चुनाव आयोग के दफ्तर तक कांग्रेस की सरेआम गुंडागर्दी, अपना फर्ज़ निभा रहे पुलिसवालों को मारी लात, अगर सरकार ने CJP के कॉकरोचों के सामने घुटने टेकने के बजाये उन्हें ठूसा होता जेल में तो ये दिन देखना न पढता

राजनीति में शब्दों के मायने कैसे बदल जाते हैं ना, ये देखना हो तो हमारे देश के नेताओं से सीखिए। एक हाथ में भारत का पवित्र संविधान, चेहरे पर लोकतंत्र बचाने की चिंता, होठों पर ‘मोहब्बत की दुकान’ का नारा…

और पैरों के नीचे देश के रक्षकों की खाकी वर्दी! जी हां, 7-8 अक्टूबर की दोपहर दिल्ली की सड़कों के लिए एक ऐसा खौफनाक मंज़र लेकर आई, जिसे देखकर किसी भी सच्चे हिंदुस्तानी का खून खौल उठे।

कनॉट प्लेस की वो सड़कें, जहां आम तौर पर लोग शांति से घूमते हैं, अचानक एक ऐसे अखाड़े में तब्दील हो गईं जहां कानून के रखवालों को सरेआम ज़मीन पर गिराकर लातें मारी जा रही थीं।

और ये सब कौन कर रहा था? वही राहुल गाँधी की टोली जो देश को अहिंसा का पाठ पढ़ाने निकली थी।

चुनाव आयोग का विरोध करने और लोकतंत्र बचाने के नाम पर शुरू हुआ ये ड्रामा कुछ ही मिनटों में पुलिसवालों के लिए एक ऐसा बुरा सपना बन गया, जिसने उनके शरीर से ज्यादा उनके स्वाभिमान को छलनी कर दिया।

क्या पुलिस सिर्फ लात खाने के लिए है? केंद्र सरकार की वो पुरानी नरमी जिसने इन तिलचट्टों को सिर पर चढ़ा दिया

सच कहा जाए तो इस पूरे बवाल में गलती सिर्फ इन धरना देने वाले गुंडों की नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की भी है जिसने इन्हें इतना सिर पर चढ़ा रखा है।

ज़रा पीछे मुड़कर देखिए, इस बीमारी की असली जड़ केंद्र सरकार (बीजेपी) की वो पुरानी नरमी है, जिसका खामियाज़ा आज हमारी पुलिस भुगत रही है।

याद है ना जब ये कॉकरोचों (CJP) ने जंतर-मंतर में NEET को लेकर हिंसक प्रदर्शन किया था और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की थी?

तब केंद्र सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफ़ा दिलवा दिया और गालीबाज़ों और पुलिस पर हमला करने वालों को भी मोदी जी ने माफ़ी दे दी।

बस, उसी दिन से इस ‘प्रोटेस्ट गैंग’ का घमंड सातवें आसमान पर है। जब आप सड़क छाप उपद्रवियों के सामने झुकते हैं, तो आप उन्हें ये संदेश देते हैं की देश का कानून बहुत कमज़ोर है।

उसी पुरानी नरमी का नतीजा है की आज ये लोग किसी को कुछ नहीं समझते। इन्हें लगने लगा है की बात-बात पर सड़कें जाम करो, बवाल काटो, पुलिस को पीटो और सरकार घुटने टेक देगी।

संविधान बचाने निकले थे या कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने, कनॉट प्लेस से शुरू हुए इस ‘अहिंसक’ मार्च का हिंसक सच

अब असली मुद्दे पे आते हैं, 7 अक्टूबर के दिन दिल्ली में कांग्रेस और INDIA ब्लॉक के दिग्गजों का जमावड़ा लगा था।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में ये सारे नेता चुनाव आयोग (EC) के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे।

इनकी मांग थी की मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार तुरंत अपना इस्तीफा दें, क्योंकि इन्हें ईवीएम (EVM) और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी की शिकायत थी।

लोकतंत्र में अपनी बात रखना, प्रदर्शन करना सबका हक़ है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन ये प्रदर्शन किस कीमत पर किया जा रहा था, असली कहानी वहां से शुरू होती है।

दोपहर का वक़्त था। कनॉट प्लेस के मशहूर ‘सागर रत्ना’ रेस्तरां में इन नेताओं का बढ़िया लंच चल रहा था। लंच खत्म होते ही अचानक ये लोग और इनके कार्यकर्ता बिना किसी पूर्व अनुमति के चुनाव आयोग के दफ्तर की तरफ कूच कर गए।

अब आप खुद सोचिए, नई दिल्ली का वो इलाका जहां जंतर-मंतर, विंडसर प्लेस और कनॉट प्लेस जुड़ते हैं, वो देश का सबसे अति-संवेदनशील ज़ोन है।

