ज़रा सोच कर देखिए… 1930 का साल है। भारत पर अंग्रेजों का कब्ज़ा है। बंबई के बंदरगाह से ‘लॉयड ट्रिएस्टिनो’ (Lloyd Triestino) नाम का एक विशाल पानी का जहाज़ इंग्लैंड की तरफ रवाना होता है।
18 दिन के इस लंबे समुद्री सफर में जहाज़ के डेक पर एक 19 साल का भारतीय लड़का बैठा है।
बाकी मुसाफिर जहां समंदर की लहरों का मज़ा ले रहे हैं या ताश खेल कर अपना टाइम पास कर रहे हैं, वहीं ये लड़का एक कॉपी और पेंसिल लेकर कुछ अजीबोगरीब गणित के फॉर्मूले सुलझाने में लगा हुआ है।
आस-पास से गुज़रने वाले गोरे लोग उसे देखकर शायद मन ही मन हंस भी रहे होंगे।
लेकिन उन अंग्रेजों को क्या पता था की डेक पर बैठा मद्रास का ये लड़का अपनी कॉपी पर जो कैलकुलेशन कर रहा था, वो आने वाले समय में ब्रह्मांड का सबसे बड़ा राज़ खोलने वाली थी।
आज 19 अक्टूबर है, और आज ही के दिन जन्मे उस 19 साल के लड़के का नाम था- सुब्रमण्यन चंद्रशेखर।
वही चंद्रशेखर जिन्होंने दुनिया को पहली बार बताया था की आसमान में टिमटिमाने वाले ये तारे आखिर मरते कैसे हैं और ‘ब्लैक होल’ जैसी खौफनाक चीज़ ब्रह्मांड में कैसे बनती है।

पानी के जहाज़ का वो लंबा सफर और 19 साल के एक लड़के ने समंदर की लहरों के बीच सुलझाया तारों के अंत का रहस्य
सुब्रमण्यन चंद्रशेखर का जन्म आज ही के दिन, 19 अक्टूबर 1910 को अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ था। बाद में उनका परिवार मद्रास आ गया।
सच कहूं तो, टैलेंट और विज्ञान तो जैसे इनके खून में ही दौड़ता था। चंद्रशेखर कोई और नहीं, बल्कि भारत के पहले वैज्ञानिक नोबेल पुरस्कार विजेता महान सर सी.वी. रमन (C.V. Raman) के सगे भतीजे थे।
मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, जब उन्हें आगे की रिसर्च के लिए इंग्लैंड की मशहूर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (Cambridge University) जाने की स्कॉलरशिप मिली, तो उसी जहाज़ के सफर में उन्होंने वो कर दिखाया जो बड़े-बड़े दाढ़ी वाले प्रोफेसर भी नहीं कर पाए थे।
उस समय दुनिया भर के वैज्ञानिक इस बात पर माथापच्ची कर रहे थे की जब किसी तारे (Star) के अंदर का ईंधन (न्यूक्लियर एनर्जी) खत्म हो जाता है, तो आखिर उस तारे का होता क्या है?
19 साल के इस लड़के ने आइंस्टीन की थ्योरी और क्वांटम फिजिक्स को आपस में मिलाया और एक ऐसी गणित तैयार की जिसने विज्ञान की दुनिया में भूचाल ला दिया।
अगर एकदम आसान भाषा में समझें तो, चंद्रशेखर जी ने दुनिया को बताया की तारों की मौत उनके वज़न (Mass) पर निर्भर करती है।
उन्होंने एक लिमिट तय की, जिसे आज पूरी दुनिया ‘चंद्रशेखर लिमिट’ (Chandrasekhar Limit) के नाम से पूजती है।
उन्होंने साबित कर दिया की अगर किसी तारे का वज़न हमारे सूरज के वज़न से 1.44 गुना से कम है, तो जब उसका ईंधन खत्म होगा, वो तारा धीरे-धीरे सिकुड़ कर एक ‘सफेद बौना’ (White Dwarf) बन जाएगा और चुपचाप ठंडा हो जाएगा।
लेकिन जब तारे का वज़न इस 1.44 की लिमिट से ज्यादा हो?
