बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 11: 1960 में कांग्रेस का देश तोड़ने वाले जिन्ना की विचारधारा से जन्मी IUML के साथ सरकार बनाने का वो ब्लंडर, केरल में मुसलमानों का अलग देश मांगने वालों से इस यारी ने कैसे हर सच्चे देशभक्त को जोड़ दिया बीजेपी के साथ

🤔 शुरू करने से पहले सोचें:

लोग अक्सर पूछते हैं कि बीजेपी चुनाव दर चुनाव कैसे जीतती जा रही है। क्या आपके पास इसका कोई जवाब है? नीचे पढ़ते हुए अपने विचार नोट करते रहें।

साल (Year) ऐतिहासिक घटना कांग्रेस का ‘सेल्फ-गोल’
1948 मद्रास में जिन्ना के वारिसों ने IUML बनाई सरदार पटेल की ‘पाकिस्तान जाओ’ चेतावनी को कांग्रेस ने अनसुना किया
1955 मुस्लिम लीग ने अलग ‘मोपलिस्तान’ देश मांगा कांग्रेस ने इस अलगाववादी मांग पर शर्मनाक चुप्पी साधे रखी
1960 केरल में सत्ता हासिल करने की राजनीतिक होड़ कांग्रेस ने देश तोड़ने वाली लीग से गठबंधन कर उसे वैधता दे दी
1969 मुस्लिम लीग का ब्लैकमेलिंग और दबाव बढ़ा कांग्रेस ने घुटने टेककर धर्म के आधार पर ‘मल्लपुरम’ ज़िला बना डाला

💡 टाइमलाइन से सीख:

यह सिर्फ चार साल नहीं हैं। ये वो साल हैं जब कांग्रेस ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी।

1. मोहम्मद अली जिन्ना की ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ और 1947 का खूनी बंटवारा

📖 पढ़ते हुए सोचें:

1947 के बंटवारे के बाद जनता क्या उम्मीद कर रही थी और कांग्रेस ने क्या किया?

आज़ादी के तुरंत बाद कांग्रेस का विश्वासघात जिसने बो दिए थे बीजेपी की जीत के बीज

🔍 ध्यान दें:

नाम में ‘इंडियन’ जोड़ देने से क्या विचारधारा बदल जाती है?

इस पूरे खेल को गहराई से समझने के लिए आपको थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। आपको उस दौर की साइकोलॉजी समझनी होगी जब 1947 का खूनी बंटवारा हुआ था।

मोहम्मद अली जिन्ना की ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ ने अपने अलग पाकिस्तान की मांग मनवाने के लिए पूरे देश में धर्म के नाम पर हिन्दुओं के खिलाफ खून खराबा कर दिया था, जिसके दबाव में ही देश को दो भागों में बांटना पड़ा।

बंटवारा कोई इतिहास की किताब का कोरा पन्ना नहीं था भाई! वो एक ऐसा ज़िंदा और धड़कता हुआ दर्द था जिसने इस देश की रूह को बुरी तरह छलनी कर दिया था।

ज़रा सोचिए उस मंज़र के बारे में! पंजाब और बंगाल के रास्ते आने वाली ट्रेनें जब स्टेशन पर रुकती थीं, तो वो खचाखच भर कर तो आती थीं, लेकिन उनमें ज़िंदा इंसान नहीं होते थे, बल्कि हिन्दुओं की कटी हुई लाशें और खून से सने हुए डिब्बे होते थे।

बीस लाख से ज़्यादा बेगुनाह लोग मारे गए थे यार। करोड़ों लोग जो कल तक अपने घरों में सुकून से सोते थे, वो रातों-रात अपनी ही ज़मीन पर रिफ्यूजी बन गए।

उस भयंकर त्रासदी के वक्त देश के हर आम नागरिक, हर हिंदू और हर राष्ट्रवादी के सीने में बस एक ही आग जल रही थी।

वो आग ये थी की जिस ‘मुस्लिम लीग’ ने धर्म के नाम पर हमारे सीने पर खंजर घोंपा, जिसने हमारे देश के दो टुकड़े कर दिए, अब कम से कम इस आज़ाद भारत में उस लीग का नामोनिशान तक नहीं बचना चाहिए।

देश चाहता था की जिन्ना की उस ज़हरीली और अलगाववादी विचारधारा को हमेशा के लिए ज़मीन में गहरा गाड़ दिया जाए। और इस काम को पूरा करने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी थी उस वक्त की सत्ताधारी पार्टी यानी कांग्रेस की।

क्योंकि जनता ने आज़ादी के नाम पर उन्हें सर-आंखों पर बिठाया था। लेकिन कांग्रेस ने क्या किया? उन्होंने एक ऐसा ऐतिहासिक विश्वासघात किया जिसने पूरे देश की उम्मीदों को सन्न कर दिया।

2. जिन्ना की मुस्लिम लीग का पुनर्जन्म

🦁 पटेल की बात:

अगर उस समय पटेल की चेतावनी मान ली जाती, तो क्या आज का माहौल अलग होता?

1948 में मद्रास के अंदर कैसे रची गई इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग यानी IUML की नींव

⚠️ मोपलिस्तान:

यह मांग कितनी खतरनाक थी? क्या आप इसे सिर्फ राजनीतिक मांग मानते हैं?

