आज 28 सितंबर 2026 है। हर उस हिंदुस्तानी के लिए आज का दिन बहुत बड़ा है जिसके सीने में अपने देश के लिए धड़कन बसती है।
आज ही के दिन, साल 1907 में अविभाजित भारत के लायलपुर जिले के बंगा गांव (जो अब पाकिस्तान में है) में एक ऐसा शेर पैदा हुआ था, जिसके सिर्फ नाम से ही अंग्रेजी हुकूमत के पसीने छूट जाते थे।
आज हमारे उसी ‘शहीद-ए-आज़म’ भगत सिंह की 119वीं जयंती है।

जलियांवाला बाग़ की उस खून से सनी मिट्टी ने कैसे एक 12 साल के लड़के को इंकलाब की धड़कन बना दिया
भगत सिंह कोई रातों-रात बने क्रांतिकारी नहीं थे। बगावत और देशभक्ति का ये जज़्बा तो उनके खून की एक-एक बूंद में दौड़ता था।
उनके दादा अर्जुन सिंह, पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह खुद बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे।
आपको याद होगा की किसान आंदोलन के दौरान ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ का जो नारा गूंजता था, वो दरअसल भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह का ही खड़ा किया हुआ आंदोलन था।
जिस घर की दीवारों पर ही आज़ादी के तराने लिखे हों, वहां पलने वाले बच्चे के खिलौने भी तो बाकियों से अलग ही होंगे।
तारीख थी 13 अप्रैल 1919। अमृतसर का जलियांवाला बाग़ जनरल डायर की गोलियों से छलनी हो चुका था। हज़ारों बेगुनाह हिंदुस्तानियों की लाशें बिछी हुई थीं। उस वक़्त भगत सिंह की उम्र मुश्किल से 12 साल थी।
जब इस भयंकर नरसंहार की खबर उन तक पहुंची, तो वो 12 साल का बच्चा स्कूल बंक करके मीलों पैदल चलकर सीधे अमृतसर के उस बाग में पहुंच गया।
उसने वहां की खून से सनी हुई लाल मिट्टी को एक छोटी सी शीशी में भर लिया। जब वो घर लौटा, तो वो उस शीशी में रखी मिट्टी को छुपाकर नहीं, बल्कि सामने रखकर उसकी पूजा करने लगा।
वो मिट्टी उसके लिए किसी भगवान से कम नहीं थी, क्योंकि उसमें उसके बेगुनाह देशवासियों की जान रची-बसी थी।
लाला लाजपत राय की मौत का भयंकर बदला, जब अंग्रेज़ सांडर्स को गोली ठोककर इन शेरों ने दहला दी थी अंग्रेजी हुकूमत
वक़्त बीतता गया और वो 12 साल का बच्चा जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुका था। अब वो सिर्फ एक भावुक लड़का नहीं, बल्कि ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) का एक बेहद तेज़-तर्रार और खूंखार क्रांतिकारी बन चुका था।
अक्टूबर 1928 का महीना था। लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध चल रहा था और हज़ारों की भीड़ ‘साइमन गो बैक’ के नारे लगा रही थी।
इसी भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे पंजाब केसरी लाला लाजपत राय। तभी वहां के सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस, जेम्स ए. स्कॉट ने उस शांतिपूर्ण भीड़ पर लाठीचार्ज का ऑर्डर दे दिया।
अंग्रेजों ने लाला जी के सिर और सीने पर इतनी बेरहमी से लाठियां बरसाईं की वो बुरी तरह घायल हो गए और 17 नवंबर 1928 को उनका देहांत हो गया।
लाला जी की मौत ने पूरे देश को सुन्न कर दिया था, लेकिन भगत सिंह और उनके साथियों (राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद) के सीने में बदले की आग धधक उठी। इन्होंने कसम खाई की लाला जी के खून का एक-एक कतरा अंग्रेजों से वसूलेंगे।
तारीख तय हुई 17 दिसंबर 1928। जगह थी लाहौर पुलिस स्टेशन के ठीक बाहर की सड़क। इन शेरों ने घात लगाकर स्कॉट को मारने का प्लान बनाया था।
लेकिन किस्मत से पुलिस स्टेशन से स्कॉट की जगह एएसपी जॉन पी. सैंडर्स अपनी मोटरसाइकिल पर बाहर निकला। जैसे ही वो बाहर आया, राजगुरु ने अचूक निशाना लगाते हुए पहली गोली सैंडर्स के सिर में दाग दी। वो वहीं गिर पड़ा।
और फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर अपनी पिस्तौल से गोलियों की ऐसी बौछार की कि सैंडर्स का शरीर छलनी हो गया।
