जिस विज़नरी नेता ने बेंगलुरु को बनाया भारत की अपनी ‘सिलिकॉन वैली’, IT कंपनियों को भारत लाने, लेकिन ग्रामीण कर्नाटक को अनदेखा कर सत्ता गंवाने वाले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ‘S. M. Krishna’

हमारे देश की सियासत भी बड़ी अजीब और दिलचस्प चीज़ है। यहाँ कब कौन सा नेता जनता की आँखों का तारा बन जाए और कब वही जनता उसे सत्ता से बेदखल कर दे, इसका कोई फिक्स फॉर्मूला नहीं है।

जब भी हम किसी टिपिकल भारतीय राजनेता के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में खादी का सफेद कुर्ता-पायजामा, गले में मफ़लर और रैलियों में लंबी-चौड़ी बातें करने वाले किसी शख्स की तस्वीर उभरती है।

लेकिन कर्नाटक की राजनीति में एक ऐसा नेता भी आया, जिसने इस पूरी ठेठ राजनीतिक इमेज को बदलकर रख दिया।

हम बात कर रहे हैं कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एस. एम. कृष्णा (S. M. Krishna) की, जिनका हाल ही में 10 दिसंबर 2024 को 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

उनका करीब 6 दशकों का जो सियासी सफर रहा है, वो किसी बायोग्राफिकल फिल्म की तरह है। एक ऐसा सफर जिसमें गज़ब का विज़न था, बेमिसाल तरक्की थी, लेकिन साथ ही कुछ ऐसी भारी प्रशासनिक चूकें भी थीं जिन्होंने सत्ता की कुर्सी तक हिला दी थी।

धोती-कुर्ते की पारंपरिक सियासत में सूट-बूट और ग्लोबल विज़न वाले राजनेता की वो ऐतिहासिक एंट्री

1 मई 1932 को कर्नाटक के मांड्या ज़िले के एक छोटे से गांव ‘सोमनाहल्ली’ में जन्मे कृष्णा शुरुआत से ही पढ़ाई-लिखाई में अव्वल थे।

मैसूर से अपनी ग्रेजुएशन और बेंगलुरु से वकालत की डिग्री लेने के बाद, उन्होंने सीधे अमेरिका का रुख किया। वहां की जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में वो एक ‘फुलब्राइट स्कॉलर’ (Fulbright Scholar) रहे।

जब वो अमेरिका से वापस लौटे, तो उनके पास सिर्फ एक डिग्री नहीं, बल्कि दुनिया को देखने का एक ‘ग्लोबल विज़न’ था।

उनकी सियासी पारी 1962 में शुरू हुई, जब वो पहली बार मद्दूर सीट से विधायक चुने गए। शुरुआत प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से हुई, लेकिन जल्द ही वो कांग्रेस के खेमे में आ गए।

इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो कई बार सांसद बने, इंदिरा और राजीव गांधी के दौर में केंद्र में मंत्री रहे, कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर की कुर्सी संभाली और 1992 में राज्य के डिप्टी सीएम भी बने।

लेकिन उनकी ज़िंदगी का असली टर्निंग पॉइंट आया साल 1999 में। उनके प्रदेश अध्यक्ष (KPCC) रहते हुए कांग्रेस ने कर्नाटक में 132 सीटों के साथ बंपर जीत हासिल की और इसी के साथ एस. एम. कृष्णा ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली।

सीएम की कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने राज्य की राजनीति में कॉर्पोरेट स्टाइल की एंट्री कराई। वो विदेशी निवेशकों के साथ सूट-बूट पहनकर फर्राटेदार अंग्रेजी में मीटिंग्स करते थे।

कृष्णा का साफ मानना था की सरकार का काम सिर्फ जातियों का समीकरण बिठाना नहीं, बल्कि राज्य को एक ब्रांड की तरह प्रमोट करना है।

BATF और विदेशी निवेशकों का वो दौर जिसने बेंगलुरु को बना दिया भारत की ‘सिलिकॉन वैली’

