कानून का मजाक बनाने वाले CJP के कॉकरोचों का अदालत ने उतारा नशा, कोर्ट में फर्जी जमानती पेश किए तो मजिस्ट्रेट ने ‘सौरव दस’ और ‘आशुतोष रांका’ को थमा दिया तिहाड़ जेल का रिटर्न टिकट

आजकल हमारे देश में राजनीति का मतलब ही बदल गया है। पहले के ज़माने में नेता ज़मीन पर उतरकर पसीना बहाते थे, जनता के बीच सालों-साल घिसते थे तब जाकर कोई मुकाम हासिल करते थे।

लेकिन आजकल का दौर अलग है भाई! अब क्रांति सड़कों पर कम और ट्विटर, इंस्टाग्राम की रील्स पर ज़्यादा होती है।

आजकल के ‘नए नवेले’ क्रांतिकारियों को लगता है की बस कैमरा ऑन करो, कोई सरकारी बैरिकेड फांद लो, थोड़ा सा ड्रामा करो और शाम तक ब्रेकिंग न्यूज़ में छाकर रातों-रात नेशनल हीरो बन जाओ।

इसी सस्ती पब्लिसिटी और शॉर्टकट वाली राजनीति के चक्कर में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने बड़ा गदर काट रखा था।

वैसे तो इस ‘कॉकरोच पार्टी’ के फाउंडर अभिजीत दीपके हैं, लेकिन आजकल इसके दो होनहार सिपहसालार- सौरव दास और आशुतोष रांका बड़े फॉर्म में चल रहे थे।

इन दोनों को लगा की चलो दिल्ली चलकर सिस्टम को थोड़ा हिलाया जाए। लेकिन इन्हें ये अंदाज़ा नहीं था की जिस सिस्टम को ये ‘हिलाने’ निकले हैं, वो ऐसा करंट मारेगा की सीधा तिहाड़ जेल के मच्छरों के बीच जाकर आँख खुलेगी।

पब्लिसिटी के लिए निकले ये दोनों नेता अब सलाखों के पीछे बैठकर ये सोच रहे होंगे की आख़िर उन्होंने ये नौटंकी की ही क्यों!

चलिए आपको शुरू से बताते हैं की आखिर ये पूरा तमाशा शुरू कहाँ से हुआ और कैसे इन ‘कॉकरोचों’ के हीरो बनने के शौक का अदालत ने सरेआम नशा उतार दिया।

कॉकरोचों का जंतर-मंतर का ताला फांदकर रातों-रात हीरो बनने का खुमार

तारीख थी 13 अक्टूबर 2026। दिल्ली का मौसम थोड़ा ठंडा होने लगा था, लेकिन इन दोनों नेताओं के अंदर ‘क्रांति’ की भयंकर गर्मी उबल रही थी।

सौरव दास और आशुतोष रांका अपनी पूरी प्लानिंग के साथ दिल्ली के मशहूर जंतर-मंतर पहुंचे। अब मजे की बात ये है की इन्हें ये तक नहीं पता था, या फिर पब्लिसिटी के नशे में जानकर अनजान बन रहे थे, की जंतर-मंतर अब कोई ‘फ्री-फॉर-ऑल’ धरना स्थल नहीं रहा है।

सरकार और प्रशासन ने इसे काफी पहले ही प्रोटेस्ट साइट की लिस्ट से हटा दिया है (डी-नोटिफाई कर दिया है) और वहां बकायदा धारा 144 लागू रहती है।

लेकिन भाई, रील भी तो बनानी थी! ये दोनों वहां पहुंचे और सीधे बैरिकेडिंग और जंतर-मंतर का ताला फांदकर अंदर घुसने की कोशिश करने लगे।

इनका एजेंडा क्या था? ये वहां जाकर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे।

मतलब, आप ताला तोड़कर अंदर घुसेंगे, राष्ट्रीय ध्वज फहराने का एक इमोशनल ड्रामा रचेंगे और सोचेंगे की सरकार डरकर इस्तीफे दे देगी? इसे कहते हैं मुंगेरीलाल के हसीन सपने!

