भारत की वो बेटी जो बंटवारे के शरणार्थियों की जान बचाने वाली डॉक्टर भी बनीं और ब्रिटिश हुकूमत की काल भी, ‘रानी झाँसी रेजीमेंट’ की महान क्रांतिकारी ‘लक्ष्मी सहगल’ को जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि

इतिहास के पन्नों में वैसे तो कई तारीखें दर्ज़ हैं, लेकिन आज 24 अक्टूबर का दिन हर उस हिंदुस्तानी के लिए खास है जिसके सीने में अपने देश के लिए अथाह प्रेम छलकता है।

दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं जिनके एक हाथ में इंसानियत की जान बचाने वाला स्टेथोस्कोप हो, और दूसरे हाथ में दुश्मनों की खोपड़ी उड़ाने वाली बंदूक!

आज ही के दिन 1914 में भारत की धरती पर एक ऐसी शेरनी ने जन्म लिया था, जिसने महलों की ऐशो-आराम वाली ज़िंदगी को लात मार दी, ताकि वो अंग्रेज़ों के खिलाफ जंग-ए-आज़ादी में अपनी जान दांव पर लगा सके।

हम बात कर रहे हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA) की सबसे भरोसेमंद और धाकड़ कमांडर- कैप्टन लक्ष्मी सहगल की।

आज़ादी के दीवानों के लिए वो ‘कैप्टन लक्ष्मी’ थीं, अंग्रेज़ों के लिए वो साक्षात मौत थीं, और आज़ाद भारत में बंटवारे का दर्द झेल रहे लाखों बेसहारा शरणार्थियों और गरीबों के लिए वो ‘डॉक्टर दीदी’ बन गईं।

उनके अंदर का वो पागलपन ही तो था जिसने एक पढ़ी-लिखी, रसूखदार डॉक्टर को बर्मा के खूंखार जंगलों की धूल फांकने और अंग्रेज़ों की गोलियों का सामना करने पर मजबूर कर दिया।

आज उनकी जयंती है, और ये वक़्त है उस महान बेटी को याद करने का, जिसकी क़र्ज़दार आज भी पूरी इंसानियत है।

मद्रास के रसूखदार परिवार की वो होनहार डॉक्टर जिसने गरीबों के लिए ठुकरा दी अपनी ऐशो-आराम की ज़िंदगी

कैप्टन लक्ष्मी पैदाइशी बागी थीं। 24 अक्टूबर 1914 को मद्रास के एक बेहद अमीर और नामी परिवार में उनका जन्म हुआ।

उनका बचपन का नाम लक्ष्मी स्वामीनाथन था। उनके पिता एस. स्वामीनाथन उस दौर के मद्रास हाई कोर्ट के सबसे टॉप के क्रिमिनल लॉयर हुआ करते थे।

पैसा, रुतबा, गाड़ी-बंगला… किसी चीज़ की कमी नहीं थी। उनकी माँ अम्मू स्वामीनाथन खुद एक बहुत बड़ी आज़ादी की दीवानी और सोशल वर्कर थीं, जिन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाने वाले आंदोलनों में हिस्सा लिया था।

मतलब लक्ष्मी के खून में ही आज़ादी और समाज सेवा का वायरस कूट-कूट कर भरा था। बचपन से ही उन्होंने छुआछूत और जाति-पाति के खिलाफ लड़ना शुरू कर दिया था।

परिवार चाहता था की बेटी पढ़-लिख कर कोई बड़ा मुकाम हासिल करे, और लक्ष्मी ने किया भी। 1938 में उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से बाकायदा MBBS की डिग्री ली और उसके बाद 1940 में गायनेकोलॉजी (Gynaecology) यानी स्त्री रोग विशेषज्ञ का डिप्लोमा भी हासिल कर लिया।

अब ज़रा सोचिए, उस ज़माने में एक महिला MBBS डॉक्टर! वो चाहतीं तो मद्रास में अपना शानदार अस्पताल खोलकर करोड़ों रुपये छाप सकती थीं। ऐशो-आराम की ज़िंदगी उनके कदमों में बिछी थी।

लेकिन इस लड़की के दिमाग में तो कुछ और ही फितूर चल रहा था। 1940 में वो भारत छोड़कर सिंगापुर चली गईं। वहां जाकर उन्होंने क्या किया?

उन्होंने कोई फाइव-स्टार अस्पताल जॉइन नहीं किया, बल्कि सिंगापुर में जाकर गरीब और बेसहारा भारतीय मज़दूरों के लिए अपना एक छोटा सा क्लिनिक खोल दिया।

उन दिनों सिंगापुर में भारत से गए हज़ारों गरीब मज़दूर रबर के बागानों में जानवरों की तरह काम करते थे। ना उनके पास इलाज के पैसे थे, ना कोई उनका हाल पूछने वाला था।

डॉक्टर लक्ष्मी ने अपने पैसों से इन मज़दूरों और उनकी औरतों का मुफ़्त इलाज करना शुरू किया। वहीं से उनके अंदर का वो इंसान पूरी तरह से जाग गया जिसे अब सिर्फ लोगों का दर्द दिखाई देता था।

नेताजी की एक हुंकार और जन्म हुआ अंग्रेजों की नींदें हराम करने वाली दुनिया की पहली महिला ‘रानी झाँसी रेजीमेंट’ का

सिंगापुर में क्लिनिक चलाते-चलाते 1943 का वो साल आ गया, जिसने डॉक्टर लक्ष्मी की पूरी ज़िंदगी को ही पलट कर रख दिया।

ये वो वक़्त था जब दूसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर था और 2 जुलाई 1943 को एक ऐसा शख्स सिंगापुर की धरती पर उतरा जिसकी आवाज़ सुनकर मुर्दों में भी जान आ जाती थी- नेताजी सुभाष चंद्र बोस!