अब एक आम हिंदुस्तानी के नज़रिए से सोचिए। 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान बन गया, तो इस देश की भोली-भाली जनता को लगा था की चलो भाई, जिस जिन्ना और उसकी ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ ने देश में आग लगाई थी, वो बला अब हमेशा के लिए सरहद के उस पार चली गई है।

लोगों को लगा की जो मुसलमान पाकिस्तान जाना चाहते थे वो चले गए, और जो भारत में रुक गए हैं, उन्होंने उस मुस्लिम लीग वाली अलगाववादी सोच को हमेशा के लिए दफना दिया है।

लेकिन पब्लिक कितनी गलत थी यार! पर्दे के पीछे एक ऐसा खौफनाक खेल चल रहा था जिसकी भनक तक आम आदमी को नहीं लगने दी गई।

तारीख थी 10 मार्च 1948… बंटवारे के खूनी मंज़र को अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ था। उसी वक्त दक्षिण भारत में, मद्रास (चेन्नई) के मशहूर ‘राजाजी हॉल’ के अंदर एक बहुत ही सीक्रेट और हाई-प्रोफाइल मीटिंग बुलाई गई।

ये मीटिंग कोई आम राजनीतिक चर्चा नहीं थी भाई। इस हॉल में वो सारे नेता इकट्ठा हुए थे जो आज़ादी से पहले ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के कट्टर सिपाही हुआ करते थे और जो किसी वजह से पाकिस्तान नहीं जा पाए थे।

कायदे से तो इन लोगों को शर्मिंदगी के मारे राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए था या फिर अपनी पार्टी को भंग करके हिंदुस्तान के आम लोकतंत्र का हिस्सा बन जाना चाहिए था।

लेकिन नहीं! इन्होंने एक नई चाल चली। मद्रास के उस राजाजी हॉल में जिन्ना की उस पुरानी और खूनी मुस्लिम लीग को दफनाने के बजाय, उसे एक नया चोला पहना दिया गया।

उन्होंने पार्टी के नाम के आगे सिर्फ एक शब्द चिपका दिया- ‘इंडियन यूनियन’, और रातों-रात पैदा हो गई ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML)।

ज़रा इनका पाखंड देखिए! नाम में ‘इंडियन’ लगा देने से क्या खून में बसा हुआ जिन्ना का ज़हर खत्म हो जाएगा? इनकी पार्टी का हरा झंडा बिल्कुल वही था।

इनका चांद-तारे वाला चुनाव चिन्ह बिल्कुल वही था। इनकी वो सांप्रदायिक सोच भी बिल्कुल वही थी। बस इन्होंने अपनी उस ज़हरीली बोतल पर एक नया ‘सेक्युलर’ लेबल चिपका दिया था।

और इस पूरी नई दुकान का पहला अध्यक्ष किसे बनाया गया? ये नाम सुनकर ही आपका खून खौल जाएगा! इस पार्टी का बॉस बना ‘मोहम्मद इस्माइल खान’।

अब ये मोहम्मद इस्माइल कौन था, ये जानना आपके लिए बहुत ज़रूरी है। ये इस्माइल आज़ादी से पहले मद्रास प्रेसीडेंसी में जिन्ना का सबसे वफादार और सबसे खूंखार सिपहसालार था।

जब पूरे देश में पाकिस्तान बनाने की मांग चल रही थी, तो दक्षिण भारत में इसी मोहम्मद इस्माइल ने डंके की चोट पर उस बंटवारे का समर्थन किया था।

ये वही आदमी था जो कहता था की मुसलमानों के लिए एक अलग इस्लामी मुल्क होना ही चाहिए।

अब आप खुद सोचिए! जो आदमी कल तक जिन्ना के पैरों में बैठकर पाकिस्तान मांग रहा था, वो आदमी अचानक 1948 में ‘भारत का वफादार’ कैसे हो गया?

जिस इंसान ने भारत माता के टुकड़े करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, उसे आज़ाद भारत में एक नई राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने की खुली छूट कैसे मिल गई?

ये तो सीधे-सीधे उस ज़हरीले सांप को दूध पिलाने वाली बात थी जो मौका मिलते ही दोबारा डसने वाला था।

आधार ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (1947 से पहले) IUML (1948 के बाद)
प्रमुख चेहरा मोहम्मद अली जिन्ना (पाकिस्तान का संस्थापक) मोहम्मद इस्माइल (मद्रास में जिन्ना का दायां हाथ)
अलगाववादी मांग धर्म के आधार पर मुसलमानों के लिए ‘पाकिस्तान’ केरल के मोपला मुसलमानों के लिए अलग ‘मोपलिस्तान’
पार्टी का झंडा चांद-तारे वाला हरा झंडा बिल्कुल वही पुराना हरा झंडा (सिर्फ ‘इंडियन’ नाम जोड़ा)

3. दो नावों में पैर रखने वालों को सरदार पटेल की खुली चेतावनी

🩸 1921 का इतिहास:

मोपला विद्रोह को ‘किसानों का आंदोलन’ बताने की कोशिश क्यों की गई?

जिसे नेहरू और कांग्रेस के दरबारियों ने घमंड में कर दिया दरकिनार

⚡ 1960 का ब्लंडर:

सत्ता के लिए कांग्रेस ने किन उसूलों को छोड़ दिया?

अब सवाल ये उठता है की जब मद्रास में सरेआम जिन्ना की इस नई लीग (IUML) की नींव रखी जा रही थी, तब दिल्ली में बैठी कांग्रेस सरकार क्या कर रही थी? क्या किसी का खून नहीं खौला? क्या किसी ने इन्हें रोकने की कोशिश नहीं की?

