दोस्तों यूपी की सियासत का भी अपना एक अलग ही स्वैग है। यहाँ कब कौन सी गंगा उल्टी बहने लगे, किसी को कानो-कान खबर नहीं होती।
अब यूपी की राजनीति में यादवों का ज़िक्र न हो, ऐसा तो मुमकिन ही नहीं। यादव यानी यदुवंश… मतलब वो गौरवशाली समाज जो खुद को सीधे भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ता है।
जिनका पूरा का पूरा इतिहास ही धर्म की स्थापना, अन्याय के खिलाफ आवाज़ और गीता के ज्ञान से भरा पड़ा है। मथुरा से लेकर द्वारका तक, जिस कुल ने हमेशा धर्म की ढाल बनकर सनातन की रक्षा की हो, उस कुल का नाम लेते ही हम सनातनियों को गर्व महसूस होता है।
लेकिन ज़रा रुकिए! सियासत के इस रंगमंच पर एक ऐसा परिवार भी है जो खुद को इस यदुवंश का सबसे बड़ा प्रतिनिधि बताता है, पर उनकी प्रेरणा के स्रोत देखकर आप भी अपना माथा पीट लेंगे।
जी हाँ, बात हो रही है उत्तर प्रदेश के उस कद्दावर समाजवादी यादव परिवार की, जिसने सेक्युलरिज्म का ऐसा अजब-गजब रस पिया की उन्हें अपने घर के चिराग, अपने कुलदीपक ‘अखिलेश’ का नाम रखने के लिए भगवान कृष्ण, बलराम या अर्जुन की डिक्शनरी कम पड़ गई।
प्रेरणा लेने के लिए ये लोग सीधे मैसूर पहुँच गए और वो भी किसके पास? इतिहास के उस क्रूर आक्रांता टीपू सुल्तान के पास!
सोचिए, जिस घर में बांसुरी और सुदर्शन चक्र की पूजा होनी चाहिए थी, वहां टीपू की तलवार से वैचारिक इश्क लड़ाया जा रहा था। अब ये वोट बैंक की मजबूरी थी या कोई गहरा सुल्तानी शौक, ये समझना वाकई बड़ा दिलचस्प है!
भगवान कृष्ण की बांसुरी से लेकर टीपू सुल्तान की तलवार तक, यूपी की सेक्युलर सियासत का ये अजब-गजब खेल
राजनीति में हाथी के दांत दिखाने के कुछ और, और खाने के कुछ और होते हैं, ये तो सब जानते हैं। समाजवादी नेता बड़ी-बड़ी रैलियों में कहते हैं की “हम भगवान कृष्ण के वंशज हैं।” बात-बात पर गीता का ज्ञान दिया जाता है।
लेकिन ज़रा इनकी वैचारिक ज़मीन टटोल कर देखिए तो पता चलता है की अंदर ही अंदर एक अलग ही खिचड़ी पक रही है।
अब आप ही बताइए, जो परिवार खुद को यदुवंशी परंपरा का प्रतिनिधि मानता हो, क्या उसके घर में बच्चों के नाम कृष्ण, माधव, केशव, अर्जुन या युधिष्ठिर नहीं होने चाहिए थे?
हमारी सनातनी परंपरा में तो शूरवीरों और महापुरुषों के नामों की कोई कमी नहीं है। लेकिन ऐसा लगता है की मुलायम परिवार पर सेक्युलरिज्म का नशा कुछ इस कदर हावी था की उन्हें हिंदू नायकों में कोई ‘वज़न’ ही नज़र नहीं आया।
उन्होंने अपने राजनीतिक वारिस और घर के सबसे लाड़ले बेटे अखिलेश यादव का निकनेम रखा- ‘टीपू’।
वही टीपू, जिसका नाम सुनते ही दक्षिण भारत के लाखों कटे हुए हिंदुओं के सिर, टूटे हुए मंदिर और जबरन धर्मांतरण का खौफनाक इतिहास आंखों के सामने तैरने लगता है।
क्या अजब-गजब विरोधाभास है! जो यदुवंशी कुल धर्म की रक्षा के लिए जाना जाता हो, उसी कुल का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवार एक ऐसे शासक से प्रेरणा ले रहा था, जिसने सनातन धर्म को मिटाने में अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी।
राहुल बाबा का नाम ‘पप्पू’ तो जनता ने रखा लेकिन अखिलेश का ‘टीपू’ नाम खुद मुलायम परिवार ने एक क्रूर आक्रांता से प्रेरित होकर रखा

अक्सर ऐसा होता है की राजनीति में जब कोई नेता जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो पब्लिक मज़े लेने के लिए उसका कोई निकनेम रख देती है।
जैसे राहुल गांधी को जनता ने तंज में ‘पप्पू’ बना दिया। लेकिन अखिलेश यादव के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है भाई!