दिल्ली पुलिस ने इन्हें ज्यादा फुटेज नहीं दी। पुलिस ने देखा की ये लोग कानून को ठेंगे पर रखकर शांति भंग कर रहे हैं, तो तुरंत एक्शन लिया।

बिना किसी वीआईपी ट्रीटमेंट के, पुलिस ने इन दोनों को शांति भंग करने और ‘पीस बॉन्ड’ (Peace Bond) तोड़ने के आरोप में धर दबोचा।

जो क्रांति जंतर-मंतर के ताले से शुरू होनी थी, वो लोकल थाने के लॉकअप में जाकर एकदम से ठंडी पड़ गई। पुलिस को लगा था की ये थोड़ा बहुत ड्रामा करके शांत हो जाएंगे, लेकिन असली कॉमेडी तो अभी बाकी थी।

जमानत कराने आए या कॉमेडी सर्कस चल रहा है, बाप का नाम तक नहीं पता और चले थे गारंटर बनने

थाने की हवा खाने के बाद मामला पहुंचा दिल्ली पुलिस की ‘स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट’ (SEM) कोर्ट में। तारीख थी 19 अक्टूबर 2026। इन दोनों नेताओं की 5 दिन की कस्टडी खत्म हो रही थी।

अब ज़ाहिर सी बात है, इनके महंगे वकीलों ने इन्हें तसल्ली दी होगी की “अरे टेंशन मत लो यार, ये तो ट्रेसपासिंग और शांति भंग का छोटा सा केस है। मजिस्ट्रेट साहब को दो जमानती (Sureties) दिखाएंगे और तुम लोग आज शाम तक बाहर आकर फिर से ट्विटर पर छा जाओगे।”

सौरव दास और आशुतोष रांका भी मन ही मन खुश हो रहे होंगे की अब बाहर जाकर इंटरव्यू देंगे की ‘हम सिस्टम से लड़कर आ रहे हैं’। लेकिन भाईसाहब, कोर्ट रूम में इनके जमानतियों ने जो तमाशा किया है ना, वो किसी कॉमेडी फिल्म के सीन से कम नहीं था।

जमानत के लिए कोर्ट में दो गारंटर पेश किए गए। जज साहब ने जब पहले गारंटर के कागज़ात देखे, तो उनका भी माथा ठनक गया। उस महान जमानती की शक्ल उसके खुद के आधार कार्ड की फोटो से ही मैच नहीं हो रही थी!

मतलब आप कोर्ट में एक ऐसे आदमी को गारंटर बनाकर लाए हैं जिसकी अपनी पहचान ही संदिग्ध है।

चलिए, ये तो फिर भी ट्रेलर था। पूरी पिक्चर तो दूसरे जमानती ने दिखाई। जब जज साहब ने दूसरे गारंटर से एक बहुत ही बेसिक और सीधा सा सवाल पूछा की “भाई, तुम सौरव दास की गारंटी ले रहे हो, ज़रा ये बताओ की इसके पिता का नाम क्या है और ये रहता कहाँ है?”

यकीन मानिए, उस जमानती के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था! वो बगलें झांकने लगा। मतलब ये तो गजब ही हो गया!

तुम किसी मुजरिम की कानूनी तौर पर ज़मानत लेने कोर्ट में खड़े हो, और तुम्हें उस आदमी के बाप का नाम तक नहीं मालूम? उसका अता-पता नहीं मालूम? ये कोर्ट रूम था या कोई नुक्कड़ नाटक चल रहा था?