चंद्रशेखर ने अपनी कॉपी पर गणित लगाकर बता दिया की अगर तारा बड़ा है, तो वो सिकुड़ कर रुकेगा नहीं। उसका अपना ही गुरुत्वाकर्षण (Gravity) इतना हावी हो जाएगा की वो तारा खुद को ही कुचलने लगेगा और अंत में पिचक कर या तो एक भयंकर धमाके (Supernova) के साथ फट जाएगा, या फिर एक ऐसा बिंदु बन जाएगा जिसकी ग्रेविटी से रोशनी भी बाहर नहीं निकल पाएगी।
जी हां, जिसे आज दुनिया ‘ब्लैक होल’ (Black Hole) कहती है, उस चीज़ की गणितीय भविष्यवाणी 1930 में इसी 19 साल के लड़के ने एक पानी के जहाज़ पर बैठे-बैठे कर दी थी।

रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी का वो दिन जब एक घमंडी गोरे वैज्ञानिक ने अपने ईगो के चक्कर में उड़ाया था हमारे जीनियस का मज़ाक
अब आप सोच रहे होंगे की जब इस लड़के ने इतनी बड़ी खोज कर ली, तो इंग्लैंड पहुंचने पर उसे सिर आंखों पर बैठाया गया होगा? उसे इनाम मिले होंगे?
अरे भाईसाहब, आप भूल रहे हैं की वो दौर 1930 के दशक का था। अंग्रेजों का घमंड तब सातवें आसमान पर हुआ करता था।
उन्हें ये बात किसी भी कीमत पर हज़म ही नहीं हो सकती थी की जिस देश पर वो राज कर रहे हैं, वहां का कोई लड़का आकर उन्हें फिजिक्स और एस्ट्रोनॉमी पढ़ाए।
लंदन पहुंचने के बाद चंद्रशेखर ने अपनी रिसर्च को और पक्का किया। और फिर आया साल 1935। लंदन की ‘रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी’ (Royal Astronomical Society) की एक बहुत बड़ी मीटिंग बुलाई गई थी।
दुनिया भर के टॉप वैज्ञानिक वहां बैठे थे। इसी मीटिंग में 24-25 साल के चंद्रशेखर को अपनी ये तारों वाली और ब्लैक होल वाली थ्योरी पेश करनी थी।
उसी महफिल में पहली पंक्ति में एक गोरा साहब बैठा था- सर आर्थर एडिंगटन (Sir Arthur Eddington)। एडिंगटन उस ज़माने में एस्ट्रोनॉमी (खगोल विज्ञान) का ‘बॉस’ माना जाता था।
ये वो आदमी था जिसने आइंस्टीन की थ्योरी को दुनिया के सामने साबित किया था। चंद्रशेखर खुद एडिंगटन की बहुत इज़्ज़त करते थे और उन्हें अपना गुरु मानते थे।
जब चंद्रशेखर ने मंच पर जाकर अपनी पूरी थ्योरी समझाई और बताया की कैसे बड़े तारे अपने ही भार से पिचक कर एक ऐसा बिंदु बन जाएंगे जहां से कुछ भी वापस नहीं आ सकता, तो पूरी हॉल में सन्नाटा छा गया।
सबने एडिंगटन की तरफ देखा कि वो क्या कहते हैं।
एडिंगटन अपनी कुर्सी से उठे, और बजाय एक युवा वैज्ञानिक की पीठ थपथपाने के, उन्होंने सरेआम उस भरे मंच पर चंद्रशेखर का ऐसा घटिया मज़ाक उड़ाया जिसे विज्ञान के इतिहास का सबसे शर्मनाक पल कहा जाता है।
अपने ईगो और नस्लभेदी घमंड में चूर एडिंगटन ने चंद्रशेखर की थ्योरी को पूरी तरह से बकवास बता दिया।
उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में हंसते हुए कहा, “नेचर (प्रकृति) को ऐसा कोई कानून बनाना चाहिए जो तारों को इस तरह बेवकूफों की तरह बर्ताव करने से रोके! ये कैसे मुमकिन है की कोई तारा पिचकता ही चला जाए?”
