चाणक्य-नीति भी बन जाती घाव, जब सत्ता चल देती गलत दांव Episode 3: हर साल 2 करोड़ रोजगार बनाने के कागजी दावे और 10 लाख खाली सरकारी पदों के बावजूद सड़कों पर धक्के खाता बेरोज़गार युवा, कैसे सिस्टम की सुस्ती खिसका रही BJP की सियासी जमीन

2 करोड़ 24 करोड़ 83% 67% 9.79 लाख
हर साल का वादा 12 साल का हिसाब बेरोजगारों में युवा ग्रेजुएट हिस्सेदारी खाली केंद्र पद

राजनीति में वादों की उम्र बहुत छोटी होती है, नेता वादे करते हैं और जनता उन्हें भूल जाती है। लेकिन कुछ वादे ऐसे होते हैं जो इतिहास के पन्नों पर पत्थर की लकीर बन जाते हैं और सत्ता के गले की फांस भी।

ज़रा राजनीति का चश्मा उतारकर 2013-14 के उस दौर को याद कीजिए। देश में घोटालों का शोर था, पॉलिसी पैरालिसिस से पूरा सिस्टम लकवाग्रस्त हो चुका था और तब BJP से एक बहुत ही धारदार आवाज़ उठती है- “हमारी सरकार आई तो हर साल 2 करोड़ नौकरियां देंगे!”

ये सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं था, ये उस हताश और बेरोजगार युवा के लिए एक संजीवनी बूटी थी जो अपनी डिग्रियां लेकर दफ्तरों के धक्के खा-खाकर थक चुका था।

भारत दुनिया का सबसे युवा देश बन रहा था, जिसे अर्थशास्त्री भारी-भरकम शब्दों में ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (Demographic Dividend) कहते हैं।

बीजेपी के रणनीतिकारों ने इस नब्ज़ को बहुत ही गज़ब तरीके से पकड़ा। उन्होंने उस युवा को एक सपना दिखाया, एक ऐसा ‘तिलिस्म’ रचा जिसमें हर हाथ को काम और हर जेब में पैसे की गारंटी थी।

पहली बार वोट डालने जा रहे (First-time voters) उन करोड़ों युवाओं ने इस वादे पर आँख मूंदकर भरोसा किया। उन्होंने ईवीएम (EVM) का बटन इतनी ज़ोर से दबाया की सत्ता के सारे पुराने और जर्जर किले भरभरा कर ढह गए।

1. हर साल दो करोड़ नौकरियों का सुनहरा ख्वाब

लेकिन बारह साल बाद आज जनता के हाथ में सिर्फ झुनझुना

अब हम 2026 में बैठे हैं। भावनाएं ठंडी हो चुकी हैं, इसलिए ज़रा ठंडे दिमाग से गणित की बात कर लेते हैं। 2014 से लेकर आज तक यानी पूरे 12 साल गुज़र चुके हैं।

अगर हर साल 2 करोड़ नौकरियों का वो वादा ज़मीन पर उतरा होता, तो आज 2026 तक पूरे 24 करोड़ नए रोज़गार पैदा हो जाने चाहिए थे। 24 करोड़! ये कोई छोटा-मोटा नंबर नहीं है, दुनिया के कई बड़े और विकसित देशों की तो इतनी कुल आबादी भी नहीं होती। मगर ज़मीनी हकीकत क्या है?

हकीकत ये है की 24 करोड़ का वो पहाड़ आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी ‘चुनावी मृगतृष्णा’ (Mirage) बनकर रह गया है।

जैसे रेगिस्तान में तपती धूप के बीच प्यासे मुसाफिर को दूर से पानी का भ्रम होता है और पास जाने पर सिर्फ सूखी रेत मिलती है, ठीक वैसा ही भ्रम देश के युवाओं को दिखाया गया।

चुनाव दर चुनाव घोषणापत्र आते गए, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया जैसे शानदार नाम वाले अभियान लॉन्च हुए, फीते कटे, लेकिन ज़मीन पर उस आम युवा के हाथ में कोई पक्की नौकरी का अपॉइंटमेंट लेटर नहीं आया।

ये एक ऐसा तिलिस्म था जिसने बीजेपी को एक बार नहीं, बार-बार दिल्ली के तख़्त पर बैठाया, लेकिन अब यही तिलिस्म टूट रहा है। युवा अब समझ चुका है की वादों की चाशनी में लपेटकर उसे जो परोसा गया था, वो असल में हकीकत की ज़मीन पर कहीं टिकता ही नहीं है।

2. BJP के अच्छे दिन का वो नारा जो ले गया युवाओं की उम्मीदों को आसमान में

लेकिन अब उतनी ही तेज़ी से गिर रही वो सारी उम्मीदें

पॉलिटिकल साइंस का एक बहुत सीधा सा उसूल है- आप जनता की उम्मीदों को जितना ऊपर ले जाएंगे, उनके टूटने पर गिरने की आवाज़ भी उतनी ही भयंकर होगी।

बीजेपी ने ‘अच्छे दिन’ का जो नारा गढ़ा था, वो दरअसल एक ऐसा राजनीतिक हथौड़ा था जिससे उन्होंने विपक्ष को सत्ता से बेदखल कर दिया। लेकिन आज देखें तो यही नारा बीजेपी के लिए सबसे बड़ा ‘बूमरैंग’ साबित हो रहा है। बूमरैंग समझते हैं ना? वो हथियार जिसे आप जितनी पूरी ताकत से फेंकते हैं, वो पलटकर उतनी ही तेज़ रफ़्तार से आपको ही आकर हिट करता है।

ज़रा उस साइकोलॉजी को समझिए जो आज के युवा के दिमाग में चल रही है। जब देश का पढ़ा-लिखा युवा, जिसने दिन-रात एक करके इंजीनियरिंग की, एमबीए किया, या सालों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, वो नौकरी मांगने सरकार के दरवाज़े पर गया, तो उसे क्या जवाब मिला?

