काशी की धरती पर पूर्व जापानी PM के सम्मान में खुला ‘शिंजो आबे मेमोरियल कॉरिडोर’, स्मृतियां देखकर भावुक हुईं पत्नी आकी आबे, कूटनीति से ऊपर उठकर दिलों में बस गया भारत और जापान का रिश्ता

दुनिया के बड़े-बड़े नेता मिलते हैं, मुस्कुराकर फोटो खिंचवाते हैं और अपने-अपने देश लौट जाते हैं। लेकिन सच कहूं तो, भारत और जापान का रिश्ता इस रूखी-सूखी डिप्लोमेसी से बहुत ऊपर है।

यह एक ऐसा रिश्ता है जो कागज़ों पर नहीं, बल्कि दिलों की ज़मीन पर लिखा गया है। और इसी आत्मीय रिश्ते का सबसे भावुक नज़ारा 7 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी काशी (वाराणसी) में देखने को मिला।

जापान के दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे भले ही आज हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन बनारस के घाटों और यहां की हवाओं में उनकी यादें आज भी ताज़ा हैं।

जब उनकी पत्नी आकी आबे काशी के रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर पहुंचीं, तो वहां का माहौल ऐसा हो गया जिसने हर किसी का गला रुंधा दिया।

काशी की भव्य भूमि में जापान के पूर्व PM के सम्मान में हुआ ‘शिंजो आबे मेमोरियल कॉरिडोर’ का उद्घाटन

राजनीति में सच्चे दोस्त बहुत कम मिलते हैं, और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए शिंजो आबे सिर्फ एक विदेशी समकक्ष नहीं, बल्कि एक बेहद करीबी और सच्चे मित्र थे।

दोनों नेताओं ने मिलकर कूटनीति की एक नई इबारत लिखी थी। इसी दोस्ती और शिंजो आबे के भारत प्रेम को हमेशा के लिए अमर करने के लिए काशी के सिगरा स्थित ‘रुद्राक्ष इंटरनेशनल कोऑपरेशन एंड कन्वेंशन सेंटर’ के भीतर एक भव्य ‘शिंजो आबे मेमोरियल कॉरिडोर’ का निर्माण किया गया है।

7 अक्टूबर 2026 की वो सुबह काशी के लिए बेहद खास थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ जब जापान की पूर्व प्रथम महिला आकी आबे इस कॉरिडोर का उद्घाटन करने पहुंचीं, तो वह अपने आंसुओं को रोक नहीं पाईं।

यह कोई कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी, यह एक पत्नी का अपनी आंखों के सामने अपने दिवंगत पति की स्मृतियों को एक दूसरे देश में इतना जीवंत देखकर छलक उठना था।

रुद्राक्ष की छांव और 108 मनकों का रहस्य जिसे देखकर काशी में छलक उठीं आकी आबे की आंखें

उद्घाटन समारोह के दौरान का वो नज़ारा जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। जब आकी आबे ने कॉरिडोर की दीवारों पर 2015 की उस ऐतिहासिक काशी यात्रा की तस्वीरें देखीं- जहां शिंजो आबे और पीएम मोदी गंगा आरती देख रहे थे- तो वे सिसक पड़ीं।

मंच पर आकर अपने जापानी भाषण में उन्होंने जो कहा, उसने वहां मौजूद हर इंसान का दिल जीत लिया।

रुंधे हुए गले से आकी आबे ने कहा, “मेरे पति शिंजो आबे काशी और मां गंगा में बहुत गहरी श्रद्धा रखते थे। अगर आज वो ज़िंदा होते, तो वो इस पल को देखने यहाँ ज़रूर आते।”

उन्होंने बताया की जब उनके पति काशी आए थे, तभी पीएम मोदी के साथ इस ‘रुद्राक्ष सेंटर’ की योजना बनी थी। उन्हें इस सेंटर का डिज़ाइन बहुत गहराई से छू गया।

दरअसल, इस पूरी इमारत को एक विशाल शिवलिंग (Shivalinga) का आकार दिया गया है और इसके बाहरी हिस्से में एल्युमीनियम के 108 बड़े रुद्राक्ष लगाए गए हैं।