इनकी इसी ओवर-स्मार्टनेस और ‘जुगाड़’ वाली मानसिकता ने पूरा खेल बिगाड़ दिया। इन्हें लगा था की किसी भी राह चलते आदमी को पकड़कर कोर्ट में खड़ा कर देंगे और मजिस्ट्रेट साहब आँख बंद करके बेल ऑर्डर पर साइन कर देंगे।

लेकिन कानून अंधा ज़रूर होता है, बेवकूफ नहीं! जैसे ही इस फर्जीवाड़े की पोल खुली, सौरव और आशुतोष के वकीलों के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं।

जो नेता कुछ घंटे पहले जेल से बाहर आने के सपने बुन रहे थे, उन्हें अचानक समझ आ गया की उनकी इस ‘कॉकरोच पार्टी’ का फर्जीवाड़ा उन्हीं पर बहुत भारी पड़ने वाला है।

मैजिस्ट्रेट ने सरेआम लगा दी क्लास, कहा इनके अंदर कानून के लिए रत्ती भर भी सम्मान नहीं है

अब आप ही बताइए, जब कोर्ट रूम में इन फर्जी और ‘किराए के’ जमानतियों का रायता फैलेगा, तो क्या जज साहब बैठकर तालियां बजाएंगे? बिल्कुल नहीं!

स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

मजिस्ट्रेट साहब ने अपने आदेश में एकदम साफ और कड़े शब्दों में धोबिया पछाड़ देते हुए लिखा की इन दोनों (सौरव दास और आशुतोष रांका) के अंदर “कानून के प्रति कोई सम्मान नहीं है” (No respect for law)।

जज साहब ने साफ कहा की ये कोई अनजाने में हुई गलती नहीं है, बल्कि ये लोग ‘आदतन अपराधी’ (Habitual offenders) की तरह बर्ताव कर रहे हैं।

कोर्ट ने इनकी होशियारी की हवा निकालते हुए साफ कह दिया कि जब तुम्हारे गारंटर (ज़मानती) ही फर्जी और गैर-भरोसेमंद हैं, जिनका ना अता पता है ना पहचान, तो हम तुम्हें बेल कैसे दे दें?

क्या पता कल को तुम भी गायब हो जाओ! इसी कड़क रवैये के साथ, मजिस्ट्रेट ने इनकी जमानत याचिका को उठाकर किनारे कर दिया और इनकी कस्टडी 2 दिन के लिए और बढ़ा दी (21 अक्टूबर तक)।

जो कॉकरोच नेता कुछ देर पहले बाहर जाकर मीडिया को बाइट देने के सपने देख रहे थे, उन्हें कोर्ट ने चुपचाप वापस तिहाड़ जेल का ‘रिटर्न टिकट’ थमा दिया।

पब्लिसिटी चाहिए थी तो मिल गई, तिहाड़ जेल के हाई सिक्योरिटी सेल में कट रही हैं कॉकरोच नेताओं की रातें

अब भई, जब कोई इतनी मेहनत से जंतर-मंतर का ताला फांदकर पब्लिसिटी बटोरने निकले, तो सिस्टम भी उन्हें निराश कैसे कर सकता है?

पुलिस ने भी सोचा की जब इन्हें ‘हीरो’ बनना ही है, तो क्यों ना इन्हें एकदम वीआईपी (VIP) वाला ट्रीटमेंट दिया जाए। पब्लिसिटी चाहिए थी ना? तो लो, मिल गई पब्लिसिटी!

इन कॉकरोच नेताओं को तिहाड़ जेल में कोई आम पॉकेटमारों या छंटे हुए कैदियों के साथ नहीं रखा गया है। इन्हें बकायदा जेल के ‘हाई-सिक्योरिटी’ वार्ड में शिफ्ट किया गया है।

लेटेस्ट ख़बरों के मुताबिक, सौरव दास को तिहाड़ की कुख्यात जेल नंबर 2 में भेजा गया है। जी हां, ये वही जेल नंबर 2 है जहाँ दिल्ली दंगों का आरोपी उमर खालिद भी अपनी लंबी छुट्टियां बिता रहा है।

वहीं दूसरे नेताजी, आशुतोष रांका को जेल नंबर 4 में मेहमान बनाकर रखा गया है।

बाहर सड़कों पर कैमरा लेकर घूमने वाले इन नेताओं के लिए पुलिस ने अंदर भी कैमरों का पूरा इंतज़ाम कर दिया है।

