हिन्दुओं के हत्यारे से इतना प्रेम और अपने सगे दादा से इतनी बेरुखी, मुगल लूटेरे बाबर की कब्र में बार बार माथा टेकने वाले गाँधी परिवार ने एक बार फिर फिरोज गांधी की पुण्यतिथि पर छोड़ दी उनकी कब्र वीरान

कल 8 सितंबर था। भारत की राजनीति में दशकों तक राज करने वाले और खुद को देश का सबसे बड़ा राजनीतिक घराना बताने वाले परिवार के लिए यह तारीख बहुत बड़ी होनी चाहिए थी। क्यों?

क्योंकि कल ही के दिन, साल 1960 में राहुल और प्रियंका गाँधी के दादा फिरोज गांधी का निधन हुआ था। वही फिरोज गांधी, जिनका सरनेम (‘गांधी’) लगाकर आज भी इस परिवार की राजनीति शान से चमकती है।

कल उनकी 66वीं पुण्यतिथि थी।

लेकिन कमाल की बात देखिए! जिस परिवार को अपने ही सगे दादा की कब्र पर दो फूल चढ़ाने के लिए प्रयागराज बहुत दूर लगता है, उसी परिवार की चार पीढ़ियां अफ़ग़ानिस्तान के काबुल जाकर लाखों हिन्दुओं के हत्यारे और लूटेरे ‘बाबर’ की कब्र पर मत्था टेक कर आती रही हैं।

ये कोई वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का फॉरवर्ड मैसेज नहीं है भाई, ये वो कड़वी हकीकत है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।

अपने पुश्तैनी दादा की कब्र को लावारिस छोड़ देना और भारत की संस्कृति को रौंदने वाले एक विदेशी लूटेरे की कब्र पर पीढ़ियों तक हाजिरी लगाना… आखिर ये कैसा सियासी और पारिवारिक रिश्ता है?

आइए, आज इस दिखावे की राजनीति और मुग़लपरस्त मानसिकता का पूरा कच्चा-चिट्ठा खोलते हैं।

प्रयागराज का वो पारसी कब्रिस्तान और फिरोज गांधी की अस्थियां जिसे उनके अपने परिवार ने ही भुला दिया

पहले ज़रा कल की हकीकत और उस कब्र का सच जान लीजिए, जिसे आज पूरी तरह से भुला दिया गया है। प्रयागराज (जिसे पहले इलाहाबाद कहते थे) के स्टेनली रोड पर एक पुराना पारसी कब्रिस्तान है।

इसी कब्रिस्तान के एक शांत कोने में फिरोज जहांगीर गांधी की कब्र मौजूद है।

8 सितंबर 1960 को महज़ 48 साल की उम्र में हार्ट अटैक से फिरोज गांधी का निधन हो गया था। मरने से पहले उनकी एक ही आखिरी इच्छा थी की उनका अंतिम संस्कार पारसी तरीके से न होकर पूरे हिंदू रीति-रिवाज़ों के साथ हो।

उनकी इसी इच्छा का सम्मान करते हुए दिल्ली में बाकायदा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उनका दाह संस्कार किया गया। इसके बाद उनकी अस्थियों को दो हिस्सों में बांटा गया।

अस्थियों का एक हिस्सा प्रयागराज के पवित्र संगम में प्रवाहित कर दिया गया और दूसरे हिस्से को इसी पारसी कब्रिस्तान में दफनाकर एक स्मारक (कब्र) बना दिया गया।

अब आप सोचेंगे की जिस इंसान के नाम पर देश में इतनी बड़ी राजनीतिक विरासत खड़ी है, उसकी कब्र पर तो पुण्यतिथि या जयंती पर नेताओं का मेला लगता होगा।

लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है। दशकों तक सत्ता की मलाई खाने वाला ये परिवार यहाँ फटकता तक नहीं है।

आंकड़े देखिए, सोनिया गांधी आख़िरी बार 2001 में यहाँ आई थीं। राहुल गांधी 2008 और 2011 में एक-दो बार यहाँ रुके थे, और प्रियंका वाड्रा 2009 में।

उसके बाद से? एकदम सन्नाटा। कल उनकी 66वीं पुण्यतिथि पर भी यहाँ का नज़ारा कुछ अलग नहीं था। गांधी परिवार का कोई भी सदस्य अपने दादा को श्रद्धांजलि देने नहीं पहुँचा।

