जब आप अपने ही घर में बेगाने कर दिए जाते हैं ना, तो वो दर्द किसी बाहर वाले के वार से भी ज्यादा तकलीफ देता है। आज तमिलनाडु का सनातनी बिल्कुल ऐसा ही महसूस कर रहा है।
आप दिन-रात पाई-पाई जोड़कर अपना घर चलाते हैं, टैक्स भरते हैं, लेकिन जब सरकार अपना खजाना खोलती है, तो आपको ऐसे धक्के मारकर साइड कर दिया जाता है जैसे आप इस राज्य के नागरिक ही न हों।
ये सिस्टम की वो हकीकत है जो आज तमिलनाडु की सड़कों पर एकदम साफ दिख रही है। तुष्टिकरण की इस दौड़ में सरकार ने सारी हदें पार कर दी हैं।
खजाने का मुंह इस कदर मुस्लिम समुदाय की तरफ मोड़ दिया गया है की आम हिन्दू अब खुद से यह सवाल पूछने पर मजबूर हो गया है की क्या इस धरती पर जन्म लेना ही मेरा सबसे बड़ा गुनाह है?
हिन्दुओं का अपनी ही माटी में अनाथ होने का दर्द और सेक्युलरिज्म के नाम पर तमिलनाडु में सरेआम बांटा जा रहा सरकारी खजाना
सेक्युलरिज्म… ये शब्द आपने टीवी डिबेट्स और अखबारों में बहुत सुना होगा। किताबी भाषा में इसका मतलब होता है की सरकार के लिए सारे धर्म बराबर हैं।
सरकार किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगी। लेकिन तमिलनाडु के सिस्टम ने इस ‘सेक्युलरिज्म’ का जो नया वर्ज़न लॉन्च किया है, उसे देखकर खुद सेक्युलरिज्म भी शर्मा जाये!
अगर आपके सिर पर एक खास जालीदार टोपी है, या आप किसी विशेष समुदाय से आते हैं, तो सरकारी खजाने के दरवाजे आपके लिए 24 घंटे खुले हैं।
आपके लिए करोड़ों के फंड रातों-रात पास हो जाएंगे। लेकिन अगर आप माथे पर तिलक लगाने वाले एक आम सनातनी हैं, तो आपको थमाने के लिए सरकार के पास सिर्फ एक झुनझुना है।
बहुसंख्यकों को पीछे धकेल कर माइनॉरिटी को खुश करने की ये जो रेस चल रही है, उसने तमिलनाडु के बहुसंख्यक हिन्दू समाज को ऐसा लावारिस छोड़ दिया है जैसे उनका इस राज्य पर कोई हक ही न हो।
मुस्लिम लड़कियों की मुफ्त पढ़ाई पर लुटा दिए करोड़ों और सनातनी बच्चियों को सिस्टम ने छोड़ दिया लावारिस
अब उन डरावने आंकड़ों पर आते हैं जो हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने अल्पसंख्यकों के कल्याण के नाम पर विधानसभा में पेश किए हैं।
शिक्षा एक ऐसा पवित्र क्षेत्र है जहां कम से कम कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, लेकिन सरकार ने यहां भी मजहब का जो ज़हर घोला है, उसके आंकड़े सुनकर आपका दिमाग सुन्न हो जाएगा।
सरकार ने सीना ठोक कर ऐलान किया है की मुस्लिम लड़कियों की ‘फ्री कॉलेज ट्यूशन’ के लिए सरकारी खजाने से सीधे 20 करोड़ रुपये दिए जाएंगे।
मतलब अगर आप मुस्लिम समुदाय से आते हैं, तो आपकी मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ या आर्ट्स… सबकी पढ़ाई का ट्यूशन फीस एकदम फ्री! सारा खर्चा सरकार उठाएगी।
बात यहीं खत्म नहीं होती भाई। मुस्लिम लड़कियों (9वीं और 10वीं क्लास) की वक्फ स्कॉलरशिप के लिए 8.28 करोड़ रुपये अलग से अलॉट कर दिए गए।
मतलब करीब 41,000 बच्चियों को सिर्फ इसलिए स्कॉलरशिप मिलेगी क्योंकि उनका धर्म विशेष है। और तो और, चेन्नई में एक नया ‘माइनॉरिटी विमेंस कॉलेज’ (यानी एक ऐसा कॉलेज जो मुख्य रूप से मुस्लिम महिलाओं के लिए होगा) खोलने के लिए 2.45 करोड़ रुपये की खैरात बांट दी गई।
अब यहां एक बहुत सीधा और चुभने वाला सवाल उठता है। क्या तमिलनाडु में हिन्दू बेटियां गरीब नहीं हैं? क्या किसी सनातनी बाप की बेटी का डॉक्टर या इंजीनियर बनने का कोई सपना नहीं होता? क्या वो रात-दिन जगकर पढ़ाई नहीं करती?
