चलिए, इस लेख को शुरू करने से शुरू करने से पहले एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट करते हैं। आप जहाँ भी बैठे हैं, अपनी आँखें बंद कीजिए और मन ही मन निकल पड़िए सीधे शिव जी के धाम, कैलाश पर्वत की ओर।
बर्फ से ढकी चोटियाँ, डमरू की गूंज… पहुँच गए? कितना टाइम लगा आपको? एक सेकंड? शायद उससे भी कम। आप देखिए की आप कुर्सी पर ही बैठे हैं और आपका मन पलक झपकते ही हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय करके वापस भी आ गया।
अब ज़रा सोचिए की क्या होता अगर आपका ये हाड़-मांस का भौतिक शरीर भी आपके मन के पीछे-पीछे उसी स्पीड से चल पड़ता? मतलब आप यहाँ आँख बंद करते और अगले ही पल साक्षात कैलाश पर खड़े होते!
आज की मॉडर्न दुनिया में इसी कॉन्सेप्ट को ‘टेलीपोर्टेशन’ (Teleportation) और ‘टाइम ट्रैवल’ कहते हैं।
और आपको जानकार हैरानी होगी की हमारे सनातन धर्म के ऋषि-मुनि हज़ारों साल पहले ही इसका पूरा का पूरा ब्लूप्रिंट ग्रंथों में लिखकर जा चुके हैं।
ये टाइम ट्रैवल, टेलीपोर्टेशन और मन की गति से उड़ने वाली बातें कोई ‘कहानियां’ या चमत्कार-वमत्कार नहीं हैं दोस्तों। ये शुद्ध रूप से एक ऐसा विज्ञान है, जिसका फार्मूला हमारे शास्त्रों में आज भी सुरक्षित है।
पलक झपकते ही नर्मदा से कैलाश पहुँच गए थे भगवान परशुराम, और ब्रह्मांड पुराण में दर्ज़ है ये चमत्कार

अगर आप ‘ब्रह्मांड पुराण’ का 41वां अध्याय खोलकर पढ़ेंगे, तो वहाँ एक ऐसी घटना दर्ज़ है जो आज की क्वांटम फिजिक्स (Quantum Physics) वाले विज्ञान से हूबहू मेल खाती है।
घटना उस वक़्त की है जब क्षत्रियों का संहार करने के बाद भगवान परशुराम नर्मदा नदी में स्नान कर रहे थे। स्नान के बाद उन्हें और उनके शिष्य को महादेव से मिलने जाना था।
अध्याय का श्लोक 17 कहता है की परशुराम जी ‘मन की गति’ (Speed of thought) से चले। और उसके ठीक अगले श्लोक (श्लोक 18) में लिखा है की वो ‘तक्षण’ (उसी पल) कैलाश पहुँच गए थे!
नर्मदा नदी से कैलाश पर्वत की हज़ारों किलोमीटर की दूरी… और समय लगा सिर्फ एक पल!
और यह कोई इकलौता उदाहरण नहीं है जहाँ इस सुपर-स्पीड का ज़िक्र आया हो। आप ऋग्वेद उठाकर देख लीजिए, वहां अश्विनी कुमारों के जिस रथ का वर्णन है, वो मन से भी तेज़ चलता है।
हम सब बचपन से रामरक्षा स्तोत्र पढ़ते आ रहे हैं। उसमें बजरंगबली हनुमान जी के लिए क्या कहा गया है? “मनोजवं मारुत तुल्य वेगम”… मतलब जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान है।
भागवत पुराण में चले जाइए, वहां साफ़ लिखा है की देवर्षि नारद बिना किसी रुकावट के तीनों लोकों में पलक झपकते ही ट्रेवल करते थे। महर्षि कपिल के बारे में तो यहाँ तक कहा जाता है की वो एक जगह बैठे-बैठे पूरे ब्रह्मांड की इन्फॉर्मेशन निकाल लेते थे।
अब सवाल ये उठता है की यार इतने सारे अलग-अलग ग्रंथ, अलग-अलग युगों में लिखी गई किताबें, एक ही बात को बार-बार क्यों दोहरा रही हैं?