उसे नेताओं की तरफ से नसीहत दी गई की “पकौड़े तलना भी तो रोज़गार है।” या फिर बड़े-बड़े मंचों से माइक पर कहा गया की “नौकरी मांगने वाले मत बनो, नौकरी देने वाले बनो।”

सच कहूँ तो, ये बातें सुनने में किसी मोटिवेशनल सेमिनार या यूट्यूब के पॉडकास्ट में तो बहुत क्रांतिकारी लग सकती हैं, लेकिन ज़मीनी राजनीति में ये सीधे-सीधे जले पर नमक छिड़कने जैसा है।

भारत का वो मध्यम वर्गीय या गरीब किसान परिवार, जिसने अपनी ज़मीनें गिरवी रखकर, बैंक से लाखों का एजुकेशन लोन लेकर अपने बच्चे को पढ़ाया है, वो इसलिए नहीं पढ़ा रहा की उसका बच्चा कल को सड़क किनारे पकौड़े तले या ‘स्टार्टअप’ के नाम पर दर-दर की ठोकरें खाए।

वो एक स्टेबल और सुरक्षित भविष्य चाहता है। नेताओं की ये नसीहतें उस कोर युवा वोटर को भीतर तक चुभ गईं हैं।

BJP के शीर्ष रणनीतिकारों को शायद यह भयंकर ग़लतफ़हमी हो गई की ‘ब्रांड मोदी’ का तिलिस्म और राष्ट्रवाद की लहर इतनी बड़ी है की वो बेरोज़गारी के इस सुलगते हुए लावे को हमेशा के लिए दबा देगी।

लेकिन सत्ता का यही ओवरकॉन्फिडेंस किसी भी मज़बूत पार्टी का सबसे बड़ा ‘सेल्फ-गोल’ बन जाता है। जब नेता ज़मीन पर आम आदमी की नब्ज़ टटोलना छोड़ देते हैं और सिर्फ अपने बनाए हुए नैरेटिव में जीने लगते हैं, तब पार्टी की जड़ें खोखली होनी शुरू होती हैं।

भावनाओं, भव्य इवेंट्स और नारों के दम पर आप कुछ चुनाव ज़रूर जीत सकते हैं, लेकिन खाली जेब, पेट की भूख और करियर की असुरक्षा आख़िरकार हर ‘अच्छे दिन’ के नारे को खोखला कर ही देती है।

युवा वोटर का यह मोहभंग पार्टी के लिए कोई छोटी-मोटी चुनौती नहीं, बल्कि एक ऐसा बजता हुआ अलार्म है जिसे अनसुना करना सत्ता के लिए बहुत भारी पड़ने वाला है।

3. सरकारी आंकड़ों का गुलाबी भ्रमजाल

और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट जो बताती की देश में 83 प्रतिशत बेरोजगार सिर्फ युवा

जब कोई सत्ता ज़मीन पर अपने वादे पूरे करने में नाकाम होने लगती है, तो वो अक्सर फाइलों पर लड़ाई लड़ना शुरू कर देती है। अगर आप आज सरकार के किसी मंत्री या प्रवक्ता से बेरोज़गारी पर सवाल पूछ लें, तो वो तुरंत अपनी जेब से सरकारी सर्वे (PLFS – Periodic Labour Force Survey) का डेटा निकालकर आपके मुँह पर मार देंगे।

सरकार अपनी पीठ थपथपाते हुए कहती है की देश में बेरोज़गारी दर ऐतिहासिक रूप से गिरकर 3.1% से 5% के बीच आ गई है। अब ये सरकारी आंकड़ा सुनकर पटना, प्रयागराज या जयपुर की किसी लाइब्रेरी में बैठा और सालों से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा युवा अपना सिर पीट लेता है।

वो सोचता है की यार अगर देश में बेरोज़गारी सिर्फ 3 प्रतिशत ही है, तो फिर 60 हज़ार सिपाही या चपरासी की भर्ती के लिए 50-50 लाख फॉर्म क्यों भरे जा रहे हैं?

पीएचडी (PhD) और इंजीनियरिंग किए हुए लड़के सफाई कर्मचारी बनने के लिए लाइनों में क्यों धक्के खा रहे हैं?