सच कहूं तो उस वक्त कांग्रेस के अंदर एक ऐसा लोहे का शेर मौजूद था, जिसकी दहाड़ से इन जिन्ना प्रेमियों की पैंट गीली हो जाती थी।

वो थे हमारे देश के पहले गृह मंत्री, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल!

सरदार पटेल कोई हवा-हवाई बातें करने वाले लुटियंस के एलीट नेता नहीं थे। वो ज़मीन से जुड़े हुए आदमी थे और वो इन कट्टरपंथियों की नीयत को शीशे की तरह आर-पार देख सकते थे।

पटेल साहब को साफ दिख रहा था की ये IUML कोई नई पार्टी नहीं है, बल्कि उसी पुरानी जिन्ना वाली लीग का नया संस्करण है जो आगे चलकर फिर से भारत के लिए नासूर बनेगा।

सरदार पटेल ने संविधान सभा (Constituent Assembly) और अपनी कई पब्लिक रैलियों में इन मुस्लिम लीग के बचे हुए नेताओं को ऐसी ज़ोरदार लताड़ लगाई थी की अच्छे-अच्छों के पसीने छूट गए थे।

पटेल ने एकदम डंके की चोट पर खुली चेतावनी देते हुए कहा था-

“मुस्लिम लीग ने इस देश को बहुत भयंकर नुकसान पहुंचाया है। जो लोग अब भी दो नावों में पैर रखकर सवारी करना चाहते हैं, उनके लिए इस हिंदुस्तान में कोई जगह नहीं है। जिनके दिलों में अब भी मुस्लिम लीग की वो पुरानी अलगाववादी सोच ज़िंदा है, उनके लिए पाकिस्तान के दरवाज़े आज भी खुले हैं, वो वहां जा सकते हैं।”

वाह! क्या बात कही थी पटेल साहब ने! अगर उस वक्त पटेल की इस बात को पत्थर की लकीर मान लिया जाता, तो आज देश में ये तुष्टिकरण का रायता फैलता ही नहीं।

पटेल का विज़न एकदम क्लियर था की आज़ाद भारत में किसी भी ऐसी पार्टी या विचारधारा के लिए रत्ती भर भी जगह नहीं होनी चाहिए, जिसका नाता जिन्ना या बंटवारे से रहा हो।

लेकिन अफ़सोस! दिल्ली में बैठे पंडित नेहरू और कांग्रेस के उन एलीट दरबारियों को सरदार पटेल की ये कड़क बातें बिल्कुल रास नहीं आई।

कांग्रेस का वो लुटियंस इकोसिस्टम एक झूठे सेक्युलरिज्म के नशे में चूर था। उन्हें लगता था की पटेल तो बहुत ‘हार्डलाइनर’ (Hardliner) हैं।

नेहरू और उनके दरबारियों के मन में कहीं ना कहीं भविष्य के वोटबैंक का वो लालच पनपने लगा था। उन्हें दिख रहा था की अगर हम इन मुस्लिम लीग के नेताओं पर बैन लगा देंगे या इन्हें पूरी तरह खत्म कर देंगे, तो भविष्य में मुसलमानों का थोक वोट हमें कैसे मिलेगा?

बस इसी वोटबैंक की गंदी लालसा के चलते कांग्रेस के आलाकमान ने सरदार पटेल की उस गंभीर चेतावनी को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया।

पटेल की बातों को अनसुना करके कांग्रेस ने मोहम्मद इस्माइल और उसकी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) को भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में पनपने की खामोश मंज़ूरी दे दी।

ये कांग्रेस की वो ऐतिहासिक भूल थी, जिसे हम राजनीतिक आत्महत्या भी कह सकते हैं। इन्होंने एक ऐसे अलगाववादी वायरस को ज़िंदा छोड़ दिया जिसे 1947 में ही कुचल दिया जाना चाहिए था।

और मज़ाक देखिए, कांग्रेस के इसी इकोसिस्टम को लगता था की वो इस ‘लीग’ को अपने इशारों पर नचाएंगे।

लेकिन उन्हें अंदाज़ा ही नहीं था की ये वायरस अगले कुछ ही सालों में केरल के अंदर एक ऐसा खौफनाक रूप लेने वाला था, जिसकी मांगें सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

4. हिन्दुओं से अलग नस्ल और अरबों के वंशज होने का अजीबोगरीब दावा

🏛️ वैधता:

एक गठबंधन कैसे किसी पार्टी को मुख्यधारा में ला देता है?

IUML ने मालाबार में अलग मुस्लिम देश ‘मोपलिस्तान’ की रखी मांग

📍 मल्लपुरम:

धर्म के आधार पर जिला बनाने का क्या मतलब था?

आप ज़रा इन लोगों की हिम्मत और दुस्साहस का लेवल देखिए! 1947 में जिन्ना ने धर्म के नाम पर देश के दो टुकड़े करवा दिए।

भारत की धरती अभी उस बंटवारे के खून और लाशों की गंध से आज़ाद भी नहीं हुई थी की दक्षिण भारत के केरल में एक और नए ‘बंटवारे’ की ज़हरीली पटकथा लिखी जाने लगी।

कांग्रेस के दरबारियों ने जिस इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) को भारत में पनपने की खामोश मंज़ूरी दी थी, उस आस्तीन के सांप ने अपना असली फन निकालना शुरू कर दिया था।

मोहम्मद इस्माइल और उसकी इस मुस्लिम लीग की नज़रें केरल के मालाबार इलाके पर गड़ गई थीं। मालाबार वो इलाका था जहां ‘मोपला’ मुसलमानों की एक बहुत बड़ी और घनी आबादी रहती थी।

इस मुस्लिम लीग ने सीधे तौर पर यह खौफनाक मांग रख दी की भारत के अंदर इस मालाबार इलाके को काटकर मुसलमानों के लिए एक अलग स्वायत्त (Autonomous) राज्य या एक अलग मुल्क बना दिया जाए..