उन्हें जो ‘टीपू’ कहा जाता था, वो किसी पॉलिटिकल मीम या आईटी सेल की उपज नहीं थी। यह तो बाकायदा उनका घर का निकनेम है, जिससे खुद नेताजी (मुलायम सिंह यादव), शिवपाल यादव और परिवार के तमाम करीबी लोग उन्हें बचपन से बुलाते आए हैं।
अब सवाल ये उठता है की आखिर यही नाम क्यों? क्या हमारे यूपी में शूरवीरों की कमी थी? अगर आज़ादी के दीवाने ही थे, तो नाम चंद्रशेखर आज़ाद के नाम पर ‘आज़ाद’ रख देते! रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, भगत सिंह… लिस्ट बहुत लंबी है।
लेकिन नहीं, मुलायम परिवार के करीबियों का दिल तो मैसूर के उसी सुल्तान पर आया था।
‘टीपू सुल्तान’ के व्यक्तित्व, उसकी कट्टरता और उसकी तथाकथित ‘वीरता’ से प्रभावित होकर अखिलेश का यह नामकरण किया गया था।
शायद बचपन से ही परिवार चाहता था की उनका बेटा बड़ा होकर उत्तर प्रदेश में उसी ‘सुल्तानी’ अंदाज़ में राज करे। और सच पूछिए तो, नाम का असर होता भी है।
बचपन से ‘टीपू-टीपू’ सुनते हुए जो शख्स बड़ा हुआ हो, उसकी वैचारिक ज़मीन में सनातन के लिए कितना सम्मान होगा, ये तो हम सब आज उनकी राजनीति देखकर समझ ही रहे हैं।
पत्रकार सुनीता आरोन की किताब से खुला वो ‘टीपू’ वाला राज जिसने यदुवंशी परिवार की खास ‘सेक्युलर पसंद’ से उठा दिया पर्दा

अब कुछ सेक्युलर पैरोकार तुरंत उछल कर आएंगे और कहेंगे की “अरे दाल में कोई काला नहीं है, टीपू तो ऐसे ही एक आम सा नाम है, आप लोग खामखां इसमें राजनीति ढूंढ़ रहे हैं!”
तो चलिए, उनके इस मुगालते को भी दूर किए देते हैं। हम हवा में कोई तीर नहीं चला रहे, बल्कि इस बात के एकदम पक्के और सॉलिड सुबूत हैं।
ये सुबूत कहीं और से नहीं, बल्कि साल 2012 में आई एक बहुत ही मशहूर किताब से मिला है। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की सीनियर पत्रकार सुनीता आरोन (Sunita Aron) ने अखिलेश यादव के जीवन और उनकी राजनीतिक यात्रा पर एक पूरी बायोग्राफी लिखी थी, जिसका नाम था- “Akhilesh Yadav: Winds of Change”।
2012 के यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान जब यह किताब बाज़ार में आई, तो इसी किताब और उसके बाद हुए कई इंटरव्यूज़ में सुनीता आरोन ने खुद एक बहुत बड़ा खुलासा किया।
उन्होंने दुनिया को बताया की अखिलेश यादव का बचपन का निकनेम ‘टीपू’ किसी और वजह से नहीं, बल्कि सीधे-सीधे ‘टाइगर ऑफ मैसूर’ यानी टीपू सुल्तान से ही प्रेरित होकर रखा गया था।
और सबसे मज़ेदार बात जानते हैं क्या है? जब इस किताब के पन्नों से ये राज़ बाहर निकला और मीडिया में इसकी चर्चा हुई, तो समाजवादी कुनबे के किसी भी नेता या प्रवक्ता ने इसका खंडन नहीं किया!
