, और थाने का इलाका।
हरियाणा अभिलेखागार उन्हें रत्ना के परिवार में रखता है। यह कागज की पंक्ति है। गाँव की बात और साफ है। बारवास के इंद्रायण पाणा के कुछ लोग उन्हें अपना बताते हैं। पिता का नाम चतरू राम कहते हैं। दादा का नाम कीता राम कहते हैं। दोनों बातें साथ चलती हैं। कागज देर से आता है। ग्रामीण स्मृति पहले बोलती है। एक को काटने की जरूरत नहीं। दोनों को साथ रखना ही ईमान है।
जन्म से प्रसिद्ध नहीं थे। किसान घर में पैदा हुए। खेत छोटा था। घर सादा था। नाम गाँव के बाहर नहीं जाता था। पीली मिट्टी कमजोरी माफ नहीं करती। वह लड़का भी नहीं भूलती जो छोटा रहना मंजूर नहीं करता।
बारवास लोहारू पट्टी का गाँव है। रेत और पीली मिट्टी पास हैं। वर्षा कम है। अकाल दूर नहीं रहता। ऐसे घर में बेटा पैदा होना सौभाग्य भी है और बोझ भी। मुँह में दूध होता है। कंधे पर खेत का हिसाब जल्दी आ जाता है।
जींद के पास जुलानी गाँव ने बाद में वह नाम दिया जिससे हरियाणा उन्हें जानता है। हरफूल जाट जुलानीवाला। हरफूल जाट जुलानी आला। हरफूल श्योराण। बारवास जन्म देता है। जुलानी नाम देता है। दोनों गाँव उसकी कहानी के दो सिरे हैं। एक सिरे पर बच्चा है। दूसरे सिरे पर वह आदमी है जिसकी आल्ह गाई जाती है।
नाम कैसे चलता है, यह गाँव जानता है। आदमी जहाँ लंबा ठहरता है, जहाँ रिश्ते बनते हैं, जहाँ लड़ाई याद रहती है, वही जगह उसके नाम से चिपक जाती है। जुलानी उनके जीवन का वह पड़ाव बना जहाँ लोग उन्हें अपना कहने लगे। इसलिए इतिहास उन्हें बारवास का बेटा कहता है। लोक उन्हें जुलानीवाला कहता है। दोनों सत्य पास-पास खड़े हैं।
इंद्रायण पाणा आज भी दावा करता है। दावा प्रेम का है, कागज का नहीं। गाँव अपना वीर खोना नहीं चाहता। दूसरा गाँव अपना गौरव छोड़ना नहीं चाहता। इस झगड़े में सच्चाई यह है कि लड़का एक था। मिट्टी दो थीं। नाम बाद में एक हो गया।
बचपन का चेहरा किसी सरकारी फोटो में नहीं बचा। बचा गाँव का वाक्य है। सात वर्ष का लड़का। पिता नहीं रहे। घर टूटा। माँ ने देवर से घर जोड़ा। रिश्तेदारों की ओर कूच हुआ। जमीन का हिस्सा नहीं मिला। झूठा मुकदमा बना। थाने की देहरी पर बच्चा खड़ा हुआ। यहीं से बारवास का बेटा सिर्फ बेटा नहीं रहा। वह उस लड़के में बदलने लगा जिसे बाद में जुलानीवाला कहा गया।
जो लोग केवल जन्मगाँव पूछते हैं, वे आधा पूछते हैं। पूरा प्रश्न यह है कि लड़का कहाँ से उठा, कहाँ ठहरा, और किस गाँव ने उसका नाम अपनी जुबान पर बिठाया। बारवास ने जन्म दिया। अकाल ने बचपन काटा। जुलानी ने नाम रखा। हरियाणा ने गीत बचाया।
आज भी जब कोई आल्ह गाता है तो पहले जुलानीवाला आता है। बारवास पीछे खड़ा रहता है, जैसे पिता का घर। जुलानी आगे आता है, जैसे वह आँगन जहाँ मेहमान नाम पूछते हैं। दोनों आँगन बिना एक-दूसरे के पूरे नहीं होते।
यह लड़का किताब के नायक की तरह राजमहल में नहीं जन्मा। न कोई झंडा घर पर फहराता था। न कोई भविष्यवक्ता द्वार पर बैठा था। एक किसान घर था। एक विधवा के करीब पहुँचती माँ थी। एक हिस्सा माँगता अनाथ था। इतने से जीवन शुरू हुआ। आगे अकाल आया। प्लेग आया। हवालात आई। फिर वर्दी आई। फिर तह करने वाली बंदूक आई। फिर गौ माता आई। फिर टोहाना आया। फिर सतलुज आया।
लेकिन वह सब बाद की बात है। पहले केवल बारवास का लड़का था। पीली मिट्टी पर पैर रखता था। नाम अभी छोटा था। दुनिया अभी थाने से बड़ी नहीं लगी थी। वही छोटा नाम एक दिन इतना बड़ा हुआ कि राज को शव नदी में छिपाना पड़ा।
बारवास का लड़का जुलानीवाला इसलिए बना कि घर ने धक्का दिया, गाँव ने ठहराया, और अन्याय ने रास्ता चुना। जन्म स्थान एक पंक्ति है। यात्रा पूरी कहानी है।

अकाल, प्लेग और हवालात में एक बच्चा
लगभग 1899 में वह अकाल चला जिसे लोग छप्पनिया अकाल कहते हैं। साथ में प्लेग चला। लोक-स्मृति कहती है कि पिता का देहांत तब हुआ जब लड़का करीब सात साल का था। घर का मुखिया गिर गया। खेत का हिसाब अधूरा रह गया। चूल्हा ठंडा पड़ने लगा।
छप्पनिया केवल वर्ष नहीं था। वह पीढ़ी का नाम था। बूढ़े आज भी अकाल को साल से नहीं, पेट से याद करते हैं। अनाज महंगा हुआ। कुएँ कम पड़े। गाँव के द्वार पर बीमारी खड़ी रही। प्लेग ने जो छोड़ा, भूख ने काटा। जो भूख ने छोड़ा, थाने ने पकड़ा।