दरअसल, इस ‘गुलाबी भ्रमजाल’ के पीछे सरकार की वो चालाकी भरी परिभाषा है, जिसे वो रोज़गार मानती है। अगर कोई व्यक्ति हफ्ते में कुछ घंटे खेत में बिना पगार के काम कर ले, या मजबूरी में सड़क किनारे ठेला लगा ले, तो सरकारी डेटा उसे ‘रोज़गारशुदा’ (Employed) मान लेता है।

लेकिन जब स्वतंत्र संस्थाएं और अंतरराष्ट्रीय संगठन इस डेटा का एक्स-रे करते हैं, तो हकीकत कुछ और ही खौफनाक तस्वीर पेश करती है। ज़रा इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) की ‘इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024’ के आंकड़ों पर गौर कीजिए।

ये रिपोर्ट सरकार के सुशासन वाले दावों पर सीधा प्रहार करती है। रिपोर्ट डंके की चोट पर बताती है की भारत में जितने भी बेरोजगार हैं, उनमें से 83 प्रतिशत सिर्फ और सिर्फ युवा हैं!

ज़रा सोचिए इस आंकड़े के बारे में। देश का लगभग हर वो इंसान जो खाली बैठा है, वो कोई बुजुर्ग नहीं बल्कि एक जवान आदमी है जिसके कंधों पर देश को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए थी।

इसी तरह, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) का डेटा पिछले कई सालों से लगातार चीख-चीख कर बता रहा है की असली बेरोज़गारी दर 7 से 9 प्रतिशत के बीच झूल रही है।

लेकिन सत्ता में चूर रणनीतिकार इन आंकड़ों को बड़ी आसानी से ‘विदेशी साज़िश’ या ‘प्रोपेगेंडा’ बताकर खारिज कर देते हैं। हकीकत को नकारने की यही ज़िद आख़िरकार चुनाव के नतीजों में एक बड़े ‘सेल्फ-गोल’ के रूप में सामने आती है।

4. पढ़े-लिखे बेरोजगारों की डरावनी फौज

देश के 67% ग्रेजुएट्स हैं बेरोजगार

अब बात करते हैं उस समस्या की जो किसी भी विकासशील देश के लिए एक कैंसर जैसी है- ‘पढ़े-लिखे बेरोज़गारों की फौज’ (Educated Unemployed)।

हमारे देश में एक बहुत ही अजीब सा पैराडॉक्स (Paradox) बन गया है- आप जितने ज़्यादा पढ़े-लिखे होंगे, आपके बेरोज़गार रहने के चांस उतने ही ज़्यादा बढ़ जाएंगे।

कभी 2000 के दशक की शुरुआत में, बेरोज़गारों की कुल भीड़ में ग्रेजुएट्स (स्नातक) की संख्या लगभग 32% के आस-पास हुआ करती थी।

मतलब अगर आप ग्रेजुएट हैं, तो कोई न कोई ढंग की नौकरी मिल ही जाती थी। लेकिन आज? आज ये आंकड़ा बढ़कर 67% तक पहुँच गया है!

गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ खोल दी गईं। डिग्रियां ऐसे बांटी गईं जैसे चुनाव में पर्चे बांटे जाते हैं, लेकिन उन डिग्रियों की मार्केट में कोई वैल्यू ही नहीं है।

इंडस्ट्री को जो स्किल चाहिए, वो इन युवाओं के पास है नहीं, और जो इनके पास है, उसकी मार्केट में कोई डिमांड नहीं है।

यहीं पर जन्म होता है उस वर्ग का, जो आज की सत्ताधारी पार्टी के लिए सबसे बड़ा साइलेंट किलर बन चुका है। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘NEET’ (Not in Employment, Education, or Training) कहते हैं। इसका मतलब है वो युवा जो ना तो कोई नौकरी कर रहा है, ना ही वो कोई आगे की पढ़ाई कर रहा है, और ना ही कोई स्किल ट्रेनिंग ले रहा है। देश का करीब 20 से 25 प्रतिशत युवा आज इसी डरावनी केटेगरी में आता है।

ये वो लड़के-लड़कियां हैं जो हार मान चुके हैं। ये अब फॉर्म भरना बंद कर चुके हैं। ये डिप्रेशन का शिकार होकर बस अपने घरों में पड़े रहते हैं, मोबाइल पर दिन-रात रील्स (Reels) स्क्रॉल करते हैं और अपने भविष्य को कोसते रहते हैं।

सत्ताधारी पार्टी के बड़े-बड़े रणनीतिकारों को शायद लगता है की जो सड़कों पर उतरकर हल्ला नहीं मचा रहा, वो हमारा वोटर बना रहेगा। लेकिन ये उनकी सबसे बड़ी भूल है।

ये डिप्रेस्ड और खामोश युवा सड़कों पर उतरकर पत्थर भले ही ना फेंके, टीवी डिबेट्स में हिस्सा भले ना ले, लेकिन जब चुनाव का दिन आता है, तो ये अपना सारा फ्रस्ट्रेशन, अपना सारा गुस्सा और अपनी सारी हताशा ईवीएम (EVM) के बटन पर जाकर निकालता है।

यही वो ‘खामोश अंडरकरंट’ (Undercurrent) है, जिसे भांपने में बीजेपी की मशीनरी बार-बार फेल हो रही है। जब पेट की आग और भविष्य का अंधेरा सामने हो, तो विश्वगुरु बनने के नारे इन युवाओं को एक भद्दा मज़ाक लगने लगते हैं।

