आज जब भी सोशल मीडिया या टीवी पर बिहार का नाम आता है, तो ज़्यादातर लोगों के ज़हन में क्या तस्वीर बनती है? गरीबी, पलायन, मज़दूरी, चोरी और राजनीति के वही पुराने घिसे-पिटे चुटकुले।
बाहर के राज्यों में लोग अक्सर बिहार के नाम पर मज़ाक उड़ाते हुए मिल जाते हैं। हमारी आज की पीढ़ी ने तो शायद मान ही लिया है की बिहार हमेशा से ऐसा ही था।
लेकिन अगर मैं आपसे कहूं की जिस राज्य पर आज ये चुटकुले बन रहे हैं, वो आज़ादी के ठीक बाद पूरे हिंदुस्तान का सबसे मॉडर्न, सबसे ताकतवर और नंबर वन राज्य हुआ करता था, तो शायद आप यकीन नहीं करेंगे।
पर हकीकत यही है यार! 1950 के दशक में बिहार पूरे देश के लिए तरक्की का एक जीता-जागता रोल मॉडल था।
और इस सुनहरे दौर को हवा में नहीं बुना गया था, बल्कि इसके पीछे एक ऐसे इंसान का खून-पसीना और विज़न लगा था, जिसे इतिहास आज ‘आधुनिक बिहार का निर्माता’ कहता है।
हम बात कर रहे हैं आज़ाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की, जिन्हें जनता प्यार और सम्मान से ‘श्री बाबू’ और ‘बिहार केसरी’ बुलाती थी।
आपको हवा-हवाई बातें लग रही हों तो ज़रा एक पक्का ऐतिहासिक तथ्य सुन लीजिए। 1950 के दशक में पॉल एच. एप्पलबी (Paul H. Appleby) नाम के एक बहुत मशहूर अमेरिकी पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एक्सपर्ट भारत आए थे।
उन्हें खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बुलाया था ताकि वो देश के कामकाज का आंकलन कर सकें। एप्पलबी ने पूरे देश का दौरा किया, हर राज्य के सिस्टम को बारीकी से परखा और फिर अपनी ऑफिशियल रिपोर्ट में डंके की चोट पर लिखा था की “बिहार पूरे भारत का सबसे बेहतर प्रशासित (Best-Administered) और सुशासित राज्य है।”

जेल की काल कोठरियों से निकलकर सत्ता के शिखर तक पहुंचे एक ज़मींदार बेटे की आज़ादी और संघर्ष की कहानी
अक्सर कहा जाता है की जो इंसान खुद ज़मीन से जुड़कर संघर्ष करता है, वही सिस्टम की कमियों को सबसे बेहतर समझता है। श्री बाबू की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी।
21 अक्टूबर 1887 को मुंगेर के मौर गांव में उनका जन्म हुआ। बैकग्राउंड की बात करें तो वो एक बहुत ही संपन्न और रुतबे वाले भूमिहार (ज़मींदार) परिवार से आते थे।
मतलब घर में पैसों या सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। चाहते तो आराम से अपनी ज़िंदगी ऐश-ओ-आराम में काट सकते थे।
पढ़ाई-लिखाई में भी वो शुरू से ही अव्वल थे। पटना कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी का रुख किया और वहां से कानून की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद उन्होंने मुंगेर में अपनी शानदार वकालत शुरू कर दी। उस दौर में एक नामी वकील होने का मतलब था बेतहाशा पैसा और शोहरत। लेकिन उनके अंदर तो कुछ और ही आग सुलग रही थी।
साल 1921 में जब महात्मा गांधी ने देशवासियों से ‘असहयोग आंदोलन’ में कूदने का आह्वान किया, तो श्री बाबू ने एक सेकंड नहीं सोचा।
उन्होंने अपना चलता हुआ वकालत का पेशा, काले कोट की वो इज़्ज़त और ज़मींदार परिवार का सारा सुख-चैन एक झटके में लात मार कर छोड़ दिया और आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े।