पिता के बाद घर संभला नहीं। माँ ने देवर से दूसरा विवाह किया। यह गाँव की मजबूरी थी, कहानी की सजावट नहीं। विधवा अकेली नहीं रह सकती थी। अनाथ बेटा अकेला नहीं पाल सकती थी। नया घर बना। पुराना हिस्सा पीछे छूट गया। परिवार जुलानी और रिश्तेदारों की ओर बढ़ा।
यहीं से दूसरी चोट आई। चाचाओं ने जमीन का हिस्सा नहीं दिया। अनाथ का हक कागज पर कमजोर होता है। जब पिता नहीं, गवाह कम हो जाते हैं। जब गवाह कम हों, मुकदमा आसान हो जाता है। झूठा मामला बन गया। लड़का अदालत में नहीं, थाने में पहुँचा।
जींद पुलिस ने बच्चे को पकड़ा और यातना दी
गाँव की आल्ह इस हिस्से को नरम नहीं करती। लोक-स्मृति कहती है कि छोटी टाँग पर खाट की टाँग दबाई गई। बच्चा चिल्लाया। कमरा चुप रहा। कुछ समय बाद छोड़ दिया गया। छूटना न्याय नहीं था। छूटना इसलिये था कि बच्चा मर जाए तो सवाल खड़े होते।
बच्चा हड्डी पर लकड़ी का बोझ नहीं भूलता। यह भी नहीं भूलता कि किसने दबाया। दर्द शरीर छोड़ देता है। नक्शा नहीं छोड़ता। कौन कमरा था, कौन खाट थी, कौन आदमी खड़ा था, यह नक्शा जिंदगी भर साथ चलता है।
माँ का पक्ष लोक-कथन में आता है। वह बेटे के साथ खड़ी हुईं। उनकी एक न चली। बाद में देखभाल भी रुक गई, कुछ कथन ऐसा कहते हैं। घर दो टूक हो गया। एक ओर नया संसार था। एक ओर वह लड़का था जिसे हिस्सा चाहिए था और मिला हवालात।
यह बचपन का अंत है। खेल यहीं टूटता है। स्कूल अगर था भी तो थाने के बाद क्या बचता। सात वर्ष का लड़का अब सिर्फ अनाथ नहीं रहा। वह उस अनुभव का मालिक बन गया जिसे बड़े लोग जुल्म कहते हैं और दफ्तर लोग व्यवस्था कहते हैं।
राज की पहली फाइल यहीं से शुरू हुई, भले बाबू ने सोचा हो कि लड़का जवाब देने तक जिएगा नहीं। दूसरी फाइल बहुत बाद में अंग्रेजी अखबार के पन्ने पर आई। उन दो कागजों के बीच एक पूरा जीवन खड़ा था। बीच में सेना थी। बीच में साधु था। बीच में टोहाना था। लेकिन जड़ यहीं थी: अकाल ने पिता लिया, रिश्ते ने हिस्सा लिया, थाने ने बचपन लिया।
जो लोग बाद में उन्हें केवल बंदूक से जानते हैं, वे यह दृश्य भूल जाते हैं। बंदूक बाद में आई। पहले खाट की टाँग आई। जो बच्चा हवालात से बाहर निकला, वह सिपाही इसलिए बना कि घर में जगह नहीं बची। वह गौरक्षक इसलिए बना कि माँ के बाद एक और माँ दिखी। वह सवा शेर इसलिए बना कि बावन गाँव हार चुके थे। लेकिन वह आदमी इसलिए बना कि सात वर्ष की उम्र में राज्य ने उसे अपराधी की तरह कुचला।
छप्पनिया चला गया। प्लेग चला गया। थाना वही रहा। लड़का नहीं रहा। उसकी जगह वह स्मृति रह गई जो आल्ह आज भी गाती है: बारवास का बेटा छोटा था, खाट बड़ी थी, और इंसाफ कहीं नहीं था।
वह सिपाही जिसने सिर्फ तह करने वाली बंदूक मांगी
वह ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए। करीब दस वर्ष सेवा की। प्रथम विश्वयुद्ध में भी गए। सामुदायिक स्मृति कहती है कि दुश्मनों से घिरे एक ब्रिटिश कर्नल के बच्चों की जान उन्होंने बचाई। अफसर खुश हुए। जब सेवा छोड़ी तो पूछा, उपहार क्या चाहिए।
उन्होंने तह करने वाली बंदूक मांगी। दे दी गई।
पदक मत गढ़िए। रेजिमेंट नंबर मत गढ़िए। जाटलैंड और गाँव की बात में यही बचा है: सेवा की, साम्राज्य की वर्दी के अंदर उसकी दुनिया देखी, और घर तह करने वाली बंदूक लेकर लौटे। मन नहीं मुड़ा।
तह करने वाली बंदूक काम की चीज है। छिपती है। चलती है। इंतजार करती है। साम्राज्य ने सोचा, एक काम का सिपाही चुका दिया। सिपाही ने औजार ले लिया।
एक साधु, दो माताएँ और नया जीवन
गाँव लौटे तो पहले उस पुलिस वाले से हिसाब चुकाया जिसने बचपन में यातना दी थी। लोक-कथन इसे गायों की बड़ी लड़ाई से पहले रखते हैं। कहते हैं, खाट की टाँग तले कुचला गया लड़का भूलने वाला आदमी बनकर नहीं बड़ा।
फिर पता चला, माँ चल बसीं।
वह जंगल चले गए।
वहाँ एक साधु मिले जो गाय पालते थे। साधु ने कहा, गाय भी माँ है। उस दिन से हरफूल ने गौ माता को अपनी माँ माना।
यह अदालती सबूत नहीं है। यह गाँव का धर्म है, धूल और दूध की भाषा में। दो माताएँ: वह स्त्री जिसने अकाल में पाला, और वह गाय जो खेत चूक जाए तो घर पालती है। उस भेंट के बाद गौरक्षा नारा नहीं रही। जीवित माँ का फर्ज रही।