जिसे इन्होंने नाम दिया- ‘मोपलिस्तान’ (Moplastan)!

अब आप सोचेंगे की भला आज़ाद भारत के अंदर, वो भी केरल जैसे राज्य में एक अलग मुस्लिम देश मांगने की हिम्मत इनमें कहां से आई?

इसके पीछे मोहम्मद इस्माइल और लीग के नेताओं ने जो ज़हरीला तर्क दिया था, वो सीधे तौर पर इनकी घमंडी और नस्लवादी सोच को नंगा करता है।

इन कट्टरपंथियों ने डंके की चोट पर कहा की मालाबार के मोपला मुसलमान कोई आम हिंदुस्तानी नहीं हैं। इन्होंने दावा किया की वो तो अरबों (Arabs) के वंशज हैं!

उनका तर्क था की चूंकि हमारे पूर्वज अरब से आए थे, इसलिए हमारी नस्ल, हमारा खून, हमारी संस्कृति और हमारा रहन-सहन यहां के मूल हिंदुओं से बिल्कुल अलग है।

इस्माइल का साफ कहना था की हमारे तौर-तरीके हिंदुओं से मेल नहीं खाते, इसलिए मोपला मुसलमान किसी हिंदू-बहुल सिस्टम या सरकार के अधीन नहीं रह सकते।

ज़रा सोचिए भाईसाहब! ये किस दर्जे का घमंड और अलगाववाद था? जो लोग पीढ़ियों से भारत का नमक खा रहे थे, केरल की हवा में सांस ले रहे थे, वो अचानक खुद को अरब का वारिस बताने लगे ताकि उन्हें एक और नया ‘पाकिस्तान’ (मोपलिस्तान) मिल सके।

ये वही जिन्ना वाली टू-नेशन थ्योरी (Two-Nation Theory) थी, जिसे अब दक्षिण भारत में एक नया चोला पहनाकर बेचा जा रहा था। और ताज्जुब की बात ये है की दिल्ली में बैठी वो ‘सेक्युलर’ कांग्रेस इन खतरनाक मंसूबों पर पूरी तरह से आंखें मूंदे बैठी थी!

IUML का ज़हरीला दावा असल हकीकत
मोपला मुसलमान आम हिन्दुओं से अलग हैं इन पर जिन्ना की ‘टू-नेशन थ्योरी’ का भूत सवार था
हम ‘अरबों’ (Arabs) के वंशज हैं खुद को हिन्दुओं से श्रेष्ठ बताने का नस्लवादी घमंड
हमें अलग ‘मोपलिस्तान’ देश चाहिए राज्य पुनर्गठन आयोग (1955) ने इस मांग को कूड़े में डाल दिया
1921 का विद्रोह ‘आज़ादी की लड़ाई’ थी वो हज़ारों हिन्दुओं के नरसंहार का खूंखार जिहाद था
हमें लोकतंत्र में पूरा भरोसा है असली मकसद भारत में एक ‘मिनी-पाकिस्तान’ बनाना था

5. 1921 के भयंकर हिन्दू नरसंहार की राख से उठी एक और बंटवारे की मांग

🚩 आज का वायनाड:

पुरानी गलती आज भी कैसे दोहराई जा रही है?

राज्य पुनर्गठन आयोग के सामने पेश किए गए अलगाववादी तर्क

✍️ अब आपकी बारी:

इस पूरे इतिहास को पढ़ने के बाद आप क्या निष्कर्ष निकालते हैं?

मालाबार और मोपलिस्तान की इस साज़िश को आप तब तक नहीं समझ सकते, जब तक आप 1921 के उस भयानक काले इतिहास को नहीं जानेंगे जिसे वामपंथी इतिहासकारों ने हमेशा छिपाने की कोशिश की है।

1921 में इसी मालाबार इलाके में मोपला मुसलमानों ने हिंदुओं का एक ऐसा बर्बर नरसंहार किया था, जिसे सुनकर आज भी रूह कांप जाती है।

वामपंथी और कांग्रेसी इसे ‘किसानों का विद्रोह’ या ‘आज़ादी की लड़ाई’ बताते हैं, लेकिन हकीकत में वो एक भयंकर जिहाद था।

हज़ारों बेगुनाह हिंदुओं को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि वो काफिर थे। सैकड़ों मंदिरों को तोड़कर ज़मींदोज़ कर दिया गया, महिलाओं के साथ वो दरिंदगी हुई जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता..