नमक सत्याग्रह हो, सविनय अवज्ञा आंदोलन हो या फिर 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’… श्री बाबू ने हर मोर्चे पर आगे बढ़कर लाठियां खाईं और अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर बगावत की।
अंग्रेजों ने उन्हें तोड़ने के लिए क्या कुछ नहीं किया! उन्होंने अपने जीवन के लगभग 8 कीमती साल अंग्रेजों की काल कोठरियों और जेलों में गुज़ारे।
लेकिन इस शख्स ने कभी भी ब्रिटिश हुकूमत के सामने घुटने टेकने या माफ़ी मांगने से साफ़ इनकार कर दिया। यही वो निडरता और संघर्ष था जिसने पूरे बिहार की जनता के दिलों में उन्हें ‘बिहार केसरी’ बना दिया था।

अपनों से बगावत कर गरीबों को दिलाया हक और ज़मींदारी प्रथा को जड़ से उखाड़ने वाला देश का पहला राज्य बना बिहार
जैसा की मैंने पहले बताया, श्री बाबू खुद एक बहुत बड़े और प्रभावशाली भूमिहार ज़मींदार परिवार से आते थे। उस समय बिहार में ज़मींदारी प्रथा का भयंकर खौफ था।
बड़े-बड़े ज़मींदारों के पास हज़ारों एकड़ ज़मीनें हुआ करती थीं और बेचारा गरीब भूमिहीन किसान उनकी ज़मीनों पर बंधुआ मज़दूरों की तरह खून पसीना बहाता था।
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही श्री बाबू ने ठान लिया की जब तक ये ज़मींदारी सिस्टम ख़त्म नहीं होगा, तब तक बिहार के असली किसानों का कभी भला नहीं हो सकता।
और फिर 1950 में उन्होंने वो मास्टरस्ट्रोक खेला जिसने पूरे देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। उन्होंने विधानसभा में ‘बिहार भूमि सुधार अधिनियम’ (Bihar Land Reforms Act, 1950) पेश कर दिया।
इस कानून का सीधा सा मतलब था की अब ज़मींदारों से उनकी हज़ारों एकड़ फालतू ज़मीनें छीन ली जाएंगी और उन्हें गरीब और भूमिहीन किसानों में बांट दिया जाएगा।
श्री बाबू के इस एक कदम से उनके अपने ही लोग, उनके अपने रिश्तेदार और सूबे के तमाम बड़े ज़मींदार उनके कट्टर दुश्मन बन गए।
यह कोई मामूली लड़ाई नहीं थी। उस समय बिहार के सबसे बड़े ज़मींदार कामेश्वर सिंह (दरभंगा महाराज) थे, जिनकी हैसियत किसी राजा से कम नहीं थी।
दरभंगा महाराज और बाकी ज़मींदारों ने अपना सारा पैसा और ताकत लगा दी। उन्होंने देश के सबसे बड़े-बड़े वकीलों की फौज खड़ी कर दी और श्री बाबू के इस कानून के खिलाफ सीधे पटना हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए।
कोर्ट ने तकनीकी आधार पर इस कानून पर स्टे लगा दिया। ज़मींदारों को लगा की उन्होंने श्री बाबू को हरा दिया है। लेकिन वो श्री बाबू ही क्या जो हार मान लें!
जब कोर्ट से अड़ंगा लगा, तो श्री बाबू सीधे दिल्ली गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने अड़ गए। उन्होंने नेहरू जी से दो-टूक कह दिया की या तो आप संविधान बदलिए, वरना ये ज़मींदारी कभी ख़त्म नहीं हो पाएगी और मैं अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा।
श्री बाबू का दबाव इतना भयंकर और तर्क इतने मजबूत थे की पंडित नेहरू को झुकना पड़ा। और आपको जानकर हैरानी होगी की भारत के संविधान में जो ‘पहला संशोधन’ (First Amendment of the Constitution in 1951) हुआ था और जिसमें ‘9वीं अनुसूची’ (9th Schedule) जोड़ी गई थी, वो सिर्फ और सिर्फ श्री बाबू के इसी ज़मींदारी उन्मूलन कानून को बचाने के लिए किया गया था!