साधु ने पदवी नहीं दी। बावन गाँव बाद में देंगे। साधु ने वह वजह दी जो तह करने वाली बंदूक से आगे निकलेगी।
गाय उसका रणक्षेत्र क्यों बनी
अंग्रेजी राज में इस इलाके में रांगड़ और दूसरे कसाइयों द्वारा गौ-हत्या आम थी। स्थानीय हिंदू और बावन गाँव की नैन खाप कई बार कसाईखाने पर चढ़े। असफल रहे।
उन्होंने हरफूल को बुलाया।
राज के नीचे गौरक्षा पहले से अपराध बन जाती थी जब वह लाइसेंसशुदा कसाई और उसके पीछे बैठे राजस्व को छूती। यह नया नहीं था। 1872 में मलेरकोटला में कसाइयों पर कूका यानी नामधारी हमले के बाद अंग्रेजी प्रतिशोध हुआ था। साम्राज्य पहले दिखा चुका था कि हत्था तोड़ने वाले आदमी के बारे में उसकी राय क्या है।
हरफूल उसी पुरानी पंक्ति में खड़े हुए। अर्जी का इंतजार नहीं किया। उस प्रस्ताव का इंतजार नहीं किया जो कभी आया ही नहीं।
कसाई उनके नाम की अफवाह से भागने लगे। सामुदायिक स्मृति कहती है कि गौ-तस्करी भी रोकी। सड़क और हत्था एक ही युद्ध थे। एक माँ बेचता था। दूसरा मारता था।
गौरक्षा के अलावा वह गरीब किसान, विधवा और सताए हुए लोगों के लिए चलती-फिरती अदालत बने। जाट स्मृति उन्हें उत्तर भारत का हरियाणवी रॉबिन हुड कहती है। यह वाक्य लोक का है, राजपत्र का नहीं। मतलब यह कि जो कमजोर को कुचलते थे उनसे डर छीना, जिनके पास कुछ नहीं था उन्हें साँस दी।
23 जुलाई 1930: वह स्त्री जो टोहाना में घुसी
23 जुलाई 1930 को टोहाना के कसाइवाड़ा यानी कसाईखाने में उन्होंने स्त्री का भेष धरा, अंदर गए, कसाइयों को उलझाए रखा, और अपने आदमियों के साथ वार किया।
मुस्लिम रांगड़ कसाई मारे गए। काटी जाने वाली गायें छूटीं।
यह गाँव का कथन है। जाटलैंड के पन्नों में, आल्ह में, और बाद की स्मृति-सभाओं में यही दोहराया जाता है।
योजना सादी थी क्योंकि जगह चौकन्नी थी। हरफूल नाम का आदमी भीतर नहीं जा सकता था। एक स्त्री जा सकती थी। बात चलती रही। आदमी बढ़े। जो हत्था नैन खाप वर्षों नहीं तोड़ सकी, वह एक सुबह टूट गई।
टोहाना आज भी टीले और बदले मोहल्ले की ओर उँगली उठाता है जब बूढ़े उस दिन की बात करते हैं। मकान बदल गए। तारीख नहीं बदली।
बावन गाँव का सवा शेर
बावन गाँव की नैन खाप ने उन्हें सवा शेर की उपाधि दी।
सवा शेर सरकार का पदक नहीं है। खाप का फैसला है। मतलब शेर से भी अधिक। मतलब वह आदमी जिसने वह काम पूरा किया जो बावन गाँव मिलकर नहीं कर सके।
फिर उन्होंने जींद, नरवाना, गोहाना और रोहतक के कसाईखाने तोड़े। सामुदायिक स्मृति कहती है कि बहुत से हत्थे तोड़े। कुछ स्मरण 17 कहते हैं। कुछ 36 तक कहते हैं। गिनती को जनगणना मत बनाइए। इसे स्मृति रहने दीजिए। संख्या इसलिए बढ़ी क्योंकि भय बढ़ा। नाम गली में उनसे पहले पहुँच जाता तो कसाई भाग खड़े होते।
बंद तथ्य: उपाधि
- किसने दी: बावन गाँव की नैन खाप।
- किसके बाद: टोहाना, 23 जुलाई 1930।
- गाँव में अर्थ: वह पुरुष जिसने खाप का अधूरा काम पूरा किया।
- थाने में अर्थ: वांछित नाम।
टोहाना के बाद वह केवल जुलानीवाला नहीं रहे। हत्था जिनसे डरता था, वह आदमी बन गए।
पीली मिट्टी की सड़क पर रॉबिन हुड
जींद, हिसार और रोहतक की पीली सड़कों पर केवल गाड़ी नहीं चलती थी। अफवाह भी चलती थी।
विधवा का खेत छीना गया। किसान कर न दे सका तो पीटा गया। किसी बेटी का अपमान हुआ। लोक-स्मृति कहती है कि खबर जाती, हरफूल ऐसे पहुँचते जैसे अदालत जो टिकट के कागज का इंतजार नहीं करती।
जाट स्मृति इसे चलती अदालत कहती है। उस समय जब कमजोर की रक्षा कम थी, स्त्रियों का सम्मान रखते थे। गरीब किसान के साथ खड़े रहते थे। सताए हुए के साथ खड़े रहते थे। रॉबिन हुड का नाम उत्तर भारतीय जाट बात में इसलिए चिपक गया। यह अंग्रेजी रोमांस नहीं है। गाँव का तरीका है कहने का कि बलवान से भय लिया और निर्बल को साँस दी।
जीवन का यह हिस्सा अखबार के कॉलम में कम मिलता है। आल्ह में रहता है। उस आवाज में रहता है जब बुजुर्ग औरतें आज भी धीमे स्वर में कहती हैं, अगर बात समय पर पहुँची तो बहन को डरी हुई घर नहीं लौटने दिया।
गौरक्षा ने प्रसिद्ध किया। न्याय ने प्रिय बनाया। राज को दोनों रोकने थे।
राज ने उसे डाकू कैसे लिखा
9 अगस्त 1930 के टाइम्स ऑफ इंडिया ने उन्हें सिख डाकू हरफूल सिंह बताकर हत्याओं की सूची दी, जिसमें टोहाना की कार्रवाई भी थी।