वहां पहले से ही कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए धारा 163 (निषेधाज्ञा, जिसे पहले धारा 144 कहते थे) लागू थी।

पुलिस का क्या काम है? पुलिस का काम है कानून का पालन करवाना। दिल्ली पुलिस के जवानों ने सिर्फ अपना फर्ज़ निभाते हुए इन नेताओं के मार्च को शांति से रोका।

पुलिस के आला अधिकारियों ने बहुत ही अदब से इन नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहा की सर, यहाँ धारा 163 लगी है, आप लोग आगे नहीं जा सकते, कृपया इन बसों में बैठ जाइए।

लेकिन जनाब, सियासत का नशा और नेताओं का रौब कुछ और ही होता है। शांति से बसों में बैठने के बजाय, कांग्रेसी कार्यकर्ता उग्र हो गए।

कुछ ही पलों में वो सड़क, जहां पुलिस सिर्फ कानून व्यवस्था बनाए रखने की मिन्नतें कर रही थी, वो इन ‘संविधान रक्षकों’ की गुंडागर्दी का शिकार हो गई।

जो पुलिसवाले प्रदर्शनकारियों का चश्मा उठाकर दे रहे थे उन्हें बदले में मिले नाखून, दांतों के निशान, और वर्दी पर लातें

अक्सर मीडिया और नेता पुलिस की वो छवि दिखाते हैं जिसमें खाकी वर्दी वाले सिर्फ लाठियां भांजते नज़र आते हैं। लेकिन 7 अक्टूबर को जो हुआ, उसने पुलिस के उस इंसानियत वाले चेहरे को दुनिया के सामने रख दिया, जिसे सियासत अक्सर अपने फायदों के लिए छुपा लेती है।

जब धक्का-मुक्की शुरू हुई और माहौल बिगड़ने लगा, तो दिल्ली पुलिस के जवान उग्र नहीं हुए। जब भीड़ पुलिस पर हावी हो रही थी, और उस भगदड़ में कुछ प्रदर्शनकारी ज़मीन पर गिर रहे थे, तो यही पुलिसवाले उन्हें अपने हाथों से उठाकर खड़ा कर रहे थे।

किसी का चश्मा गिर जा रहा था, किसी का मोबाइल या कैमरा छूट रहा था, तो हमारे ये खाकी वर्दी वाले जवान खुद नीचे झुककर वो सामान उठा रहे थे और बड़े प्यार से कह रहे थे, “आप आराम से बस में बैठिए, आपको चोट लग जाएगी।”

ज़रा सोचिए, एक तरफ वो इंसान है जो गाली खाकर भी आपकी फिक्र कर रहा है, और दूसरी तरफ वो भीड़ है, जिसे इस शराफत में पुलिस की कमज़ोरी नज़र आ रही थी।

इस इंसानियत के बदले इन कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने पुलिस को क्या रिटर्न गिफ्ट दिया?

भीड़ अचानक वहशीपन पर उतर आई। हेड कॉन्स्टेबल भूपेंद्र अहलावत और कॉन्स्टेबल देवेंद्र संधू जैसे जवान, जो सिर्फ बैरिकेडिंग के पास अपनी ड्यूटी कर रहे थे, उन्हें 30-40 लोगों की उग्र भीड़ ने घेर लिया।

पहले इन पुलिसवालों की छाती पर लगी नेमप्लेट को नोच दिया गया, फिर उनके सिर से उनकी टोपी उछाली गई।

किसी भी वर्दीधारी के लिए उसकी नेमप्लेट और टोपी बहुत अहम होती है, वो उसका गुरूर होता है। लेकिन इन उपद्रवियों ने उसे सड़कों पर रौंद दिया।

बात सिर्फ टोपी उछालने तक नहीं रुकी। पुलिसवालों को पीछे से वर्दी पकड़कर ज़मीन पर पटक दिया गया। और जब वो जवान ज़मीन पर गिर गए, तो इस भीड़ ने उन्हें सरेआम लातों से मारना शुरू कर दिया।

जरा सोचिये! जो पुलिस दिन-रात हमारी रक्षा करती है, उसे लातों से मारा जा रहा था!

वहीं पास में कॉन्स्टेबल अंकित कसाना के साथ जो हुआ, वो तो इंसानियत को ही शर्मसार कर दे। 30 से 40 लोगों की बेकाबू भीड़ ने उस अकेले जवान को खींच लिया।

उसकी खाकी वर्दी बीच सड़क पर फाड़ दी गई। अंकित के चेहरे और शरीर पर नाखूनों से खरोंचा गया और हद तो तब पार हो गई जब भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने उस जवान को दांतों से काट लिया!

