चाणक्य-नीति भी बन जाती घाव, जब सत्ता चल देती गलत दांव Episode 5: दिन-रात सरकार को बदनाम करने वालों को मिल रहा सत्ता से इनाम, वहीं वफादारी निभाने वाले समर्थकों को पार्टी से निकालकर कर दिया बेगाना, अपनों की पीठ में छुरा घोंपने का ये खेल BJP को पड़ेगा भारी

हमारे बचपन में एक कहावत सिखाई जाती थी- ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’। मतलब जो अपना है, जो हमेशा वफादारी से आपके साथ खड़ा है, उसकी कोई इज़्ज़त नहीं होती।

लेकिन आज के समय में BJP सरकार ने इस कहावत को जिस नेक्स्ट लेवल पर पहुंचा दिया है ना, वो सिर्फ हैरानी भरा नहीं, बल्कि एक सच्चे समर्थक के लिए बहुत ही पीड़ादायक है।

ज़रा सोचिए! एक आम कार्यकर्ता, एक आम राष्ट्रवादी वोटर अपना काम-धंधा छोड़कर, दिन-रात सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक सरकार का बचाव करता है।

जब भी विपक्ष या विदेशी मीडिया भारत को बदनाम करने की कोशिश करता है, तो यही आम सनातनी ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। बदले में इसे क्या मिलता है? भयंकर ट्रोलिंग, झूठे मुक़दमे और सिस्टम की बेरुखी।

लेकिन दूसरी तरफ तस्वीर बिल्कुल उलट है। अगर आप दिन-रात सिस्टम को कोसते हैं, अगर आप कैमरे के सामने प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पूज्य दिवंगत मां तक के लिए भद्दे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो बधाई हो!

सरकार आपको अपना सबसे ख़ास मेहमान बनाएगी। आपको वीआईपी सोफे पर बिठाया जाएगा, आपको करोड़ों के सरकारी विज्ञापन दिए जाएंगे और आपके साथ मुस्कुराते हुए तस्वीरें खिंचवाई जाएंगी।

ये BJP की एक ऐसी मानसिक बीमारी बन चुकी है, जहाँ अपने ही निष्ठावान वोटर को तो ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (बपौती) मान लिया गया है की “अरे ये कहाँ जाएंगे, वोट तो हमें ही देंगे।”

और जो लोग रात-दिन इस सरकार को कोसने में लगे रहते हैं, उन्हें हम टैक्सपेयर के पैसों से मलाई खिलाकर ‘गुड बॉय’ का सर्टिफिकेट लेने की होड़ मची है।

और सरकार को अंदाजा नहीं है की ये बीमारी उन्हें अंदर ही अंदर कैसे दीमक की तरह खा रही है।

1. विरोधियों से सर्टिफिकेट लेने की BJP की भूख

और खुद के जमीनी समर्थक को समझ रखा महज़ ‘वोट बैंक’

आखिर ऐसा होता क्यों है? क्यों एक प्रचंड बहुमत वाली सरकार को अपने ही समर्थकों से ज़्यादा उन लोगों की फिक्र सताने लगती है, जो उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं करते?

इसका सीधा सा जवाब है- ‘वैलिडेशन की भूख’ (Hunger for Validation)।

आप इसे लुटियंस दिल्ली का सिंड्रोम कह लीजिए या फिर विदेशी मीडिया से ‘सर्टिफिकेट’ मांगने की बेताबी। जब कोई पार्टी बहुत लंबे समय तक सत्ता में रह जाती है, तो उसके शीर्ष नेतृत्व को एक अलग ही किस्म का कीड़ा काट लेता है।

उन्हें लगता है की यार चुनाव तो हम जीत ही रहे हैं, वोट तो ये पब्लिक दे ही रही है… लेकिन हमें ‘लिबरल’, ‘सेक्युलर’ और ‘स्टेट्समैन’ (Statesman) का ठप्पा कौन देगा?

वो ठप्पा तो वही विरोधियों का इकोसिस्टम देगा ना, जिसने दशकों से मीडिया, अकैडमिया और न्यायपालिका में अपनी जड़ें जमा रखी हैं।

बस, इसी ‘गुड बॉय’ वाले सर्टिफिकेट की चाहत में सत्ताधारी लोग अपने ही वैचारिक योद्धाओं से कन्नी काटने लगते हैं। उन्हें लगता है की अगर हम जेएनयू वाले नैरेटिव को थोड़ा दुलार देंगे, अगर हम वामपंथी पत्रकारों को इंटरव्यू और विज्ञापन देंगे, या अगर हम किसी धुर-विरोधी को सरकारी पद दे देंगे, तो शायद वो हमारे बारे में दो मीठे शब्द लिख देंगे।

न्यूयॉर्क टाइम्स या वॉशिंगटन पोस्ट में शायद उनकी तारीफ छप जाए।

लेकिन भाई, राजनीति का सबसे कड़वा सच यही है की जो विचारधारा आपसे नफरत करती है, वो आपकी चाय और आपके समोसे खाकर बदल नहीं जाएगी।

आप उन पर टैक्सपेयर का करोड़ों का खजाना लुटा दीजिए, वो वो पैसे अपनी जेब में डालेंगे और अगले ही दिन उसी पैसे से आपके खिलाफ एक नया टूलकिट तैयार कर देंगे। वो आपको कभी वोट नहीं देने वाले।

और इस पूरे तमाशे में सबसे बड़ा नुकसान किसका होता है? उस ज़मीनी कार्यकर्ता का, जिसे अब सिर्फ एक ‘वोटिंग मशीन’ समझ लिया गया है।