औपनिवेशिक फाइलों ने अपराधी बनाया। गाँव की आल्ह ने रक्षक बनाया।
दोनों पाठ रखिए।
औपनिवेशिक आरोपपत्र मत छिपाइए। कागज ने हत्याएँ लिखीं, कस्बे में आतंक लिखा, उस आदमी को लिखा जो घुसा और गोलियाँ चलाईं। नाम तक सिख लिख दिया। वह भूल बताती है कि शहर की मेज बारवास के श्योराण लड़के को कितना कम जानती थी, और पुलिस अधिनियम में फिट बैठने वाला लेबल कितनी जल्दी चाहिए था।
आरोपपत्र को गौ माता और गाँव की इज्जत का हेतु मिटाने न दीजिए।
कसाईखाने तोड़ने वाले आदमी के लिए राज की भाषा डाकूगिरी थी। पहले भी गौरक्षकों पर वही कलम चली थी। अखबार का कॉलम जंगल के साधु को नहीं देख सकता। वह शव गिन सकता है और गिरफ्तारी माँग सकता है।
बंद अंतर
- अखबार की फाइल, 9 अगस्त 1930: सिख डाकू, हरफूल सिंह, टोहाना की हत्याएँ अपराध।
- गाँव की आल्ह और खाप स्मृति: गौ-पुत्र, सवा शेर, गायें मुक्त, हत्था टूटा।
- एक ही सप्ताह। एक जिले के भीतर दो देश।
यहीं कहानी दो फाटकों पर खड़ी होती है। अगस्त 1930 के बाद राज्य डाकू खोजता रहा। गाँव भाई छिपाते रहे।
वह रात जब सोते हुए पकड़ा गया
वह भूमिगत रहे। अंग्रेजों ने सिर पर इनाम रखा। फिर भी वर्षों तक हाथ नहीं आया।
छिपने की जगह पचेड़ी बताई जाती है, कई कथन में पचारी कलां, बहन का घर। कोई कहता है, जिस ठाकुर पर भरोसा था उसने पुलिस को बताया। कोई कहता है, ब्राह्मण मुँहबोली बहन के पति ने बताया।
पुलिस ने रात को सोते हुए गिरफ्तार किया।
जो आदमी टोहाना में स्त्री बनकर घुसा था, उसे नींद में एक फुसफुसाहट ने पकड़ लिया। बहुत सी ग्रामीण बगावतें मैदान में नहीं खत्म होतीं। आँगन में खत्म होती हैं। विश्वसनीय घर में। उस घंटे में जब बंदूक हाथ में नहीं होती।
लोक-कथन मुखबिर के नाम पर एक नहीं हैं। घाव पर एक हैं। विश्वासघात वह पंक्ति है जो हर आल्ह बचाकर रखती है।
पहले जींद थाने में रखा गया। फिर चुपके फिरोजपुर जेल भेजा गया ताकि हरियाणा न उठे।
सिर का इनाम वर्षों असफल रहा। एक रात का विश्वास सफल रहा।
फिरोजपुर की रस्सी, बिना चिता की नदी
सामुदायिक स्मरण कहता है कि 27 जुलाई 1936 को फाँसी हुई। गौशालाएँ बाद में दिन को बलिदान दिवस और गौरक्षक दिवस कहकर मनाने लगीं।
शव परिवार को नहीं मिला। सतलुज में इसलिए डाला गया कि न संस्कार हो, न भीड़ लगे। चिता सार्वजनिक दावा है कि यह आदमी हमारा था। आग कहती है, हमारा है। बिना विधि का जल कहता है, कोई नहीं था।
साम्राज्य ने जल चुना।
फाजिल्का और जींद की कुछ सभाएँ आज भी बलिदान दिवस पर जुड़ती हैं और वही अंत कहती हैं। लेखिका राजवंती मान ने बाद में जीवन को पुस्तक में बाँधा ताकि कहानी केवल गीत में न रहे। हरियाणवी रंगीन फिल्म, जीवनी पर बनी वीर हरफूल जाट जुलानी, उन तक पहुँची जो पीपल के नीचे आल्ह नहीं बैठे थे।
रस्सी पंजाब में थी। शोक हरियाणा में था। नदी दोनों के बीच बहती रही और जेल वाला भेद अपने पास रखा।
वह गीत जो फाइल से आगे निकला
हरियाणवी आल्ह आज भी नाम लेती है।
आल्ह पादटिप्पणी नहीं है। किसान समाज उसी में रखता है जो स्कूल नहीं पढ़ाता। छंद में बच्चे की यातना है, तह करने वाली बंदूक है, टोहाना की स्त्री है, सवा शेर की उपाधि है, पचेड़ी की नींद है, बिना चिता की नदी है।
लोग आज भी हर हरियाणा कस्बे में गौ-पुत्र हरफूल सिंह के नाम पर चौक या पार्क माँगते हैं। जींद, फाजिल्का और अन्य जगहों की गौशालाएँ दिन याद करती हैं। जुलानी, गंगाना और टोहाना के पुराने टीले तक कैमरा अब भी पहुँचता है।
लोक-कथन उन्हें अनाथालय या अमृतसर के वर्षों में उधम सिंह से भी जोड़ते हैं। इसे केवल जीवित मौखिक स्मृति मानिए, सिद्ध फाइल नहीं। कड़ी बताती है कि गाँव अपने वीरों को एक पंक्ति में कैसे बिठाता है। पुलिस डायरी की जगह नहीं लेती।
फाइल चाहती थी 1936 में खत्म हुआ डाकू। गीत चाहता था वह आदमी जो हत्थे का नाम रात को लिया जाए तो पीली सड़क पर अब भी चलता है।
पाठ्यक्रम चुप क्यों रहा
स्कूल की किताबें लगभग नाम नहीं लेतीं।
कारण हैं, और कोई भी भोला नहीं है।
वह साफ अध्याय में नहीं बैठते जो अर्जी से जेल और झंडे तक चलता है। बंदूक उठाई। लाइसेंसशुदा कसाईखाने तोड़े। जिन लोगों को राज्य व्यापारी कहता था उन्हें मारा। घर से दूर फाँसी दी गई ताकि घर शांत रहे। औपनिवेशिक आरोपपत्र की नकल आसान है। खाप की उपाधि की नहीं।