और हज़ारों हिंदुओं का तलवार की नोक पर ज़बरन धर्मांतरण करवाया गया। 1921 के उस मोपला नरसंहार का इकलौता मकसद वहां एक ‘इस्लामी खिलाफत’ की स्थापना करना था।

और अब 1950 के दशक में, उसी खूनी नरसंहार की राख से मुस्लिम लीग ने ‘मोपलिस्तान’ की इस नई अलगाववादी मांग को खड़ा कर दिया था।

ये लोग उसी खौफनाक इतिहास को दोहराना चाहते थे। इस बार इन्होंने हथियार की जगह कागज़ और कानून का सहारा लिया।

1955 में जब भारत सरकार ने राज्यों की सीमाएं तय करने के लिए ‘राज्य पुनर्गठन आयोग’ (States Reorganisation Commission – SRC) का गठन किया, तो ये मुस्लिम लीग वाले पूरी ढिठाई के साथ आयोग के सामने पहुंच गए।

इन्होंने SRC के सामने बाकायदा अपना ज्ञापन (Memorandum) सौंपा और कहा की मालाबार को मद्रास राज्य से अलग करके एक मुस्लिम-बहुल प्रांत बना दिया जाए।

इन्होंने मांग की कि मालाबार, लक्षद्वीप और आस-पास के मुस्लिम इलाकों को मिलाकर एक ऐसा राज्य बने जहां सिर्फ मुसलमानों का वर्चस्व हो।

भाई, अगर कोई भी राष्ट्रभक्त या कड़क सरकार होती ना, तो ऐसे अलगाववादी मांग करने वालों को उसी दिन कॉलर से पकड़कर जेल की काल कोठरी में डाल देती। उन पर देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया जाता।

लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की उस वक्त की सत्ताधारी कांग्रेस ने इन पर कोई एक्शन नहीं लिया। कांग्रेस का वो इकोसिस्टम जो खुद को महात्मा गांधी का वारिस बताता था, वो इन देश तोड़ने वालों के सामने एकदम भीगी बिल्ली बना रहा।

कांग्रेस की इसी कायरता और खामोशी ने आम राष्ट्रवादियों के मन में ये बात गहराई से बैठा दी की ये पार्टी सत्ता और वोटबैंक के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर सकती है।

1955 में भले ही राज्य पुनर्गठन आयोग ने इनकी मोपलिस्तान की मांग को दरकिनार कर दिया हो, लेकिन मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच पनप रही ये नूरा-कुश्ती अभी खत्म नहीं हुई थी।

इसका सबसे वीभत्स और घिनौना रूप तो 1960 में सामने आने वाला था, जब कांग्रेस ने शेरवानी पहन कर सरेआम इसी मुस्लिम लीग के साथ राजनीतिक शादी रचा ली!

6. सत्ता की भूख में अंधी कांग्रेस का 1960 का वो ब्लंडर

जब देश तोड़ने वाली मुस्लिम लीग से ही कर लिया गठबंधन

अब तक की कहानी में आपने देखा की कैसे मुस्लिम लीग के बचे हुए लोगों ने मद्रास में IUML बनाई और फिर बेशर्मी से केरल के मालाबार में एक अलग देश ‘मोपलिस्तान’ की मांग कर डाली।

एक आम हिंदुस्तानी यही सोचेगा की ऐसी देशद्रोही और अलगाववादी मांग के बाद तो कम से कम कांग्रेस पार्टी इन कट्टरपंथियों को अपनी परछाईं तक नहीं छूने देगी। लेकिन राजनीति के इस गंदे खेल में जब सत्ता की भूख सिर पर सवार होती है, तो बड़े-बड़े उसूलों को कूड़ेदान में डाल दिया जाता है।

इस भयंकर ब्लंडर को समझने के लिए हमें केरल की राजनीति के 1957 से लेकर 1960 तक के उस घटनाक्रम को समझना होगा, जिसने भारतीय राजनीति में तुष्टिकरण का सबसे गंदा अध्याय लिखा।

हुआ यूं की 1957 में केरल के अंदर विधानसभा चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस का वो सारा घमंड चूर-चूर हो गया, क्योंकि केरल की जनता ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया और वहां ईएमएस नंबूदरीपाद (EMS Namboodiripad) के नेतृत्व में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार बन गई।

अब भाई, दिल्ली में बैठी कांग्रेस और पंडित नेहरू को ये बात बिल्कुल हज़म नहीं हो रही थी। उन्हें लगता था की पूरे भारत पर राज करना सिर्फ कांग्रेस का जन्मसिद्ध अधिकार है।

कम्युनिस्टों को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस ने 1959 में केरल के अंदर एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया, जिसे इतिहास में ‘विमोचना समरम’ (Vimochana Samaram) या लिबरेशन स्ट्रगल कहा जाता है।

कांग्रेस ने इस आंदोलन में हर उस ताकत को अपने साथ मिला लिया जो कम्युनिस्टों के खिलाफ थी- चाहे वो चर्च हो, नायर सर्विस सोसाइटी हो, या फिर वही अलगाववादी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML)।

अंततः नेहरू सरकार ने 1959 में संविधान के अनुच्छेद 356 का मनमाना इस्तेमाल करते हुए नंबूदरीपाद की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया।

अब असली खेल शुरू होता है 1960 में, जब केरल में दोबारा विधानसभा चुनाव होने थे। कांग्रेस के माथे पर पसीना था। उन्हें डर था की कम्युनिस्ट कहीं दोबारा न जीत जाएं।

बस इसी डर और कुर्सी के लालच ने कांग्रेस से वो ऐतिहासिक पाप करवा दिया, जिसकी कीमत आज तक देश का बहुसंख्यक समाज चुका रहा है।

1960 के चुनाव में कम्युनिस्टों को हराने के लिए, कांग्रेस ने बाकायदा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) और उसी ‘मोपलिस्तान’ मांगने वाली मुस्लिम लीग (IUML) के साथ मिलकर एक चुनाव पूर्व गठबंधन (Pre-poll Alliance) कर लिया!