किसी ने आगे आकर ये नहीं कहा की “नहीं जी, हमारा टीपू सुल्तान से क्या लेना-देना?” बल्कि उन्होंने बड़ी खामोशी से इस सच को अपना लिया।
शायद उन्हें अंदर ही अंदर ये लग रहा था की इस नाम के सार्वजनिक होने से उनका एक खास ‘वोट बैंक’ और भी ज्यादा मज़बूत हो जाएगा।
“हम तो तुम्हारे ही सुल्तान से प्रेरणा लेते हैं”- शायद यही वो खामोश संदेश था जो मुलायम परिवार अपनी सियासत के ज़रिए देना चाहता था।
अब सोचिए, जिस परिवार को टीपू सुल्तान में अपना आदर्श नज़र आता हो, वो उत्तर प्रदेश जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य को किस दिशा में ले जाना चाहता होगा?
मालाबार के नरसंहार से लेकर मंदिरों के विध्वंस तक टीपू सुल्तान का वो इतिहास जिसे पढ़कर भी यादव परिवार का दिल सुल्तान पर ही आया
अब ज़रा उस ‘प्रेरणा स्रोत’ की बात भी कर लेते हैं, जिस पर यदुवंशी परिवार का दिल आ अटका था। वामपंथी इतिहासकार भले ही अपनी पूरी ज़िंदगी टीपू सुल्तान को एक ‘महान’, ‘सेक्युलर’ और ‘स्वतंत्रता सेनानी’ साबित करने में खपा दें..
लेकिन इतिहास की ज़मीन पर सच के जो निशान छूटे हैं, उन्हें कोई हरी चादर ओढ़ाकर नहीं छिपा सकता। दक्षिण भारत, खासकर कर्नाटक और केरल का एक बहुत बड़ा तबका आज भी टीपू का नाम सुनते ही सिहर उठता है।
आप मालाबार और कोडागु (Kodagu) का इतिहास उठाकर देख लीजिए। ये वो इलाके थे जहां टीपू सुल्तान ने अपने ‘सेक्युलरिज्म’ का ऐसा नाच किया था की इंसानियत भी कांप उठी थी।
वहां के लाखों हिंदुओं के सामने सिर्फ दो विकल्प रखे गए थे- या तो अपना सनातन धर्म छोड़ो और इस्लाम कबूल करो, या फिर मौत के घाट उतर जाओ।
इतिहास की किताबों में दर्ज है की कैसे वहां हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण करवाया गया, उनकी आस्था को तोड़ने के लिए उन्हें जबरन गाय का मांस खिलाया गया, और जिन्होंने अपनी आस्था से समझौता करने से इनकार कर दिया, उनके सिर धड़ से अलग कर दिए गए।
और मेलकोटे (Melkote) के मांड्यम अयंगर ब्राह्मणों का वो दर्दनाक किस्सा तो शायद ही कोई सनातनी भूल पाए। ये दीवाली का पावन दिन था, जब लोग दीये जलाने की तैयारी कर रहे थे, और उसी दिन टीपू सुल्तान के आदेश पर 700 से ज़्यादा अयंगर ब्राह्मणों (जिनमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे) को एक साथ पेड़ों पर फांसी के फंदे से लटका दिया गया था।
उस दिन के बाद से मेलकोटे के उस समाज ने कभी दीवाली नहीं मनाई।
अब ज़रा सोचिए यार! जिस शासक के हाथ इतने मासूम सनातनियों के खून से रंगे हों, जिसने न जाने कितने अनगिनत प्राचीन हिंदू मंदिरों को ज़मींदोज़ कर दिया हो… क्या यदुवंश का गौरवशाली परचम थामने वाले मुलायम परिवार को अपने घर के चिराग का नाम रखने के लिए पूरे इतिहास में यही ‘विवादित’ सुल्तान मिला था?
क्या हमारी सनातनी डिक्शनरी में, हमारे महाकाव्यों में शूरवीरों के नाम सच में कम पड़ गए थे? या फिर ये एक खास तरह के वोट बैंक को खुश करने के लिए उठाया गया कोई बहुत ही दूरदर्शी सियासी कदम था? जवाब जो भी हो, पर है बड़ा ही दिलचस्प!