राज के नीचे गौरक्षा बाद के लेखकों के लिए टेढ़ी जगह पर रही। किसी को बहुत धर्म लगा। किसी को बहुत रक्त। विश्वविद्यालय को बहुत गाँव। 1872 के कूका शहीदों ने पहले दिखा दिया था कि साम्राज्य ऐसे पुरुषों को कैसे लिखता है। हरफूल पर वही कलम चली।
पाठ्यक्रम उस नायक को पसंद करता है जिसे स्टाफ रूम में झगड़ा किए बिना छापा जा सके। जुलानीवाला का नाम लेते ही झगड़ा शुरू हो जाता है। इसलिए आल्ह ने बचाया और किताब ने छोड़ दिया।
चुप्पी भी नीति है। बच्चे ने नाम न सुना तो पूछेगा भी नहीं कि नदी को शरीर क्यों मिला और परिवार को कुछ नहीं।
अंग्रेजी राज की अकाल राहत: कागज की नीति, गाँव का पेट
छप्पनिया के साल में हरफूल का घर टूटा। उस घर के पीछे एक पूरी राजव्यवस्था खड़ी थी। वह व्यवस्था कहती थी, हम राहत दे रहे हैं। गाँव कहता था, राहत देरी से आई, नाप-तोल कर आई, और बहुतों तक आई ही नहीं। दोनों बातें साथ पढ़नी पड़ती हैं।
नीति कहाँ से आई
1860 और 1870 के दशक के अकालों के बाद अंग्रेजों ने अकाल को केवल भगवान का प्रकोप नहीं रहने दिया। उसे फाइल का विषय बनाया। 1880 के स्ट्रेची आयोग के बाद 1883 का प्रोविजनल फेमिन कोड आया। बाद में प्रांत अपने कोड बनाते गए। सिद्धांत साफ था। सूखा लगे तो सरकार इंतजार करे, फिर टेस्ट वर्क खोले, फिर राहत कार्य चलाए, फिर मुफ्त खाना उनको दे जिन्हें काम करने लायक न माना जाए।
कोड का मतलब दया नहीं था। कोड का मतलब खर्च पर लगाम था। राज नहीं चाहता था कि राहत आदत बन जाए। इसलिए मदद को जानबूझकर कड़वा रखा गया। मजदूरी कम। काम कठिन। दूरी ज्यादा। जो सचमुच मरने के करीब हो, वही आए। बाकी गाँव अपने खेत पर मरता रहे, यह कागज की भाषा में मितव्ययिता कहलाती थी।
टेस्ट वर्क क्या था
पहले टेस्ट वर्क खुलता था। सड़क, तालाब, मिट्टी का बांध। मजदूरी इतनी रखी जाती कि सामान्य किसान वहाँ जाना पसंद न करे। अगर भीड़ लग जाए, तब सरकार मानती कि अकाल असली है। भीड़ न लगे तो रिपोर्ट लिखी जाती, जिला अभी संभल सकता है। पेट की परीक्षा दफ्तर की परीक्षा बन गई।
हिसार और दक्षिण-पूर्वी पंजाब में 1896-97 में यही चक्र चला। नवंबर तक अकाल आधिकारिक माना गया। राहत कार्य खुले। बच्चे और अशक्त आश्रितों के लिये कुछ मुफ्त व्यवस्था लिखी गई। 1899-1900 में वही ढांचा और बड़े पैमाने पर दोहराया गया। देश भर में एक समय राहत पर करोड़ों लोग बताए गए। आंकड़ा बड़ा लगता है। गाँव तक पहुँच छोटा रह गया।
क्या मिलता था, क्या नहीं मिलता था
मिलता था काम। मिलती थी कम मजदूरी। कभी अनाज, कभी नकद। कुछ जगह पूरहाउस यानी निढालों का घर। लगान की कुछ माफी या स्थगन। किसान को थोड़ा तकावी यानी अग्रिम। कागज इन्हीं पंक्तियों पर गर्व करता है।
नहीं मिलता था वह अधिकार कि आदमी अपने गाँव में बैठकर जिंदा रहे। नहीं मिलती थी वह कीमत जिस पर अनाज खरीद सके। रेल अनाज को बाहर भी ले जाती रही। बाजार खुला रहा। निर्यात की बहस उस काल की कड़वी सच्चाई है। गोदाम भरा हो और द्वार पर बच्चा भूखा हो, यह दृश्य कई जिलों में दोहराया गया।
मवेशी नीति लगभग अनुपस्थित रही। त्रिकाल में चारा सबसे पहले खत्म होता है। बैल गिरे तो हल गिरा। हल गिरा तो अगली फसल का सवाल ही खत्म। हिसार की पुरानी रिपोर्टें पहले अकाल में ही हल-मवेशी की भारी तबाही लिख चुकी थीं। दूसरा अकाल उसी टूटी रीढ़ पर आया। आदमी के लिये कुछ काम निकला। ढोर के लिये नीति बहुत देर से और बहुत पतली निकली।
रियासत और ब्रिटिश जिला
लोहारू रियासत था। बारवास उसी छाया में था। हिसार ब्रिटिश जिला था। कोड सीधे ब्रिटिश जिले में चलता था। रियासत में राजा की तैयारी पर निर्भर था। जनगणना के बाद के आकलन कहते हैं, 1899-1900 में देशी रियासतों में मृत्यु कहीं अधिक रही क्योंकि वहाँ राहत का संगठन कमजोर था। मतलब साफ है। एक ही सूखा। दो शासन। दो मौतें।
कर्जन 1899 में वायसराय बने। उन्होंने अकाल को भारतीय इतिहास का सबसे फैला और भयानक बताया। यह स्वीकारोक्ति थी, उपचार नहीं। स्वीकारोक्ति के बाद भी सिद्धांत वही रहा: काम करो, तब खाओ। जो काम पर न पहुँचे, उसका नाम आंकड़े में कम आता।
बीमारी नीति के छेद से घुसी