नेतृत्व को लगता है की चुनाव आएंगे, हम राम मंदिर या राष्ट्रवाद का कोई तगड़ा सा नारा उछालेंगे, और ये कोर वोटर दौड़कर वापस आ जाएगा।

लेकिन चाणक्य ने बहुत पहले कहा था की जब राजा अपने वफादार सैनिकों का अपमान करके दुश्मनों को दरबार में सम्मान देने लगे, तो वो साम्राज्य बाहर के हमलों से नहीं, बल्कि अंदर की बगावत और निराशा से ढहता है।

लुटियंस के सर्टिफिकेट की इसी अंधी दौड़ ने आज बीजेपी को एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां उसके अपने ही लोग उससे सवाल पूछने लगे हैं की “क्या हमने इसलिए दरी बिछाई थी की आप हमारे हिस्से का दुलार हमारे दुश्मनों पर लुटाएं?”

चाणक्य की चेतावनी: जब राजा अपने वफादार सैनिकों का अपमान करके दुश्मनों को दरबार में सम्मान देने लगे, तो वो साम्राज्य अंदर की बगावत और निराशा से ढहता है।

2. वामपंथी प्रदर्शनकारियों को गरमा-गरम रोटी और दाल-सब्ज़ी

‘ज्ञानेश कुमार’ के खिलाफ प्रदर्शन पर प्रशासन की शाही मेहमाननवाज़ी

हमारे देश के ‘आंदोलनजीवियों’ का एक सबसे फेवरेट डायलॉग है- “भारत में अघोषित आपातकाल है, यहाँ तो डिक्टेटरशिप (तानाशाही) चल रही है!”

ये लोग दिन-रात यही रोना रोते हैं की पुलिस हम पर ज़ुल्म कर रही है, हमारी आवाज़ दबाई जा रही है। लेकिन इस तथाकथित तानाशाही का असली सच क्या है, वो अभी अक्टूबर 2026 में हुए एक ड्रामे ने पूरी दुनिया के सामने खोल कर रख दिया।

हुआ यूँ की चुनाव आयोग (EC) के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) को लेकर इस पूरे कॉकरोच जनता पार्टी, ध्रुव राठी और वामपंथी इकोसिस्टम ने दिल्ली में एक बड़ा बवाल खड़ा करने की कोशिश की।

ये लोग मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़क पर उतर आए। अब ज़ाहिर सी बात है, जब आप बिना परमिशन सड़क जाम करके नौटंकी करेंगे, तो पुलिस आपको हिरासत (Detention) में तो लेगी ही।

पुलिस ने अभिजीत दिपके और उनके साथी लिबरल आंदोलनकारियों को पकड़ा और थाने ले गई।

अब यहाँ से शुरू होता है असली खेल!

पुलिस थाने के अंदर इन ‘क्रांतिकारियों’ को मुजरिमों की तरह नहीं, बल्कि किसी दामाद की तरह ट्रीट किया जा रहा था। थाली में बकायदा दाल, सब्ज़ी, हरी मिर्च और एकदम गरमा-गरम रोटियां परोसी जा रही थी।

सब आराम से गपशप लड़ाते हुए खाना खा रहे थे, जैसे किसी पुलिस थाने में नहीं, बल्कि संडे की पिकनिक मनाने किसी रेस्टोरेंट में आए हों!

मतलब हद ही हो गई है यार! एक आम आदमी अगर अपना पासपोर्ट बनवाने या कोई छोटी सी शिकायत लेकर थाने चला जाए, तो पुलिस वाले उसे 4 घंटे बाहर बेंच पर इंतज़ार करवाते हैं और सीधे मुंह बात तक नहीं करते।

और जो लोग दिन-रात देश की न्यायपालिका, चुनाव आयोग और सरकार को गालियां बक रहे हैं, उन्हें हमारे और आपके दिए हुए टैक्स के पैसों से गरमा-गरम रोटियों और सब्ज़ी की दावतें खिलाई जा रही हैं।

सबसे बड़ा मज़ाक तो ये है की थाने के अंदर सरकारी मेहमाननवाज़ी का पूरा लुत्फ़ उठाने के बाद, डटकर रोटियां दबाने के बाद… यही लिबरल गैंग जब थाने से बाहर निकलेगा, तो विदेशी मीडिया (BBC या Al Jazeera) के कैमरों के सामने अपना विक्टिम कार्ड खेलना शुरू कर देगा।

जब सिस्टम खुद ही अपने विरोधियों को इतना सिर पर चढ़ाएगा और उनके लिए फाइव-स्टार जैसी सुविधाएं मुहैया कराएगा, तो वे आपको गालियां क्यों नहीं देंगे?

वे तो चाहते ही हैं की आप उन्हें गिरफ्तार करें ताकि उनकी TRP बढ़े और उनका डोनेशन वाला लिंक और तेज़ी से पैसा छापे। जो सरकार अपने ही थाने में देश-विरोधियों की आवभगत करने लगे, वो अपने कोर वोटर को क्या ही न्याय दिलाएगी?

असली सवाल: जो सरकार अपने ही थाने में देश-विरोधियों की आवभगत करने लगे, वो अपने कोर वोटर को क्या ही न्याय दिलाएगी?