5. केंद्र सरकार के खाली पड़े करीब दस लाख पद

बाहर लोग रोज़गार को तरस रहे और अंदर दस लाख सरकारी कुर्सियां धूल फांक रही

चलिए, एक पल के लिए मान लेते हैं की प्राइवेट सेक्टर (Private Sector) में ग्लोबल मंदी चल रही है, दुनिया भर में छंटनी हो रही है और सरकार वहां सीधे तौर पर कुछ नहीं कर सकती।

लेकिन भाईसाहब, जो नौकरियां सीधे केंद्र सरकार के हाथ में हैं, उनका क्या? एक तरफ देश का युवा रोज़गार के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है, डिप्रेशन में जा रहा है, और दूसरी तरफ खुद सरकार के मंत्रालयों और विभागों में कुर्सियां खाली पड़ी धूल फांक रही हैं।

ये कोई विपक्षी नेताओं का लगाया हुआ आरोप नहीं है, बल्कि खुद मोदी सरकार के मंत्रियों द्वारा संसद के पटल पर रखा गया आधिकारिक डेटा है। संसद में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सरकारी रिक्तियों (Vacancies) का आंकड़ा पेश किया था।

केंद्र सरकार के 78 मंत्रालयों और विभागों में स्वीकृत (Sanctioned) पदों की संख्या लगभग 40.35 लाख है, लेकिन चौंकाने वाली बात ये है की इनमें से करीब 9.79 लाख पद खाली पड़े हैं!

ज़रा इस आंकड़े की गंभीरता को समझिए। लगभग 10 लाख पद! यानी केंद्र सरकार का करीब 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा बिना कर्मचारियों के, भगवान भरोसे चल रहा है।

अगर हम इसे विभागों के हिसाब से तोड़कर देखें, तो तस्वीर और भी भयावह हो जाती है। जिस रेलवे को देश की लाइफलाइन कहा जाता है, अकेले उसमें 2.93 लाख पद खाली पड़े हैं। रक्षा मंत्रालय (सिविलियन पोस्ट्स) में 2.64 लाख, और देश की आंतरिक सुरक्षा संभालने वाले गृह मंत्रालय में लगभग 1.43 लाख पद खाली हैं।

कर्मचारी यूनियन और संगठन तो चीख-चीख कर कहते हैं कि अगर असल ग्राउंड रियलिटी देखी जाए तो ये खाली पदों का आंकड़ा 15 लाख को पार कर जाएगा।

अब एक शार्प पॉलिटिकल एनालिस्ट के नज़रिए से सोचिए। एक तरफ वो युवा है जिसने रेलवे ग्रुप-डी (Group-D) या एनटीपीसी (NTPC) की तैयारी में अपनी जवानी के 5 साल झोंक दिए। वो पटना या प्रयागराज में पटरियों पर प्रदर्शन कर रहा है, लाठियां खा रहा है। और दूसरी तरफ रेलवे का हाल ये है की वहां लोको पायलट (Train Drivers) और स्टेशन मास्टर स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहे हैं। उनसे 12-12, 14-14 घंटे की डबल शिफ्ट में काम लिया जा रहा है, जिसकी वजह से आए दिन ट्रेन हादसे हो रहे हैं।

सत्ताधारी पार्टी का नारा है “मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस” (Minimum Government, Maximum Governance)। लेकिन 10 लाख पदों को खाली रखकर आप कैसा सुशासन दे रहे हैं?

आम युवा अब इस बात को समझ रहा है की सरकार जानबूझकर इन भर्तियों को अटकाए रखती है ताकि पेंशन, पीएफ (PF) और सैलरी का पैसा बचाया जा सके। लेकिन बैलेंस शीट चमकाने और बजट का घाटा कम करने की इस ज़िद में बीजेपी अपने सबसे बड़े वोटबैंक को अपने ही हाथों से खत्म कर रही है।

ये प्रशासनिक सुस्ती (Administrative lethargy) पार्टी का एक ऐसा ‘सेल्फ-गोल’ है जिसे विपक्ष बहुत आसानी से भुना रहा है।

6. ‘रोजगार मेलों’ का मेगा PR स्टंट

अपनी ही खाली कुर्सियां भरने में हांफता बीजेपी का सिस्टम

आजकल की राजनीति की सबसे बड़ी बीमारी ‘इवेंट मैनेजमेंट’ (Event Management) है। जब ज़मीन पर असली काम नहीं हो पाता, तो PR एजेंसियां एक मेगा इवेंट डिज़ाइन कर देती हैं ताकि कैमरे और विज़ुअल्स के ज़रिेए जनता के दिमाग में एक इल्यूज़न (भ्रम) पैदा किया जा सके।

10 लाख खाली पदों की नाकामी को छुपाने के लिए बीजेपी के रणनीतिकारों ने एक ऐसा ही इवेंट डिज़ाइन किया, जिसका नाम रखा गया- “रोज़गार मेला”।