राहत कार्य भीड़ जमा करते थे। गंदा पानी, कमजोर शरीर, हैजा। 1900 की बारिश के साथ मलेरिया। कई रिपोर्टें लिखती हैं, बाद के महीनों में बुखार ने भूख से ज्यादा मारा। प्लेग 1896 से पहले से चल रहा था। अकाल ने शरीर गिराया। महामारी ने गिराए हुए को गिन लिया। हरफूल की कथा में पिता प्लेग से गए, यह उसी छेद से जुड़ता है। राहत ने अनाज का हिसाब रखा। संक्रमण का हिसाब बाद में आया।
गाँव ने नीति को कैसे पढ़ा
किसान कोड नहीं पढ़ता था। वह भाव पढ़ता था। सेर कितने का हुआ। कुआँ कितना बचा। लगान कब आया। थानेदार कब आया। अकाल के साल में कर माफ होने में देरी लगती तो घर पहले बिक जाता। अनाथ का हिस्सा सबसे पहले दबता। झूठा मुकदमा उसी कमजोर घर पर आसानी से चिपकता। हरफूल वाले बचपन की हवालात केवल पुलिस की कहानी नहीं। वह उस राज्य की कहानी भी है जिसने सूखे को फाइल बनाया और बच्चे को कैदी।
नीति का सार एक वाक्य में
अंग्रेजी अकाल नीति ने भुखमरी को अपराध की तरह जाँचा। सबूत चाहिए था कि लोग सचमुच मर रहे हैं। सबूत के लिये उन्हें सड़क पर लाया गया। जो सड़क तक नहीं पहुँचा, वह सांख्यिकी से बाहर मर गया। जो पहुँचा, उसने कम मजदूरी पर मिट्टी काटी। जो बच्चे घर में रह गए, उनकी माँ के पास देने को दूध नहीं बचा।
छप्पनिया इसी नीति के अंदर आया। कागज कहता है, राहत चली। आल्ह कहती है, पिता गए, हिस्सा गया, थाना आ गया। दोनों वाक्य एक ही साम्राज्य के दो चेहरे हैं। एक चेहरा आयोग की रिपोर्ट है। दूसरा चेहरा बारवास के सात वर्ष के लड़के की टाँग पर रखी खाट की टाँग है।
हरफूल जाट की सेना सेवा: जो तथ्य हैं, जो अनुमान हैं
सेना वाला अध्याय हरफूल जाट जुलानीवाला की कहानी का पुल है। एक छोर पर हवालात का बच्चा है। दूसरे छोर पर टोहाना का सवा शेर है। बीच में वर्दी है। कागज यहाँ पतला है। गाँव की जुबान मोटी है। दोनों को अलग रखिए।
गाँव और जाटलैंड क्या दोहराते हैं
जाटलैंड, गौशाला स्मरण और आल्ह एक छोटी सूची पर सहमत हैं।
बचपन की यातना और हिस्से के झगड़े के बाद हरफूल ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए। करीब दस वर्ष सेवा की। प्रथम विश्वयुद्ध में गये। सेवा के दौरान एक ब्रिटिश कर्नल के बच्चे दुश्मनों से घिर गये। कुछ कथन में पत्नी भी साथ है। हरफूल ने जान बचाई। अफसर खुश हुए। जब सेवा छोड़ी तो पूछा, उपहार क्या चाहिए। उन्होंने तह करने वाली बंदूक मांगी। दे दी गई।
यही केंद्र है। यह लोक-स्मृति है। छपी हुई सेवा-पुस्तिका नहीं है।
जो अब तक सार्वजनिक फाइल में नहीं मिला
रेजिमेंट का नाम नहीं मिला। बटालियन नहीं मिली। सेवा संख्या नहीं मिली। पद नहीं मिला। युद्ध का मैदान नहीं मिला। पदक-नामावली नहीं मिली। छुट्टी का कागज नहीं मिला।
इसलिए छठी जाट लाइट इन्फैंट्री मत लिखिए। चौदहवीं लांसर्स मत लिखिए। न्युव शापेल या हाइफा को उनका युद्धक्षेत्र मत बनाइए। वे जाटों के रास्ते थे। हरफूल का पक्का रास्ता अभी कागज पर नहीं है।
तह करने वाली बंदूक भी मॉडल से नहीं पहचानी गई। उस काल में तह होने वाली चीज शॉटगन भी हो सकती थी, जेबी पिस्तौल भी, यात्रा के लिये सिकुड़ने वाला हथियार भी। गाँव केवल फोल्डिंग गन कहता है। इसे स्मृति रहने दीजिए, आयुध-सूची नहीं।
भर्ती का दरवाजा उस लड़के के लिये क्यों खुला
1857 के बाद अंग्रेजी सेना ने उत्तर के किसान को मार्शल रेस कहा। हिंदू जाट उस सूची में थे। रोहतक, हिसार, भिवानी, जींद, गोहाना, झज्जर की पट्टी भर्ती का अच्छा मैदान मानी गई। शांति काल में जबरन भर्ती नहीं थी। रेजिमेंट की पार्टी तहसील आती थी। सही गोत्र, सही छाती, सही लंबाई, साफ रोग-रिपोर्ट चाहती थी। तनख्वाह, राशन, वर्दी, बाद में पेंशन। साथ में इज्जत।
1899 के अकाल के बाद बारवास का घर टूटा था। हिस्सा नहीं मिला था। थाना निशान लगा चुका था। सूखी पीली मिट्टी पर खेत कम पड़ता था। सेना उस लड़के के लिये मजदूरी भी थी, निकास भी था। लोहारू रियासत था, हिसार ब्रिटिश जिला। दोनों तरफ से जवान जाते थे। यह परिवेश भर्ती को संभव बनाता है। यह इकाई का नाम नहीं देता।
विश्वयुद्ध ने मशीन कैसे चलाई
1914 से 1918 तक भारत से तेरह से पंद्रह लाख आदमी गये, सिपाही और अनुचर मिलाकर। भर्ती कागज पर स्वैच्छिक रही। 1917-18 में दबाव बढ़ा। पंजाब में भर्ती बोर्ड बना। जेलदार, पीर, गाँव के बड़े आदमी कोटा भरने पर इज्जत, खिताब, कभी नहर-कॉलोनी की जमीन पाते थे। मार्शल सूची युद्ध के बोझ से टूटी। महार, बंगाली, ईसाई फिर लिये गये। युद्ध खत्म होते-होते फौज का बड़ा भाग फिर पुरानी सूची से ही आया। जाट उस भाग में रहे।