3. चुनाव आयोग पर कीचड़ उछालने वाले अखबार ने विपक्ष से डकारे पूरे 81 लाख रुपये

और उसी अखबार पर बेखौफ लुटाया जा रहा टैक्सपेयर का खजाना

चलिए थाने की दावत से बाहर निकलते हैं और मीडिया के उस ‘मलाईदार’ खेल की तरफ चलते हैं, जहाँ सरकार खुद अपने ही पैरों पर सबसे बड़ी कुल्हाड़ी मार रही है।

सोशल मीडिया पर एक आम राष्ट्रवादी लड़का रात-दिन जागकर वामपंथी पत्रकारों और एजेंडाधारी अख़बारों से लड़ता है। वो गालियां खाता है ताकि सरकार की इमेज बची रहे।

लेकिन उसे क्या पता की जिन अखबारों से वो लड़ रहा है, उनका खर्च तो खुद वही सरकार उठा रही है जिसका वो बचाव कर रहा है!

ज़रा ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ का ये 81 लाख वाला खेल समझिए। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने सीनियर वकील महेश जेठमलानी ने डंके की चोट पर एक बड़ा धमाका किया।

उन्होंने चुनाव आयोग (EC) के खर्चे के पक्के डॉक्यूमेंट्स दुनिया के सामने रख दिए। इन कागज़ों से साबित हुआ की पश्चिम बंगाल और कर्नाटक चुनावों के दौरान कांग्रेस पार्टी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को पूरे 81 लाख रुपये का भारी-भरकम पेमेंट किया था।

अब ये सुन लीजिये की ये अख़बार आखिर क्या कर रहा था? चुनाव के दौरान इसी अख़बार ने पूरे लाव-लश्कर के साथ चुनाव आयोग को बदनाम करने और एक फुल-प्रूफ ‘एंटी-बीजेपी’ नैरेटिव सेट करने का ठेका लिया हुआ था।

राइट-विंग के बुद्धिजीवियों और आम समर्थकों ने इस प्रोपेगेंडा का कड़ा विरोध किया। उन्होंने सबूत दिए की कैसे ये अख़बार झूठ फैलाकर लोकतंत्र को कमज़ोर कर रहा है।

लेकिन भाई साहब, हमारे सिस्टम का ‘मास्टरस्ट्रोक’ तो देखिए! जिस अखबार का बॉयकॉट करने के लिए आम समर्थक अपना गला फाड़ रहा था, उसी ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में कुछ ही दिनों बाद हमारी ही सरकार ने फुल-पेज के महंगे विज्ञापन छपवा दिए!

अख़बार के पन्नों पर बड़े-बड़े अक्षरों में “गुजरात वाटर गवर्नेंस मॉडल” की तारीफें छपी थीं।

अब एक सीधा और चुभता हुआ सवाल है- अगर सरकार को अपनी ही जड़ें खोदने वाले, चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करने वाले और कांग्रेस से 81 लाख की फंडिंग लेने वाले अखबारों को ही करोड़ों रुपये का विज्ञापन देना है, तो फिर आपका आम वोटर आपका बचाव क्यों करे?

आप ही बताइए ना! जब आप अपनी आलोचना करने वालों के बैंक खातों में टैक्सपेयर के पैसों की बरसात कर रहे हैं, तो कोई बेवकूफ ही होगा जो मुफ्त में आपके लिए सोशल मीडिया पर गालियां खाएगा।

ये कोई राजनीति नहीं है, ये दुश्मनों को मलाई खिलाकर खुद अपना जनाधार खत्म करने का एक अचूक फॉर्मूला है।

सीधा सवाल: जब आप अपनी आलोचना करने वालों के बैंक खातों में टैक्सपेयर के पैसों की बरसात कर रहे हैं, तो कोई बेवकूफ ही होगा जो मुफ्त में आपके लिए सोशल मीडिया पर गालियां खाएगा।

4. सवेरे फेक न्यूज़ छापकर अराजकता फैलाते ये एजेंडाधारी अखबार

और इनके ही ‘अड्डे’ में शाम को सज-धज कर पहुँचते BJP मंत्री

बात सिर्फ विज्ञापनों तक रुक जाती, तो शायद कोर वोटर इतना आहत नहीं होता। लेकिन लुटियंस की वैलिडेशन की भूख यहीं खत्म नहीं होती भाई!

इस अखबार का एक मशहूर इवेंट होता है- ‘एक्सप्रेस अड्डा’ (Express Adda)। इस ‘अड्डा’ में बुलाए जाने को दिल्ली में एक बहुत बड़ा स्टेटस सिंबल माना जाता है।

आपको जानकर हैरानी होगी की जिस अखबार ने चुनाव आयोग से लेकर सरकार की हर नीति को कटघरे में खड़ा किया, उसी के इस इवेंट में बीजेपी के दिग्गज मंत्री, बड़े-बड़े चेहरे पूरी शानो-शौकत के साथ हाज़िरी लगाते हैं।

और यहां तक की खुद प्रधानमंत्री मोदी भी इंडियन एक्सप्रेस के ‘रामनाथ गोएंका’ इवेंट में शामिल हुए थे।

ज़रा इमेजिन कीजिए उस ज़मीनी कार्यकर्ता की हालत। दिन भर वो बेचारा सोशल मीडिया पर वामपंथियों से लड़ रहा है, गालियां खा रहा है, और कह रहा है की “ये अखबार फेक न्यूज़ फैलाता है, इसका बायकॉट करो!”

