वो आदिवासी योद्धा जिसने ‘जंगोम सेना’ बनाकर अंग्रेजों की तोपों का गुरूर अपने तीर-कमान से तोड़ा, 1857 के ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ के महान क्रांतिकारी ‘वीर बाबूराव शेडमाके’ को पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि

जब भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बात आती है, तो हमारे ज़हन में मंगल पांडे, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे जैसे महान शूरवीरों का नाम सबसे पहले आता है।

लेकिन हमारे देश में उस वक़्त ऐसे भी माटी के लाल थे, जिन्होंने जंगलों और पहाड़ों से अंग्रेजों की नींदें हराम कर दी थी।

आज 21 अक्टूबर है, और आज ही के दिन महाराष्ट्र के विदर्भ और गोंडवाना के घने जंगलों में दहाड़ने वाले एक ऐसे ही 25 साल के आदिवासी शेर ने फांसी का फंदा चूमा था।

आज हम बात कर रहे हैं ‘वीर बाबूराव पुल्लेसुर शेडमाके’ की। एक ऐसा शूरवीर जिसने अपनी ‘जल, जंगल और ज़मीन’ की खातिर अंग्रेजों की आधुनिक तोपों और बंदूकों के सामने अपने तीर-कमान तान दिए थे।

आज उनकी पुण्यतिथि पर इस महान आदिवासी क्रांतिकारी की उस अनसुनी कहानी को जानना हर हिंदुस्तानी का फ़र्ज़ है, ताकि हम समझ सकें की जो आज़ादी हमें मिली है, वो ऐसे ही मतवाले नौजवानों के खून की बदौलत मिली है।

गोटूल की माटी से लेकर रायपुर तक की शिक्षा, कैसे तैयार हुआ जल जंगल और ज़मीन का यह रखवाला

वीर बाबूराव शेडमाके की रगों में बचपन से ही गोंडवाना की माटी और अपनी संस्कृति का स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा था।

उनका जन्म 12 मार्च 1833 को चंद्रपुर (जो अब महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले का हिस्सा है) के अहेरी तालुका के एक छोटे से गांव ‘किश्तपुर’ में हुआ था। उनके पिता पुल्लेसुर शेडमाके उस इलाके के एक बहुत ही सम्मानित गोंड ज़मींदार थे।

बाबूराव की शुरुआती शिक्षा किसी चारदीवारी वाले स्कूल में नहीं हुई, बल्कि आदिवासियों की उस प्राचीन और महान परंपरा में हुई जिसे ‘गोटूल’ कहा जाता है।

गोटूल असल में आदिवासियों का वो गुरुकुल होता है, जहाँ बच्चों को प्रकृति से जुड़ना, अपनी संस्कृति का सम्मान करना और अपने समाज की रक्षा करना सिखाया जाता है।

इसी गोटूल की माटी में रगड़ खाकर बाबूराव ने मल्ल-युद्ध (कुश्ती), अचूक तीरंदाज़ी, तलवारबाज़ी और भाला चलाने की कठोर ट्रेनिंग ली।

वो बचपन से ही जंगल के चप्पे-चप्पे, उसकी पगडंडियों और हर नदी-नाले से ऐसे वाकिफ थे जैसे कोई शेर अपनी गुफा से होता है।

लेकिन बाबूराव के पिता दूरदर्शी थे। उन्हें पता था की आने वाले समय में अंग्रेजों से लड़ने के लिए सिर्फ बाहुबल काफी नहीं होगा, बल्कि दुश्मन की भाषा और उनकी चालों को समझना भी बेहद ज़रूरी है।

इसीलिए उन्होंने बाबूराव को आधुनिक और अंग्रेज़ी शिक्षा हासिल करने के लिए रायपुर भेज दिया।

ज़रा सोचिए इस कॉम्बिनेशन को! एक ऐसा नौजवान जिसके बाजुओं में गोटूल की ताक़त और तीरंदाज़ी का हुनर था, और दिमाग में रायपुर से मिली अंग्रेज़ी शिक्षा की समझ।

बाबूराव अंग्रेजों के उन काले कानूनों को अच्छी तरह पढ़ और समझ चुके थे, जिनके ज़रिए ये गोरे लोग आदिवासियों को उन्हीं के जंगलों से बेदखल कर रहे थे।

शिक्षा और बाहुबल का यही खतरनाक संगम बाबूराव को अंग्रेजों के लिए एक ‘काल’ बनाने वाला था।

जब 24 साल के युवा ने बनाई 500 लड़ाकों की ‘जंगोम सेना’ और अंग्रेजों की तोपों के सामने तान लिए अपने तीर-कमान