आज जब हम बेंगलुरु की चमचमाती बिल्डिंग्स, शानदार आईटी पार्कों और दुनिया भर की टॉप कंपनियों के दफ्तरों को देखते हैं, तो हमें लगता है की ये शहर हमेशा से ऐसा ही होगा। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है।

90 के दशक के आख़िर तक बेंगलुरु महज़ एक शांत सा ‘पेंशनर्स पैराडाइज़’ (रिटायर्ड लोगों का शहर) माना जाता था। इसे भारत की ‘सिलिकॉन वैली’ (Silicon Valley) बनाने का असली क्रेडिट एस. एम. कृष्णा को ही जाता है।

1999 में कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने सबसे पहला और क्रांतिकारी काम ये किया की सरकार और प्राइवेट सेक्टर को एक टेबल पर लाकर बिठा दिया।

देश में ‘बैंगलोर एजेंडा टास्क फोर्स’ (BATF) का गठन किया गया। ज़रा सोचिए, उस दौर में किसी मुख्यमंत्री ने इन्फोसिस (Infosys) के नंदन नीलेकणि और वी. रविचंद्रन जैसे कॉरपोरेट दिग्गजों को सरकार के साथ मिलकर शहर का इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने की ज़िम्मेदारी सौंप दी थी।

ये कोई छोटी बात नहीं थी।

कृष्णा का एजेंडा बिल्कुल क्लीयर था- बेंगलुरु को ग्लोबल मैप पर चमकाना है। उन्होंने विदेशी निवेशकों और IT कंपनियों के लिए बाकायदा रेड कारपेट बिछा दिया।

‘सिंगल विंडो क्लीयरेंस’ (Single window clearance) का सिस्टम लागू किया गया ताकि कंपनियों को दफ्तरों के धक्के न खाने पड़ें। आईटी कंपनियों को टैक्स हॉलिडे (Tax holidays) और सस्ती ज़मीनें दी गईं।

नतीजा क्या हुआ? जिन विदेशी कंपनियों का फोकस पहले ताइवान, चीन या फिलीपींस की तरफ होता था, उन्होंने अपनी फ्लाइट्स का रुख़ सीधे बेंगलुरु की तरफ मोड़ लिया। शहर का कायाकल्प होने लगा।

ट्रैफिक को कंट्रोल करने के लिए बेंगलुरु को उसका पहला फ्लाईओवर कृष्णा के राज में ही मिला। विप्रो, इन्फोसिस से लेकर दुनिया की बड़ी-बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों ने बेंगलुरु को अपना घर बना लिया और देखते ही देखते यह शहर दुनिया भर में आईटी हब (IT Hub) के नाम से मशहूर हो गया।

भूमि प्रोजेक्ट की डिजिटल क्रांति और अक्षर दासोह की मिठास से आम जनता तक पहुंचा तकनीक का असली फायदा

अब अगर आपको लग रहा है की एस. एम. कृष्णा सिर्फ अमीरों और आईटी कंपनियों के ही सीएम थे, तो यहाँ थोड़ा रुकना पड़ेगा। तकनीक का इस्तेमाल उन्होंने सिर्फ कॉरपोरेट के लिए नहीं, बल्कि आम जनता की ज़िंदगी आसान बनाने के लिए भी किया था।

गांवों में सबसे बड़ा क्लेश क्या होता है? ज़मीन के कागज़ात! पटवारी के चक्कर काटो, रिश्वत दो, तब जाकर खसरा-खतौनी की नकल मिलती है।

इस पूरे भ्रष्ट सिस्टम को खत्म करने के लिए कृष्णा सरकार एक बहुत ही तगड़ा सॉफ्टवेयर लेकर आई, जिसका नाम था ‘भूमि’ (Bhoomi) प्रोजेक्ट।