बस शहर के कुछ गिने-चुने पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ता आए, मोमबत्ती जलाई, दो फूल चढ़ाए और चलते बने। जिस सरनेम ने इन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया, उस सरनेम वाले असली इंसान की कब्र आज अपने ही वारिसों की राह ताक रही है।

1959 में नेहरू 1976 में राजीव और 2005 में राहुल गांधी… भारत को लूटने वाले बाबर की कब्र से चार पीढ़ियों का ये कैसा प्रेम है

अब ज़रा इस सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। प्रयागराज की दूरी भले ही इन नेताओं को अखरती हो, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान का काबुल शहर इन्हें हमेशा अपने घर जैसा लगा है।

काबुल में एक जगह है ‘बाग-ए-बाबर’। यहीं पर भारत के मंदिरों को तोड़ने वाले, अयोध्या में रामलला का मंदिर गिराने वाले और लाखों निर्दोष हिन्दुओं का कत्लेआम करने वाले मुग़ल लूटेरे बाबर की कब्र है।

शायद आपको जानकर हैरानी होगी की गांधी-नेहरू परिवार की एक-दो नहीं, बल्कि पूरी चार पीढ़ियों ने इस लूटेरे की मज़ार पर जाकर अपना सिर झुकाया है।

ये हम नहीं कह रहे, बल्कि खुद कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व विदेश मंत्री रहे के. नटवर सिंह ने अपनी किताब और बयानों में इसके पुख्ता सुबूत दिए हैं।

इस सिलसिले की शुरुआत की थी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने। ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स गवाह हैं की 1959 में नेहरू जी अफ़ग़ानिस्तान गए और वहां जाकर बाकायदा बाबर की कब्र पर हाजिरी लगाई।

इसके बाद 1968 में इंदिरा गांधी काबुल दौरे पर गईं। नटवर सिंह अपनी किताब में लिखते हैं की उस वक़्त बाबर की कब्र पर जाने का कोई सरकारी प्रोटोकॉल नहीं था, लेकिन इंदिरा जी ने वहां जाने की ज़िद पकड़ ली।

वो वहां गईं, सिर झुकाया और बाहर आकर नटवर सिंह से बोलीं- “आज मैंने इतिहास को महसूस किया है।”

ज़रा सोचिए! लाखों हिन्दुओं को बेरहमी से काटने वाले की कब्र पर इन्हें भारत का ‘इतिहास’ महसूस हो रहा था!

लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होती। कई ऐतिहासिक रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1976 में इंदिरा गांधी एक बार फिर बाबर की मज़ार पर गईं। और इस बार वो अकेली नहीं थीं।

उनके साथ उनके बेटे राजीव गांधी और छोटे से राहुल गांधी भी मौजूद थे। यानी राजीव गांधी भी उस मुग़ल आक्रान्ता के सामने सजदा करने वालों की लिस्ट में शामिल रहे।

और फिर आया साल 2005। अगस्त 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अफ़ग़ानिस्तान के सरकारी दौरे पर थे। उनके साथ राहुल गांधी, के. नटवर सिंह और तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) एम.के. नारायणन भी गए थे।

इस कूटनीतिक दौरे के बीच भी राहुल गांधी ने वक़्त निकाला और उसी बाग-ए-बाबर जाकर अपने परदादा, दादी और पिता की परंपरा को निभाते हुए बाबर की मज़ार पर मत्था टेका।

अब इंसानियत और तर्क के नाते एक सीधा सा सवाल उठता है। अयोध्या में भगवान राम का मंदिर तोड़ने वाले बाबर की मज़ार में ऐसा क्या गड़ा है जो नेहरू, इंदिरा, राजीव और राहुल गांधी… लगातार चार पीढ़ियां वहां सजदा करने जाती रहीं?

ऐसा कौन सा पुश्तैनी लगाव है की प्रयागराज जाने के लिए इनके पास 15 साल से वक़्त नहीं है, लेकिन काबुल जाने के लिए हर पीढ़ी बेकरार रहती है?

भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले फिरोज गांधी से आखिर क्या दिक्कत है जो सिर्फ उनका सरनेम इस्तेमाल किया गया और वजूद मिटा दिया गया

अब एक बहुत ही स्वाभाविक सा सवाल जेहन में आता है। आखिर ऐसी क्या वजह है की गांधी परिवार को अपने ही दादा, अपने ही पुरखे से इतनी चिढ़ है?

ज़्यादातर लोगों को लगता है की फिरोज गांधी की पहचान सिर्फ इतनी थी की वो इंदिरा गांधी के पति थे। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

फिरोज गांधी अपने ज़माने के एक बेहद प्रखर, निडर और बेबाक सांसद थे। वो ऐसे नेता थे जो गलत बात पर अपनी ही पार्टी और अपनी ही सरकार से भिड़ जाने का माद्दा रखते थे। और यही बेबाकी गांधी परिवार को खटकने लगी थी।

साल 1958 का वो दौर याद कीजिए, जब देश में आज़ाद भारत का पहला बड़ा आर्थिक घोटाला सामने आया था- ‘मूंदड़ा LIC घोटाला’।

आपको जानकर हैरानी होगी की इस घोटाले का पर्दाफाश किसी विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि खुद फिरोज गांधी ने संसद के अंदर किया था।

उन्होंने डंके की चोट पर अपनी ही सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और अपने ससुर (जवाहरलाल नेहरू) की सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था।

फिरोज गांधी के इस कड़े प्रहार का नतीजा ये हुआ की नेहरू जी के बेहद करीबी और तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णामाचारी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी, उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

बस यही वो टर्निंग पॉइंट था जिसने फिरोज गांधी को उनके ही ससुराल और पार्टी में ‘विलेन’ बना दिया। गांधी परिवार को हमेशा से ऐसे लोग पसंद रहे हैं जो उनके सामने जी-हुज़ूरी करें।

भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ आवाज़ उठाने वाला इंसान भला इन्हें कैसे रास आता?

यही वजह है की सत्ता की मलाई खाने के लिए, पब्लिक का वोट बटोरने के लिए इन्होंने ‘गांधी’ सरनेम तो लपक लिया, क्योंकि वो सरनेम सत्ता की मास्टर चाबी था।

लेकिन उस सरनेम के असली मालिक, उस इंसान के उसूलों और उसके वजूद को इतिहास से पूरी तरह मिटा दिया गया।

आज भी कांग्रेस के किसी बड़े मंच से फिरोज गांधी का नाम गलती से भी नहीं लिया जाता। सरनेम अपना लिया, लेकिन इंसान को पीछे छोड़ दिया।

चुनाव आते ही दत्तात्रेय गोत्र याद आता है लेकिन अपने सगे दादा को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रयागराज दूर लगता है

इस पूरे मामले का सबसे घिनौना पहलू है सियासी दिखावा। जब उत्तर प्रदेश, गुजरात या मध्य प्रदेश में चुनाव होते हैं, तो यही राहुल गांधी अचानक से अपना रूप बदल लेते हैं।

कुर्ते के ऊपर से जनेऊ चमकने लगता है और कहते हैं की “हम तो असली कश्मीरी पंडित हैं, हमारा गोत्र दत्तात्रेय है, हम तो पक्के शिवभक्त हैं!”

चुनाव के टाइम पर इन्हें हर मंदिर, हर मठ और हर तीर्थ याद आ जाता है।

लेकिन ज़रा सोचिए, क्या अपने पुरखों को याद करना, उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देना हमारे सनातन धर्म का हिस्सा नहीं है? बिल्कुल है!

लेकिन शायद दादा की कब्र पर जाने से ‘वोट’ नहीं मिलते, इसलिए वहां जाना बंद कर दिया गया। इन्हें मालूम है की प्रयागराज के उस पारसी कब्रिस्तान में जाकर फूल चढ़ाने से कोई सियासी फायदा नहीं होने वाला।

और दूसरी तरफ काबुल में वो बाबर की कब्र है.. जहाँ पर जा कर माथा टेकने से भारत के एक खास ‘वोट बैंक’ को लुभाया जा सकता है।

राजनीति में रिश्तों और उसूलों की कोई जगह नहीं है.. यहाँ सिर्फ वोट बैंक और सत्ता की लालसा काम करती है।

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