13000 फ़ीट की ऊंचाई पर अकेले आतंकियों पर बोल दिया धावा, गोलियों से छलनी होने के बावजूद एक-एक आतंकी को मौत की नींद सुलाने वाले ‘असम रेजिमेंट’ के जांबाज सिपाही ‘हंगपन दादा’

आजकल हमने ‘हीरो’ शब्द का बड़ा ही मज़ाक बना कर रख दिया है। कोई नई फिल्म रिलीज़ होती है, और हम थियेटर में बैठकर उन एक्टर्स को देखकर सीटियां मारते हैं, तालियां पीटते हैं, और उन्हें ‘हीरो’ बोलते हैं।

लेकिन कभी सोचा है की कैमरे के सामने उछल-कूद करने वाले ये ‘नकली बाहुबली’ अगर 13,000 फ़ीट की बर्फीली ऊंचाई पर 5 मिनट के लिए भी बिना हीटर और जैकेट के खड़े कर दिए जाएं, तो इनकी हड्डियां कांपने लगेंगी और सांसें उखड़ जाएंगी?!

असली हीरो वो नहीं होता जो डायरेक्टर के ‘एक्शन’ बोलने पर स्टंटमैन के सहारे गुंडों को हवा में उड़ाता है।

असली हीरो तो वो फौजी होता है, जो माइनस डिग्री तापमान में, जब शरीर का खून जम रहा होता है, तब भी सीना तानकर आतंकियों से आमने-सामने की लड़ाई लड़ता है।

आज मैं आपको भारत माँ के एक ऐसे ही असली और रीयल-लाइफ ‘हीरो’ की कहानी सुनाने जा रहा हूँ।

एक ऐसा खूंखार शेर, जिसने शरीर गोलियों से छलनी होने के बावजूद, अपने खून की आखिरी बूंद तक लड़ते हुए आतंकियों को जहन्नुम का रास्ता दिखा दिया था।

इस महानायक का नाम है- हवलदार हंगपन दादा।

अरुणाचल के छोटे से गांव बोरदुरिया का वो लड़का जिसकी रगों में बचपन से ही देशभक्ति का उबाल था

हवलदार हंगपन दादा का जन्म भारत के सुदूर पूर्व में बसे अरुणाचल प्रदेश के तिरप (Tirap) ज़िले के एक बेहद छोटे से और खूबसूरत गांव ‘बोरदुरिया’ में 2 अक्टूबर 1979 को हुआ था।

ये वो इलाका है जहां के लोग जन्म से ही निडर होते हैं। वहां के बच्चे मोबाइल फोन या वीडियो गेम खेलकर बड़े नहीं होते, बल्कि जंगलों, नदियों और पहाड़ों से लड़कर अपना शरीर फौलाद बनाते हैं।

हंगपन बचपन से ही गज़ब के फुर्तीले और ताकतवर थे। उनके अंदर दूसरों की जान बचाने का जो जज़्बा था, वो शहादत वाले दिन अचानक पैदा नहीं हुआ था, बल्कि उसकी नींव बचपन में ही पड़ गई थी।

उनके गांव का ही एक बहुत मशहूर किस्सा है। एक बार हंगपन अपने बचपन के दोस्त सोमहांग के साथ नदी के किनारे खेल रहे थे। अचानक सोमहांग का पैर फिसला और वो तेज़ बहाव वाली गहरी नदी में गिर गया।

कोई और बच्चा होता तो डर के मारे भाग जाता या चिल्लाने लगता, लेकिन हंगपन ने अपनी जान की परवाह किए बिना तुरंत उफनती नदी में छलांग लगा दी।

उन्होंने अपनी जान पर खेलकर अपने दोस्त सोमहांग को डूबने से बचा लिया। बस उसी दिन से पूरे बोरदुरिया गांव के लोग उन्हें प्यार और सम्मान से ‘दादा’ (यानी बड़ा भाई) बुलाने लगे।

दादा का मतलब ही वो इंसान था जो किसी भी मुसीबत में अपने लोगों के आगे ढाल बनकर खड़ा हो जाए।

पहाड़ों की इसी ताकत और देशभक्ति के जुनून ने उन्हें फौज की तरफ खींचा। साल 1997 में, जब दादा बहुत जवान थे, उन्होंने इंडियन आर्मी की बेहद खूंखार और मशहूर ‘असम रेजिमेंट’ (Assam Regiment) जॉइन कर ली।

असम रेजिमेंट का तो इतिहास ही शौर्य से भरा पड़ा है, और दादा जैसे फौलादी शरीर वाले युवा ने इस रेजिमेंट की शान में चार चांद लगा दिए।