गरीबी का कोई धर्म नहीं होता। गरीब हिन्दू भी होता है, गरीब मुसलमान भी होता है। कोई भी गरीब बच्ची हो, उसे पढ़ाई का पूरा हक मिलना चाहिए।
लेकिन ये कैसा इंसाफ है की क्लासरूम में बैठी दो गरीब बच्चियों में से एक को सरकार गले लगा ले, उसे करोड़ों की स्कॉलरशिप दे दे, और दूसरी बच्ची को इसलिए धक्के मार कर किनारे कर दे क्योंकि वो सनातनी है?
पैसा आसमान से नहीं टपकता। यह पैसा राज्य के खजाने का है जो राज्य के ही लोगो के टैक्स से आता है, और वो उस टैक्स का अधिकतम हिस्सा भी बहुसंख्यक हिन्दुओं के पैसो से आता है!
तो फिर ये मेहरबानियां सिर्फ एक मुस्लिम समुदाय पर ही क्यों? क्या सनातनी बेटियों ने कोई पाप किया है जो उनके लिए ऐसी कोई ‘मुफ्त ट्यूशन’ या विशेष स्कॉलरशिप की घोषणा नहीं की गई?
सिस्टम का ये दोहरा रवैया बता रहा है की इन्हें शिक्षा या महिला सशक्तिकरण से कोई लेना-देना नहीं है। इन्हें तो बस अपना वो फिक्स वोट बैंक चमकाना है जो थोक के भाव में वोट डालता है। हिन्दू बच्ची की पढ़ाई छूटे तो छूटे, इन्हें क्या फर्क पड़ता है!
वक्फ बोर्ड को 100 करोड़ का ब्याज मुक्त ‘फ्री लोन’, आखिर सनातनियों के टैक्स के पैसों से ये कैसा सेक्युलरिज्म चल रहा है
चलिए, बच्चियों की शिक्षा में किए गए भेदभाव को अगर कोई यह कहकर पचा भी ले की वो ‘अल्पसंख्यक कल्याण’ है, तो ज़रा दिल थाम कर बैठिए।
क्योंकि अब जो आंकड़ा मैं आपको बताने जा रहा हूँ, वो किसी भी स्वाभिमानी इंसान की रातों की नींद उड़ा देगा।
तमिलनाडु सरकार ने बाकायदा विधानसभा में ऐलान किया है की मुस्लिम वक्फ बोर्ड और ईसाई धार्मिक संपत्तियों को विकसित करने के लिए 100 करोड़ रुपये का ‘ब्याज-मुक्त’ (Interest-free) रिवॉल्विंग फंड दिया जाएगा।
ज़रा इस शब्द ‘ब्याज-मुक्त’ की गहराई को समझिए। इसका सीधा सा मतलब है की खजाने से 100 करोड़ रुपये ले जाओ और उस पर सरकार को एक रुपये का भी ब्याज (Interest) मत दो।
अब इस बात को ज़मीनी हकीकत पर रखकर तौलिए। जब इस देश का एक आम सनातनी किसान अपनी फसल उगाने के लिए बैंक से 50 हज़ार का लोन लेता है, तो उसे भारी ब्याज चुकाना पड़ता है।
अगर मौसम की मार से फसल बर्बाद हो जाए और वो ब्याज न चुका पाए, तो बैंक वाले उसके घर के बाहर नीलामी का नोटिस चिपका देते हैं। किसान फांसी के फंदे पर झूल जाता है, लेकिन सरकार उसका ब्याज माफ नहीं करती।
जब एक आम हिन्दू नौजवान अपना छोटा सा व्यापार शुरू करने के लिए, या कोई सनातनी बाप अपने बेटे की पढ़ाई के लिए एजुकेशन लोन लेने जाता है, तो बैंक वाले उससे 10 से 12 प्रतिशत का भयंकर ब्याज वसूलते हैं।
लेकिन दूसरी तरफ देखिए सरकार की दरियादिली! वक्फ बोर्ड, जो रक्षा मंत्रालय और रेलवे के बाद पूरे देश में सबसे ज़्यादा ज़मीनों का मालिक बना बैठा है।
जिसके पास पहले से ही अकूत संपत्ति है, जिसका काम ही ज़मीनों पर कब्ज़ा करना रह गया है… उस वक्फ बोर्ड की संपत्तियों को चमकाने के लिए सरकार खजाने से 100 करोड़ रुपये मुफ्त में दे रही है।
क्यों भाई? क्या सरकार किसी एक खास समुदाय की जागीरदार बन गई है? क्या तमिलनाडु सरकार कोई प्राइवेट बैंक है जिसने कसम खा ली है की वो सिर्फ एक खास टोपी वाले समुदाय को ही फ्री का पैसा बांटेगी?