इस प्रोजेक्ट के तहत रातों-रात कर्नाटक के 2 करोड़ से ज़्यादा ज़मीन के रिकॉर्ड्स को पूरी तरह से कंप्यूटराइज़्ड (डिजिटल) कर दिया गया।

ये उस ज़माने में एक बहुत बड़ी डिजिटल क्रांति थी। किसान अब बिना किसी रिश्वत के, एक कंप्यूटर सेंटर से अपनी ज़मीन के असली कागज़ निकाल सकता था।

इसके अलावा, शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी उनका काम बहुत सॉलिड रहा। साल 2002 में उन्होंने इस्कॉन (ISKCON) के अक्षय पात्र फाउंडेशन के साथ पार्टनरशिप की और कर्नाटक के सरकारी स्कूलों में ‘अक्षर दासोह’ के नाम से मिड-डे मील योजना को ज़मीन पर उतारा।

लाखों गरीब बच्चों को स्कूलों में गरम और पौष्टिक खाना मिलने लगा, जिससे स्कूलों में बच्चों की अटेंडेंस (Attendance) तेज़ी से बढ़ने लगी।

किसानों की सेहत का ध्यान रखते हुए वो ‘यशस्विनी’ (Yashaswini) नाम की एक को-ऑपरेटिव हेल्थ इंश्योरेंस योजना भी लेकर आए।

यह अपने आप में एक बहुत प्रगतिशील (Progressive) कदम था, जिसने गांव के गरीब किसानों को बड़े अस्पतालों में प्राइवेट इलाज कराने की सहूलियत दी।

मतलब अगर देखा जाए, तो शुरुआती सालों में ऐसा लग रहा था कि एस. एम. कृष्णा ने विकास का एक ऐसा परफेक्ट मॉडल तैयार कर लिया है जिसे कोई हरा नहीं सकता।

लेकिन कहते हैं ना यार, राजनीति में कोई भी पीरियड हमेशा के लिए नहीं होता। जल्द ही उनके इस चमचमाते ‘ब्रांड बेंगलुरु’ के विज़न पर ग्रहण लगने वाला था।

डॉ राजकुमार का खौफनाक अपहरण और पूरे 108 दिनों तक खूंखार वीरप्पन के आगे लाचार नज़र आया कर्नाटक का सिस्टम

जुलाई 2000 का वो महीना कर्नाटक के इतिहास में एक ऐसा भूचाल लेकर आया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। खूंखार चंदन तस्कर वीरप्पन ने वो दुस्साहस कर दिया जिसने पूरी राज्य सरकार के हाथ-पांव फुला दिए।

वीरप्पन ने कन्नड़ सिनेमा के भगवान कहे जाने वाले, करोड़ों लोगों की धड़कन, दिग्गज अभिनेता डॉ. राजकुमार का अपहरण कर लिया।

ज़रा सोचिए, एक तरफ आपकी सरकार सिलिकॉन वैली बना रही है, दुनिया भर की तकनीक आपके पास है, और दूसरी तरफ एक जंगल का तस्कर आपके राज्य के सबसे बड़े आइकन को अगवा करके ले जाता है और पूरा का पूरा सिस्टम सिर्फ मूकदर्शक बना रहता है।

पूरे 108 दिनों तक डॉ. राजकुमार वीरप्पन के कब्ज़े में जंगल में रहे। कर्नाटक की सड़कों पर आगजनी हुई, लोग सड़कों पर उतर आए, और सरकार पूरी तरह से लकवाग्रस्त नज़र आई।

कृष्णा सरकार वीरप्पन को पकड़ने के बजाय उसके आगे पूरी तरह घुटनों पर बैठी दिखी। मामला तब और गंभीर हो गया जब डॉ. राजकुमार की रिहाई के बाद कुछ बेहद सनसनीखेज़ खुलासे हुए।

कर्नाटक के पूर्व डीजीपी (DGP) सी. दिनकर ने अपनी एक किताब में साफ-साफ आरोप लगाया की एस. एम. कृष्णा की सरकार ने डॉ. राजकुमार को छुड़ाने के लिए वीरप्पन को भारी-भरकम फिरौती दी थी।