ज़रा इस बात की गंभीरता को समझिए दोस्त! ये वो कांग्रेस थी जो देश भर में घूम-घूम कर खुद को गांधी की विरासत का वारिस बताती थी।

और ये वो मुस्लिम लीग थी जिसके नेताओं के हाथों पर 1947 के बंटवारे और मोपला नरसंहार के खून के छींटे थे।

लेकिन कुर्सी के लिए कांग्रेस ने अपने सारे उसूल खूंटी पर टांग दिए और सरेआम जिन्ना के इन राजनीतिक वारिसों के साथ राजनीतिक शादी रचा ली।

7. IUML के साथ गठबंधन से कांग्रेस ने लोकतंत्र को किया मैला

कैसे जिन्ना के वारिसों को दे दी केरल की सरकार में हिस्सेदारी

1960 के इस गठबंधन ने सिर्फ एक चुनाव नहीं जीता, बल्कि इसने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को हमेशा के लिए मैला कर दिया।

चुनाव के नतीजे आए, और कांग्रेस – PSP (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी) – मुस्लिम लीग के इस नापाक गठबंधन ने जीत हासिल कर ली। इसके बाद जो हुआ, वो और भी ज़्यादा शर्मनाक था।

जिस मुस्लिम लीग को भारत की राजनीति में अछूत माना जाना चाहिए था, उसे कांग्रेस ने केरल की सरकार में हिस्सेदारी दे दी।

इस एक कदम से कांग्रेस ने उस अलगाववादी मुस्लिम लीग को वो ‘वैधता’ (Legitimacy) और राजनीतिक संजीवनी दे दी, जिसके लिए वो 1947 से तरस रहे थे।

जो लीग बंटवारे के अपराध-बोध (Guilt) के कारण अब तक ज़मीन के नीचे छिपकर अपनी साज़िशें रच रही थी, कांग्रेस ने उसका हाथ पकड़कर उसे मुख्यधारा के राजनीतिक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया।

कांग्रेस ने एक झटके में देश के हर सच्चे देशभक्त को यह संदेश दे दिया था की उनके लिए सत्ता से बढ़कर ना तो देश की अखंडता है और ना ही बहुसंख्यक समाज की भावनाएं।

अगर कल को दाऊद इब्राहीम की कोई पार्टी चुनाव लड़ ले और कांग्रेस को लगे की उससे हाथ मिलाने पर उन्हें 20 सीटें फालतू मिल जाएंगी, तो वो उससे भी गठबंधन कर लेंगे – 1960 के इस गठजोड़ ने जनता के दिमाग में यही छवि बना दी थी।

कांग्रेस का यह कदम कोई साधारण राजनीतिक गठबंधन नहीं था। यह भारत के लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय था।

इन्होंने जिन्ना की उस विचारधारा को वेंटिलेटर से निकालकर सीधे सत्ता के गलियारों में दौड़ा दिया था। और इसी पाखंड ने आम हिंदू समाज को अंदर से इतना खोखला और बेचैन कर दिया की उनका कांग्रेस के तथाकथित ‘सेक्युलरिज्म’ से हमेशा के लिए मोहभंग हो गया।

राष्ट्रवादियों को साफ समझ आ गया था की कांग्रेस का सेक्युलरिज्म असल में तुष्टिकरण का एक ऐसा भद्दा मुखौटा है, जिसके पीछे छिपकर ये लोग देश तोड़ने वालों से भी सौदा कर सकते हैं।

और सच कहूं तो दोस्त, कांग्रेस का यही वो ऐतिहासिक सेल्फ-गोल था, जिसने देश के करोड़ों राष्ट्रवादियों को एक ऐसा राजनीतिक विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया जो कम से कम जिन्ना के वारिसों के सामने घुटने न टेकता हो।

8. मल्लपुरम जिले का निर्माण और मुस्लिम लीग के सामने कांग्रेस का सरेंडर

जिसने केरल को बना दिया तुष्टिकरण की सबसे बड़ी प्रयोगशाला

अगर आपको लग रहा है की 1960 में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन करना कांग्रेस की महज़ एक ‘वन टाइम मिस्टेक’ थी, तो आप बहुत बड़े मुगालते में हैं भाईसाहब।

राजनीति में एक कहावत है की जब आप किसी आदमखोर शेर के मुंह में खून लगा देते हैं, तो वो फिर घास नहीं खाता। कांग्रेस ने सत्ता के लालच में जिस मुस्लिम लीग को राजनीति की मुख्यधारा में लाकर खड़ा किया था, उस लीग ने अब अपनी असली कीमत वसूलनी शुरू कर दी थी।

मुस्लिम लीग को अच्छे से पता चल गया था की कांग्रेस और कम्युनिस्ट, दोनों ही सत्ता के लिए इतने भूखे हैं की वे उनकी किसी भी शर्त के सामने घुटने टेक देंगे।

और इसी कमज़ोरी का फायदा उठाकर 1969 में वो कांड हुआ, जिसने केरल को हमेशा-हमेशा के लिए तुष्टिकरण की सबसे भयंकर प्रयोगशाला बना दिया।

याद है ना, हमने पिछले हिस्से में बात की थी की कैसे ये कट्टरपंथी लोग ‘मोपलिस्तान’ नाम का एक अलग मुस्लिम देश मांग रहे थे? अब जब देश मांगना मुमकिन नहीं हुआ, तो इन्होंने सिस्टम के अंदर बैठकर अपने लिए एक ‘मिनी-मोपलिस्तान’ (Mini-Moplastan) बनवा लिया।