उनकी फिजिकल फिटनेस इतनी ज़बरदस्त थी की वो पहाड़ों पर ऐसे चढ़ते थे जैसे कोई चीता शिकार के लिए दौड़ रहा हो। फौज के सफर के दौरान ही उनकी शादी चासेन लोवांग से हुई।

उनके दो प्यारे बच्चे भी हुए- बेटी रौखिन और बेटा सेनवांग। दादा एक बेहद शांत इंसान थे, जो जब छुट्टी पर गांव आते तो चर्च जाते और बच्चों के साथ खेलते, लेकिन जब वो अपनी यूनिफॉर्म पहनते, तो दुश्मनों के लिए साक्षात काल बन जाते थे।

कुपवाड़ा के नौगाम सेक्टर की 13 हज़ार फ़ीट वाली वो बर्फीली चोटी जहां आतंकियों के शिकार के लिए यमराज बनकर डटे थे हंगपन दादा

अब कहानी थोड़ा आगे बढ़ती है और रुख करती है उस जगह का, जहां इस शेर ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आखिरी लड़ाई लड़ी।

हंगपन दादा मूल रूप से असम रेजिमेंट (4th Battalion) के सिपाही थे, लेकिन सेना में जब किसी जवान की बहादुरी और उसकी कॉम्बैट स्किल्स (लड़ने की क्षमता) बहुत टॉप लेवल की होती है, तो उसे विशेष ऑपरेशन्स के लिए राष्ट्रीय राइफल्स में भेजा जाता है।

शहादत के वक़्त हवलदार हंगपन दादा की पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में 35 राष्ट्रीय राइफल्स (35 RR) में थी।

राष्ट्रीय राइफल्स इंडियन आर्मी की वो एलीट फोर्स है जिसे खास तौर पर कश्मीर में काउंटर-टेररिज्म यानी आतंकियों को ढूंढ-ढूंढ कर ठोकने के लिए ही बनाया गया है।

दादा अपनी बटालियन के सबसे तेज़-तर्रार और अचूक निशानेबाज़ थे। 35 आरआर में उनकी ड्यूटी कश्मीर के सबसे खतरनाक और दुर्गम इलाकों में से एक- कुपवाड़ा ज़िले के ‘नौगाम सेक्टर’ (Naugam Sector) में लगी थी।

नौगाम सेक्टर कोई मामूली जगह नहीं है भाईसाहब! यह वही इलाका है जहां शमशाबारी (Shamshabari) की पहाड़ियां खड़ी हैं। यह पूरा इलाका समुद्र तल से लगभग 12,500 से 13,000 फीट की ऊंचाई पर है।

आप खुद ही सोच लो, जो लोग छुट्टियां मनाने हिल स्टेशन जाते हैं, उन्हें 6-7 हज़ार फ़ीट पर ही सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। नौगाम सेक्टर की उन चोटियों पर ऑक्सीजन इतनी कम होती है की एक आम आदमी चंद घंटों में ही बेहोश हो जाए।

हंगपन दादा अपनी टीम के साथ इसी नौगाम सेक्टर की सबसे क्रिटिकल लोकेशन ‘साबु पोस्ट’ (Sabu Post) पर डटे हुए थे। साबु पोस्ट वो जगह है जो सीधे लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पर नज़र रखती है।

पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर (PoK) से जिहादी आतंकी अक्सर इन्ही बर्फीले रास्तों और घने जंगलों का फायदा उठाकर घुसपैठ करने की कोशिश करते हैं।

मई का महीना कहने को तो गर्मियों का होता है, लेकिन 13 हज़ार फ़ीट की उस साबु पोस्ट पर हर तरफ सिर्फ और सिर्फ बर्फ की सफ़ेद चादर बिछी थी।

वहां की सर्द हवाएं ऐसी चलती हैं की अगर स्किन खुली रह जाए तो फ्रॉस्टबाइट (Frostbite) हो जाए और शरीर के अंग काटने पड़ जाएं।

वहां फौजी भाई सिर्फ दुश्मन की गोलियों से नहीं लड़ रहे होते, बल्कि उन्हें हर सेकंड उस जानलेवा मौसम और बर्फीले तूफानों से भी लड़ना पड़ता है।

लेकिन दादा और उनकी टीम साबु पोस्ट पर एक चट्टान की तरह डटी हुई थी। दादा को पता था की बर्फ पिघलनी शुरू हो गई है और घुसपैठ का खतरा सबसे ज़्यादा है। वो दिन-रात अपनी टीम को अलर्ट रखते थे।