नेताजी ने सिंगापुर पहुंचते ही आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA) की कमान संभाली और ऐलान कर दिया की “दिल्ली चलो!” नेताजी की सोच एकदम साफ थी।

उन्होंने भरी सभा में गरजते हुए कहा की भारत की आज़ादी की इस आखिरी लड़ाई में सिर्फ मर्द नहीं लड़ेंगे, हमारी औरतें भी पीछे नहीं रहेंगी।

उन्हें सिर्फ घायलों की मरहम-पट्टी करने वाली नर्सें नहीं चाहिए थीं, उन्हें वो शेरनियां चाहिए थीं जो राइफल और स्टेनगन लेकर अंग्रेजों के सीने छलनी कर सकें।

डॉक्टर लक्ष्मी ने जब नेताजी का ये भाषण सुना, तो वो खुद को रोक नहीं पाईं। वो तुरंत नेताजी से मिलने पहुंच गईं। नेताजी को भी बस ऐसे ही किसी जुनूनी की तलाश थी।

उन्होंने डॉक्टर लक्ष्मी को ज़िम्मा सौंपा की जाओ और औरतों की एक पूरी फ़ौज खड़ी कर दो। और फिर जो हुआ, वो दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार था।

लक्ष्मी ने रातों-रात सिंगापुर और आस-पास के इलाकों में रहने वाली भारतीय महिलाओं को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। ये वो औरतें थीं जिन्होंने कभी चाकू तक नहीं पकड़ा था, जो घरों में रोटियां सेंकती थीं।

लेकिन डॉक्टर लक्ष्मी के जज़्बे ने उनके अंदर ऐसी आग भर दी कि हज़ारों औरतें अपना घर-बार छोड़कर आज़ादी की इस लड़ाई में कूद पड़ीं।

देखते ही देखते महिलाओं की एक पूरी की पूरी लड़ाकू टुकड़ी (Combat Force) खड़ी हो गई, जिसका नाम रखा गया ‘रानी झाँसी रेजीमेंट’।

आपको जानकर हैरानी होगी दोस्त, की ये दुनिया के इतिहास की सबसे पहली ऑल-फीमेल कॉम्बैट रेजीमेंट थी!

अंग्रेजों के तो पसीने छूट गए ये देखकर की हिंदुस्तानी औरतें साड़ियां छोड़कर खाकी वर्दी पहन रही हैं और राइफलों में गोलियां लोड कर रही हैं।

इसी ‘रानी झाँसी रेजीमेंट’ की कमान सौंपी गई डॉक्टर लक्ष्मी स्वामीनाथन को। उन्होंने अपना क्लिनिक बंद किया, गले से स्टेथोस्कोप निकाला और कंधे पर राइफल टांग ली।

उस दिन के बाद से वो होनहार डॉक्टर हमेशा-हमेशा के लिए ‘कैप्टन लक्ष्मी’ बन गई, जिसके नाम से ही ब्रिटिश हुकूमत की रूह कांपने लगी थी।

बर्मा के खूंखार जंगलों में ब्रिटिश हुकूमत का काल बनी ये बेटी और फिर हंसते-हंसते झेली जेल की यातनाएं

चलिए अब चलते हैं दिसंबर 1944 के उस खौफनाक दौर में, जब दूसरा विश्व युद्ध अपने उफान पर था।

कैप्टन लक्ष्मी अपनी लड़ाकू महिलाओं की फ़ौज लेकर बर्मा के बेहद घने और खूंखार जंगलों में घुस गईं।

इन महिलाओं ने जापानी सेना और INA के बाकी सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज़ों के खिलाफ छापामार (Guerrilla) युद्ध लड़ा।

जब ये औरतें जंगलों से निकलकर अंग्रेज़ी कैंपों पर गोलियां बरसाती थीं, तो गोरे सैनिकों के पसीने छूट जाते।

लेकिन युद्ध हमेशा जज़्बे से नहीं, कई बार हथियारों और रसद से भी जीता जाता है। 1945 आते-आते जापानी सेना कमज़ोर पड़ने लगी और आज़ाद हिन्द फ़ौज को पीछे हटना पड़ा।

मई 1945 में अंग्रेज़ों ने आखिरकार कैप्टन लक्ष्मी को गिरफ्तार कर लिया। गोरों को लगा की अब तो ये टूट जाएगी, लेकिन जब उसे हथकड़ियां पहनाई गईं, तो कैप्टन लक्ष्मी के चेहरे पर एक गज़ब की मुस्कान और आँखों में वही आग थी।