दावा किया गया की यह 15 करोड़ रुपये की फिरौती कृष्णा के दामाद वी.जी. सिद्धार्थ (जो कैफे कॉफी डे – CCD के संस्थापक थे) के ज़रिए वीरप्पन तक पहुंचाई गई थी।

हालांकि सरकार ने इन आरोपों को हमेशा नकारा, लेकिन इस एक घटना ने एस. एम. कृष्णा की ‘स्ट्रॉन्ग सीएम’ वाली छवि की पूरी तरह हवा निकाल दी थी।

तेलगी स्टाम्प घोटाले की कालिख और कंबलापल्ली नरसंहार का वो काला पन्ना जिसने दागदार कर दी एक हाई-टेक सरकार की छवि

मुसीबतें कभी अकेले नहीं आतीं। जब वीरप्पन वाले मामले से सरकार की किरकिरी हो ही रही थी, तभी एक ऐसा घोटाला सामने आया जिसने पूरे भारत को हिला कर रख दिया।

1999 से 2004 के बीच, यानी ठीक एस. एम. कृष्णा के कार्यकाल के दौरान, देश का सबसे बड़ा और कुख्यात ‘अब्दुल करीम तेलगी स्टाम्प पेपर घोटाला’ अपने चरम पर था।

करीब 30,000 करोड़ रुपये के इस महाघोटाले का मास्टरमाइंड तेलगी अपना बेस कर्नाटक में ही बनाकर बैठा था। सबसे शर्मनाक बात ये थी की इस घोटाले के तार सीधे पुलिस और सरकार के बड़े मंत्रियों से जुड़े हुए थे।

कृष्णा सरकार के कद्दावर मंत्री रोशन बेग का नाम जब इस घोटाले में उछला, तो उन्हें मजबूरी में इस्तीफा तक देना पड़ा। कई बड़े पुलिस अफ़सर जेल गए।

‘स्वच्छ और पारदर्शी सरकार’ का जो दावा एस. एम. कृष्णा ने कुर्सी पर बैठते वक्त किया था, वो इस 30 हज़ार करोड़ की कालिख के नीचे पूरी तरह दब गया।

और बात सिर्फ करप्शन की ही नहीं थी, सामाजिक न्याय (Social justice) के मोर्चे पर भी एक ऐसी भयानक घटना हुई जिसे याद करके आज भी रूह कांप जाती है।

मार्च 2000 में चिक्कबल्लापुर ज़िले के कंबलापल्ली गांव में सवर्ण जाति के लोगों ने 7 दलितों को एक घर के अंदर बंद करके ज़िंदा जला दिया। इस बर्बर नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया था।

जब बेंगलुरु में आईटी पार्क बन रहे थे, तब राज्य के ही एक गांव में इंसानियत को ज़िंदा जलाया जा रहा था। इस घटना ने साबित कर दिया की कृष्णा सरकार का फोकस सिर्फ शहरों पर था और ज़मीनी स्तर पर कानून-व्यवस्था (Law and Order) राम भरोसे चल रही थी।

एक प्रशासक के तौर पर यह उनके करियर का सबसे काला पन्ना साबित हुआ।

कावेरी के पानी पर 100 किलोमीटर की पदयात्रा का वो बड़ा सियासी दांव जो सुप्रीम कोर्ट की बिना शर्त माफ़ी पर जाकर खत्म हुआ

सियासत में कई बार दांव उलटे भी पड़ जाते हैं। एस. एम. कृष्णा के साथ भी कावेरी नदी के पानी को लेकर बिल्कुल यही हुआ। 2002 में कर्नाटक भयंकर सूखे की चपेट में था।

कावेरी नदी का जलस्तर बहुत नीचे जा चुका था। उधर तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जयललिता थीं, जो पानी के लिए लगातार दबाव बना रही थीं।

मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और कोर्ट ने आदेश दिया की कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी छोड़ना ही होगा। अब यहाँ कृष्णा ने एक बहुत बड़ा सियासी दांव चला।

उन्हें लगा की अगर वो कोर्ट का आदेश मानकर पानी छोड़ देंगे, तो राज्य के किसान उनसे नाराज़ हो जाएंगे। खुद को ‘कन्नड़ हीरो’ और किसानों का मसीहा साबित करने के चक्कर में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने से साफ़ इनकार कर दिया।

माहौल बनाने के लिए उन्होंने बेंगलुरु से लेकर मद्दूर तक बाकायदा 100 किलोमीटर लंबी पदयात्रा निकाल दी।

शुरुआत में तो लगा की कृष्णा ने मास्टरस्ट्रोक खेल दिया है और जनता उनके साथ खड़ी है। लेकिन सामने जयललिता थीं, वो कहाँ चुप बैठने वाली थीं!

उन्होंने तुरंत सुप्रीम कोर्ट में ‘अवमानना’ (Contempt of Court) का मुकदमा ठोक दिया। जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना डंडा चलाया और सरकार को बर्खास्त करने की चेतावनी दी, तो कृष्णा सरकार के पसीने छूट गए।

आखिरकार, जो नेता कुछ दिन पहले पदयात्रा निकालकर पानी न देने की कसमें खा रहा था, उसे न सिर्फ तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ना पड़ा, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सामने हाथ जोड़कर “बिना शर्त माफ़ी” (Unconditional Apology) भी मांगनी पड़ी।

इस एक कानूनी हार ने उनकी सारी सियासी मेहनत पर पानी फेर दिया और राज्य की बहुत भारी फजीहत हुई। जनता समझ गई की पदयात्रा सिर्फ एक दिखावा थी।

चमकते आईटी पार्कों के शोर में दब गई सूखते खेतों की आवाज़ और ग्रामीण कर्नाटक की इसी अनदेखी ने छीन ली सत्ता

सियासत का एक बहुत ही कड़वा और अटल सच है- आप शहर की सड़कों पर चाहे जितना सोना बिछा दो, लेकिन अगर गांव के खेत सूखे रह गए, तो कुर्सी आपके हाथ से खिसक ही जाएगी।

एस. एम. कृष्णा के साथ बिल्कुल यही हुआ। जब बेंगलुरु दुनिया भर के नक्शे पर छा रहा था, आईटी कंपनियों के सीईओ (CEOs) और विदेशी डेलिगेट्स कृष्णा के साथ फोटो खिंचवा रहे थे, ठीक उसी वक़्त ग्रामीण कर्नाटक एक भयानक त्रासदी से गुज़र रहा था।

2000 से लेकर 2004 के बीच कर्नाटक ने लगातार तीन साल तक ऐसा भयंकर सूखा झेला, जिसने गांव-देहात की कमर तोड़ कर रख दी। न पीने को पानी था, न खेतों में फसल थी।

हज़ारों किसान भारी कर्ज़े में डूब चुके थे और मजबूर होकर आत्महत्याएं कर रहे थे। ऐसे नाज़ुक वक़्त में एक मुख्यमंत्री से उम्मीद की जाती है की वो खेतों की खाक छाने, किसानों के बीच जाकर बैठे और उनके आंसू पोंछे।

लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही थी।

विपक्ष और ग्रामीण जनता के बीच ये नैरेटिव सेट हो गया की एस. एम. कृष्णा तो सिर्फ ‘अमीरों और सूट-बूट वालों के नेता’ हैं। गांव के लोगों को लगने लगा की जब वो कर्ज़े से मर रहे हैं, तब उनका मुख्यमंत्री बेंगलुरु में बैठकर विदेशी कंपनियों के साथ लैपटॉप पर पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन देख रहा है।