और फिर वो मनहूस और खौफनाक दिन आ ही गया, जिसका दादा की टीम को इंतज़ार था। पाकिस्तान की तरफ से कुछ ऐसे जिहादी भारत की सीमा में घुसने वाले थे, जिन्हें रोकने के लिए दादा को अपनी जान की बाज़ी लगानी थी।

26 मई 2016 की वो रात जब 4 भारी हथियारों वाले खूंखार आतंकी लाइन ऑफ कंट्रोल (LOC) पार कर रहे थे

फौज में कोई भी ऑपरेशन हवा में नहीं होता भाई। 25 मई 2016 की रात को ही मिलिट्री इंटेलिजेंस से एक पक्का इनपुट मिल गया था की पाकिस्तान की तरफ से कुछ भारी हथियारों से लैस खूंखार आतंकी लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पार करके भारत की सीमा में घुसने की फिराक में हैं।

ये कोई मामूली आतंकी नहीं थे, बल्कि इन्हें स्पेशल ट्रेनिंग देकर और हथियारों से लादकर भेजा गया था ताकि ये कश्मीर में घुसकर कोई बड़ा खून-खराबा कर सकें।

इनपुट मिलते ही 35 राष्ट्रीय राइफल्स की टीम तुरंत एक्टिव हो गई। 26 मई 2016 की सुबह-सुबह, जब उस 13 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर हड्डियां जमा देने वाली ठंड थी, तब हवलदार हंगपन दादा अपनी सेक्शन (टीम) को लीड करते हुए सर्च ऑपरेशन पर निकल पड़े।

कुछ ही दूर जाने पर दादा की पारखी नज़रों ने बर्फ पर ताज़े पैरों के निशान (Footprints) देख लिए। पहाड़ का आदमी ठहरा, वो तुरंत समझ गए की घुसपैठिए इसी इलाके में कहीं छिपे हैं।

दादा ने अपनी टीम को बेहद खामोशी से आगे बढ़ने का इशारा किया। दोपहर होते-होते, एक बर्फीले नाले और पत्थरों के पीछे दादा की टीम का सामना उन 4 खूंखार आतंकियों से हो गया।

दोनों तरफ से भयंकर गोलीबारी शुरू हो गई। आतंकियों के पास AK-47, ग्रेनेड और भारी गोला-बारूद था।

वो ऊंचाई पर पत्थरों की आड़ लेकर बैठे थे, जिसका उन्हें एडवांटेज (फायदा) मिल रहा था। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरी शमशाबारी की पहाड़ियां गूंज उठीं।

गोलियां खत्म हुई तो नंगे हाथों से आतंकियों की गर्दन मरोड़ दी असम रेजिमेंट के इस शेर ने

लड़ाई का माहौल एकदम खौफनाक हो चुका था। आतंकी भारी कवर फायर देते हुए वहां से बचकर भागने की कोशिश कर रहे थे।

दादा को तुरंत अहसास हो गया की अगर ये जिहादी यहाँ से भाग निकले, तो ये आगे जाकर शहर में किसी बड़े नरसंहार को अंजाम देंगे या उनके पीछे आ रही फौज की टुकड़ी के लिए खतरा बन जाएंगे।

अब यहाँ से शुरू होता है असली ‘बाहुबली’ का वो एक्शन, जिसे मिलिट्री की भाषा में ‘क्लोज क्वार्टर बैटल’ (CQB – Close Quarter Battle) कहते हैं।

जब दादा ने देखा की उनके साथियों की जान भी खतरे में है, तो उन्होंने छुपकर फायरिंग करने के बजाय वो किया जिसकी कोई आतंकी सपने में भी कल्पना नहीं कर सकता था।

मौत का खौफ तो जैसे उनके अंदर था ही नहीं! दादा अपनी पोजीशन से उठे और सीधी गोलियों की बौछार के बीच सीधे आतंकियों के सामने कूद पड़े।

सामने आते ही पलक झपकने से पहले दादा ने अपनी अचूक फायरिंग से 2 खूंखार आतंकियों की खोपड़ी उड़ा दी। दो आतंकी वहीं बर्फ पर ढेर हो गए।

लेकिन तभी तीसरे आतंकी ने पोजीशन ली और फायरिंग कर दी। कवर टूट चुका था और इस गोलीबारी में दादा को गोलियां लग गईं।