जब राज्य का किसान और युवा कर्ज़े के बोझ तले मर रहा है, तब किसी धार्मिक बोर्ड की ज़मीनों को चमकाने के लिए 100 करोड़ का फ्री लोन देना कहाँ तक सही है?
वक्फ बोर्ड के लिए 40 करोड़ का नया आलीशान मुख्यालय और 5 करोड़ की मुफ्त खैरात, सिस्टम के इस तुष्टिकरण पर जनता हैरान है
तुष्टिकरण की यह कहानी सिर्फ 100 करोड़ के फ्री लोन पर जाकर खत्म नहीं होती। सिस्टम ने यह तय कर लिया है की जब लुटाना ही है, तो फिर शर्म कैसी!
सरकार ने ऐलान किया है की तमिलनाडु वक्फ बोर्ड का एकदम नया, बड़ा और आलीशान हेडक्वार्टर (मुख्यालय) बनाने के लिए 40 करोड़ रुपये दिए जाएंगे।
और बात यहीं नहीं रुकी, वक्फ बोर्ड को अपना काम-काज चलाने के लिए, यानी कागज़-कलम और चाय-पानी के लिए ‘प्रशासनिक ग्रांट’ (Administrative grant) के नाम पर 5 करोड़ रुपये बिल्कुल मुफ्त में दे दिए गए।
अब कोई इस सेक्युलर सरकार के नीति-निर्माताओं से ये पूछे की क्या किसी लोकतांत्रिक सरकार का काम किसी एक धर्म के धार्मिक बोर्ड के लिए महल खड़े करना होता है?
आज के समय में तमिलनाडु सरकार के ऊपर लगभग 13 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का भयंकर कर्ज़ है। राज्य भारी उधारी में डूबा हुआ है।
गांव-देहात में अस्पताल टूटे पड़े हैं, सरकारी स्कूलों की छतों से पानी टपकता है, सड़कों पर गड्ढे हैं और युवाओं के पास रोजगार नहीं है। जब भी पब्लिक भलाई का कोई काम आता है, तो सरकार रोना रोने लगती है की “हमारे पास तो बजट ही नहीं है।”
लेकिन जैसे ही बात वक्फ बोर्ड की आती है, तो खजाने में रातों-रात 40 करोड़ रुपये पैदा हो जाते हैं! 40 करोड़ रुपये में एक पूरा का पूरा शानदार सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल बन सकता था, जिसमें हर धर्म के गरीब का मुफ्त इलाज होता।
इस पैसे से राज्य के दर्जनों बदहाल स्कूलों की कायापलट हो सकती थी। लेकिन नहीं! सरकार को पब्लिक की भलाई से ज़्यादा वक्फ बोर्ड के दफ्तर में लगने वाले इटालियन मार्बल की फिक्र है।
मंदिरों की देखभाल के नाम पर सरकारें हमेशा पीछे हट जाती हैं। हिन्दुओं के प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार तो छोड़िए, वहां बुनियादी सुविधाएं देने में भी सरकार का हाथ कांपता है।
लेकिन वक्फ के दफ्तर चलाने के लिए 5 करोड़ की मुफ्त खैरात सरेआम बांटी जा रही है।
आज तमिलनाडु के सनातनी समाज को ऐसा महसूस हो रहा है जैसे इस पूरे सिस्टम में उसकी हैसियत सिर्फ एक लावारिस एटीएम मशीन जैसी रह गई है।
एक ऐसी मशीन, जहां से पैसा तो जमकर निकाला जाता है, लेकिन उस मशीन की मेंटेनेंस या भलाई के लिए एक रुपया भी खर्च नहीं किया जाता।