ताकि कोई भी कोर्ट इस कानून को खारिज न कर सके।
यह एक अकल्पनीय जीत थी। अपनों से बगावत करके, अपनी ही जाति के रसूखदारों से दुश्मनी मोल लेकर बिहार पूरे हिंदुस्तान का वो ‘पहला राज्य’ बन गया जिसने ज़मींदारी प्रथा को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया।

सिंदरी के कारखानों से लेकर बरौनी की रिफाइनरी तक, ऐसे बुनी गई थी बिहार के औद्योगिक स्वर्ण युग की पूरी पटकथा
अब बात करते हैं उस चीज़ की जिसके लिए आज का युवा सबसे ज़्यादा रोता है- ‘फैक्ट्रियां और रोज़गार’। आज अगर बिहार का लड़का ट्रेन में धक्के खाकर गुजरात, महाराष्ट्र या पंजाब मज़दूरी करने जा रहा है, तो उसे ये इतिहास ज़रूर पढ़ना चाहिए।
श्री बाबू के 15 सालों के शासनकाल को बिहार का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Era) यूं ही नहीं कहा जाता भाई! उस दौर में बिहार सिर्फ खेती-बाड़ी वाला राज्य नहीं था, बल्कि पूरे हिंदुस्तान का ‘इंडस्ट्रियल इंजन’ था।
श्री बाबू का विज़न एकदम क्लियर था की सिर्फ ज़मीन बांटने से गरीबी नहीं जाएगी, हमें भारी उद्योग (Heavy Industries) लगाने होंगे।
उनके इसी विज़न का नतीजा था की आज़ाद भारत का सबसे पहला ‘पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग’ (PSU) कहीं और नहीं, बल्कि बिहार की धरती पर लगा।
वो था ‘सिंदरी खाद कारखाना’ (Sindri Fertilizer Plant)। उस वक्त ये पूरे एशिया का सबसे बड़ा खाद कारखाना हुआ करता था।
उन्होंने कारखानों और प्रोजेक्ट्स की ऐसी झड़ी लगाई की बाकी राज्य बस देखते रह गए। सोवियत संघ (रूस) की मदद से बेगूसराय में विशाल ‘बरौनी ऑयल रिफाइनरी’ (Barauni Oil Refinery) और ‘बरौनी थर्मल पावर प्लांट’ की नींव रखी गई, जिसने पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था को पलट कर रख दिया।
रांची में जो ‘हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन’ (HEC) आज खड़ा है, क्या आप जानते हैं उसे क्या कहा जाता था? उसे “मदर ऑफ़ ऑल इंडस्ट्रीज़” (कारखानों का जन्मदाता) कहा जाता था, क्योंकि यहाँ ऐसी विशाल मशीनें बनती थीं जो बाकी फैक्ट्रियां लगाने के काम आती थीं।
ये भी श्री बाबू की ही देन था।
बोकारो स्टील प्लांट (Bokaro Steel Plant) का ब्लूप्रिंट और ज़मीन अधिग्रहण भी उन्हीं के दौर में शुरू हुआ, जिसने बाद में भारत को इस्पात (Steel) उत्पादन में दुनिया के नक़्शे पर खड़ा कर दिया।
(यह बात और है की सिंदरी, रांची और बोकारो आज बंटवारे के बाद झारखण्ड में चले गए हैं, लेकिन उस वक्त यह सब एक ही अखंड बिहार का हिस्सा था और इन सबका क्रेडिट सीधे तौर पर श्री बाबू को जाता है)।
सिर्फ कारखाने ही नहीं, उन्होंने कृषि और किसानों को बाढ़ से बचाने के लिए ‘कोशी नदी घाटी परियोजना’ (Kosi Project) और ‘गंडक प्रोजेक्ट’ जैसी महात्वाकांक्षी सिंचाई योजनाएं शुरू करवाईं।
पूरे राज्य में नहरों का एक शानदार जाल बिछा दिया गया ताकि किसान सिर्फ बारिश के भरोसे न रहें।

सिर्फ कारखाने ही नहीं बल्कि नेतरहाट जैसे शानदार स्कूल और कई यूनिवर्सिटीज़ खोलकर बिहार को बनाया था शिक्षा का मक्का
एक सचमुच का बड़ा और विज़नरी नेता वो होता है जो जानता है की सिर्फ ईंट, गारे और लोहे की इमारतें खड़ी करने से कोई राज्य महान नहीं बनता।
जब तक आप इंसानी दिमाग (Human Capital) को नहीं तराशेंगे, तब तक वो कारखाने भी किसी काम के नहीं। श्री बाबू ने ये बात बहुत गहराई से समझी थी।