साल 1857… जब पूरे देश में क्रांति का बिगुल बजा, तो बाबूराव खून के घूंट पीकर बैठने वालों में से नहीं थे। उम्र महज़ 24 साल थी, लेकिन आंखों में गोंडवाना को आज़ाद कराने का एक ऐसा भयंकर तूफान था की उन्होंने सीधे अंग्रेजी हुकूमत को ललकार दिया।

बाबूराव जानते थे की अंग्रेजों की विशाल और आधुनिक सेना से वो अकेले नहीं लड़ सकते। इसलिए उन्होंने अपने इलाके के गोंड, माड़िया और रोहिला समुदाय के नौजवानों को इकट्ठा करना शुरू किया।

गांव-गांव जाकर उन्होंने आदिवासियों के दिलों में आज़ादी की आग फूंकी। और देखते ही देखते इस युवा शेर ने 500 से ज़्यादा गठीले और खतरनाक आदिवासी लड़ाकों की अपनी खुद की एक छापामार फौज खड़ी कर दी।

इस ऐतिहासिक फौज को नाम दिया गया- ‘जंगोम सेना’ (Movable Army / जंगोम दल)।

ये कोई मामूली फौज नहीं थी दोस्त। आज की भाषा में कहें तो ये एक ‘गुरिल्ला कमांडो फोर्स’ थी। एक तरफ अंग्रेजों की फौज थी, जिनके पास उस ज़माने की सबसे आधुनिक राइफलें, गोला-बारूद और तोपें थीं।

और दूसरी तरफ वीर बाबूराव की जंगोम सेना थी, जिनके हाथों में सिर्फ तीर-कमान, फरसे, बर्छियां और तलवारें थीं।

लेकिन युद्ध सिर्फ हथियारों से थोड़े ना जीते जाते हैं! युद्ध जीते जाते हैं जज़्बे से। आदिवासियों के सीने में अपनी जल, जंगल और ज़मीन के लिए जो आग धधक रही थी, वो अंग्रेजों के बारूद पर भारी पड़ने वाली थी।

बाबूराव ने अपनी जंगोम सेना को छापामार युद्ध (Guerrilla Warfare) के लिए ऐसे तैयार किया की वे जंगलों में अचानक हमला करते और जब तक अंग्रेज अपनी बंदूकें लोड करते, तब तक ये आदिवासी योद्धा उन्हें काटकर वापस घने जंगलों में गायब हो जाते।

सात महीने तक अंग्रेजों के सीने पर किया तांडव, राजगढ़ पर कब्ज़ा करके कैप्टन शेक्सपियर को चटाई थी धूल

1858 की शुरुआत में वीर बाबूराव और उनकी जंगोम सेना ने चंद्रपुर और गढ़चिरौली के इलाकों में जो तांडव मचाया, उसने अंग्रेजों की लंदन तक बैठी हुकूमत की चूलें हिला कर रख दीं।

बाबूराव का सबसे पहला और बड़ा टारगेट था ‘राजगढ़ परगना’। उन्होंने अपनी सेना के साथ राजगढ़ के अंग्रेजी ठिकानों पर ऐसा भयंकर धावा बोला की गोरे अफसरों को अपनी जान बचाकर वहां से भागना पड़ा।

बाबूराव ने राजगढ़ से अंग्रेजों को खदेड़ कर उस पर अपना सीधा कब्ज़ा कर लिया और गोंडवाना का परचम लहरा दिया।

अंग्रेज बौखला गए। उन्होंने बाबूराव को पकड़ने और इस बगावत को कुचलने के लिए अपने सबसे क्रूर और तेज़-तर्रार अफसरों को मैदान में उतारा- कैप्टन शेक्सपियर (Captain Shakespeare) और मिस्टर क्रिक्टन (Mr. Crichton)।

इन दोनों को भारी फौज और तोपखाने के साथ भेजा गया था।

लेकिन बाबूराव की तलवार और उनके तीरंदाज़ों के सामने इन दोनों गोरे अफसरों की सारी मिलिट्री ट्रेनिंग धरी की धरी रह गई।

नन्दगांव, घोसरी, सागोन और बामनपेट के भीषण युद्धों में जंगोम सेना ने कैप्टन शेक्सपियर की फौज को ऐसे नाको चने चबवाए की अंग्रेज़ों को समझ ही नहीं आ रहा था की ये हमले हो किधर से रहे हैं।

जंगल के चप्पे-चप्पे पर बाबूराव के लड़ाके घात लगाए बैठे रहते थे।

कमाल की बात तो ये है की पूरे 7 महीने तक कैप्टन शेक्सपियर और क्रिक्टन भारी फौज और आधुनिक हथियारों के बावजूद बाबूराव शेडमाके की परछाई तक नहीं छू पाए।

जब-जब अंग्रेज़ों ने सीधे मैदान-ए-जंग में बाबूराव को चुनौती दी, तब-तब उन्हें मुँह की खानी पड़ी और अपने जवानों की लाशें उठानी पड़ीं।