क्या ये सब इत्तेफाक है? बिल्कुल नहीं! जब कोई बात इतने सारे ग्रंथों में एक ही तरीके से लिखी जाए, तो समझ लीजिए की वह कोई कहानी नहीं, बल्कि उस युग की सिद्ध की हुई विज्ञान थी।
रावण को बांधने वाले सहस्रबाहु का उड़ने वाला रथ, और पिता की मौत के बाद भगवान परशुराम को मिली तेजी से यात्रा करने की शक्ति

खैर, अब भगवान परशुराम की कहानी के एक ऐसे सच पर बात करते हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। बहुत से लोगों को लगता है की परशुराम जी तो भगवान के अवतार थे, इसलिए ये उड़ने-उड़ाने वाली शक्ति उनके पास बचपन से ही रही होगी। लेकिन सच कुछ और ही है!
अगर आप इस कहानी को गहराई से खंगालेंगे तो पाएंगे की शुरुआत में बिना रोक-टोक और पलक झपकते ही कहीं भी पहुँच जाने वाली ये ‘सुपरपावर’ इस कहानी के असली विलेन के पास थी।
और वो विलेन था- सहस्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन। ये वही कार्तवीर्य था जिसने खेल-खेल में त्रिलोक विजयी रावण को किसी आवारा जानवर की तरह अपनी बगल में दबा लिया था।
महाभारत के वन पर्व में स्पष्ट लिखा है की भगवान दत्तात्रेय के वरदान से इस सहस्रबाहु अर्जुन को एक ऐसा सोने का दिव्य रथ मिला था, जो कभी भी, कहीं भी बिना रुके जा सकता था। इसी रथ पर बैठकर वो देवताओं और यक्षों को रौंदता फिरता था।
अब कहानी में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट आता है। जब इस कार्तवीर्य के बेटों ने कामधेनु गाय चुराने के लिए भगवान परशुराम के पिता, ऋषि जमदग्नि के आश्रम पर हमला किया, तब परशुराम जी आश्रम में नहीं थे।
अब आप ही सोचिए! जो व्यक्ति नर्मदा से सीधे कैलाश पलक झपकते पहुँच सकता हो, वो अपने ही पिता की पुकार सुनकर आश्रम क्यों नहीं पहुँच पाया?
ऋषि जमदग्नि तपस्या में लीन थे, वो लड़े नहीं। महाभारत बताती है की वो बुरी तरह घायल होकर बस ‘राम-राम’ पुकारते रहे। और जब परशुराम जी लौटकर आए, तो उनके हाथों में सिर्फ यज्ञ की लकड़ियां थीं, और सामने पिता का शव!
साफ है की उस मनहूस दिन परशुराम जी के पास वो ‘मन की गति’ वाली शक्ति नहीं थी। अगर होती, तो वो पल भर में आकर अपने पिता को बचा लेते।
पिता की मौत ने परशुराम जी को अंदर तक झकझोर दिया। पिता के जाने के बाद ही उनका महा-रूपांतरण शुरू हुआ। उन्होंने महादेव की घोर तपस्या की।
अपने तपोबल और भगवान शिव की कृपा से उन्होंने अंततः उस ‘मनोजवित्व’ (मन की गति) सिद्धि को हासिल किया, जिसका ज़िक्र हम ऊपर ब्रह्मांड पुराण में कर चुके हैं।
इस सिद्धि का असर इतना भयंकर था की महाभारत काल तक आते-आते (जब वो महेंद्र पर्वत पर एक प्राचीन ऋषि के रूप में रह रहे थे), वो इतने एडवांस हो चुके थे की बिना किसी से मिले उन्हें पता चल जाता था की कौन आ रहा है।
जब युधिष्ठिर उनसे मिलने पहुंचे, तो परशुराम जी के शिष्य अकृतव्रण ने युधिष्ठिर से कहा की “ऋषि को पहले से ही पता था की तुम आने वाले हो।”
ये सब साबित करता है की परशुराम जी का वो सफर कोई रैंडम चमत्कार नहीं था। ये एक ऐसा विज्ञान था जिसे पहले तपोबल से डिकोड किया गया और फिर उसका इस्तेमाल किया गया।
लेकिन सवाल ये है की आखिर ये ‘डिकोडिंग’ होती कैसे है? वो कौन सा फॉर्मूला है जिससे इंसान का शरीर मन की स्पीड पकड़ लेता है?