एडिंगटन के रुतबे के आगे किसी की हिम्मत नहीं थी की वो चंद्रशेखर के पक्ष में एक शब्द भी बोल सके।
यह सिर्फ एक वैज्ञानिक की थ्योरी का रिजेक्शन नहीं था, यह एक गोरे अंग्रेज़ का उस भारतीय टैलेंट पर किया गया प्रहार था, जिसे वो कभी अपने बराबर खड़ा नहीं देख सकते थे।
गालियों का जवाब गालियों से नहीं बल्कि काम से दिया और अमेरिका जाकर चुपचाप तैयार कर दी नोबेल विजेताओं की पूरी फौज

चंद्रशेखर जी जानते थे की एक घमंडी इंसान से मंच पर बहस करने का कोई फायदा नहीं है, खासकर तब, जब पूरी की पूरी जूरी ही उस गोरे साहब के ईगो की चापलूसी कर रही हो।
इंग्लैंड की इस गंदी अकैडमिक पॉलिटिक्स और नस्लभेदी रवैये से निराश होकर चंद्रशेखर जी ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अंग्रेजों की उस ज़हरीली हवा को छोड़ने का मन बना लिया और 1937 में वो अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर अमेरिका चले गए।
वहां जाकर उन्होंने ‘यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो’ (University of Chicago) जॉइन कर ली। और फिर उसके बाद जो हुआ, वो इतिहास है।
बात 1940 के दशक के आस-पास की है। यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की मेन ब्रांच से लगभग 100 मील (करीब 160 किलोमीटर) दूर एक ऑब्जर्वेटरी थी, जहां सिर्फ दो छात्रों ने उनकी क्लास के लिए एनरोल किया था।
अब आप खुद सोचिए, क्या आज का कोई भी बड़ा प्रोफेसर सिर्फ 2 बच्चों को पढ़ाने के लिए 160 किलोमीटर कार चलाकर जाएगा? यूनिवर्सिटी वालों ने भी कहा की सर, सिर्फ दो बच्चों के लिए इतनी दूर ड्राइव करके जाने का क्या तुक है? क्लास कैंसल कर देते हैं।
लेकिन चंद्रशेखर जी नहीं माने। उन्होंने कहा की “अगर दो बच्चे भी मुझसे पढ़ना चाहते हैं, तो मैं जाऊंगा।” वो हफ़्ते में दो दिन 160 किलोमीटर ड्राइव करके उन दो लड़कों को फिजिक्स पढ़ाने जाते थे।
और मज़े की बात सुनिए! आप जानते हैं वो दो लड़के कौन थे? उनका नाम था त्सुंग-दाओ ली (Tsung-Dao Lee) और चेन-निंग यांग (Chen-Ning Yang)।
इन दोनों लड़कों ने आगे चलकर 1957 में फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) जीता था! ये होता है एक सच्चे गुरु का पावर। वो खुद तो जीनियस थे ही, लेकिन उन्होंने अपने हाथों से नोबेल विजेताओं की पूरी की पूरी फौज तैयार कर दी थी।
50 साल का इंतज़ार और फिर मिला नोबेल पुरस्कार जब पूरी दुनिया को मानना पड़ा की वो घमंडी अंग्रेज़ गलत था और भारतीय लड़का सही
कहते हैं ना की आप सच्चाई को कुछ देर के लिए तो दबा सकते हैं, लेकिन उसे मिटा नहीं सकते। समय का पहिया घूमा। सर आर्थर एडिंगटन दुनिया से चले गए।
जैसे-जैसे विज्ञान ने तरक्की की, नई-नई तकनीकें आईं, रेडियो टेलीस्कोप और शक्तिशाली दूरबीनें बनीं, तो दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में गहराई से झांकना शुरू किया।
और जब उन्होंने ब्रह्मांड के राज़ खंगाले, तो जो बात वो 19 साल का भारतीय लड़का 1930 में पानी के जहाज़ पर बैठकर कह रहा था, वो तो अक्षरशः 100 टका सच निकली!
वैज्ञानिकों ने देखा की वाकई तारे मर रहे हैं, वो अपनी ही ग्रेविटी में पिचक कर ‘सुपरनोवा’ बन रहे हैं और ‘ब्लैक होल’ कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक हकीकत है।
पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को अपना सिर खुजलाना पड़ा की जिस थ्योरी को उन्होंने एडिंगटन के डर से कूड़े में डाल दिया था, वो दरअसल 20वीं सदी की सबसे बड़ी खोज थी।
आख़िरकार, चंद्रशेखर जी के उस लंबे इंतज़ार और उनके बेमिसाल धैर्य की जीत हुई। अपनी खोज के पूरे 50 साल बाद, साल 1983 में दुनिया की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था को उनके सामने झुकना पड़ा।
सुब्रमण्यन चंद्रशेखर जी को फिजिक्स के नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) से सम्मानित किया गया।
उन्होंने साबित कर दिया की असली टैलेंट किसी की चापलूसी का मोहताज नहीं होता।
नासा ने भी किया इस भारतीय टैलेंट को नमन और अंतरिक्ष में भेज दी ‘चन्द्रा दूरबीन’
21 अगस्त 1995 को 84 वर्ष की आयु में इस महान भारतीय जीनियस ने दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन क्या उनके जाने से उनकी चमक कम हो गई? बिल्कुल नहीं।
उनका कद विज्ञान की दुनिया में कितना बड़ा था, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की 1999 में अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा (NASA) ने अपनी अब तक की सबसे भारी, सबसे शक्तिशाली और सबसे महंगी एक्स-रे दूरबीन (X-ray Observatory) को अंतरिक्ष की कक्षा में लॉन्च किया।
नासा चाहता तो इस दूरबीन का नाम किसी अंग्रेज़ वैज्ञानिक के नाम पर रख सकता था। लेकिन नहीं!
पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों की सहमति से नासा ने इस दूरबीन का नाम हमारे भारत के लाल के सम्मान में रखा- ‘चन्द्रा एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी’ (Chandra X-ray Observatory)।