इनके सेल के बाहर अतिरिक्त पुलिस फोर्स का कड़ा पहरा बिठाया गया है और 24 घंटे निगरानी के लिए हाई-डेफिनेशन सीसीटीवी (CCTV) कैमरे लगा दिए गए हैं।

सच कहूं तो ये नज़ारा सोचकर ही हंसी आती है। जो लोग सोशल मीडिया पर रील बनाकर सरकार गिराने चले थे, वो अब 24 घंटे कैमरों की निगरानी में सलाखों के पीछे बैठकर अनुलोम-विलोम कर रहे हैं।

तिहाड़ की दाल-रोटी खाते हुए अब इन्हें समझ आ रहा होगा की ट्विटर (X) पर बैठकर हैशटैग चलाना अलग बात है, और असल दुनिया में कानून के साथ खिलवाड़ करने का अंजाम भुगतना बिल्कुल अलग बात!

लोकल थाने से निकलकर क्राइम ब्रांच के हाथ पहुंचा मामला, अब निकलेगी इस पूरी ड्रामेबाजी की असली कुंडली

अभी तक तो ये नेता जी शायद ये सोचकर मन को तसल्ली दे रहे होंगे की ‘चलो यार, कोई नहीं! शांति भंग और ट्रेसपासिंग का छोटा-मोटा ही तो केस है। आज नहीं तो कल बेल मिल ही जाएगी, फिर बाहर जाकर विक्टिम कार्ड खेलेंगे।’

लेकिन ठहरीये… असली ‘क्लाइमैक्स’ तो अभी बाकी है!

लेटेस्ट अपडेट ये है की दिल्ली पुलिस ने इनका यह केस लोकल थाने से छीनकर सीधे अपनी सबसे खतरनाक यूनिट, यानी ‘क्राइम ब्रांच’ (Crime Branch) को ट्रांसफर कर दिया है।

अब आप सोच रहे होंगे की जंतर-मंतर पर ताला फांदने के मामले में क्राइम ब्रांच की क्या ज़रूरत पड़ गई? तो भाई, पुलिस को भी पता है की दाल में सिर्फ काला नहीं है, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

अब इस बात की तगड़ी जांच होगी की इस तथाकथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के पीछे असली दिमाग किसका है? इस पूरी ड्रामेबाजी के लिए फंडिंग (पैसा) कहाँ से आ रही थी?

क्या ये सिर्फ दो लड़कों का पब्लिसिटी स्टंट था, या फिर इसके पीछे दिल्ली का माहौल बिगाड़ने और कोई बड़ा बवाल खड़ा करने की कोई गहरी साज़िश रची जा रही थी?

जब क्राइम ब्रांच इंटेरोगेशन रूम में बैठाकर पूछताछ शुरू करेगी ना, तो सारे राज तोते की तरह बाहर आएंगे। फर्जी जमानतियों से लेकर इस पार्टी को बैक करने वाले आकाओं तक, सबकी पूरी कुंडली निकाली जाएगी।

खैर, आख़िर में बस इतना ही कहूंगा की हमारे देश का लोकतंत्र हर किसी को आवाज़ उठाने की आज़ादी देता है।

लेकिन आज़ादी का मतलब ये कतई नहीं है की आप नियम-कायदों को जूते की नोक पर रखें, प्रतिबंधित इलाकों में ताले तोड़कर घुस जाएं, और जब पुलिस पकड़े तो कोर्ट में फर्जी कागज़ात पेश करके कानून की आँखों में मिर्च झोंकने की कोशिश करें। ‘

कॉकरोच जनता पार्टी’ के इन युवा नेताओं को जो ये कड़वी दवाई पिलाई गई है, वो आगे चलकर उन तमाम सोशल मीडिया वाले ‘क्रांतिकारियों’ के लिए एक तगड़ा सबक बनेगी जो पब्लिसिटी के लालच में कानून को मज़ाक समझने की भूल कर बैठते हैं।

पिक्चर अभी बाकी है, और क्राइम ब्रांच की एंट्री के बाद तो ये वेब सीरीज़ और भी दिलचस्प होने वाली है!

Scroll to Top