महर्षि पतंजलि का योगसूत्र, जिसमे पूरे ब्रह्मांड का सीक्रेट सोर्स कोड है, और जिससे परशुराम ने हासिल करी थी हवा जैसी फुर्ती

अब सबसे बड़ा सवाल ये है की आखिर भगवान परशुराम ने वो कौन सा फॉर्मूला लगाया जिससे उनका शरीर मन की स्पीड से दौड़ने लगा? इसका एकदम सटीक और वैज्ञानिक जवाब हमें महर्षि पतंजलि के ‘योगसूत्र’ में मिलता है।
महर्षि पतंजलि का योगसूत्र पूरे के पूरे ब्रह्मांड (Universe) की मैट्रिक्स को समझने का एक सीक्रेट मैनुअल है।
अगर आप इस महान ग्रंथ के तीसरे अध्याय, जिसे ‘विभूति पाद’ कहा जाता है, उसे खंगालेंगे, तो वहां सिद्धियों (Superpowers) की एक पूरी लिस्ट दी गई है।
इसी अध्याय के 48वें सूत्र में महर्षि पतंजलि ने तीन महा-सिद्धियों का ज़िक्र किया है। चलिए इनको समझते हैं!
पहली सिद्धि है- ‘मनोजवित्व’। महर्षि व्यास जी ने इसका अर्थ समझाते हुए साफ लिखा है की जब इंसान के भौतिक शरीर को मन जैसी गति मिल जाए, जिससे तेज़ इस दुनिया में कुछ भी ना हो, तो उसे मनोजवित्व कहते हैं।
और दोस्त, यही है भगवान परशुराम जी की वो सीक्रेट सिद्धि, जिससे वो पलक झपकते नर्मदा से कैलाश पहुँच गए थे।
दूसरी सिद्धि है- ‘विकिरण भाव’। इसका मतलब है की आपका शरीर यहीं कुर्सी पर बैठा रहे, लेकिन आपकी इंद्रियां आपके शरीर से आज़ाद होकर, हज़ारों किलोमीटर दूर जाकर, किसी भी चीज़ को देख सकें, सुन सकें और उसका ज्ञान ले सकें।
हॉलीवुड वाले इसे ही ‘रिमोट व्यूइंग’ (Remote Viewing) या टेलीपैथी कहते हैं।
तीसरी और सबसे प्रचंड सिद्धि है- ‘प्रधान जय’। ‘प्रधान’ का मतलब होता है प्रकृति का वो मूल तत्व, वो ‘सोर्स कोड’ जिससे ये नदियां, पहाड़, अन्न, इंसान, जानवर सब कुछ बने हैं।
सोचिए, अगर आपको कंप्यूटर के उस 0 और 1 वाले बाइनरी कोड पर महारत हासिल हो जाए जिससे सारे सॉफ्टवेयर बनते हैं, तो आप क्या नहीं कर सकते?
प्रधान जय का मतलब है पूरे ब्रह्मांड के सोर्स कोड को हैक कर लेना! जिस दिन आपको ये सिद्धि मिल गई, आप हवा में पहाड़ बना सकते हैं, नदियां निकाल सकते हैं और जो चाहें वो कर सकते हैं।
धारणा ध्यान और समाधि का वो प्रचंड संयम सूत्र जिससे इंसान को मिल जाती है देवताओं जैसी शक्ति
अब आप सोचेंगे की यार, ये सिद्धियां सुनने में तो फिल्मों जैसी लग रही हैं, लेकिन इन्हें हासिल कैसे किया जाता है? क्या कोई कैप्सूल है या कोई मंत्र है?