चुनाव में परशुराम का फरसा और दिल में मैसूर का सुल्तान, सियासत में दोनों नावों की सवारी का ये समाजवाद बड़ा ही गज़ब है

यूपी की ये जो सेक्युलर सियासत है ना भाईसाहब, ये रंग बदलने की ट्यूशन दे सकती है। इनका समाजवाद दरअसल दोनों नावों पर एक साथ सवारी करने का एक बड़ा ही गज़ब जुगाड़ है।
आप चुनाव के सीज़न का कोई भी अखबार उठाकर देख लीजिए। जैसे ही वोटिंग करीब आती है, अचानक से इन नेताओं के अंदर का सोया हुआ ‘सनातनी’ जाग उठता है।
अखिलेश यादव मंचों से भगवान कृष्ण की बड़ी-बड़ी मूर्तियां भेंट करने लगते हैं। ब्राह्मणों का वोट चाहिए होता है, तो रातों-रात भगवान परशुराम जी की विशाल प्रतिमाएं लगवाने की कसमें खाई जाने लगती हैं और चांदी का फरसा उठा लिया जाता है।
‘हम भी सच्चे हिंदू हैं’, ‘यदुवंशियों का असली वारिस तो मैं ही हूं’- ऐसे डायलॉग्स से पूरा यूपी गूंजने लगता है। मतलब चुनाव के टाइम पर इनकी हिंदू आस्था ऐसी छलकती है की कोई भी भोला-भाला आदमी इमोशनल हो जाए।
लेकिन खेल तो तब शुरू होता है जब ये सत्ता की कुर्सी पर बैठते हैं! जैसे ही सरकार बनती है, इनके अंदर का वो ‘टीपू’ जाग जाता है।
परशुराम का फरसा और कृष्ण की बांसुरी साइड में रख दी जाती है, और फिर शुरू होता है ‘सुल्तानी निज़ाम’।
फिर क्या होता है? फिर तुष्टिकरण की राजनीति की सारी सीमाएं लांघ दी जाती हैं। हिंदू त्योहारों और जुलूसों पर नियम-कानूनों की बेड़ियां डाल दी जाती हैं, जबकि एक खास वर्ग को बीच सड़क पर कुछ भी करने की पूरी छूट मिल जाती है।
दंगों में आरोपियों के धर्म देखकर उन पर केस वापस लिए जाते हैं। ये देखकर तो यही लगता है यार की ये कृष्ण का समाजवाद कम, और ‘मैसूर के सुल्तान’ का राज ज़्यादा है!
क्या वाकई बचपन में मिले इस ‘सुल्तानी’ नाम ने ही तय कर दी थी अखिलेश की तुष्टिकरण वाली राजनीतिक दिशा
कहा जाता है की इंसान के नाम का असर उसकी ज़िंदगी और उसकी सोच पर बहुत गहरा पड़ता है। अब ये बात साइंस माने या न माने, लेकिन राजनीति के मैदान में ये थ्योरी बिल्कुल सच साबित होती दिख रही है।
बचपन से लेकर बड़े होने तक, जिस इंसान ने अपने कान में सबसे ज़्यादा ‘टीपू’ नाम सुना हो, जिसने ये जाना हो की उसका नाम एक खास ‘सुल्तान’ से प्रेरित है, तो क्या उसके मन पर उस सुल्तानी सोच का असर नहीं होगा?
आज आप अखिलेश यादव की पूरी राजनीति को ध्यान से देखिए। वो उसी ईकोसिस्टम के इर्द-गिर्द घूमती है, जो सनातन को पानी पी-पीकर कोसता है।
उनके गठबंधन, उनके बयान और उनकी पार्टी के वो नेता जो रामचरितमानस से लेकर हिंदू देवी-देवताओं पर भद्दी टिप्पणियां करते हैं- और उस पर अखिलेश की खामोशी… ये सब क्या है? ये उसी सोच का विस्तार है जो उन्हें उनके निकनेम के साथ विरासत में मिली है।
और थोड़ा पीछे जाएं, तो 1990 का वो दौर कैसे भूल सकते हैं। जब अयोध्या में निहत्थे रामभक्त कारसेवकों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दी गई थीं।
सरयू नदी का पानी लाल हो गया था। शायद रामभक्तों के साथ जो कुछ भी उस वक्त हुआ, वो उसी वैचारिक सोच का हिस्सा था, जो मैसूर के उस सुल्तान की सोच से हूबहू मेल खाती है, जिसने कभी भी सनातनियों को पनपने नहीं दिया।
खैर, बात बहुत सीधी सी है दोस्त। नाम में वाकई बहुत बड़ी ताकत होती है। जब आपके घर के कुलदीपक की प्रेरणा ही मंदिरों को तोड़ने वालों के इतिहास से ली गई हो, तो फिर उनसे मथुरा, काशी और अयोध्या के भव्य उद्धार की उम्मीद करना सबसे बड़ी भूल होगी।
चुनाव में दिखने वाले फरसे और बांसुरी के पीछे जो ‘सुल्तानी तलवार’ छिपी है, उसे पहचानना आज के वक्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है!