और शाम को वो टीवी खोलकर देखता है की उसके सबसे बड़े नेता उसी अखबार के मालिक और एडिटर्स के साथ मंच पर बैठे हैं, ठहाके लगा रहे हैं और उनके सवालों का बड़ी ही शालीनता से जवाब दे रहे हैं।

ये नज़ारा उस कार्यकर्ता के गाल पर एक बहुत ज़ोरदार तमाचा होता है। वो सोचता है की यार मैं किसके लिए लड़ रहा हूँ? जिनके लिए मैं अपनी इज्ज़त दांव पर लगा रहा हूँ, वो खुद तो उन एडिटर्स के साथ ‘इंटेलेक्चुअल’ दिखने की होड़ में लगे हैं।

जब मंत्री महोदय सूट-बूट पहनकर इन वामपंथी पत्रकारों के मंच पर ज्ञान बांट रहे होते हैं, तब उन्हें ये रत्ती भर भी एहसास नहीं होता की वो अपने करोड़ों साइलेंट वोटर्स का कितना बड़ा मज़ाक उड़ा रहे हैं।

सत्ता का ये अति-आत्मविश्वास की हम तो कुछ भी कर लें, वोटर कहां जाएगा, उसे तो कमल का बटन ही दबाना है… यही वो भ्रम है जो किसी भी राजनीतिक दल के पतन का सबसे बड़ा कारण बनता है।

आप अपने आलोचकों का सम्मान कीजिए, वहां तक बात ठीक है। लेकिन अपने आलोचकों को करोड़ों का फंड देकर और उनके मंचों की शोभा बढ़ाकर आप उन्हें सम्मान नहीं दे रहे, आप दरअसल उनकी उस वैचारिक ब्लैकमेलिंग (Ideological Blackmailing) के सामने सरेंडर कर रहे हैं, जो आपको कभी भी अपना नहीं मानेगी।

5. नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल को ‘सिर तन से जुदा’ की धमकियाँ

विश्व की सबसे बड़ी पार्टी ने अपने ही प्रवक्ताओं को लावारिस छोड़ दिया

याद कीजिए जून 2022 का वो दौर। देश के टीवी चैनलों पर रोज़ाना डिबेट्स चल रही थीं। उन्हीं में से एक डिबेट में बीजेपी की तत्कालीन राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा पार्टी का पक्ष रख रही थीं।

जब उनके आराध्य पर कीचड़ उछाला गया, तो उन्होंने उसी लहज़े में पलटकर एक धार्मिक ग्रंथ का हवाला देते हुए कुछ बातें कह दीं।

इसके बाद जो हुआ, वो पूरे देश ने देखा। वामपंथी इकोसिस्टम के एक तथाकथित ‘फैक्ट चेकर’ ज़ुबैर ने उस वीडियो की एक छोटी सी क्लिप काटी और उसे एक खास एजेंडे के तहत सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।

देखते ही देखते पूरे देश में बवाल मच गया। नूपुर शर्मा, जो की कोई सड़क चलते नेता नहीं बल्कि विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की ‘आधिकारिक प्रवक्ता’ थीं, उन्हें सरेआम धमकियां मिलने लगीं।

बात सिर्फ नूपुर शर्मा तक नहीं रुकी, दिल्ली बीजेपी के तत्कालीन मीडिया प्रभारी नवीन कुमार जिंदल ने भी नूपुर शर्मा के समर्थन में आकर पैगम्बर के बारे में सच्चाई बोली।

इसके बाद दबाव का वो खेल शुरू हुआ, जिसने बीजेपी के उस ‘मज़बूत और राष्ट्रवादी’ छवि वाले गुब्बारे की हवा निकाल दी। कतर और कुवैत जैसे कुछ अरब देशों ने अपनी त्यौरियां क्या चढ़ाईं, दिल्ली में बैठे शीर्ष नेतृत्व के पसीने छूट गए।

जिस प्रवक्ता को उन्होंने खुद टीवी पर अपनी विचारधारा डिफेंड करने के लिए भेजा था, उसे रातों-रात दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया गया।

पार्टी ने बाकायदा प्रेस रिलीज़ जारी करके अपने ही इन कट्टर वफादारों को ‘फ्रिंज एलिमेंट’ (Fringe elements – असामाजिक तत्व) घोषित कर दिया।

नूपुर शर्मा को सस्पेंड कर दिया गया और नवीन कुमार जिंदल को पार्टी से निकाल बाहर किया गया।

ज़रा सोचिए, उस वक्त उस आम कार्यकर्ता पर क्या बीत रही होगी? एक तरफ सड़कों पर ‘सिर तन से जुदा’ के खौफनाक नारे लग रहे थे। उदयपुर में कन्हैयालाल और अमरावती में उमेश कोल्हे जैसे आम लोगों की निर्मम हत्याएं कर दी गईं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने नूपुर शर्मा के समर्थन में एक सोशल मीडिया पोस्ट किया था।

और दूसरी तरफ, केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने वाली वो पार्टी, जिसे इस कोर वोटर ने अपनी ढाल समझकर सत्ता में बिठाया था, वो खामोश बैठी तमाशा देख रही थी।

नूपुर शर्मा को महीनों तक अंडरग्राउंड रहना पड़ा। अपना घर, अपना करियर, अपनी आज़ादी सब कुछ दांव पर लगाना पड़ा।

ये घटना कोई मामूली पॉलिटिकल डैमेज नहीं था। इसने ज़मीन पर दरी बिछाने वाले और सोशल मीडिया पर पार्टी के लिए गालियां खाने वाले हर एक कार्यकर्ता के दिमाग में एक बात बहुत गहराई से बैठा दी-

“जब तुम्हारी गर्दन पर तलवार लटकेगी, तो ये पार्टी तुम्हें बचाने नहीं आएगी। तुम अपने दम पर हो भाई!”

जब एक राष्ट्रीय प्रवक्ता का ये हश्र हो सकता है, तो किसी आम कार्यकर्ता की बिसात ही क्या है?