ऐसे जवान फ्रांस, फ्लैंडर्स, मेसोपोटामिया, मिस्र, फिलिस्तीन, पूर्वी अफ्रीका, गैलीपोली, सीमांत देख सकते थे। हरफूल इनमें से किसे देखे, यह लोक नहीं बताता। लोक केवल इतना गाता है: युद्ध देखा, कर्नल के बच्चों को बचाया, तह करने वाली बंदूक लेकर घर लौटे।
पद और उपहार का अंतर
नया सिपाही सिपाही होता है। ऊपर नायक, हवलदार, किसी-किसी को जमादार। कमीशन रेखा अंग्रेज अफसर के पास रहती थी। अभियान पर या छावनी में कर्नल के घर को भरोसेमंद अर्दली चाहिए होता था। उस घर को बचाना व्यक्तिगत उपहार समझाता है। फौज सिपाही को राइफल देती है, निजी तह करने वाली बंदूक नहीं। विदाई की बंदूक अफसर की कृपा बैठती है, गजट के पदक नहीं। अब तक सार्वजनिक स्मरण में हरफूल का पदक-रोल नहीं निकला।
दूसरी मौखिक धारा
कुछ हरियाणवी मंच-कथन सेना को घुमा देते हैं। कहते हैं, अमृतसर में किसी सेवानिवृत्त सरदार मेजर के अंगरक्षक रहे। क्लब में अंग्रेज ने मेजर का अपमान किया। हरफूल ने गोलियाँ चला दीं। मेजर ने घोड़ा और तह करने वाली बंदूक देकर विदा किया। वही धारा कभी उन्हें उधम सिंह के अनाथालय या अमृतसर के वर्षों से जोड़ती है।
यह जीवित जुबान है। सिद्ध सेना डायरी नहीं है। अगर कोई दस वर्ष की भर्ती पर शक करे, तो लोक हथियार की पढ़ाई का दूसरा दरवाजा यूँ खोलता है। दोनों धाराएँ साथ रखिए। एक को प्रमाणपत्र मत बनाइए।
सेना ने बाद की जिंदगी को क्या दिया
गाँव लौटे तो लोक कहता है, पहले उसी थानेदार से हिसाब चुकाया जिसने बचपन में खाट की टाँग दबाई थी। वही हाथ बाद में स्त्री का कपड़ा पहनकर टोहाना घुसा। फौज देख चुका आदमी पहरेदार की भाषा पहचानता है। गली कैसे रुकती है, वार कब लगता है, यह ड्रिल सिखाती है। चलती अदालत का नाम भी रात की सड़क जानने वाले सिपाही पर बैठता है।
उपहार वाला दृश्य काज है। साम्राज्य ने उसे काम का सिपाही समझा। उसने औजार लिया। वही साम्राज्य बाद में उसे डाकू लिखेगा। समुदाय कहता है, वही साम्राज्य फिरोजपुर में फाँसी देकर शव सतलुज में छोड़ेगा। वर्दी और रस्सी एक राज्य की हैं।
कैसे लिखें, कैसे न लिखें
लिखिए: ब्रिटिश भारतीय सेना में करीब दस वर्ष रहे। लोक-स्मृति कहती है प्रथम विश्वयुद्ध में गये। लोक-स्मृति कहती है कर्नल के बच्चों की जान बचाई और छुट्टी पर तह करने वाली बंदूक मांगी। लिखिए: रेजिमेंट का पक्का नाम अब तक सार्वजनिक नहीं मिला।
अलग वाक्य में लिखिए: अमृतसर और उधम सिंह वाला नाता मौखिक धारा है, फाइल नहीं।
जाति, इलाका और अकाल भर्ती को समझाते हैं। वे टोपी का बिल्ला नहीं देते। सेना वाला अध्याय कागज पर छोटा है। उसके बाद की जिंदगी पर उसका बोझ बड़ा है। बंदूक यहीं से घर आई। गौ माता बाद में आई। टोहाना और सतलुज उससे भी बाद में आए।
हरफूल जाट जुलानीवाला का महत्त्व: गाँव ने याद रखा, पाठ्यक्रम ने नहीं
उनका महत्त्व पदक में नहीं है। महत्त्व इस बात में है कि एक सूखी पट्टी का अनाथ लड़का राज की फाइल में डाकू बना, गाँव की जुबान में गौ-पुत्र और सवा शेर बना, और दोनों स्मृतियाँ आज भी एक-दूसरे को काटती हैं।
इतिहास की खाली पंक्ति
हरियाणा-पंजाब के गाँवों में 1930 के आसपास गौरक्षा, खाप और अंग्रेजी पुलिस का टकराव चला। टोहाना 23 जुलाई 1930 उसी टकराव की सबसे चर्चित कड़ी है। नैन खाप ने उपाधि दी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सिख डाकू लिखा। एक ही आदमी दो भाषाओं में बँट गया। आज़ादी के बाद राष्ट्रीय कथा ने बड़े नाम लिये। स्थानीय गौरक्षक, जिनका शव नदी में कहा जाता है, पाठ्यपुस्तक के बाहर रह गये। हरफूल उस बाहर रहने का चेहरा हैं।
गौ माता और गाँव का धर्म
लोक कहता है, माँ गईं तो साधु ने गाय को माँ कहा। उसके बाद कसाईखाना उनका मैदान बना। यह केवल हिंसा की कहानी नहीं। पीली मिट्टी वाले घर में गाय दूध, हल और इज्जत थी। अकाल ने पहले ढोर छीने। कसाई ने बचे हुए को काटा। हरफूल उस घाव को व्यक्तिगत माँ से जोड़ते हैं। इसलिये स्मरण गौशालाओं में जिंदा है, विश्वविद्यालय में नहीं।