मुस्लिम लीग के भारी राजनीतिक दबाव और ब्लैकमेलिंग के चलते, 16 जून 1969 को केरल के अंदर विशुद्ध रूप से धर्म और सांप्रदायिकता के आधार पर एक नया ज़िला बनाया गया- ‘मल्लपुरम’ (Malappuram)।

ज़रा सोचिए! आज़ाद और सेक्युलर भारत में, जहां धर्म के आधार पर बंटवारा एक बहुत बड़ा घाव दे चुका था, वहां महज़ एक अलगाववादी पार्टी (IUML) को खुश करने के लिए धर्म के आधार पर ज़िले काटे जा रहे थे।

जनसंघ (Jana Sangh) और कई राष्ट्रवादी विचारकों ने उस वक्त इसका विरोध किया था। उन्होंने चीख-चीख कर कहा था की धर्म के आधार पर ज़िला बनाना एक और ‘कश्मीर’ या एक और ‘पाकिस्तान’ बनाने की नींव रखने जैसा है।

लेकिन कांग्रेस का पूरा का पूरा इकोसिस्टम अपनी आंखें, कान और मुंह बंद करके बैठा रहा।

इसके बाद तो जैसे मुस्लिम लीग ने केरल में कांग्रेस को पूरी तरह से हाईजैक कर लिया। कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन ‘यूडीएफ’ (UDF) जब भी केरल की सत्ता में आता, तो उसकी स्टीयरिंग हमेशा मुस्लिम लीग के हाथों में होती।

मलाईदार और सबसे अहम मंत्रालय हमेशा लीग को सौंपे जाते। खासकर ‘शिक्षा मंत्रालय’ (Education Ministry) पर मुस्लिम लीग ने सालों तक अपना कब्ज़ा जमाए रखा।

उन्होंने अपने हिसाब से टेक्स्टबुक बदलवाई, मदरसों को सरकारी फंडिंग दिलवाई और पूरे सिस्टम का ऐसा इस्लामीकरण किया की केरल का आम हिंदू खुद को अपने ही राज्य में दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस करने लगा।

कांग्रेस ने सिर्फ कुछ सीटों के लालच में पूरे के पूरे सिस्टम को जिन्ना के वारिसों के सामने सरेंडर कर दिया था।

9. आज भी वायनाड में लहराते हैं उसी लीग के हरे झंडे

शरिया कानूनों के सामने नतमस्तक कांग्रेस का सच

अब आप कहेंगे की ये तो बहुत पुरानी बातें हैं, साठ और सत्तर के दशक की बातें हैं, शायद आज की कांग्रेस बदल गई हो।

तो भाई, अपने दिमाग से ये जाले निकाल दीजिए। पीढ़ियां बदल गई, नेता बदल गए, लेकिन कांग्रेस का वो जिन्ना प्रेम और मुस्लिम लीग के सामने ज़मीन पर लेट जाने वाला पाखंड आज भी जस का तस है।

आप आज के करंट हालातों को ही देख लीजिए। जब राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश की अपनी खानदानी सीट अमेठी से हार का डर सताता है, तो वो भागकर कहां जाते हैं? वो जाते हैं केरल के वायनाड में!

और वायनाड में उनकी नैया कौन पार लगाता है? वही इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML)!

क्या आपने कभी राहुल गांधी की वायनाड वाली चुनावी रैलियों के वीडियो ध्यान से देखे हैं? जब वो पर्चा भरने जाते हैं या रोड शो करते हैं, तो सड़क पर कांग्रेस का तिरंगा झंडा कम और मुस्लिम लीग के वो हरे रंग के झंडे ज़्यादा लहरा रहे होते हैं।

वो झंडे, जिन पर चांद और तारा बना होता है और जो दूर से देखने पर बिल्कुल पाकिस्तान के झंडे जैसे लगते हैं। आम हिंदुस्तानी टीवी पर वो नज़ारा देखकर सन्न रह जाता है।

उसे समझ नहीं आता की ये भारत के किसी चुनाव की रैली हो रही है या कराची में कोई जलसा निकल रहा है!

कांग्रेस को इतना खौफ रहता है की कहीं मुस्लिम लीग नाराज़ न हो जाए, इसलिए कई बार तो कांग्रेस के कार्यकर्ता अपनी रैलियों से खुद अपना ही झंडा गायब कर देते हैं।

मतलब सोचिए, जो पार्टी खुद को इस देश की सबसे पुरानी पार्टी कहती है, उसे एक अलगाववादी सोच वाली पार्टी के सामने इतना नतमस्तक होना पड़ता है।

और बात सिर्फ झंडों की नहीं है यार। जब भी शरिया कानूनों की बात आती है, ट्रिपल तलाक की बात आती है, या फिर कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर हमलों की बात आती है, तो कांग्रेस का यह इकोसिस्टम हमेशा मुस्लिम लीग के सुर में सुर मिलाता नज़र आता है।

केरल में जब PFI (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) जैसे खूंखार आतंकी संगठन फल-फूल रहे थे, तब इन्हीं राजनीतिक गठबंधनों ने उन्हें एक खामोश सुरक्षा कवच दे रखा था।

कांग्रेस का यह पाखंड कोई ढकी-छुपी बात नहीं रह गया है। आज देश का बच्चा-बच्चा जानता है की ये वो लोग हैं जो दिन में जनेऊ पहनकर मंदिरों में फोटो खिंचवाते हैं और रात के अंधेरे में बंद कमरों के अंदर जिन्ना के राजनीतिक वारिसों के साथ सत्ता की डीलिंग करते हैं।