24 साल के इस आदिवासी शेर ने ब्रिटिश हुकूमत को बता दिया था कि गोंडवाना के जंगलों में तोपें नहीं, तीर-कमान राज करते हैं।

जो अंग्रेज मैदान-ए-जंग में नहीं जीत पाए उन्होंने अपनों को लालच देकर रची धोखे और गद्दारी की साज़िश

हमारे देश के इतिहास का एक बहुत ही कड़वा और रुला देने वाला सच है। आप पन्ने पलट कर देख लीजिए, हमारे शूरवीर कभी भी दुश्मनों की ताकत, उनकी तोपों या उनकी बहादुरी से नहीं हारे।

हमारे योद्धा जब भी हारे हैं, तो अपने ही लोगों की गद्दारी और ‘जयचंदों’ के धोखे का शिकार होकर हारे हैं। वीर बाबूराव शेडमाके के साथ भी बिल्कुल यही हुआ।

जब 7 महीने तक जंगल की खाक छानने के बाद भी मिस्टर क्रिक्टन और कैप्टन शेक्सपियर जैसे गोरे अफसर बाबूराव को सीधी जंग में नहीं हरा पाए, तो उन्होंने अपनी उसी पुरानी नीति का सहारा लिया- ‘फूट डालो और राज करो’।

अंग्रेज समझ चुके थे की बाबूराव को बाहर से कोई नहीं हरा सकता, उन्हें तोड़ने के लिए उनके ही किसी अपने को खरीदना पड़ेगा।

और दुर्भाग्य से उन्हें वो मोहरा मिल भी गया। अंग्रेजों ने अहेरी रियासत की ज़मींदार ‘रानी लक्ष्मीबाई’ को लालच देना शुरू किया।

कहा गया की अगर तुमने बाबूराव को पकड़ने में हमारी मदद नहीं की, तो तुम्हारी रियासत छीन ली जाएगी, और अगर मदद की तो तुम्हें मालामाल कर दिया जाएगा।

सत्ता और पैसे के लालच में रानी अंधी हो गई।

सितंबर 1858 का महीना था। रानी ने एक बहुत ही गंदी साज़िश रची। उसने बाबूराव को एक गुप्त मुलाकात और दावत के बहाने बुलावा भेजा।

बाबूराव अपने कुछ साथियों के साथ उस गुप्त स्थान पर पहुंचे। रात का वक्त था। जब बाबूराव खाना खाकर विश्राम कर रहे थे और उनके हथियार उनसे दूर रखे थे, तभी रानी के इशारे पर घात लगाए बैठे अंग्रेजों की भारी फौज ने अचानक उन पर धावा बोल दिया।

निहत्थे और सोते हुए शेर को चारों तरफ से घेर लिया गया। बाबूराव ने फिर भी संघर्ष किया, लेकिन धोखे के उस जाल से वो निकल नहीं पाए। अंग्रेजों ने इस महान योद्धा को उसी रात बंदी बना लिया।

वो रात गोंडवाना के इतिहास की सबसे काली और मनहूस रात थी।

चंद्रपुर जेल का वो पीपल का पेड़ जो आज भी गवाह है महज़ 25 साल की उम्र में इस शूरवीर की अमर शहादत का

बंदी बनाने के बाद बाबूराव को भारी बेड़ियों और ज़ंजीरों में जकड़कर चंद्रपुर जेल लाया गया।

अंग्रेजों ने बाबूराव को कोई कानूनी हक नहीं दिया, बल्कि रातों-रात जेल के अंदर ही एक दिखावटी ‘विशेष अदालत’ (Kangaroo Court) बिठा दी।

इस फर्जी अदालत में बाबूराव पर राजद्रोह, बगावत और अंग्रेज अफसरों की हत्या के झूठे और मनगढ़ंत आरोप तय किए गए।

बिना कोई दलील सुने, बिना कोई गवाह पेश किए, अंग्रेजों के जज ने तुरंत फैसला सुना दिया- “फांसी की सज़ा!”

तारीख मुकर्रर हुई 21 अक्टूबर 1858 (आज ही का वो ऐतिहासिक दिन)। चंद्रपुर जेल के बीचों-बीच एक बहुत पुराना और विशाल पीपल का पेड़ था। उसी पेड़ की एक मोटी डाल पर फांसी का फंदा लटकाया गया।

फांसी वाले दिन बाबूराव के चेहरे पर मौत का रत्ती भर भी खौफ नहीं था। मात्र 25 साल का वो गठीला नौजवान, जिसकी अभी पूरी ज़िंदगी बाकी थी, उसने सीना ताने और मुस्कुराते हुए फांसी का फंदा चूम लिया।

Scroll to Top