आकी आबे ने सनातन धर्म में 108 की संख्या और भगवान शिव के महत्व का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह इमारत दोनों देशों के आध्यात्मिक जुड़ाव का साक्षात रूप है।

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया की भारत की ‘काशी’ और जापान का प्राचीन शहर ‘क्योटो’- दोनों ही ‘K’ अक्षर से शुरू होते हैं और दोनों ही अपने-अपने देशों की सांस्कृतिक आत्मा हैं।

दिल्ली का वीआईपी प्रोटोकॉल तोड़कर जब मां गंगा के कदमों में झुके थे दो देशों के सबसे ताकतवर नेता

इस मेमोरियल कॉरिडोर में जो तस्वीरें सहेजी गई हैं, उनका इतिहास दिसंबर 2015 की उस ऐतिहासिक यात्रा से जुड़ा है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सारे रटे-रटाए नियम तोड़ दिए थे।

आमतौर पर जब कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भारत आता है, तो वो दिल्ली उतरता है, राजघाट जाता है और हैदराबाद हाउस में बैठकर समझौते साइन करता है।

लेकिन पीएम मोदी ने इस वीआईपी प्रोटोकॉल को तोड़कर दुनिया को एक नया संदेश दिया। वो शिंजो आबे को सीधे बनारस के दशाश्वमेध घाट ले गए।

उस अद्भुत आध्यात्मिक माहौल के बीच दुनिया के दो सबसे ताकतवर नेता मां गंगा की आरती उतार रहे थे। उस आरती के बाद शिंजो आबे ने जो कहा था, वो आज भी रिकॉर्ड्स में दर्ज है।

उन्होंने कहा था की यहां गंगा के किनारे बैठकर उन्हें एक ऐसी “अलौकिक शांति” का अनुभव हुआ है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

उसी यात्रा के दौरान मोदी और आबे ने काशी और क्योटो को ‘सिस्टर सिटी’ (Sister City) बनाने का ऐतिहासिक समझौता किया था।

और उसी वक्त जापान की एजेंसी JICA (जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी) ने काशी को एक वर्ल्ड-क्लास कन्वेंशन सेंटर गिफ्ट करने का फैसला किया, जो आज ‘रुद्राक्ष सेंटर’ के रूप में हमारे सामने खड़ा है।

गोगाशा यानी अनंत प्रेम का वो 1500 साल पुराना जापानी ग्रंथ जिसने आज भी भारत को जापान से जोड़ कर रखा है

अगर आपको लगता है की भारत और जापान का यह रिश्ता सिर्फ मोदी और आबे के दौर में बना है, तो आप इतिहास की उस गहराई से अनजान हैं जो इन दोनों देशों को पिछले डेढ़ हज़ार सालों से जोड़ कर रखे हुए है।

यह कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि एक आत्मा का दूसरे से मिलन है।

अगर आप प्राचीन जापानी बौद्ध ग्रंथों को खंगालेंगे, तो आपको यह जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे कि वहां मां गंगा को बहुत पवित्र माना गया है और उसे जापानी भाषा में ‘गोगा’ (Gōga) कहा गया है।

इतना ही नहीं, जापान की संस्कृति और शिंगोन (Shingon) बौद्ध धर्म में एक बेहद पवित्र शब्द है- ‘गोगाशा’ (Gōgasha)। गोगाशा का मतलब होता है ‘गंगा नदी की रेत के कण’।

8वीं सदी के महान जापानी विद्वान कुकाई (Kukai) के समय से ही, जापानी संस्कृति में जब किसी ऐसी चीज़ का वर्णन करना होता है जो ‘अनंत’ (Infinity) हो, जिसकी कोई गिनती न की जा सके, जो अथाह हो…

तो वो लोग ‘गोगाशा’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। मतलब, जापानी संस्कृति में मां गंगा की रेत के कणों को अनंतता और ब्रह्मांड की विशालता का प्रतीक माना जाता है।

सारनाथ के मंदिर में जापानी पेंटर कोसेत्सु नोसू की वो कलाकारी जो आज भी दोनों देशों की धड़कन है

सारनाथ वो पवित्र भूमि है जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे इतिहास में ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है।

यही वो जगह है जहां से बौद्ध धर्म की जड़ें पूरे एशिया में फैलीं। लेकिन क्या आप जानते हैं की इसी सारनाथ में आज भी भारत और जापान के प्रेम की एक ऐसी निशानी मौजूद है जो कूटनीति की किताबों से बहुत पुरानी है?