सबसे गहरा घाव: जब तुम्हारी गर्दन पर तलवार लटकेगी, तो ये पार्टी तुम्हें बचाने नहीं आएगी।

6. राम मंदिर से लेकर सनातन तक के लिए ढाल बनने वाले अजीत भारती

उन्हें कोर्ट कचहरी के दलदल में छोड़कर चैन की नींद सो रही BJP

अब हम बात करेंगे मशहूर पत्रकार और क्रिएटर अजीत भारती की। वही अजीत भारती, जिनकी बेबाक आवाज़ और धारदार तर्कों ने सालों तक हिंदुत्व, सनातन और इसी बीजेपी सरकार का हर मोर्चे पर सीना तानकर बचाव किया।

लेकिन जब उनके बुरे दिन आए, तो दिल्ली में बैठे इन सत्ताधीशों ने अपना मुंह ऐसे फेर लिया जैसे वो उन्हें जानते ही न हों।

आपको जून 2024 का वो वाकया तो याद ही होगा। अजीत भारती ने अपने एक वीडियो में कांग्रेस के ही निकाले गए नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम के बयान का हवाला देते हुए सिर्फ इतना कह दिया था की ‘अगर राहुल गांधी सत्ता में आ गए तो राम मंदिर हटाकर वापस बाबरी मस्जिद बना देंगे।’

बस इतनी सी बात थी! इसके बाद क्या हुआ? कर्नाटक में बैठी कांग्रेस सरकार की पुलिस फ्लाइट पकड़कर सीधे उन्हें अरेस्ट करने उनके नोएडा वाले घर पहुंच गई!

उनके खिलाफ 153A और 505(2) जैसी भयंकर धाराएं ठोक दी गईं। वो तो गनीमत थी की यूपी पुलिस बीच में आ गई और मामला थोड़ा टल गया।

लेकिन इस पूरे ड्रामे में बीजेपी का स्टैंड क्या था? कुछ नेताओं ने ट्विटर पर एक-दो ट्वीट कर दिए, थोड़ी बहुत बयानबाज़ी कर दी, बस! खत्म! बाद में कर्नाटक हाई कोर्ट ने उस जांच पर स्टे लगा दिया।

लेकिन असली धोखा और सिस्टम की मुँहजोरी तो अभी हाल ही में अगस्त-सितंबर 2026 में देखने को मिली है। आज़ाद समाज पार्टी और भीम आर्मी वालों ने दिल्ली पुलिस में अजीत भारती के खिलाफ एक नई FIR दर्ज करा दी।

आरोप लगा दिया की यूट्यूब पर उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद के खिलाफ ‘जातिसूचक और अपमानजनक’ बातें कही हैं। अब भाई साहब, यहां कानून का वो फंदा कसा गया जिसमें इंसान की गर्दन सीधे तौर पर कटती है- यानी भयंकर SC/ST एक्ट!

साथ में आईटी एक्ट और नई बीएनएस (BNS) की कड़क धाराएं भी लाद दी गईं। मामला इतना संगीन बना दिया गया की अजीत भारती को अग्रिम ज़मानत के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं। पटियाला हाउस कोर्ट से लेकर दिल्ली हाई कोर्ट तक चक्कर काटे।

और अभी ताज़ा अपडेट सुन लीजिए, 24 सितंबर 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट के जज साहब (जस्टिस सौरभ बनर्जी) ने उनकी अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) याचिका ये कहकर सिरे से खारिज कर दी की भाई SC/ST एक्ट में तो ज़मानत का कोई प्रावधान ही नहीं बनता।

मतलब एक पढ़ा-लिखा पत्रकार, जो डंके की चोट पर सनातन और इस देश की बहुसंख्यक जनता की आवाज़ उठाता रहा, वो आज गिरफ्तारी की तलवार के साये में जी रहा है। जेल जाने की कगार पर खड़ा है।

और हमारे सिस्टम के जो बड़े-बड़े ठेकेदार हैं, जो हिंदुत्व के नाम पर हर चुनाव में पर्चियां बांटकर वोट मांगते हैं, उनके मुंह में दही जम गया है! बीजेपी की पूरी की पूरी लीगल सेल, उनके बड़े-बड़े मंत्री और आईटी सेल वाले एकदम सन्नाटे में हैं। किसी ने एक चवन्नी भर का लीगल या मोरल सपोर्ट तक नहीं दिया। पार्टी की तरफ से एक सिंगल ट्वीट तक नहीं आया की हम इस लड़के के साथ खड़े हैं।

अब आप खुद अपने दिल पर हाथ रखकर बताइए यार… जब एक आम युवा देखता है की जो सरकार इंडियन एक्सप्रेस को 81 लाख की कांग्रेसी फंडिंग मिलने के बावजूद करोड़ों के विज्ञापन देती है, वही सरकार अपने सबसे बड़े डिफेंडर अजीत भारती को पुलिस और कोर्ट के जाल में तड़पने के लिए अकेला छोड़ देती है!

तो वो कल को इस सिस्टम के लिए अपनी आवाज़ क्यों उठाएगा? क्यों कोई मुफ्त में आपके लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाएगा और मुकदमों के झमेले में पड़ेगा?