लेकिन क्या गोलियां लगने से असम रेजिमेंट का ये शेर रुकने वाला था? बिल्कुल नहीं! जब दादा की मैगज़ीन खाली होने लगी, तो उन्होंने अपनी बंदूक पीछे की और सीधे उस तीसरे आतंकी पर किसी भूखे शेर की तरह छलांग लगा दी।

13 हज़ार फ़ीट की उस बर्फ पर दोनों के बीच हाथापाई (Hand-to-hand combat) शुरू हो गई। खून बह रहा था, लेकिन दादा के बाजुओं की ताकत कम नहीं हुई थी।

उन्होंने अपने नंगे हाथों से उस खूंखार आतंकी को दबोच लिया और बर्फ पर पटककर उसकी सांसें उखाड़ दीं।

ज़रा सोचिए इस मंज़र को! एक इंसान, जिसके सीने और पेट में गोलियां धंसी हों, वो खाली हाथों से एक हथियारबंद आतंकी को जहन्नुम पहुंचा रहा है। ये सिर्फ और सिर्फ एक भारतीय फौजी ही कर सकता है।

शरीर छलनी होने और खून बहने के बाद भी चौथे आतंकी को जहन्नुम भेजकर ही ली आखिरी सांस

तीन आतंकी ढेर हो चुके थे, लेकिन चौथा आतंकी अभी भी पत्थरों के पीछे छिपा हुआ था और दादा की टीम पर गोलियां बरसा रहा था।

इधर दादा का शरीर गोलियों से पूरी तरह छलनी हो चुका था। उनकी वर्दी खून से लाल हो गई थी और वो बर्फ पर गिर पड़े थे।

उनके साथी फौजी चिल्ला रहे थे और उन्हें पीछे खींचकर मेडिकल कवर (Medical Help) देना चाहते थे। लेकिन दादा ने उन्हें रोक दिया। वो जानते थे की अगर चौथा आतंकी ज़िंदा बच गया, तो वो पूरी टीम को मार देगा।

खून से लथपथ होने के बावजूद, दादा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने साथियों को कवर फायर देने को कहा और खुद बर्फ पर रेंगते हुए उस चौथे आतंकी की तरफ बढ़ने लगे।

दर्द से कराहते हुए भी इस वीर ने अपनी पक्की पोज़ीशन ली और जैसे ही वो चौथा आतंकी दिखा, दादा ने उसे भी वहीं पर पटक के मौत के घाट उतार दिया।

चारों जिहादियों का सफाया हो चुका था। लेकिन 4 आतंकियों का सफाया करने के बाद, बहुत ज़्यादा खून बह जाने के कारण, भारत माँ के इस लाल ने हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं।

दादा ने अपने बचपन में जैसे अपने दोस्त सोमहांग की जान बचाई थी, ठीक वैसे ही अपने आखिरी पलों में अपनी पूरी टीम की जान बचाकर वो वीरगति को प्राप्त हो गए।

रोते हुए, लेकिन गर्व से सिर ऊंचा किए पत्नी ने जब लिया अशोक चक्र तो पूरा देश हो गया था भावुक

हवलदार हंगपन दादा की इस शहादत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। उनकी इस अदम्य स्फूर्ति, पागलपन वाली देशभक्ति और अकेले 4 आतंकियों को जहन्नुम भेजने के लिए, भारत सरकार ने उन्हें 26 जनवरी 2017 (गणतंत्र दिवस) के दिन शांति काल के सबसे बड़े सैन्य सम्मान ‘अशोक चक्र’ (Ashok Chakra) से मरणोपरांत सम्मानित किया।

राजपथ पर वो नज़ारा जिसने भी देखा, उसकी आंखें आंसुओं से भर गईं। दादा की वीर पत्नी चासेन लोवांग दादा जब वो सर्वोच्च सम्मान लेने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सामने आईं, तो उनके चेहरे पर एक भी शिकन नहीं थी।

उनकी आँखों में भले ही अपने पति को खोने का दर्द था, लेकिन उनका सीना गर्व से इतना चौड़ा था की पूरे देश ने खड़े होकर उस वीरांगना को सलाम किया।

आज अरुणाचल प्रदेश में हंगपन दादा के नाम पर स्टेडियम हैं, पुल बने हैं। वहां का बच्चा-बच्चा उनकी शौर्य गाथाएं गाता है।

हंगपन दादा जैसे महानायक मरते नहीं हैं, वो हर उस हिंदुस्तानी के खून में हमेशा ज़िंदा रहते हैं जो इस मिट्टी से बेइंतहा मोहब्बत करता है।

वन्दे मातरम! भारतीय सेना की जय!

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