आज जब बिहार के बच्चे पढ़ने के लिए कोटा, दिल्ली या पुणे भागते हैं, तो उन्हें शायद अंदाज़ा भी नहीं है की 50 के दशक में बिहार को ‘शिक्षा का मक्का’ कहा जाता था।
श्री बाबू ने सबसे पहले उच्च शिक्षा (Higher Education) का ढांचा खड़ा किया। उन्होंने ‘पटना यूनिवर्सिटी’ को एक शानदार ‘टीचिंग और रेसिडेंशियल यूनिवर्सिटी’ में बदल दिया, जिसे उस वक्त ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’ कहा जाने लगा था।
पूरे राज्य में पढ़ाई का विकेंद्रीकरण (Decentralization) करने के लिए उन्होंने मुज़फ़्फ़रपुर में ‘बिहार यूनिवर्सिटी’, भागलपुर में ‘भागलपुर यूनिवर्सिटी’ और रांची में ‘रांची यूनिवर्सिटी’ की स्थापना की।
तकनीकी शिक्षा (Technical Education) के बिना कोई राज्य उद्योगों को नहीं संभाल सकता, इसलिए उन्होंने धनबाद में ‘BIT Sindri’ (बिड़ला इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) और मुज़फ़्फ़रपुर में ‘MIT’ (मुज़फ़्फ़रपुर इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) जैसे शानदार इंजीनियरिंग कॉलेज खुलवाए।
और इन सबके बीच जो उनके मुकुट का सबसे बड़ा और चमकता हुआ हीरा था, वो था 1954 में बना ‘नेतरहाट आवासीय विद्यालय’ (Netarhat Residential School)।
श्री बाबू चाहते थे की एक ऐसा स्कूल बने जो गुरुकुल और आधुनिक शिक्षा का सबसे बेहतरीन संगम हो, जहाँ गरीब से गरीब बच्चा भी वर्ल्ड-क्लास पढ़ाई कर सके।
और यकीन मानिए, नेतरहाट ने श्री बाबू के उस सपने को सच कर दिखाया। इस एक अकेले स्कूल ने देश को इतने आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS), वैज्ञानिक और टॉप लेवल के अधिकारी दिए हैं की आप गिनते-गिनते थक जाएंगे।
उन्होंने बिहार में शिक्षा और संस्कृति के विकास के लिए अनुग्रह नारायण सिन्हा इंस्टिट्यूट (A.N. Sinha Institute), रबीन्द्र भवन, बिहार कला अकादमी और दर्जनों साइंस और आर्ट्स कॉलेज खुलवाए।
उनका मक़सद था की बिहार का युवा जब बाहर निकले, तो दुनिया उसकी बौद्धिक क्षमता का लोहा माने।
गुटबाज़ी और जातीय राजनीति का वो हल्का सा ग्रहण जिसने श्री बाबू के शानदार दौर पर भी छोड़ दिए अपने कुछ गहरे निशान
देखिए, एक पुरानी कहावत है की चांद में भी दाग होता है। दुनिया का कोई भी सिस्टम या कोई भी दौर 100 प्रतिशत परफेक्ट नहीं हो सकता।
एक निष्पक्ष और सच्चा इतिहास वही है जो सिर्फ तारीफों के पुल न बांधे, बल्कि उस दौर की कमियों और चुनौतियों को भी आईना दिखाए।
श्री बाबू का विज़न बेदाग़ था, उनकी नीयत एकदम साफ़ थी, लेकिन उनके उसी स्वर्ण युग के दौरान कुछ ऐसे बीज भी बोए गए जो आगे चलकर बिहार की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण बने।
हम बात कर रहे हैं ‘जातीय राजनीति’ (Caste Politics) और ‘गुटबाज़ी’ की। उस दौर की कांग्रेस में दो सबसे बड़े और कद्दावर चेहरे थे- एक तरफ थे मुख्यमंत्री ‘डॉ. श्रीकृष्ण सिंह’ (जो भूमिहार समाज से आते थे) और दूसरी तरफ थे राज्य के वित्त मंत्री ‘डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा’ (जो राजपूत समाज से थे)।
सच तो ये है की श्री बाबू और अनुग्रह बाबू के बीच आपसी सम्मान बहुत ज़्यादा था। दोनों ने आज़ादी की लड़ाई साथ लड़ी थी और एक-दूसरे को ‘बड़ा भाई’ और ‘छोटा भाई’ मानते थे।