‘यूज़ एंड थ्रो’ (Use and Throw) की ये राजनीति इतनी घिनौनी हो चुकी है की आज हर राइट-विंग क्रिएटर और समर्थक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

जब आप अपने रक्षकों को ही नहीं बचा सकते, तो याद रखना की कल को जब लुटियंस मीडिया आप पर हमला करेगा, तो आपकी ढाल बनने वाला कोई अजीत भारती वहां खड़ा नहीं मिलेगा।

सब घर बैठ जाएंगे और आप अपने इस ‘तुष्टिकरण’ के महल में अकेले बैठ कर तानाशाही का रोना सुनते रह जाएंगे।

कड़वा सच: जब आप अपने रक्षकों को ही नहीं बचा सकते, तो कल को जब लुटियंस मीडिया आप पर हमला करेगा, तो कोई ढाल बनने वाला नहीं मिलेगा।

7. प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने इंटरव्यू देकर जिस इन्फ्लुएंसर की चमकाई ब्रांड वैल्यू

आज वही विदेशी टूलकिट के इशारे पर सरकार को बता रही तानाशाह

ये एक बहुत पुरानी कहावत है की सांप को आप कितना भी दूध पिला लो, मौका मिलने पर वो आपको डसेगा ही डसेगा।

लेकिन लगता है हमारे सिस्टम में बैठे लोगों ने इतिहास और पुरानी कहावतों से कुछ भी नहीं सीखा है। इन्हें लगता है की वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम को हम प्यार देंगे, इंटरव्यू देंगे, तो शायद उनका हृदय परिवर्तन हो जाएगा।

ज़रा ‘ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे’ (Humans of Bombay) की फाउंडर करिश्मा मेहता का किस्सा सुनिए। ये वही मोहतरमा हैं जिन्हें रातों-रात तब नेशनल फेम मिला था जब खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे दिग्गजों ने उनके कैमरे के सामने बैठकर इंटरव्यू दिए थे।

इन लिबरल चेहरों को इतनी बड़ी सरकारी लेजिटिमेसी (मान्यता) दी गई। सरकार को लगा होगा की हमने इन्हें सिर पर बिठाया है, तो ये हमारा गुणगान करेंगे।

लेकिन हुआ क्या? जैसे ही इन लोगों को सरकारी ठप्पे के साथ पब्लिसिटी मिली, कुछ ही समय बाद इनका असली रंग सामने आ गया।

इसी करिश्मा मेहता ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (BBC) की उन फेक और ज़हरीली रिपोर्ट्स को शेयर करना शुरू कर दिया, जो भारत की छवि खराब करने के लिए बनाई गई थीं।

मैडम ने खुलेआम लिखना शुरू कर दिया की “भारत में लोकतंत्र जैसा कुछ नहीं बचा है।” मतलब, जिस सरकार ने तुम्हें कैमरे पर बिठाकर तुम्हारी टीआरपी (TRP) आसमान पर पहुंचाई, तुम उसी सरकार को विदेशी एजेंडे के साथ मिलकर ‘तानाशाह’ और ‘अवैध’ साबित करने में लग गईं! इसे कहते हैं पीठ में सीधा खंजर घोंपना।

और अगर आपको लग रहा है की अपनों को दर्द देने का सिलसिला सिर्फ यहीं तक है, तो जेपी नड्डा जी से जुड़ा एक ऐसा कड़वा फैक्ट सुन लीजिए जो आपके होश उड़ा देगा।

आपको याद है ना की कैसे हर साल दिवाली आते ही सुप्रीम कोर्ट में पटाखों पर बैन लगाने के लिए कुछ विदेशी फंडिंग वाले NGO अपनी पीआईएल (PIL) लेकर खड़े हो जाते हैं? जिससे करोड़ों सनातनियों की भावनाएं आहत होती हैं।

आपको जानकर भयंकर हैरानी होगी की जिस NGO की याचिका के आधार पर ये पटाखा बैन वाला रायता फैलाया गया था, उसकी ‘गवर्निंग बॉडी’ में और कोई नहीं, बल्कि खुद स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा जी की धर्मपत्नी डॉ. मल्लिका नड्डा शामिल थीं!

मतलब ये कैसा न्याय है भाई? एक तरफ आपके अपने ही कोर वोटर के सबसे बड़े त्योहार पर बैन लगाने वाले तंत्र में आपके परिवार के लोग बैठे हैं, और दूसरी तरफ आप हिंदू-विरोधी नैरेटिव चलाने वालों को इंटरव्यू दे रहे हैं?!

अपनों के त्योहार बैन और दुश्मनों को इनाम! क्या इसी दिन के लिए आम वोटर ने आपको पूर्ण बहुमत का ताज पहनाया था?

पीठ में छुरा: जिस सरकार ने तुम्हें कैमरे पर बिठाकर TRP आसमान पर पहुंचाई, तुम उसी को तानाशाह साबित करने में लग गईं।

8. JNU में जाकर ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के साथ खड़ी हुई थी बॉलीवुड हीरोइन

उसी को स्वास्थ्य मंत्रालय ने बना दिया अपना सरकारी ब्रांड एंबेसडर

अगर आपको लगता है की बात सिर्फ इंस्टाग्राम के इन्फ्लुएंसर्स तक सीमित है, तो अगला उदाहरण आपकी सहनशक्ति का असली इम्तिहान लेगा।

ये किस्सा है हमारी सरकार की उस तुष्टिकरण नीति का, जहाँ विचारधारा और राष्ट्रवाद को ताक पर रखकर एक बॉलीवुड हीरोइन को एम्बेसडर बना दिया गया।

बात 10 अक्टूबर 2025 (World Mental Health Day) की है, जब हमारे देश के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा जी ने कैमरे के सामने बहुत ही चौड़ी मुस्कान के साथ दीपिका पादुकोण को भारत का पहला ‘मेंटल हेल्थ एम्बेसडर’ (Mental Health Ambassador) घोषित कर दिया।

दोनों की मुस्कुराती हुई तस्वीरें सोशल मीडिया पर छा गईं।

ये तस्वीरें देखकर हर उस इंसान का खून खौल उठा, जिसे थोड़ा सा भी इतिहास याद है। ये वही दीपिका पादुकोण हैं जो जेएनयू (JNU) में उस ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग के समर्थन में सरेआम जाकर खड़ी हुई थीं, जिनके नारों से पूरा देश गुस्से से लाल हो गया था।

ये वही मोहतरमा हैं जो भारत में ‘माय बॉडी माय चॉइस’ जैसे वोक (Woke) कल्चर और अर्बन-नक्सल एजेंडे को हवा देती हैं।

और तो और, 2020 का वो वाकया देश अभी भूला नहीं है जब इनकी अपनी मैनेजर के साथ वाट्सऐप चैट पूरे नेशनल टीवी पर फ्लैश हो रही थी- “माल (ड्रग्स) है क्या?”

