चंद VIP चेहरों की चमक के लिए आखिर कब तक यूं बेहाल होती रहेगी आम जनता, मुंबई की सड़क पर रोती रही एक लाचार महिला मगर प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी

सच कहुँ तो इस देश में एक आम नागरिक होना किसी अभिशाप जैसा हो गया है। हम सिर्फ कागज़ों पर ही इस लोकतंत्र के मालिक हैं। हकीकत तो ये है की इस पूरे सिस्टम की नज़रों में हमारी हैसियत कीड़े-मकोड़ों से ज़्यादा कुछ भी नहीं है।

आपको याद होगा, कुछ सालों एक नियम निकाला गया था की अब गाड़ियों से ‘लाल बत्ती’ हटेगी, वीआईपी कल्चर ख़त्म होगा।

अरे भाई, गाड़ियों से तो वो लाल बत्ती हट गयी, लेकिन इस पूरे सिस्टम और रसूखदारों के दिमाग में जो ‘VIP कल्चर’ का जंग लगा हुआ है, वो कैसे हटेगा?

ज़रा सोचिए, एक आम टैक्सपेयर एक छोटी सी कार लेने के लिए सालों तक बैंक की EMI भरता है। और उसी कार को सड़क पर उतारने के लिए वो रोड टैक्स चुकाता है, कदम-कदम पर टोल टैक्स देता है।

लेकिन जब वो उसी सड़क पर निकलता है, जिसके लिए उसने पाई-पाई चुकाई है, तो अचानक से प्रशासन के बैरिकेड्स और डंडे उसे किनारे खड़ा कर देते हैं। क्यों? क्योंकि किसी ‘VIP’ का काफिला गुज़रने वाला है!

आम आदमी की इमरजेंसी भाड़ में जाए, किसी की नौकरी छूट रही हो, कोई एम्बुलेंस में तड़प रहा हो, या किसी की जान ही क्यों न जा रही हो… प्रशासन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

फर्क बस इस बात से पड़ता है की उन वीआईपी लोगों के इवेंट में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। मुंबई की सड़कों से जो ताज़ा तस्वीर सामने आई है ना, उसने साबित कर दिया है की आम आदमी की सांसें आज भी इस VIP सिस्टम के नीचे कुचली जा रही हैं।

इंसानियत से महंगी VIP कारों की दहाड़ और अवेयरनेस के नाम पर मुंबई की सड़कों पर हाई-प्रोफाइल तमाशा

अब ज़रा इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे की पूरी क्रोनोलॉजी समझिए। बात बीते रविवार, यानी 6 सितंबर 2026 की है। जगह थी मुंबई का सबसे पॉश इलाका- जुहू।

Bastian Beach Club और Sun-N-Sand होटल के ठीक पास एक बहुत ही आलीशान इवेंट रखा गया था। नाम था ‘क्वींस ड्राइव क्लब 6.0’ (Queens Drive Club 6.0)।

ये कोई छोटा-मोटा इवेंट नहीं था भाई, ये अमीरों का वो शानदार मेला था जहाँ 70 से भी ज़्यादा, करोड़ों रुपये की लग्ज़री सुपरकारें लाइन से खड़ी थीं।

अब आप सोचेंगे की भई ये सुपरकार रैली क्यों हो रही थी? इसका मक़सद क्या था? वजह बताई गई- ‘कैंसर अवेयरनेस’ (Cancer Awareness)।

मतलब, कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाने के नाम पर सुपरकारें बुलाई गयी और शहर की मुख्य सड़क को ही ब्लॉक कर दिया गया!