यहीं पर महर्षि पतंजलि अपनी इंजीनियरिंग का जलवा दिखाते हैं। वो बताते हैं की ये शक्तियां कोई बाज़ार में मिलने वाली चीज़ें नहीं हैं। इसके लिए एक प्रचंड तकनीक की ज़रूरत होती है, जिसे योगसूत्र में ‘संयम’ (Samyama) कहा गया है।
तीसरे अध्याय का चौथा सूत्र कहता है- “त्रयम एकत्र संयमः”। इसका मतलब है जब आप मन की तीन शक्तियों को एक ही जगह पर, एक ही बिंदु पर रोक देते हैं, तो उसे संयम कहते हैं। ये तीन शक्तियां कौन सी हैं?
- धारणा (Focus): अपने भटकते हुए मन को पकड़कर किसी एक वस्तु या बिंदु पर लगा देना।
- ध्यान (Meditation): उस वस्तु पर मन को बिना एक सेकंड के लिए भी भटकाए, लगातार टिकाए रखना।
- समाधि (Merging): और अंत में वो अवस्था, जहाँ सिर्फ वो वस्तु रह जाए, और आपका मन खुद को पूरी तरह से भूल जाए।
जब ये धारणा, ध्यान और समाधि तीनों एक साथ लॉक हो जाते हैं, तब इंसान को वो सिद्धियां मिलती हैं।
उदाहरण के तौर पर, योगसूत्र बताता है की अगर कोई इंसान अपने शरीर के ‘नाभि चक्र’ पर संयम कर ले, तो उसे पूरी ह्यूमन बायोलॉजी और शरीर की फंक्शनिंग का ज्ञान हो जाता है।
अगर कोई ‘सूर्य’ पर संयम कर ले, तो उसे घर बैठे-बैठे पूरे सोलर सिस्टम (सौर मंडल) का ज्ञान हो जाता है। और बिल्कुल इसी तरह, जब इंसान अपनी ‘इंद्रियों’ पर संयम कर लेता है, तो उसे ‘मनोजवित्व’ यानी शरीर में मन की गति मिल जाती है।
भगवान परशुराम जी ने महेंद्र पर्वत पर तपस्या करते हुए बिल्कुल यही ‘संयम’ किया था। उन्होंने प्रकृति के सोर्स कोड को हैक किया था, तभी जाकर उन्हें वो देवताओं वाली शक्ति मिली थी।
आइंस्टाइन जिसे ‘भूतिया विद्या’ कहते थे, उसे आज की क्वांटम फिजिक्स (Quantum Physics) ने सच साबित कर दिया
चलिए, अब शास्त्रों के बाद मॉडर्न विज्ञान की बात कर लेते हैं।
क्या आपको पता है की जब क्वांटम फिजिक्स में इस थ्योरी की शुरुआत हुई की ब्रह्मांड के दो कोनों में मौजूद दो कण (Particles) एक-दूसरे से एक ही पल में संपर्क कर सकते हैं, तो अल्बर्ट आइंस्टाइन (Albert Einstein) का दिमाग हिल गया था!