अंग्रेज़ उन्हें सीधा जेल में डालने से डर गए क्योंकि उन्हें पता था की अगर इस शेरनी को भारत भेजा गया तो पूरे देश में बवाल मच जाएगा।

इसलिए उन्हें बर्मा के ही जंगलों में हाउस अरेस्ट (नज़रबंद) करके रखा गया। और जब आख़िरकार मार्च 1946 में उन्हें भारत वापस लाया गया, तब तक कैप्टन लक्ष्मी पूरे हिंदुस्तान के लिए एक किवदंती (Legend), एक ज़िंदा मसीहा बन चुकी थीं।

पूरे देश में उनके नाम के नारे लग रहे थे।

जब आज़ादी के जश्न के बीच लहूलुहान हुआ देश और कैप्टन लक्ष्मी बन गईं बंटवारे के शरणार्थियों की मसीहा

1947 का वो साल आ गया। देश आज़ाद हुआ, लेकिन अपने साथ वो एक ऐसा भयंकर ज़ख्म लेकर आया जिसका दर्द आज तक महसूस होता है- बंटवारा!

इसी बीच मार्च 1947 में कैप्टन लक्ष्मी ने INA के ही एक बेहद जाबांज और मशहूर अफसर, कर्नल प्रेम कुमार सहगल से शादी कर ली। (ये वही प्रेम कुमार सहगल थे जिन पर अंग्रेज़ों ने लाल किले में मशहूर INA ट्रायल चलाया था)।

शादी के बाद ये दोनों पति-पत्नी यूपी के कानपुर आकर बस गए।

अगस्त 1947 में जब दिल्ली में आज़ादी का जश्न मन रहा था, तब ज़मीनी हकीकत कुछ और ही थी। पाकिस्तान से अपना सब कुछ लुटाकर, खून से लथपथ हिन्दू और सिख शरणार्थी (Refugees) मालगाड़ियों में भर-भर कर कानपुर स्टेशन पर उतर रहे थे।

किसी का घर जल गया था, किसी के परिवार वालों को ज़िंदा काट दिया गया था। हज़ारों लोग कानपुर के गंदे और खचाखच भरे शरणार्थी कैंपों में पड़े थे। ना उनके पास खाने को एक दाना था, ना इलाज के लिए पैसे।

ऐसे में कैप्टन लक्ष्मी चैन से कैसे बैठ सकती थीं? उन्होंने तुरंत अपना पुराना मेडिकल किट उठाया और उन शरणार्थी कैंपों में घुस गईं।

दिन-रात एक करके कैप्टन लक्ष्मी ने उन कैंपों में हज़ारों औरतों की डिलीवरी करवाई, बीमारों का इलाज किया और रोते हुए लोगों को गले लगाकर ढांढस बंधाया।

जो औरत अंग्रेज़ों के लिए काल थी, वो उन बेबस शरणार्थियों के लिए साक्षात भगवान बन गई। उन्होंने किसी से इलाज का एक पैसा नहीं लिया।

92 साल की उम्र तक सिर्फ 10 रुपये में इलाज करने वाली वो ‘डॉक्टर दीदी’ जिसने मरते दम तक नहीं छोड़ा इंसानियत का साथ

आज़ादी के बाद अगर कैप्टन लक्ष्मी ने कानपुर में ही एक छोटा सा क्लिनिक खोल लिया और इंसानियत की सेवा में लग गईं।

कानपुर वाले उन्हें ‘डॉक्टर दीदी’ या ‘कैप्टन सहगल’ कहते थे। आपको सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे की वो अपनी ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव तक, जी हाँ, 90 और 92 साल की उम्र में भी, सुबह ठीक 9 बजे अपने क्लिनिक पहुँच जाती थीं।

वो व्हीलचेयर पर बैठकर भी मरीज़ों को देखती थीं! उनकी फीस क्या थी? सिर्फ 10 या 20 रुपये! और अगर कोई गरीब रिक्शेवाला या मज़दूर आ जाए जिसके पास पैसे न हों, तो इलाज बिल्कुल मुफ़्त, और कई बार तो वो दवाइयां भी अपनी जेब से ही खरीद कर दे देती थीं।

23 जुलाई 2012… यह वो दिन था जब कानपुर का आसमान भी रो पड़ा। 97 साल की उम्र में इस महान आत्मा ने अपनी आख़िरी सांस ली।

लेकिन जाते-जाते भी वो देश और इंसानियत को बहुत कुछ दे गईं।

कैप्टन लक्ष्मी ने वसीयत की थी की मरने के बाद भी उनका शरीर किसी काम आना चाहिए। उनके जाने के बाद उनकी आँखें और उनका पूरा शरीर कानपुर के GSVM मेडिकल कॉलेज को रिसर्च के लिए दान कर दिया गया।

आपको बता दें की 1998 में भारत सरकार ने कैप्टन लक्ष्मी को देश के दूसरे सबसे बड़े सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से नवाज़ा था।

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