जो हस्ती खुद इतने भयंकर विवादों में घिरी हो, जिसका पूरा का पूरा पीआर सिस्टम वामपंथी ईकोसिस्टम से चलता हो, उसे देश का स्वास्थ्य मंत्री अपना ब्रांड एम्बेसडर बना रहा है!

लेकिन सवाल ये है की ऐसा क्यों किया गया? इसके पीछे का असली खेल क्या है?

इस खेल को समझने के लिए आपको अमेरिकी पत्रकार ईथेन वॉटर्स (Ethan Watters) की एक मशहूर किताब ‘क्रेज़ी लाइक अस’ (Crazy Like Us) के पन्ने पलटने होंगे।

इस किताब में एक बहुत ही खौफनाक सच बताया गया है की कैसे विदेशी दवा कंपनियों (Big Pharma) ने 90 के दशक में जापान के अंदर डिप्रेशन की मार्केटिंग की थी।

जापानियों को बताया गया की डिप्रेशन कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक ‘ग्लैमरस और कूल’ चीज़ है। बड़ी-बड़ी जापानी हीरोइनों से इंटरव्यू करवाए गए। नतीजा? 10 साल के अंदर जापान में मानसिक रोगों की विदेशी दवाओं की बिक्री 400 प्रतिशत बढ़ गई!

बिल्कुल वही विदेशी ‘डिप्रेशन सिंडिकेट’ आज भारत में लागू किया जा रहा है। 2015 से दीपिका पादुकोण से लेकर करण जौहर और अनुष्का शर्मा तक, पूरे बॉलीवुड ने डिप्रेशन को एक ‘कूल फैशन’ बना दिया है।

आज हर दूसरे कॉलेज के बच्चे को लगता है की “मुझे पैनिक अटैक आ रहा है, मुझे एंग्जायटी है।” और इसके पीछे कौन हंस रहा है? वो विदेशी दवा कंपनियां, जिनका भारत में मानसिक रोगों की दवाओं का बाज़ार आज 200 करोड़ रुपये का हो चुका है और हर साल 30% की रफ़्तार से बढ़ रहा है।

मोदी सरकार ने कोविड महामारी के दौरान फाइजर (Pfizer) और मॉडर्ना जैसी घमंडी विदेशी कंपनियों के आगे घुटने नहीं टेके थे। उन्होंने अपनी स्वदेशी कंपनियों को बढ़ावा देकर इस ‘बिग फार्मा’ का धंधा चौपट कर दिया था। लेकिन आज क्या हो रहा है?

आज हमारे ही स्वास्थ्य मंत्री उसी विदेशी ‘बिग फार्मा’ के वोक एजेंडे की पोस्टर गर्ल को अपने बगल में बिठाकर सरकारी सर्टिफिकेट बांट रहे हैं।

क्या नड्डा जी को सच में नहीं पता की वो किस खतरनाक विदेशी सिंडिकेट के एजेंडे को हवा दे रहे हैं? या फिर बॉलीवुड के ग्लैमर के आगे विचारधारा ने अपने घुटने टेक दिए हैं?

9. अपनों का मोहभंग और ज़मीनी कार्यकर्ता की पसरती हुई खामोशी

सबका साथ-सबका विकास के चक्कर में अपनों का विनाश कर रही BJP

दिल्ली बड़े-बड़े मंत्रालयों और पावर कॉरिडोर्स में बैठे रणनीतिकारों को शायद ये गलतफहमी हो गई है की चुनाव ‘ब्रांड मोदी’ के जादू या फिर टीवी चैनलों पर चलने वाले विज्ञापनों से जीते जाते हैं।

ये उनकी सबसे बड़ी भूल है। कोई भी चुनाव, दुनिया की कोई भी पीआर एजेंसी नहीं जिता सकती। चुनाव जिताता है ज़मीन पर बैठा वो मामूली सा कार्यकर्ता, जो सुबह 6 बजे उठकर मोहल्ले की पर्चियां बांटता है। जो नुक्कड़ की चाय की दुकान पर विपक्ष के दस लोगों से अकेला भिड़ जाता है।

लेकिन आज उस कार्यकर्ता के मन में क्या चल रहा है? आज वो कार्यकर्ता एक गहरे अवसाद और मोहभंग के दौर से गुज़र रहा है।

वो देख रहा है की जिन वामपंथियों और लिबरल इकोसिस्टम को हराने के लिए उसने अपना खून पसीना एक किया, आज उसी इकोसिस्टम के लोग सत्ता की मलाई काट रहे हैं।

उसे समझ आ गया है की अगर वो पार्टी के लिए लड़ते हुए किसी कानूनी पचड़े में फंसा, तो कोई उसकी ज़मानत कराने नहीं आएगा। लेकिन अगर कोई अर्बन-नक्सल सड़क पर बवाल काटेगा, तो उसे पुलिस चाय-समोसे खिलाएगी और सरकारी बस से घर छोड़कर आएगी।