इस शाही तमाशे को हरी झंडी (Flag-off) दिखाने के लिए चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाई गई थीं महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री की पत्नी अमृता फडणवीस।

अब ज़ाहिर सी बात है, जब इतने बड़े वीआईपी चेहरे और करोड़ों की चमचमाती गाड़ियां सड़क पर उतरेंगी, तो पूरा पुलिस और ट्रैफिक महकमा तो उनके आगे-पीछे घूमेगा ही।

हुआ भी बिल्कुल यही। प्रशासन ने इवेंट और वीआईपी प्रोटोकॉल के चक्कर में जुहू की सड़कों पर भारी बैरिकेडिंग कर दी।

नतीजा क्या निकला? पूरे इलाके में ऐसा भयंकर ट्रैफिक जाम लग गया की पैदल चलने वालों तक के लिए मुसीबत हो गई। गाड़ियों की लंबी कतारें लग गईं।

ज़रा इस वीआईपी सिस्टम को देखिए! आप ‘अवेयरनेस’ के नाम पर इवेंट कर रहे हैं, जिसका असल मकसद लोगों की ज़िंदगियां बचाना है, और उसी इवेंट के लिए आपने पूरी सड़क जाम कर दी? ताकि अगर सच में किसी की जान जा रही हो, तो वो अस्पताल पहुँच ही ना पाए!

कैमरों की चकाचौंध और मीडिया के सामने अच्छी फोटो खिंचवाने की होड़ में हमारा सिस्टम इतना अँधा हो चुका है की उसे बैरिकेड के दूसरी तरफ फंसे हुए आम आदमी का दर्द दिखाई ही नहीं देता। इंसानियत से ज़्यादा महंगी तो इन सुपरकारों की दहाड़ हो गई है।

मेरी ज़िंदगी और मौत का सवाल है साहेब… डेढ़ घंटे जाम में फंसी लाचार महिला और रोती हुई वो बेबस आवाज़

इवेंट एकदम जोरों पर था। मीडिया वालों के कैमरे लगातार फ्लैश मार रहे थे, और वीआईपी मेहमान मुस्कुराते हुए पोज़ दे रहे थे।

लेकिन इन करोड़ों की गाड़ियों के शोर के ठीक पीछे एक ऐसा दर्द सिसक रहा था, जिसने इस पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को सामने रख दिया।

ट्रैफिक जाम इतना भयानक था की गाड़ियां एक इंच भी आगे नहीं खिसक पा रही थीं। इसी भीषण जाम में पिछले डेढ़ घंटे (करीब 60 से 90 मिनट) से एक महिला अपनी कार में फंसी हुई थी।

वो महिला बदहवास हालत में अपनी गाड़ी से उतरकर बैरिकेड्स और मीडिया वालों की भीड़ से जैसे-तैसे आगे निकल के आई।

वो महिला रो-रोकर, दोनों हाथ जोड़कर वहाँ खड़े सिक्योरिटी वालों और इवेंट कोआर्डिनेटरों से गुहार लगाने लगी। उसने कहा “मेरे घर में इमरजेंसी है, मेरी कार फसी हुई है, प्लीज मुझे जाने दो.. मैं रो पड़ूंगी अब, मुझे जाने दो।”

आप खुद सोचिए ज़रा! मुंबई जैसे शहर की बीच सड़क पर एक औरत हाथ जोड़कर भीख मांग रही है। वो चीख-चीख कर कह रही है की मेरी ज़िंदगी और मौत का सवाल है, घर में मेडिकल इमरजेंसी है!

लेकिन क्या उस VIP सिस्टम का दिल पसीजा? क्या किसी पुलिस वाले ने तुरंत अपना वॉकी-टॉकी निकालकर ‘इमरजेंसी लेन’ खुलवाने का आदेश दिया?

क्या किसी इवेंट वाले ने उस महिला की मदद करने की कोशिश की? बिल्कुल नहीं! एक टैक्सपेयर की वो बिलखती हुई आवाज़, सुपरकारों के शोर और कैमरों की चमक के नीचे कहीं दबकर रह गई।

VIP इवेंट और कैमरों की चमक में आँखें बंद करता सिस्टम जहां एक जान की कीमत PR स्टंट से भी कम है

जब वो महिला बेतहाशा रोते हुए हाथ जोड़ रही थी, तब वहां खड़े प्रशासन और सिक्योरिटी गार्ड्स का जो रवैया था, उसे देखकर इंसानियत भी शर्म से पानी-पानी हो जाए।

बजाय इसके की वे तुरंत पुलिस महकमे को वायरलेस पर मेसेज देते की “भाई, कोई इमरजेंसी है, तुरंत एक इमरजेंसी लेन खोलो”, उन्होंने उस महिला के साथ बिल्कुल शर्मनाक बर्ताव किया।

उन तथाकथित ‘सिक्योरिटी’ वालों ने उस रोती-बिलखती महिला को बैरिकेड के पास से पीछे की तरफ धकेल दिया। उन्हें उसे समझाना नहीं था, उन्हें उसे बस उस कैमरे के फ्रेम से हटाना था!