सारनाथ में एक बेहद खूबसूरत मंदिर है जिसका नाम है ‘मूलगंध कुटी विहार’। जब आप इस मंदिर के अंदर कदम रखेंगे, तो इसकी दीवारों पर आपको भगवान बुद्ध के जीवन की पूरी कहानी बेहद शानदार पेंटिंग्स के रूप में नज़र आएगी।

आपको जानकर हैरानी होगी की ये अद्भुत चित्रकारी किसी भारतीय कलाकार ने नहीं, बल्कि जापान के एक महान और विख्यात चित्रकार कोसेत्सु नोसू (Kosetsu Nosu) ने की थी।

1930 के दशक में कोसेत्सु नोसू भारत आए थे और उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और भक्ति से 1936 में इन कलाकृतियों को पूरा किया था।

इतना ही नहीं, आज भी सारनाथ की गलियों में आपको जापानी शैली (Nichiren style) के लाल और सफेद पगोडा और जापानी मंदिर खड़े मिल जाएंगे।

एक दिन का राष्ट्रीय शोक और पद्म विभूषण का सम्मान जो बताता है की हिंदुस्तान अपने सच्चे दोस्तों को कभी नहीं भूलता

लेकिन वक्त का पहिया कभी-कभी ऐसा क्रूर मज़ाक करता है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होती।

जुलाई 2022 की वो मनहूस सुबह आज भी पूरी दुनिया को याद है, जब जापान के नारा (Nara) शहर में एक चुनावी सभा के दौरान शिंजो आबे की बेहद कायरतापूर्ण तरीके से गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

इस खबर ने पूरे जापान को तो रुलाया ही, लेकिन अगर दुनिया में किसी दूसरे देश को सबसे गहरा सदमा लगा था, तो वो हिंदुस्तान था।

पीएम मोदी ने उस दिन एक बेहद भावुक ट्वीट करते हुए लिखा था की “मैंने आज अपना एक बहुत करीबी दोस्त खो दिया है।” भारत अपने दोस्तों का अहसान कभी नहीं भूलता, और यह बात हिंदुस्तान ने पूरी दुनिया को साबित करके दिखाई।

एक विदेशी पूर्व राष्ट्राध्यक्ष के निधन पर भारत सरकार ने एक दिन का ‘राष्ट्रीय शोक’ (National Mourning) घोषित किया था। देश भर में सरकारी इमारतों पर तिरंगा आधा झुका दिया गया था। यह सम्मान भारत में बहुत कम विदेशी नेताओं को नसीब हुआ है।

इससे पहले, साल 2021 में ही भारत सरकार ने शिंजो आबे को देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ (Padma Vibhushan) से नवाज़ा था।

यह सम्मान सिर्फ एक मेडल नहीं था, बल्कि 140 करोड़ हिंदुस्तानियों की तरफ से शिंजो आबे को दिया गया वो धन्यवाद था, जिसके वो असली हकदार थे।

आज जब हम काशी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर के भीतर बने ‘शिंजो आबे मेमोरियल कॉरिडोर’ को देखते हैं, तो वो उस महापुरुष की निशानी है जिसने जापान में बैठकर भारत के लिए एक बहुत बड़ा सपना देखा था।

आकी आबे जब वहां से लौटीं, तो वो सिर्फ अपने साथ यादें नहीं ले गईं, बल्कि भारत के करोड़ों लोगों का वो आत्मीय प्रेम ले गईं जो हमेशा शिंजो आबे के नाम के साथ जुड़ा रहेगा।

शिंजो आबे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जब तक काशी में गंगा की लहरें बहती रहेंगी, जब तक सारनाथ में बुद्ध की शांति कायम रहेगी, और जब तक भारत में बुलेट ट्रेन पटरियों पर दौड़ती रहेगी…

तब तक भारत और जापान की इस अमर दोस्ती की दास्तां शिंजो आबे के नाम से ही पहचानी जाएगी।

भारत-जापान मैत्री अमर रहे!

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