इस हताशा का सबसे खौफनाक नतीजा होता है- ‘साइलेंट वोटर की खामोशी’। जब वो आम कोर वोटर (Core Voter) बोलना बंद कर देता है, जब वो सोशल मीडिया पर आपकी नीतियों को डिफेंड करना छोड़ देता है, तो समझ लीजिए की खतरे की घंटी बज चुकी है।

ये वोटर सड़क पर आकर टायर नहीं जलाता, ये बसों में आग नहीं लगाता। ये बहुत शांति से अपना बदला लेता है। ये चुनाव के दिन घर से निकलता ही नहीं है। या फिर पोलिंग बूथ पर जाकर चुपचाप नोटा (NOTA) का बटन दबा आता है।

सत्ता के इको-चैंबर में बैठे नेताओं को लगता है की “अरे, ट्विटर पर तो ट्रेंड चल रहा है, सब चंगा है।” लेकिन ज़मीन पर पसरता हुआ ये सन्नाटा उस तूफान की आहट होता है, जो बड़े-बड़े राजनीतिक साम्राज्यों को ताश के पत्तों की तरह ढहा देता है।

आप ‘सबका साथ, सबका विकास’ का कितना भी ढोल पीट लीजिए, लेकिन जब आपके अपने ही लोग इस नारे को ‘अपनों का विनाश और विरोधियों का विकास’ के रूप में देखने लगें, तो कोई भी चाणक्य-नीति आपको बचा नहीं सकती।

खतरे की घंटी: जब कोर वोटर बोलना बंद कर देता है और चुपचाप NOTA दबाता है, तो समझ लीजिए साम्राज्य अंदर से ढहने लगा है।

10. अंत की शुरुआत या सुधार का वक्त

जो सरकारी दाल-चावल खाकर वोट नहीं देंगे, उनके लिए अपना घर जलाना सत्ता को भारी पड़ेगा

सियासत का सबसे निर्मम और कड़वा सच ये है की विचारधारा की लड़ाई में कोई ‘ग्रे एरिया’ (Grey area) नहीं होता। आप एक ही वक्त पर संघ का झंडा उठाकर वामपंथियों से सर्टिफिकेट नहीं मांग सकते। आपको चुनना पड़ता है की आप किसके साथ खड़े हैं।

आज बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व जिस ‘लिबरल वैलिडेशन’ (Liberal Validation) की अंधी दौड़ में भाग रहा है, वो एक ऐसा मृगतृष्णा (Mirage) है, जो कभी हासिल नहीं होने वाला।

आप ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को कितने ही करोड़ के फुल-पेज विज्ञापन दे दीजिए, आप उनके ‘अड्डा’ में जाकर कितने ही बौद्धिक प्रवचन दे दीजिए… जिस दिन उन्हें मौका मिलेगा, वो उसी सरकारी पैसे से छपी स्याही से आपके खिलाफ एक नया ‘फर्जी नैरेटिव’ सेट कर देंगे।

आप करिश्मा मेहता जैसों को कितने ही एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दे दीजिए, कल को जब कोई विदेशी टूलकिट एक्टिव होगा, तो वो सबसे पहले बीबीसी की लिंक शेयर करके आपको ही ‘तानाशाह’ साबित करेंगे।

आप वामपंथी प्रदर्शनकारियों को रोटी और दाल-चावल खिला लीजिए, वो डकार मारते ही आपको ‘फासीवादी’ का तमगा पहना देंगे। ये लोग आपको कभी वोट नहीं देंगे। लिख कर रख लीजिए। कभी नहीं! इनका वैचारिक डीएनए (DNA) ही आपके वजूद के खिलाफ बना है।

तो फिर सवाल ये उठता है की जो आपको कभी वोट नहीं देने वाले, उनके लिए आप अपना खुद का घर क्यों जला रहे हैं?

आप क्यों उस आदमी के मुंह से निवाला छीनकर अपने दुश्मनों को खिला रहे हैं, जो कल भी आपके साथ खड़ा था और आज भी आपके नाम पर गालियां खा रहा है?

अगर सत्ता के अहंकार में चूर इस सिस्टम को लगता है की वो अपनों को लावारिस छोड़कर, डरा-धमका कर या ब्लैकमेल करके हमेशा सत्ता में बने रह सकते हैं, तो उन्हें इतिहास के पन्ने पलट कर देख लेने चाहिए।

जब भी किसी राजा ने अपने वफादार सैनिकों को अपमानित कर दुश्मन खेमे के लोगों को दरबार में मंत्री बनाया है, उस राजा का पतन बाहर के आक्रमण से नहीं, बल्कि अंदर की बगावत और निराशा से हुआ है।

बीजेपी के लिए ये अंत की शुरुआत है या सुधार का आखिरी मौका, ये तो वक्त बताएगा। लेकिन एक बात पत्थर की लकीर है- राजनीति में जो पार्टी अपने दोस्तों और दुश्मनों में फर्क करना भूल जाती है, जनता बहुत जल्द उस पार्टी को उसकी सही हैसियत याद दिला देती है।

वक्त रहते अपनी चाणक्य-नीति की दिशा नहीं बदली गई, तो ये गलत दांव वो नासूर बन जाएगा, जिसका कोई इलाज किसी भी ‘पॉलिटिकल डॉक्टर’ के पास नहीं मिलेगा।

अंतिम चेतावनी: जो पार्टी अपने दोस्तों और दुश्मनों में फर्क करना भूल जाती है, जनता बहुत जल्द उस पार्टी को उसकी सही हैसियत याद दिला देती है।

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