टीवी पर आपने वो विज़ुअल्स ज़रूर देखे होंगे। बड़े-बड़े टेंट लगे हैं, फूल-मालाओं से स्टेज सजा है, कैमरे चालू हैं, और बड़े-बड़े मंत्री आकर युवाओं को अपने हाथों से ‘नियुक्ति पत्र’ (Appointment Letters) बांट रहे हैं। हेडलाइन बनती है- “सरकार ने आज 70 हज़ार युवाओं को नौकरी दी।”

अब ज़रा इस पूरे पीआर स्टंट को समझते हैं। जो नियुक्ति पत्र इन मेलों में बांटे जाते हैं, वो कोई सरकार की नई खैरात नहीं होते। ये वो नौकरियां हैं जिनके लिए एसएससी (SSC), यूपीएससी (UPSC) या रेलवे (RRB) जैसी सरकारी एजेंसियों ने सालों पहले नोटिफिकेशन निकाला था।

युवा ने 3-4 साल तक दिन-रात एक करके पढ़ाई की, परीक्षा दी, कभी पेपर लीक का दर्द झेला, कभी कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटे, और तब जाकर अपनी मेरिट के दम पर वो परीक्षा पास की। ये उसकी खुद की मेहनत थी, सरकार का कोई एहसान नहीं! लेकिन पीआर का भूखा सिस्टम उस रूटीन नौकरशाही प्रक्रिया (Routine Bureaucratic Process) को भी एक ‘उपकार’ की तरह प्रोजेक्ट करता है।

जब एक मंत्री किसी होनहार युवा को स्टेज पर बुलाकर वो लेटर देता है, तो युवा के मन में सरकार के प्रति कोई कृतज्ञता (Gratitude) नहीं, बल्कि एक इरिटेशन (चिड़चिड़ाहट) पैदा होती है। उसे लगता है की “यार, ये तो मेरा हक़ था जो 2 साल पहले मिल जाना चाहिए था, इसमें इतना एहसान क्या जताना?”

और सबसे बड़ा सवाल ये है की आप मेलों में 50 हज़ार या 70 हज़ार लेटर बांटकर उस 10 लाख खाली पदों के गड्ढे को कैसे भरेंगे? ये तो बिल्कुल ऐसा है जैसे किसी की पूरी इमारत ढह रही हो और आप उसे बाहर से चमकीला पेंट कर रहे हों! जब सरकार का अपना सिस्टम हांफ रहा है, जब वो खुद अपने मंत्रालयों की 10 लाख खाली कुर्सियां भरने के लिए कोई युद्ध स्तर वाला एक्शन नहीं ले पा रही, तो फिर वो प्राइवेट कंपनियों के मालिकों को कैसे नसीहत दे सकती है की “देश में रोज़गार पैदा करो?”

ये रोज़गार मेले दरअसल पार्टी के लिए फायदे से ज़्यादा नुकसान का सौदा साबित हो रहे हैं। ये उस करोड़ों युवाओं की भीड़ को और चिढ़ाने का काम करते हैं जो बेरोज़गार बैठे हैं। इवेंट मैनेजमेंट से आप चुनाव का नैरेटिव कुछ दिनों के लिए तो सेट कर सकते हैं, लेकिन जिस युवा का करियर दांव पर लगा है, उसे आप इन चमकीले फ्लेक्स बोर्ड और कैमरों की फ्लैश से लंबे समय तक बेवकूफ नहीं बना सकते।

7. पक्की नौकरियों का धीमा खात्मा

ठेकेदारी प्रथा के चक्रव्यूह में फंसता भारत का युवा और BJP के हाथ से छिटकता उसका वफादार वोटर

भारत का आम मध्यम वर्गीय या ग्रामीण परिवार अपने बच्चों से क्या चाहता है? वो ये नहीं चाहता की उसका बच्चा कोई बहुत बड़ा बिजनेसमैन बने या करोड़ों की फंडिंग उठाकर कोई यूनिकॉर्न (Unicorn) खड़ा कर दे। उनकी मांग बहुत छोटी और सीधी होती है- एक ‘स्थायी सरकारी नौकरी’ (Permanent Government Job)। ये सिर्फ चंद हज़ार रुपयों की पगार का मामला नहीं है, ये समाज में रुतबे, शादी-ब्याह और सबसे बढ़कर ‘जॉब सिक्योरिटी’ का मामला है।

माता-पिता को लगता है की अगर बच्चे की सरकारी नौकरी लग गई, तो चाहे दुनिया में मंदी आए या कोई महामारी, उनके बच्चे की रोटी का जुगाड़ जीवन भर के लिए पक्का हो गया।

लेकिन पिछले एक दशक में एक बहुत ही खामोश, लेकिन खतरनाक बदलाव हुआ है। बीजेपी राज में सरकारों ने स्थायी नौकरियों को धीरे-धीरे खत्म करने का एक अघोषित अभियान सा चला दिया है। पक्की नौकरियों की जगह एक नए चक्रव्यूह ने ले ली है- ‘आउटसोर्सिंग’ (Outsourcing) और ‘संविदा’ (Contract/ठेकेदारी प्रथा)।

अब किसी भी सरकारी दफ्तर, अस्पताल, नगर निगम या बिजली विभाग में चले जाइए। वहां जो युवा कंप्यूटर पर टाइपिंग कर रहा है, फाइलें ढो रहा है, या मीटर की रीडिंग ले रहा है, उनमें से ज़्यादातर अब सरकार के पक्के कर्मचारी नहीं हैं। उन्हें किसी थर्ड-पार्टी प्राइवेट एजेंसी या ठेकेदार के ज़रिए रखा गया है।