जींद-फाजिल्का की गौशालाएँ बलिदान दिवस मनाती हैं। वह नागरिक इतिहास का वैकल्पिक मंदिर है।
अकाल के बच्चे से सिपाही तक
1892 जन्म, 1899 के आसपास पिता की मृत्यु, थाने में खाट की टाँग, फिर सेना। यह क्रम हरियाणा के सूखे इलाके की सामाजिक सीढ़ी है। राज ने जाट को मार्शल रेस कहा, वर्दी दी, युद्ध में भेजा। घर लौटे तो वही राज उन्हें डाकू कहा। महत्त्व यहाँ है। एक राज्य ने शरीर को औजार बनाया, फिर उसी शरीर को फाँसी की वस्तु। वर्दी और रस्सी एक साम्राज्य की दो नीतियाँ हैं।
खाप, गरीब और चलती अदालत
बावन गाँव की नैन खाप उन्हें बुलाती है क्योंकि संस्थागत चढ़ाई असफल रही। बाद की कथा उन्हें विधवा और सताए का रॉबिन हुड कहती है। यह आधुनिक पार्टी-नेता नहीं। यह गाँव का न्याय जब थाना उलटा खड़ा हो। महत्त्व यह है कि लोक-न्याय और राज-न्याय का फर्क आल्ह अब भी गाती है।
शरीर की राजनीति
समुदाय कहता है, 27 जुलाई 1936 फिरोजपुर जेल में फाँसी, शव सतलुज। परिवार को नहीं दिया। हरियाणा न उठे, इसलिये स्थान बदला। शव छीनना स्मृति छीनना है। नदी ने शव बहाया। गीत ने नाम बचाया। पाठ्यक्रम ने दोनों को अनदेखा किया। हरफूल इसलिये महत्त्वपूर्ण हैं कि मिटाने की विधि खुद इतिहास बन गई।
आज क्यों ज़रूरी हैं
पहला, स्थानीय नायक बिना पदक के भी राष्ट्र की हड्डी होते हैं। दूसरा, गौरक्षा की बहस को केवल आज की राजनीति से मत नापिए। 1872 के कूका, 1930 के टोहाना, 1936 की रस्सी एक लंबी रेखा हैं। तीसरा, अभिलेख की कमी को मौन मत समझिए। सिपाही का सेवा-पत्र नहीं मिला, पेंशन की बही नहीं मिली, फाँसी का वारंट सार्वजनिक नहीं। कमी साम्राज्य की फाइल-व्यवस्था की है, गाँव की स्मृति की नहीं। चौथा, पीढ़ी से प्रश्न: जुल्म के आगे मत झुको, गरीब और गौ माता के साथ खड़े रहो, गाँव की लाज पर कदम मत खींचो।
जो महत्त्व नहीं बनाना चाहिए
उन्हें आधिकारिक सेना-वीर मत बनाइए जब तक इकाई न मिले। उन्हें पूरे समुदाय के विरुद्ध हथियार मत बनाइए। टकराव कसाईखाने, राज की नीति, विश्वासघात और मिटाने तक सीमित रखिए। आँकड़े 17 या 36 हत्थे लोक-गिनती हैं, जनगणना नहीं।
अंतिम नाप
वे इसलिये बड़े नहीं कि राज्य ने उन्हें पद दिया। वे इसलिये बड़े हैं कि राज्य ने उन्हें मिटाना चाहा और गीत नहीं मिटा। सतलुज में शरीर इसलिए फेंका गया कि हरियाणा भूल जाए। नदी नहीं भूली। आल्ह नहीं भूली। केवल किताब भूली। वही उनकी सबसे कड़वी और सबसे साफ पहचान है।
उनका जीवन इस पीढ़ी से अब भी क्या पूछता है
जीवन अब भी तीन गाँव के पाठ पूछता है।
जुल्म के आगे मत झुको। बच्चे की टाँग पर खाट की टाँग जुल्म है। गाँव की अनसुनी करने वाला हत्था जुल्म है। भीड़ न लगे इसलिए चुपके फाँसी जुल्म है। हरफूल ने हर जुल्म का उत्तर अपनी भाषा में दिया: पहले सहन, फिर बंदूक, फिर छिपे रहने से इनकार जब गाय और गरीब दोनों टूट रहे हों।
गरीब और गौ माता दोनों के साथ खड़े रहो। साधु का वाक्य सरल था। गाय भी माँ है। विधवा और किसान भी गाँव हैं। दो फर्ज अलग नहीं किए। चलती अदालत और टूटा हत्था एक धर्म था, दो सड़कों पर।
जब धर्म और गाँव की इज्जत दांव पर हों, पीछे मत हटो। नैन खाप कई बार हारी थी। उस हार को बहाना नहीं बनाया। टोहाना में स्त्री का कपड़ा इसलिए पहना कि इज्जत पहले पूछ चुकी थी और उत्तर सुरक्षित साल का इंतजार नहीं कर सकता था।
लोग चौक माँगते हैं। चौक काफी नहीं अगर बगल के स्कूल का बच्चा यह न जाने कि आदमी वहाँ क्यों है। केवल आल्ह में बची स्मृति जीवित है। किताब में न गई स्मृति घायल है।
उन्हें बड़ी पंक्ति में बिना बढ़ाए रखिए। मलेरकोटला 1872 के कूका गौरक्षा की कीमत अंग्रेजी आग से चुका चुके थे। हरफूल ने नदी से चुकाई। उन दो कीमतों के बीच साम्राज्य ने राय नहीं बदली। गाँव ने गीत नहीं बदला।
उन्होंने शरीर नदी में इसलिए फेंका कि हरियाणा भूल जाए। नदी कुछ नहीं भूली। गीत नहीं भूला। केवल पाठ्यपुस्तक भूली।
तीन पाठ गाँव आज भी दोहराता है। ज़ुल्म के आगे मत झुको। गरीब और गौ माता के साथ खड़े रहो। जब धर्म और गाँव की लाज दांव पर हो, कदम मत खींचो।
शव नदी को दिया गया ताकि स्मृति डूब जाए। पानी ने कुछ नहीं डुबाया। गीत ने कुछ नहीं छोड़ा। केवल पाठ्यक्रम खाली रह गया।
दो। बालक वाला, नरम फिर तेज ।