क्योंकि अगर वो रोती हुई महिला कैमरे के फ्रेम में आ जाती, तो उस ‘VIP Event’ का PR स्टंट खराब हो जाता। तमाशा किसी भी कीमत पर रुकना नहीं चाहिए साहब!

सोशल मीडिया पर लोग वीडियो देखकर यही सवाल पूछ रहे हैं की जब वो महिला इतना गिड़गिड़ा रही थी, तब वहां मौजूद वीआईपी लोगों ने एक बार भी माइक हाथ में लेकर या अधिकारियों को बुलाकर क्यों नहीं कहा की पहले इस महिला की गाड़ी को रास्ता दो?

क्या उनके लिए कैंसर अवेयरनेस के नाम पर फोटो खिंचवाना उस महिला की असल ज़िंदगी से ज़्यादा ज़रूरी था?

यह किसी एक चेहरे या सरकार की बात नहीं है, यह पूरे के पूरे सिस्टम के ‘वीआईपी प्रोटोकॉल’ की बात है। इस सिस्टम की नज़रों में एक जान की कीमत PR स्टंट से भी कम हो चुकी है।

आपको रोड पर तड़पकर मरना है तो मर जाइये, लेकिन वीआईपी लोगों का इवेंट डिस्टर्ब नहीं होना चाहिए।

सोशल मीडिया का आक्रोश और VIP कल्चर की वो लाइलाज बीमारी जिसका इलाज किसी के पास नहीं

जैसे ही ये दर्दनाक मंज़र कैमरे में कैद हुआ और इंटरनेट पर डाला गया, पूरे देश का गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। लोग आगबबूला हैं, और उनका भड़कना बिल्कुल जायज़ भी है।

ये गुस्सा सिर्फ उस एक वीडियो को लेकर नहीं है, ये वो दबा हुआ आक्रोश है जो हर आम हिंदुस्तानी अपने सीने में लिए घूम रहा है।

हर आदमी उस महिला के दर्द से खुद को जोड़ पा रहा है, क्योंकि हम सबने कभी ना कभी सड़कों पर इस वीआईपी कल्चर की ज़िल्लत को झेला है।

याद कीजिए, कितनी ही बार ऐसा हुआ है की किसी नेता, किसी बड़े अधिकारी या किसी रसूखदार के लंबे-चौड़े काफिले के लिए एम्बुलेंस को ही आधे-आधे घंटे तक रोक दिया गया।

ये वीआईपी मानसिकता एक ऐसी लाइलाज बीमारी बन चुकी है, जो आज़ादी के इतने सालों बाद भी हमारे सिस्टम से नहीं निकली है।

इन VIP लोगों को लगता है कि ये सड़कें, ये पुलिस, ये प्रशासन सब इनकी जागीर है। और आम जनता? आम जनता तो बस एक मशीन है जिसका काम है चुपचाप टैक्स भरना और जब साहब की गाड़ी निकले तो किनारे खड़े होकर धूल फांकना।

जुहू की उस सड़क पर हाथ जोड़कर रोती हुई वो महिला दरअसल इस देश का पूरा का पूरा मिडिल क्लास है। वो आम हिंदुस्तानी है, जो हर दिन किसी न किसी चौराहे पर, किसी न किसी सरकारी दफ़्तर में वीआईपी कल्चर के सामने बेबस खड़ा रहता है।

वो रोता है, गिड़गिड़ाता है, अपने हक़ की भीख मांगता है, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।

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