ज़रा इस ठेका प्रथा का दर्द समझिए। उसी दफ्तर में एक पक्का सरकारी कर्मचारी बैठा है जिसे हर महीने 60 हज़ार रुपये सैलरी, मेडिकल सुविधा और भत्ते मिलते हैं। और ठीक उसी के बगल वाली कुर्सी पर बैठा एक संविदा कर्मचारी (Contractual worker) उससे दोगुना काम करता है, लेकिन उसे महीने के आखिर में ठेकेदार अपना कमीशन काटकर बमुश्किल 12 से 15 हज़ार रुपये थमा देता है। ना कोई पीएफ (PF), ना मेडिकल, और ना ही कोई जॉब सिक्योरिटी। ठेकेदार या साहब का जब मन करेगा, वो उसे एक झटके में नौकरी से निकाल कर बाहर कर देंगे।

सरकार और उनके बाबू इसे ‘खर्च कम करने का स्मार्ट तरीका’ बताकर अपनी फाइलें तो चमका लेते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से ये एक बहुत बड़ा सेल्फ-गोल है।

जो युवा 15 हज़ार की संविदा नौकरी में अपनी जवानी खपा रहा है, वो अंदर ही अंदर फ्रस्ट्रेशन के ज्वालामुखी पर बैठा है। उसे हर दिन महसूस होता है की सिस्टम उसका शोषण कर रहा है। वो अपने भविष्य को लेकर इतना डरा हुआ है की वो अब सरकार की किसी भी ‘विकास योजना’ से कनेक्ट नहीं कर पाता। जब आप एक युवा की जॉब सिक्योरिटी छीन लेते हैं, तो आप दरअसल एक ऐसा असुरक्षित और नाराज़ वोटर तैयार कर रहे होते हैं, जो मौका मिलते ही आपको सत्ता से बेदखल करने का इंतज़ार करता है।

8. सिकुड़ते सरकारी उपक्रम

जॉब सिक्योरिटी छिनने से बीजेपी के खिलाफ पनपता खामोश अंडरकरंट

एक दौर था जब देश के पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) यानी सार्वजनिक उपक्रम भारत के मिडिल क्लास के लिए रोज़गार की सबसे बड़ी खदान हुआ करते थे। BSNL, LIC, सरकारी बैंक, ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियां, और रेलवे के अलग-अलग उपक्रम लाखों युवाओं को एक बेहतरीन करियर देते थे।

इन संस्थानों में काम करने वाला तबका अक्सर वैचारिक रूप से बीजेपी का वो पक्का (Core) वोटर माना जाता था, जो हर चुनाव में पार्टी के लिए झंडा उठाता था। लेकिन ‘विनिवेश’ (Disinvestment) और ‘मोनेटाइजेशन पाइपलाइन’ के नाम पर जो नीतियां लाई गईं, उन्होंने इस कोर वोटर की ही कमर तोड़ कर रख दी।

अर्थशास्त्र की किताबों या शेयर बाज़ार के दलालों के लिए सरकारी संपत्तियों को प्राइवेट हाथों में बेचना या उनका निजीकरण करना बहुत अच्छी बात हो सकती है। सरकार के रणनीतिकार सीना ठोक कर कहते हैं की “सरकार का काम व्यापार करना नहीं है।”

लेकिन जब आप ज़मीन पर उतरकर देखते हैं, तो हकीकत बहुत कड़वी है। जब कई सरकारी बैंकों को आपस में मर्ज (Merge) कर दिया जाता है, तो रातों-रात हज़ारों ब्रांच बंद हो जाती हैं और आने वाले सालों की हज़ारों वैकेंसीयां (Vacancies) एक झटके में शून्य हो जाती हैं।

बीएसएनएल जैसी विशाल कंपनी जो कभी गांव-गांव तक रोज़गार देती थी, उसे वीआरएस (VRS) के नाम पर खाली कर दिया गया। रेलवे के कई कामों को प्राइवेट हाथों में सौंपने की सुगबुगाहट ने तैयारी कर रहे छात्रों के भीतर एक खौफ पैदा कर दिया है। जो नीतियां कॉर्पोरेट बोर्डरूम में बहुत अच्छी लगती हैं, वो अक्सर वोटिंग बूथ पर सुसाइडल (आत्मघाती) साबित होती हैं।

जब एक आम युवा देखता है की जो सरकारी संपत्तियां उसके दादा-परदादा के समय से देश की रीढ़ थीं, वो अब सिमट रही हैं या बड़े कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में जा रही हैं, तो उसके मन में एक डर बैठता है। विपक्ष इसी डर को नैरेटिव बनाकर बड़ी आसानी से भुना लेता है। हैरानी की बात ये है की बीजेपी का सिस्टम इस नैरेटिव को काउंटर (Counter) करने या अपने ही वोटर को समझाने में पूरी तरह फेल रहा है।