इसके बाद अंग्रेजों की पूरी पुलिस फ़ोर्स लाहौर में चप्पे-चप्पे पर तैनात हो गई। लेकिन भगत सिंह का दिमाग भी पुलिस से दस कदम आगे चलता था।
उन्होंने अपने मशहूर सिख वाले बाल और दाढ़ी कटवा दी (जो उनके लिए बहुत बड़ा त्याग था), एक अंग्रेज़ी हैट पहना और महान क्रांतिकारी दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) के साथ पति-पत्नी का भेष बना लिया।
दुर्गा भाभी के छोटे से बच्चे को गोद में लेकर, राजगुरु को अपना नौकर बनाकर, ये शेर अंग्रेजों की नाक के ठीक नीचे से एक फर्स्ट क्लास ट्रेन के डिब्बे में बैठकर कलकत्ता के लिए निकल गए।
पूरी ब्रिटिश हुकूमत हाथ मलती रह गई और वो उन्हें छू तक नहीं पाए।

बहरों के कान खोलने के लिए वो एतिहासिक धमाका और पर्चे उड़ाकर सीना तानते हुए गिरफ्तारी देना
भगत सिंह बहुत बड़े मास्टरमाइंड थे। वो जानते थे की अगर आज़ादी की लड़ाई को जन-आंदोलन बनाना है, तो उनकी आवाज़ को अदालत के कटघरे से पूरे देश तक पहुंचना होगा।
साल 1929 की शुरुआत में अंग्रेज सरकार दो बहुत ही काले कानून पास करने वाली थी- ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट’, जो सीधे-सीधे भारतीयों के हक कुचलने के लिए थे।
8 अप्रैल 1929 को जब दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में इन बिलों पर बहस चल रही थी, तभी दर्शक दीर्घा से अचानक दो बम नीचे गिरे और एक भयंकर धमाका हुआ। पूरा हॉल धुएं से भर गया। ये बम भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने फेंके थे।
लेकिन यहाँ एक बात बिल्कुल साफ समझनी होगी। उनका मकसद वहां किसी अंग्रेज़ की जान लेना नहीं था। बम जानबूझकर उन खाली बेंचों की तरफ फेंके गए थे जहां कोई बैठा नहीं था।
धमाके के बाद उन्होंने असेंबली में कुछ पर्चे उड़ाए, जिन पर फ्रांसीसी क्रांतिकारी का एक बहुत ही मशहूर कोट (Quote) लिखा था- “बहरों को सुनाने के लिए आवाज़ का बहुत तेज़ होना ज़रूरी है।”
धमाके के बाद असेंबली में भगदड़ मच गई थी। अगर वो चाहते, तो उस धुएं का फायदा उठाकर बड़ी आसानी से वहां से भाग सकते थे।
लेकिन वो भागे नहीं। वो वहीं सीना तान कर खड़े रहे और अपने पूरे फेफड़ों की ताकत से पहली बार वो नारा लगाया जिसने पूरे मुल्क की रूह को झकझोर कर रख दिया- “इंकलाब जिंदाबाद!”
उन्होंने खुद अपनी गिरफ्तारी दी, क्योंकि वो अदालत को अपना मंच बनाना चाहते थे। वो चाहते थे की जब उन पर मुकदमा चले, तो अखबारों के ज़रिए उनकी आवाज़ और उनकी विचारधारा देश के कोने-कोने तक, हर झोपड़ी और हर नौजवान तक पहुंचे।
और हुआ भी बिल्कुल ऐसा ही! असेंबली के उस धमाके ने सच में अंग्रेजों के कान फाड़ दिए थे और पूरे देश में इंकलाब की वो आग लगा दी थी, जिसे बुझाना अब गोरी सरकार के बस में नहीं था।
116 दिन की वो भूख हड़ताल, और कालकोठरी में रची गई आज़ादी की इबारत
गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह और उनके साथियों को जेल की जिन कालकोठरियों में डाला गया, वहां के हालात नरक से भी बदतर थे।
उन्होंने देखा की वहां अंग्रेजों का कितना खौफनाक दोगलापन चल रहा है।
जेल में जो गोरे (अंग्रेज़) कैदी थे, उन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था- पहनने को अच्छे कपड़े, पढ़ने को अख़बार और खाने को बढ़िया खाना।
लेकिन जो भारतीय राजनीतिक कैदी थे, उन्हें जानवरों से भी बदतर समझा जाता था। उन्हें खाने के नाम पर सड़ा हुआ दलिया दिया जाता था जिसमें कीड़े रेंगते थे और रोटियां ऐसी होती थीं जिन्हें चबाना भी नामुमकिन था।
भगत सिंह ने इस नाइंसाफी के खिलाफ सीधे अंग्रेजी हुकूमत की आँखों में आँखें डालकर बगावत कर दी। उन्होंने मांग की कि हमें ‘राजनीतिक कैदी’ (Political Prisoners) का दर्जा दिया जाए।
और जब अंग्रेज़ नहीं माने, तो उन्होंने हथियार उठाया- ‘भूख हड़ताल’!