इसी दौर में उन पर ‘लैपटॉप वाले सीएम’ (Laptop CM) का ठप्पा लग गया। शुरुआत में जो शब्द उनके ‘विज़न’ की तारीफ के लिए गढ़ा गया था, वही शब्द अब ग्रामीण इलाकों में उनके लिए एक ताना बन चुका था।

नतीजा वही हुआ जिसका डर था। 2004 में जब विधानसभा के चुनाव हुए, तो शहर के लोगों ने भले ही कृष्णा के नाम पर तालियां बजाई हों, लेकिन असली वोट तो गांव के पास था।

ग्रामीण कर्नाटक ने अपना सारा गुस्सा ईवीएम (EVM) पर उतार दिया। कांग्रेस को गांव-देहात में करारी शिकस्त मिली और एस. एम. कृष्णा को मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी।

भारतीय राजनीति के इतिहास में यह चुनाव एक बहुत बड़ी केस स्टडी बन गया। इसने साबित कर दिया की आप सिर्फ शहरों को शंघाई या सिलिकॉन वैली बनाकर भारत में चुनाव नहीं जीत सकते; दिल्ली का रास्ता आज भी गांवों की कच्ची पगडंडियों से होकर ही गुज़रता है।

महाराष्ट्र के राजभवन से लेकर विदेश मंत्रालय के गलियारों तक विकास और विवादों के बीच गुज़रा एक सौम्य राजनेता का आखिरी सफर

कर्नाटक की कुर्सी से बेदखल होने का मतलब ये बिल्कुल नहीं था की एस. एम. कृष्णा की सियासत खत्म हो गई थी। कांग्रेस आलाकमान जानता था की भले ही वो ज़मीनी चुनाव हार गए हों, लेकिन उनकी बौद्धिक क्षमता, उनकी सौम्य छवि और उनके ग्लोबल विज़न की पार्टी को ज़रूरत है।

हार के तुरंत बाद 2004 में उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल बनाकर राजभवन भेज दिया गया। लेकिन उनकी असली और सबसे शानदार दूसरी पारी शुरू हुई साल 2009 में।

यूपीए (UPA-2) की मनमोहन सिंह सरकार में एस. एम. कृष्णा को देश का विदेश मंत्री (External Affairs Minister) बना दिया गया। 2009 से 2012 तक उन्होंने इस पद पर रहते हुए दुनिया भर में भारत का पक्ष बड़ी ही शालीनता से रखा।

वक़्त के साथ सियासत करवट बदलती है और नेता भी। अपने आख़िरी सालों में कृष्णा को लगने लगा था की कांग्रेस पार्टी में नई लीडरशिप (राहुल गांधी का दौर) उन्हें वो सम्मान और तवज्जो नहीं दे रही है जिसके वो हक़दार हैं।

दशकों तक कांग्रेस का झंडा उठाने वाले कृष्णा ने अचानक 2017 में बीजेपी (BJP) का दामन थाम लिया।

हालांकि तब तक उनकी उम्र काफी हो चुकी थी, इसलिए बीजेपी में वो कोई सक्रिय या आक्रामक राजनीति नहीं कर पाए।

आख़िरकार 10 दिसंबर 2024 को, 92 साल की एक लंबी, शानदार और उतार-चढ़ाव से भरी ज़िंदगी जीने के बाद एस. एम. कृष्णा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

आज जब हम उनके पूरे सियासी सफर को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो किसी एक चश्मे से उनका आंकलन करना बेमानी होगा।

वो उस दौर के नेता थे जब सियासत महज़ नारों तक सीमित थी, लेकिन उन्होंने उस दौर में भी कर्नाटक को ग्लोबल मैप पर चमकाने का रिस्क लिया।

ब्रांड बेंगलुरु आज जो कुछ भी है, वो उसी नींव पर खड़ा है जो कृष्णा ने अपने हाथों से रखी थी।

लेकिन साथ ही, तेलगी घोटाला, वीरप्पन का खौफ और किसानों की बेबसी हमेशा उनकी उस शानदार विरासत पर एक सवालिया निशान बनकर लटकी रहेगी।

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