आइंस्टाइन को लगता था की दुनिया में प्रकाश (Light) से तेज़ कुछ नहीं चल सकता। इसलिए जब उनके सामने ये बात आई की दो पार्टिकल्स बिना किसी तार या सिग्नल के, करोड़ों किलोमीटर दूर होकर भी एक ही पल में रिएक्ट कर सकते हैं, तो आइंस्टाइन ने इसे “Spooky action at a distance” (दूरी पर एक भूतिया असर) कहकर इसका मज़ाक उड़ाया था।
साइंस की भाषा में इसे ‘क्वांटम एंटेंगलमेंट’ (Quantum Entanglement) कहते हैं।
आइंस्टाइन को लगता था की ये बकवास है। लेकिन भाईसाहब, आज की फिजिक्स ने आइंस्टाइन को गलत साबित कर दिया है! और ये सिर्फ पन्नों पर लिखी थ्योरी नहीं रह गई है, इस पर बाकायदा असली एक्सपेरिमेंट्स हो चुके हैं।
साल 2015 की बात है। नीदरलैंड्स की डेल्फ़्ट यूनिवर्सिटी (Delft University) के वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया। उन्होंने 1.3 किलोमीटर दूर दो इलेक्ट्रॉन्स रखे।
ये दोनों इलेक्ट्रॉन्स कभी आपस में नहीं मिले थे। लेकिन वैज्ञानिकों ने उनके बीच एक कनेक्शन (Entanglement swapping) बना दिया।
मतलब एक इलेक्ट्रॉन के साथ जो भी छेड़छाड़ की जाती, 1.3 किलोमीटर दूर बैठा दूसरा इलेक्ट्रॉन उसी पल, ज़ीरो सेकंड में वही रिएक्शन देता! इंफॉर्मेशन पलक झपकते ही वहां पहुँच गई।
और इससे भी बड़ा धमाका हुआ साल 2017 में। तिब्बत के पहाड़ों में करीब 5100 मीटर की ऊंचाई पर एक ग्राउंड स्टेशन है। वहां से वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक फोटॉन (Photon) की पूरी की पूरी ‘इंफॉर्मेशन’ को वहां से 500 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में घूम रही ‘मिशियस’ (Micius) नाम की एक सैटेलाइट में टेलीपोर्ट (Teleport) करके दिखा दिया!
यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है की वो फोटॉन अपनी जगह से उड़ा नहीं था, वो वहीं ज़मीन पर था। लेकिन उसकी पूरी पहचान, उसकी पूरी इंफॉर्मेशन 500 किलोमीटर दूर सैटेलाइट वाले फोटॉन में छप गई!
मतलब वस्तु ने खुद यात्रा नहीं की, लेकिन उसका ज्ञान और उसकी पहचान दूसरी जगह पहुँच गई।
अब याद कीजिए महर्षि पतंजलि के योगसूत्र का वो ‘विकिरण भाव’! शरीर यहीं रहेगा, लेकिन इंद्रियां और ज्ञान हज़ारों किलोमीटर दूर पहुँच जाएगा।
आज के ये क्वांटम वैज्ञानिक अरबों डॉलर खर्च करके जिस टेलीपोर्टेशन पर तालियां पीट रहे हैं, महर्षि पतंजलि हज़ारों साल पहले हिमालय की गुफा में बैठकर उस विज्ञान का पूरा मैनुअल संस्कृत में लिखकर चले गए थे।
विज्ञान और सनातन दर्शन यहाँ आकर एक-दूसरे के बिल्कुल आमने-सामने खड़े हो जाते हैं!
‘वार्म होल’ और एंटेंगलमेंट की जिस थ्योरी पर आज विदेशी नोबेल प्राइज ले रहे हैं वो हजारों साल पहले योग दर्शन में लिखी थी
चलिए, अब उस सवाल पर आते हैं जो हर किसी के दिमाग में खटक रहा होगा। टेलीपोर्टेशन में तो सिर्फ ज्ञान या इंफॉर्मेशन ट्रेवल करती है, लेकिन अगर इंसान को अपने हाड़-मांस के शरीर के साथ एक जगह से दूसरी जगह जाना हो, तो उसका क्या जुगाड़ है? क्या हमारा शरीर भी इस क्वांटम जाल में ट्रेवल कर सकता है?
यहाँ पर मॉडर्न फिजिक्स एक और शॉर्टकट का दरवाज़ा खोलती है, जिसे विज्ञान की दुनिया में ‘वार्म होल्स’ (Wormholes) कहा जाता है।
ज़रा इमेजिन कीजिए की हमारा ये जो पूरा ब्रह्मांड है, ये जो स्पेस-टाइम (Space-Time) है, वो एक तनी हुई चादर की तरह है। जब इस चादर पर आप कोई बहुत भारी चीज़ रखते हैं, तो वो चादर वहां से धंस जाती है।
साल 1935 में अल्बर्ट आइंस्टाइन और नाथन रोजन (Nathan Rosen) नाम के दो वैज्ञानिकों ने एक मैथमेटिकल कैलकुलेशन दुनिया के सामने रखी।
इन्होंने बताया की अगर स्पेस की इस चादर को मोड़ दिया जाए, तो स्पेस के दो बहुत दूर के हिस्से एक सुरंग (Bridge) के ज़रिए आपस में जुड़ सकते हैं।
इसी को ‘आइंस्टाइन-रोजन ब्रिज’ या वार्म होल कहा जाता है। मतलब, बाहर से देखने पर आपको लगेगा की दो ग्रहों के बीच करोड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी है, लेकिन अगर आप इस वार्म होल रूपी सुरंग के अंदर से जाएंगे, तो आप पलक झपकते ही दूसरे ग्रह पर निकल जाएंगे!