जब देश में हज़ारों पब्लिक सेक्टर की नौकरियां ख़त्म हो रही हों, तो आप सिर्फ ‘पांच ट्रिलियन की इकॉनमी’ (5 Trillion Economy) का भारी-भरकम शब्द उछालकर आम आदमी का पेट नहीं भर सकते। यही वो जगह है जहाँ बीजेपी का अपना पक्का वोटर, जो कभी राम मंदिर या धारा 370 के नाम पर गर्व महसूस करता था, अब आर्थिक असुरक्षा के कारण पार्टी से दूरी बना रहा है।

ये वोटर सड़कों पर आकर कोई हंगामा खड़ा नहीं करता, ये टीवी पर डिबेट नहीं करता… ये बस खामोश हो जाता है। और लोकतंत्र में, सत्ताधारी पार्टी के लिए अपने ही कोर वोटर की खामोशी से ज़्यादा डरावना और कोई अंडरकरंट नहीं होता।

9. अग्निपथ योजना का सबसे बड़ा ब्लंडर

सेना की तैयारी करने वाले ग्रामीण कोर-वोटर के गुस्से की आग

दिल्ली में बैठकर नीतियां बनाने वाले ‘कॉर्पोरेट सलाहकारों’ और ज़मीन की हकीकत में कितना बड़ा फासला होता है, इसका सबसे बड़ा और जीता-जागता उदाहरण है- अग्निपथ योजना।

अगर आप उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान या उत्तराखंड के किसी भी गांव में भोर के 4 बजे चले जाएं, तो आपको पगडंडियों और सड़कों पर दर्जनों युवा पसीने से लथपथ दौड़ लगाते हुए मिल जाएंगे। इन इलाकों के लिए ‘इंडियन आर्मी’ (Indian Army) सिर्फ एक नौकरी नहीं है भाई, ये एक जज़्बा है, एक परंपरा है। पीढ़ी दर पीढ़ी इन परिवारों ने सेना में अपने बेटे भेजे हैं।

इस ग्रामीण युवा के लिए सेना की वो पक्की नौकरी उसकी ज़िंदगी, उसके परिवार की इज़्ज़त और उसकी आजीविका का इकलौता और सबसे सुरक्षित साधन हुआ करती थी। लेकिन फिर एक दिन अचानक सरकार एक मास्टरस्ट्रोक लेकर आती है, जिसका नाम था ‘अग्निपथ’। ऐलान कर दिया गया की अब सेना में जो भी भर्ती होगी, वो सिर्फ 4 साल के लिए होगी। 4 साल बाद 75 प्रतिशत युवाओं (अग्निवीरों) को बिना किसी पेंशन और रिटायरमेंट बेनिफिट के घर भेज दिया जाएगा।

सरकार के बाबुओं ने हिसाब लगाया की सेना का पेंशन बिल बहुत बढ़ रहा है, इसलिए 4 साल वाला ठेका सिस्टम ले आओ, अरबों रुपये बच जाएंगे। बजट बचाने के चक्कर में इन्होंने ग्रामीण भारत के उस युवा की साइकोलॉजी को पूरी तरह इग्नोर कर दिया, जो 17-18 साल की उम्र में देश के लिए जान देने को तैयार रहता है, लेकिन इसके बदले में वो 60 साल तक की ‘जॉब सिक्योरिटी’ चाहता है।

जब ये योजना आई, तो तैयारी कर रहे युवाओं के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा हो गया की 21 या 22 साल की उम्र में जब वो फौज से ‘रिटायर’ होकर वापस गांव लौटेंगे, तो क्या करेंगे? क्या वो एटीएम (ATM) के बाहर या किसी कॉर्पोरेट ऑफिस के गेट पर सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करेंगे? नेताओं ने टीवी पर आकर ये समझाने की बहुत कोशिश की कि 4 साल बाद इन युवाओं के पास लाखों का फंड होगा, वो बिज़नेस कर सकते हैं या नाई की दुकान खोल सकते हैं (कुछ नेताओं ने सच में ऐसे बेतुके बयान दिए)।

इन बयानों ने आग में घी डालने का काम किया। जो युवा सीने पर गोली खाने की तैयारी कर रहा था, उसे लगा की सत्ता उसके जज़्बे का भद्दा मज़ाक उड़ा रही है।

10. राष्ट्रवाद के नाम पर वोट देने वाले युवाओं का मोहभंग

भाजपा के अजेय किले में लगती गहरी सेंध

राजनीति में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिन्हें विपक्ष भी उतनी आसानी से नहीं भुना पाता, जितनी आसानी से आप खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। अग्निपथ योजना बीजेपी के लिए बिल्कुल वैसा ही एक आत्मघाती कदम साबित हुआ।

ज़रा सोचिए, ये वो युवा कौन थे जो अग्निपथ का विरोध कर रहे थे? क्या ये कोई वामपंथी थे? क्या ये कांग्रेसी या समाजवादी वोटर थे? बिल्कुल नहीं! ये वही युवा थे जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक (Surgical Strike) और बालाकोट एयरस्ट्राइक के समय सबसे ज़्यादा तालियां पीटी थीं।