लेकिन दिक्कत इन दोनों नेताओं में नहीं, बल्कि इनके पीछे चलने वाले समर्थकों में थी। नीचे के कार्यकर्ताओं और छोटे नेताओं ने सत्ता और मलाई के चक्कर में पूरी पार्टी को दो जातियों के खेमे में बांट दिया था।
एक खेमा ‘श्री बाबू’ का था और दूसरा ‘अनुग्रह बाबू’ का। इन दोनों गुटों के बीच सत्ता और वर्चस्व की एक दबी हुई लेकिन भयंकर खींचतान चलती रहती थी।
बाद में यही लड़ाई महेश प्रसाद सिन्हा और के.बी. सहाय जैसे नेताओं के बीच भी गुटबाज़ी के रूप में सामने आई।
कई बड़े राजनीतिक विश्लेषक आज भी मानते हैं की बिहार की राजनीति में जातिवाद का जो कैंसर आज हमें हर जगह दिखाई देता है, उसका पहला इंफेक्शन उसी दौर की सत्ता की लड़ाई से शुरू हुआ था।
इसके अलावा, श्री बाबू का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी कदम जो ‘ज़मींदारी उन्मूलन’ था, वो भी ज़मीन पर 100 प्रतिशत सफल नहीं हो पाया। कानून तो बहुत शानदार था, लेकिन उसे लागू करने वाले जो अफसर और नौकरशाह (Bureaucrats) थे, वो सामंती थे।
सिस्टम में बैठे इन भ्रष्ट बाबुओं ने ज़मींदारों को कानून की कमियां (Loopholes) बता दीं। नतीजा ये हुआ की बड़े-बड़े ज़मींदारों ने रातों-रात अपनी हज़ारों एकड़ ज़मीनें अपने नौकरों, दूर के रिश्तेदारों और यहाँ तक की अपने घर के कुत्तों-बिल्लियों के नाम पर ‘बेनामी’ रूप से दर्ज़ करा दीं!
श्री बाबू की लाख कोशिशों के बावजूद जो फायदा एकदम निचले तबके के गरीब और भूमिहीन किसान को पूरा मिलना चाहिए था, वो बीच में ही मार लिया गया।
आख़िरी सांस तक राज्य की सेवा और श्री बाबू के जाने के बाद कैसे बिखर गया एक महान और आधुनिक बिहार का सपना
खैर, इन कुछ कमियों को अगर दरकिनार कर दें, तो श्री बाबू का कद इतना विशाल था की वो इन सारी छोटी-मोटी राजनीति से बहुत ऊपर उठ चुके थे।
वो एक ऐसे राजनेता थे जो अपनी आख़िरी सांस तक सिर्फ और सिर्फ अपने राज्य और जनता के लिए जीते रहे। 31 जनवरी 1961 को, जब वो बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ही विराजमान थे, तब इस महान आत्मा ने अपनी आख़िरी सांस ली।
श्री बाबू के निधन की खबर ने पूरे बिहार को रुला कर रख दिया था। लोगों को उस वक़्त शायद इस बात का अंदाज़ा नहीं था की उनके जाने के साथ ही सिर्फ एक नेता का अंत नहीं हुआ है, बल्कि ‘आधुनिक बिहार’ के उस सुनहरे सपने का भी अंत हो गया है जिसे उन्होंने पिछले 15 सालों में खून-पसीना एक करके बुना था।
अगर हम उनके दौर की सबसे बड़ी नाकामी की बात करें, तो वो शायद ये थी की वो अपने पीछे नेताओं की कोई ऐसी ‘सेकंड लाइन’ (Second line of leadership) तैयार नहीं कर पाए जो उनके विज़न को आगे ले जा सके।
उनके गुज़रने के बाद तो जैसे बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया। सत्ता की ऐसी अंधी भूख जगी और कुर्सी के लिए ऐसी लड़ाई शुरू हुई की विकास, कारखाने, स्कूल और सुशासन जैसे शब्द राजनीति के डस्टबिन में फेंक दिए गए।
आने वाले दशकों में जाति ही बिहार की इकलौती सियासी करेंसी बन गई। श्री बाबू ने जिन कारखानों की नींव रखी थी, उन पर जंग लगने लगा।
जो यूनिवर्सिटीज़ कभी पूरे देश को टॉपर्स देती थीं, वो राजनीति का अखाड़ा बन गईं। और जो बिहार 1950 के दशक में देश का सबसे बेहतरीन प्रशासित और नंबर वन राज्य था, वो धीरे-धीरे अपराध, भ्रष्टाचार, गरीबी और पलायन की आग में झुलस गया।