10. कांग्रेस के कुकर्मों से उपजा हिन्दुओं का अविश्वास

इसी गलती ने बीजेपी को सौंप दिया पूरा का पूरा राष्ट्रवादी वोटबैंक

जब कोई सरकार या कोई पार्टी अपने ही देश के बहुसंख्यक समाज को बेवकूफ समझने लगती है, तो वो अपनी राजनीतिक कब्र खुद ही खोद रही होती है।

1960 में जब कांग्रेस ने मुस्लिम लीग (IUML) के साथ गठबंधन करके सत्ता की मलाई खाई, तो दिल्ली में बैठे उनके एलीट नेताओं को लगा की अरे, आम पब्लिक को क्या ही समझ आएगा! ये लोग तो अनपढ़ हैं, दो-चार लुभावने वादे करेंगे और ये फिर से हमें ही वोट दे देंगे।

लेकिन कांग्रेस का ये लुटियंस इकोसिस्टम ज़मीन पर पल रहे उस भयंकर गुस्से और मनोवैज्ञानिक बदलाव को भांपने में पूरी तरह से फेल हो गया।

अब ज़रा उस दौर में भारतीय जनसंघ (जो आज की बीजेपी है) के नेताओं की रणनीति को देखिए। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय से लेकर बाद में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी तक…

इन लोगों ने कोई जादुई छड़ी नहीं घुमाई थी भाई। इन्हें तो अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए कोई खास मेहनत भी नहीं करनी पड़ी। कांग्रेस ने खुद ही अपना सारा कच्चा चिट्ठा और अपनी नीयत का खोट एक सजी हुई थाली में रखकर जनसंघ और बीजेपी के नेताओं को सौंप दिया था।

राष्ट्रवादी नेताओं ने गांव-गांव, गली-गली जाकर जनता से बस एक बहुत सीधा और साधारण सा सवाल पूछा।

उन्होंने पूछा की जो कांग्रेस महज़ एक राज्य की सत्ता पाने के लिए उस मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर सकती है जिसने भारत माता के दो टुकड़े करवाए… क्या वो कांग्रेस कल को आपकी सुरक्षा, आपकी आस्था और आपके वजूद की रक्षा कर पाएगी?

बस! इस एक सवाल ने देश के हर उस सच्चे हिंदुस्तानी और आम हिंदू के दिमाग में ऐसा हथौड़ा मारा की उसकी आंखें हमेशा के लिए खुल गईं।

पब्लिक को समझ में आ गया की जिस पार्टी के लिए सत्ता की भूख, देश की अखंडता से भी बड़ी हो चुकी है, वो पार्टी कभी बहुसंख्यक समाज की सगी नहीं हो सकती।

हिंदुओं को अपने ही देश में एक अनाथ होने वाली फीलिंग आने लगी। उन्हें लगा की हमारे टैक्स के पैसे से देश चल रहा है, देश के लिए जान हम दे रहे हैं, और सरकारें उनके सामने लेट रही हैं जो कल तक देश तोड़ने की बातें करते थे?

इसी भयंकर अविश्वास और घुटन ने एक ऐसे वोटबैंक की नींव रखी, जो कांग्रेस से हमेशा के लिए छिटक गया। ये वो लोग थे जो आज़ादी के नाम पर आंख बंद करके कांग्रेस को वोट दिया करते थे, लेकिन इस मुस्लिम लीग वाले धोखे ने उनका मोहभंग कर दिया।

कांग्रेस का ब्लंडर हिन्दू समाज पर असर बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक
1960 में IUML से गठबंधन लगा कि सत्ता के लिए कांग्रेस देश भी बेच सकती है इसे ‘राष्ट्रीय विश्वासघात’ बताकर पोल खोली
मल्लपुरम ज़िले का निर्माण बहुसंख्यक समाज में खुद को ‘अनाथ’ समझने की घुटन तुष्टिकरण का सबसे बड़ा सबूत बनाकर बेनकाब किया
आज भी वायनाड में यारी साफ हुआ कि कांग्रेस अलगाववादी सोच कभी नहीं छोड़ेगी बिना समझौते के राष्ट्रवाद की बात की और वोटबैंक समेट लिया

कांग्रेस ने अपने पैरों पर ऐसी कुल्हाड़ी मारी की जो राष्ट्रवादी वोटबैंक कभी उनके साथ हुआ करता था, वो बिना किसी संघर्ष के सीधा बीजेपी की झोली में जाकर गिर गया।

इस सीरीज़ का निचोड़ यही है दोस्त, की बीजेपी की जीत का सबसे बड़ा रहस्य विपक्ष के इन्हीं गंदे पापों में छिपा है।

बीजेपी को हराना इसलिए नामुमकिन सा लगता है क्योंकि विपक्ष खुद कभी अपनी उस ‘देश-विरोधी’ और तुष्टिकरण वाली मानसिकता से बाहर ही नहीं आ पाया।

🎯 इस एपिसोड का सबसे बड़ा सबक

बीजेपी की जीत का सबसे बड़ा रहस्य विपक्ष के इन्हीं ऐतिहासिक गलतियों में छिपा है। जब तक विपक्ष अपनी तुष्टिकरण वाली मानसिकता नहीं छोड़ता, तब तक राष्ट्रवादी मतदाता उनके साथ नहीं आएंगे।

💬 अब क्या करें?

इस लेख को पढ़ने के बाद अपने दोस्तों या परिवार के साथ चर्चा जरूर करें। इतिहास को जानना जरूरी है ताकि वही गलतियां दोबारा न हों। क्या आप इस विषय पर और जानना चाहते हैं?

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