ये बीजेपी का वो पक्का ‘राष्ट्रवादी कोर-वोटर’ (Core Voter) था जो ‘भारत माता की जय’ के नारों पर बिना सोचे-समझे ईवीएम का बटन दबाता था। इन परिवारों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा हुआ करता था। लेकिन जब बात खुद के भविष्य और पेट की आई, तो वो राष्ट्रवाद का नशा टूट गया। इस कोर-वोटर को लगा की सरकार ने देश का बजट बचाने के लिए सीधे उसके पेट पर लात मार दी है।

उसे लगा की जो पार्टी हमेशा सेना और राष्ट्रवाद की बात करती थी, उसने सेना की नौकरी को भी एक ‘संविदा’ (Contract) का मज़ाक बनाकर रख दिया है। विपक्ष को तो बैठे-बिठाए एक ऐसा हथियार मिल गया, जिसके लिए उन्हें कोई मेहनत ही नहीं करनी पड़ी। हरियाणा, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में विपक्ष ने बस इस युवा की नब्ज़ पर हाथ रखा और कहा की “अगर हम आए तो इस ठेका प्रथा को खत्म करेंगे।”

नतीजा क्या हुआ? हमनें विधानसभा चुनावों में साफ़ देखा है की हिंदी पट्टी (Hindi Heartland) में बीजेपी के अजेय किले दरकने लगे हैं। जो जातियां और वर्ग कभी बीजेपी के साथ मजबूती से खड़े थे, वो सिर्फ और सिर्फ इस योजना के गुस्से के कारण पार्टी से छिटक गए।

11. सिर्फ राम मंदिर और मुफ्त राशन से नहीं भरेगा पेट

बीजेपी को रोजगार पर युद्ध स्तर पर करना होगा काम

पिछले कुछ सालों में बीजेपी ने चुनाव जीतने का एक बहुत ही अचूक फॉर्मूला ईजाद किया है- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘लाभार्थी वर्ग’। एक तरफ राम मंदिर, काशी-मथुरा और राष्ट्रवाद जैसे भावनात्मक मुद्दे हैं जो लोगों के दिलों से जुड़ते हैं। और दूसरी तरफ 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देकर एक ऐसा ‘लाभार्थी वर्ग’ तैयार किया गया है, जो पेट की आग बुझने के अहसास पर वोट देता है।

इसमें कोई शक नहीं की राम मंदिर देश के करोड़ों हिंदुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है और इस मुद्दे ने बीजेपी को अजेय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुफ्त राशन योजना ने भी गरीब तबके को बहुत बड़ी राहत दी है। लेकिन आपको इस फॉर्मूले की एक बहुत बड़ी लिमिटेशन (सीमा) को भी समझना होगा।

आप किसी 50-60 साल के बुज़ुर्ग या एक दिहाड़ी मज़दूर को 5 किलो मुफ्त गेंहू और चावल देकर संतुष्ट कर सकते हैं। आप उसे धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर एक कर सकते हैं। लेकिन वो युवा जिसकी उम्र 22 से 30 साल के बीच है, उसकी भूख 5 किलो राशन से नहीं मिटती। उसे अपनी ज़िंदगी बनानी है, उसे अपना करियर सेट करना है, उसे शादी करनी है और समाज में इज़्ज़त से सिर उठाकर जीना है। उसकी असली भूख एक सुरक्षित भविष्य और एक पक्की नौकरी की है।

जब वो युवा देखता है की उसके हिस्से की 9.79 लाख कुर्सियां केंद्र सरकार के विभागों में खाली पड़ी धूल फांक रही हैं और उसे ‘पकौड़े तलने’ की नसीहत दी जा रही है, तो उसका वो धार्मिक और राष्ट्रवादी नशा भी धीरे-धीरे उतरने लगता है।

वो सोचने पर मजबूर हो जाता है की आखिर आस्था और मुफ्त के राशन से वो अपने बच्चों की स्कूल की फीस कैसे भरेगा? बीजेपी को यह कड़वा सच बहुत जल्द स्वीकार करना होगा की ‘ब्रांड मोदी’ का जादू हर बार हर मर्ज की दवा नहीं बन सकता। आप एक ही फॉर्मूले से हर चुनाव नहीं जीत सकते। डैमेज कंट्रोल का अब सिर्फ एक ही तरीका बचा है- सरकार को रोजगार सृजन और खाली पड़े उन लाखों पदों को भरने के लिए युद्ध स्तर पर काम करना ही होगा। इवेंट मैनेजमेंट और रोज़गार मेलों के पीआर स्टंट से बाहर निकलकर, एक ठोस और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया बनानी होगी।

चाणक्य नीति कहती है की “जिस राज्य का युवा हताश हो और राजा अति-आत्मविश्वास में डूबा हो, उस सत्ता का पतन बहुत जल्द शुरू हो जाता है।”

सत्ता का ये चक्रव्यूह ऐसा है की अगर आपने अपने ही सबसे बड़े वादे को ज़मीन पर नहीं उतारा, तो आपका अपना ही वोटर आपके खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन जाता है। बीजेपी के रणनीतिकारों को यह बात समझनी होगी की युवाओं की यह खामोशी कोई सहमति नहीं है, यह एक तूफान से पहले की शांति है।

अगर इस ‘सेल्फ-गोल’ को समय रहते नहीं सुधारा गया, तो पार्टी की जड़ों को खोखला होने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक पाएगी।

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