क्या यही है वो अहिंसक सत्याग्रह जिसका पाठ ये नेता टीवी कैमरों के सामने पढ़ाते हैं? जानवरों की तरह एक अकेले पुलिसवाले को नोचना और काटना कौन से संविधान में लिखा है?

कैमरे के सामने संविधान की दुहाई और पीछे से वर्दी वालों से हाथापाई, देश ने देखा सियासत का ये दोहरा चरित्र

अब ज़रा उन बड़े-बड़े नेताओं की बात कर लेते हैं, जो इस पूरी भीड़ की अगुवाई कर रहे थे। इस पूरे ड्रामे में सियासत का जो दोहरा चरित्र देश ने देखा, वो वाकई किसी ऑस्कर विनिंग परफॉरमेंस से कम नहीं था।

एक तरफ कैमरे चमचमा रहे थे, और प्रियंका गांधी वाड्रा हाथ में संविधान लेकर बीच सड़क पर लेट गई थीं। राहुल गांधी पुलिस अधिकारियों के साथ ऐसे बहस कर रहे थे जैसे वो दुनिया के सबसे बड़े शांतिदूत हों।

ये सब तस्वीरें टीवी और अख़बारों के फ्रंट पेज के लिए एकदम परफेक्ट थीं। लेकिन कैमरे के फ्रेम से थोड़ा बाहर जो हो रहा था, क्या वो संविधान की मूल भावना थी?

क्या बाबा साहब का वो पवित्र संविधान ये सिखाता है की आप ड्यूटी पर खड़े एक आम सरकारी कर्मचारी को जानवरों की तरह नोचें और पीटें? जब आपके कार्यकर्ता एक पुलिसवाले को ज़मीन पर गिराकर उसकी पीठ पर लातें मार रहे थे, तब आपका वो मशहूर ‘मोहब्बत की दुकान’ वाला नारा कहाँ छिप गया था भाई?

क्या मोहब्बत की दुकान में अब पुलिसवालों की वर्दी फाड़ने और उन्हें दांतों से काटने का सामान बिकने लगा है? ये कैसा सत्याग्रह है जिसमें सत्याग्रही सड़कों पर गुंडे बन जाते हैं और जिनके खिलाफ प्रदर्शन है (चुनाव आयोग), उनकी जगह वो अपना सारा ज़हर उन बेबस पुलिसवालों पर निकाल देते हैं जो सिर्फ अपना काम कर रहे थे?

खाकी से इस बदसलूकी की भारी कीमत, राहुल और प्रियंका समेत कांग्रेसियों पर दर्ज हुईं 3 FIR और अब कानून करेगा अपना काम

खैर, ये दिल्ली पुलिस है, कोई पंचिंग बैग नहीं की जिसे जो चाहे, जब चाहे आकर पीट जाए और चला जाए। अगर किसी को लगता था की VIP तमगा पहनकर वो कानून के रखवालों की वर्दी फाड़ देंगे और कोई उनसे सवाल नहीं पूछेगा, तो वे बहुत बड़े मुगालते में थे।

दिल्ली पुलिस ने इस गुंडागर्दी और सरेआम हुई मारपीट का करारा जवाब दिया है। इस हिंसक बवाल के तुरंत बाद, नई दिल्ली ज़िले में पुलिस ने कड़ा एक्शन लेते हुए 3 अलग-अलग एफआईआर दर्ज़ की हैं।

और ये एफआईआर हवा में नहीं हुई हैं। इनमें राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और उन तमाम कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को नामजद किया गया है, जिन्होंने इस बवाल को अंजाम दिया।

इन सभी पर सरकारी काम में बाधा डालने (Obstructing government work), निषेधाज्ञा (BNS 163) का उल्लंघन करने और पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला करने (Assaulting cops) की बेहद गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।

आख़िर में एक बात तो पूरी तरह से साफ़ हो जानी चाहिए। हमारे देश में लोकतंत्र है, और लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना, आवाज़ उठाना या चुनाव आयोग से सवाल पूछना विपक्ष का हक़ है।

लेकिन उस हक़ की आड़ में अगर आप ये सोचते हैं की आपको सड़कों पर अराजकता फैलाने और कानून के रखवालों को पैरों तले कुचलने का लाइसेंस मिल गया है… तो आप गलत हैं।

किसी गरीब पुलिसवाले की नेमप्लेट नोचना, उसकी टोपी उछालना और उसे सड़कों पर गिराकर लात मारना.. ये ना तो सत्याग्रह है, ना आज़ादी है, और ना ही कोई राजनीतिक क्रांति।

यह सिर्फ और सिर्फ गुंडागर्दी है! और अच्छी बात ये है की अब इस गुंडागर्दी का हिसाब कानून अपने तरीके से करेगा।

देखते हैं की अब ये तथाकथित ‘संविधान रक्षक’ कानून की इस कार्रवाई का सामना कैसे करते हैं।

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