आज के क्वांटम वैज्ञानिक ये मानने लगे हैं की ये जो पूरा ब्रह्मांड हमें अलग-अलग और बिखरा हुआ दिखता है ना, असल में ये अंदर से एंटेंगलमेंट के इन्हीं धागों से बुना हुआ एक जाल है।
यहाँ का हर कोना, वहां के हर कोने से किसी न किसी सुरंग से जुड़ा हुआ है। और भाईसाहब! यही तो वो परम सत्य है जो हज़ारों साल पहले हमारे महर्षि पतंजलि योग दर्शन में चीख-चीख कर कह रहे थे।
जब ऋषि-मुनि अपनी चेतना (Consciousness) को ‘शून्य’ में ले जाते थे, तो वो ब्रह्मांड के इसी सुरंग से कहीं भी ट्रेवल कर सकते थे! विदेशी आज इन्हीं बातों पर नोबेल प्राइज ले रहे हैं और हम अपने ही शास्त्रों को अंधविश्वास मानते थे।
पास्ट प्रेजेंट और फ्यूचर सब एक ही पल में मौजूद हैं, महर्षि पतंजलि ने हजारों साल पहले ही बता दिया था टाइम ट्रैवल का सच
अब बात करते हैं साइंस की सबसे फेवरेट चीज़ की- टाइम ट्रैवल (Time Travel)!
हॉलीवुड की फिल्मों में दिखाते हैं की एक टाइम मशीन है, उसमें बैठो, बटन दबाओ और पास्ट या फ्यूचर में चले जाओ। लेकिन सच बताऊं? असली टाइम ट्रैवल मशीनों से नहीं, चेतना (Mind) के लेवल पर होता है।
आप महर्षि पतंजलि के योगसूत्र का तीसरे अध्याय का 16वां सूत्र उठाकर देख लीजिए। पतंजलि साफ-साफ कहते हैं की जब योगी संयम करता है, तो उसे एक ही जगह पर बैठे-बैठे पास्ट (अतीत) और फ्यूचर (भविष्य) दोनों का ज्ञान मिल जाता है।
और अगर आप चौथे अध्याय के 12वें सूत्र पर जाएंगे, तो पतंजलि कहते हैं की पास्ट, प्रेजेंट और फ्यूचर… ये तीनों अलग-अलग हैं ही नहीं। ये तीनों एक ही जगह, एक ही पल में मौजूद हैं!
ये तो हमारी इंसानी दृष्टि और हमारे दिमाग का धर्म है की हम समय को आगे बढ़ता हुआ (Linear) महसूस करते हैं। वरना इस ब्रह्मांड में सब कुछ एक ही साथ घटित हो रहा है।
जो हो चुका है वो भी यहीं है, जो होने वाला है वो भी यहीं है।
और मज़े की बात देखिए! आज की मॉडर्न फिजिक्स की ‘स्पेस-टाइम कॉन्टिनम’ (Space-Time Continuum) थ्योरी और ‘ब्लॉक यूनिवर्स’ (Block Universe) का कॉन्सेप्ट बिल्कुल यही बात हुबहू कह रहा है।
आइंस्टाइन खुद कह कर गए थे की “समय एक भ्रम है।” मतलब जो गुत्थी विज्ञान आज सुलझाने की कोशिश कर रहा है, महर्षि पतंजलि उसे हज़ारों साल पहले ही डीकोड करके उसका प्रैक्टिकल दिखा चुके थे।