ज़रा कल्पना करके देखिए… पूरे 116 दिन! 116 दिनों तक भगत सिंह और उनके साथियों ने अन्न का एक दाना तक अपने मुंह में नहीं रखा।
अंग्रेज पागल हो गए थे। उन्होंने इन नौजवानों का अनशन तोड़ने के लिए हर हथकंडा अपनाया। कैदियों के कमरों में पानी के घड़ों की जगह दूध के घड़े रखवा दिए गए ताकि प्यास से तड़पकर ये दूध पी लें।
लेकिन इन शेरों ने उस दूध के मटकों को ठोकर मारकर तोड़ दिया।
अंग्रेजों ने 5-5 हट्टे-कट्टे पुलिसवालों को लगाकर ज़बरदस्ती इनके मुंह में रबर की पाइप ठूंसकर दूध डालने की कोशिश की। पाइप कई बार फेफड़ों में चला जाता था, खून की उल्टियां होती थीं, लेकिन इनका हौसला नहीं टूटा।
इसी खौफनाक भूख हड़ताल के 63वें दिन उनके साथी जतिन दास ने तड़प-तड़प कर अपनी जान दे दी, वो शहीद हो गए।
जतिन दास की शहादत ने पूरे देश में आज़ादी की ऐसी आंधी ला दी की आख़िरकार इस अहंकारी ब्रिटिश हुकूमत को घुटने टेकने पड़े और भगत सिंह की मांगें माननी पड़ीं।
116 दिन बिना खाए ज़िंदा रहना, ये साबित करता है की उनका शरीर भले ही कमज़ोर हो गया था, लेकिन उनकी रूह फौलाद की बनी थी।
खौफ से कांपते अंग्रेजों का एक दिन पहले ही चुपके से फांसी देना, और वीर भगत सिंह का ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गाते हुए फांसी का फंदा चूम लेना
लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी थी। मुकर्रर की गई तारीख थी 24 मार्च 1931 की सुबह।
लेकिन पूरा हिंदुस्तान सड़कों पर उतर आया था। जेल के बाहर हज़ारों की भीड़ इंकलाब के नारे लगा रही थी। ब्रिटिश हुकूमत को ये डर सताने लगा की अगर 24 मार्च की सुबह तक का इंतज़ार किया, तो ये भीड़ जेल की दीवारें तोड़कर इन शेरों को आज़ाद करा लेगी।
और फिर अंग्रेजों ने वो नीचता दिखाई जो उनके कायर होने का सबसे बड़ा सबूत है। उन्होंने फांसी का वक़्त बदल दिया।
इतिहास में पहली और आख़िरी बार ऐसा हुआ जब किसी को सुबह के बजाय शाम को फांसी दी गई। 23 मार्च 1931 की शाम को करीब 7 बजे जेलर उनके पास आया और बोला- “वक़्त हो गया है।”
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी के तख्ते की तरफ ले जाया जाने लगा। तीनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ा हुआ था।
मौत का कोई खौफ नहीं, बल्कि चेहरों पर ऐसी चमक थी जैसे कोई दूल्हा अपनी बारात लेकर जा रहा हो।
पूरे जेल परिसर में उनकी कड़कती हुई आवाज़ गूंजने लगी- “इंकलाब जिंदाबाद!” और फिर उन्होंने वो तराना छेड़ दिया जो आज भी हमारे कानों में गूंजता है- “मेरा रंग दे बसंती चोला…”
तीनों शेरों ने जल्लाद के हाथ से काले कपड़े पहनने से इंकार कर दिया। उन्होंने खुद आगे बढ़कर फांसी के फंदे को चूमा और अपने गले में डाल लिया। 23 मार्च 1931 की शाम 7 बजकर 33 मिनट पर, आज़ादी के ये तीनों आशिक़ हमेशा के लिए अमर हो गए।
