आज जब भी हम देश की राजनीति की बात करते हैं, तो गुजरात का ज़िक्र सबसे ऊपर आता है। आज गुजरात में भारतीय जनता पार्टी का एक ऐसा अभेद्य किला खड़ा है, जिसे पिछले तीन दशकों से कोई भी विरोधी दल भेद नहीं पाया है।
लोग अक्सर इस अजेय किले का सारा श्रेय आज के दौर के नेताओं को दे देते हैं, लेकिन सियासत की एक पुरानी कहावत है की इमारत की चमक तो सबको दिखती है, पर उस नींव की ईंट को कोई याद नहीं रखता जिसने खुद को मिट्टी में गाड़कर उस पूरी इमारत का बोझ उठाया हो।
गुजरात की राजनीति में वो नींव की ईंट, वो शिल्पकार और कोई नहीं, बल्कि केशुभाई पटेल थे। पूरे गुजरात में लोग उन्हें प्यार और सम्मान से ‘बापा’ (पिता तुल्य) कहकर बुलाते थे।
यह वो शख़्स था जिसने उस दौर में गुजरात के रास्तों पर साइकिल और स्कूटर चलाकर जनसंघ और बीजेपी का झंडा उठाया था, जब कांग्रेस के सामने कोई सांस लेने की भी हिम्मत नहीं करता था।
उनकी कहानी एक ऐसे सियासी सफर की दास्तान है जिसमें कामयाबी का शिखर भी है, अपनों की बगावत का दर्द भी है, और कुदरत की वो बेतरतीब मार भी है जिसने एक कद्दावर मुख्यमंत्री को कुर्सी से उतरने पर मजबूर कर दिया।
चलिए, गुजरात की राजनीति के उस ‘भीष्म पितामह’ के जीवन के उन पन्नों को पलटते हैं, जो आज भी कई अनकहे किस्सों से भरे पड़े हैं।

साइकिल पर गांव-गांव घूमकर खड़ा किया था वो बीजेपी का अभेद्य किला जिस पर आज तक भगवा लहरा रहा है
केशुभाई का जन्म 24 जुलाई 1928 को गुजरात के जूनागढ़ ज़िले के एक छोटे से गांव विसावदर में हुआ था।
राजनीति और समाज सेवा का कीड़ा उनके अंदर बहुत कम उम्र में ही जाग गया था। महज़ 17 साल की उम्र थी जब 1945 में उन्होंने खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जोड़ लिया।
जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की, तो केशुभाई गुजरात में जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक बन गए।
उनका असली सियासी संघर्ष शुरू हुआ 1975 की उस इमरजेंसी (आपातकाल) के दौर में। इंदिरा गांधी सरकार ने जब देश भर के विपक्षी नेताओं को रातों-रात सलाखों के पीछे धकेलना शुरू किया, तो केशुभाई भी उसी लपेटे में आ गए।
उन्होंने जेल की लंबी सजा काटी, लेकिन जब वो जेल से बाहर निकले तो उनका राजनीतिक कद बहुत बड़ा हो चुका था।
1980 के दशक का वो दौर गुजरात में कांग्रेस का स्वर्ण युग माना जाता था। उस वक्त बीजेपी के पास न तो पैसा था, न संसाधन और न ही कोई बहुत बड़ा जनाधार।
तब गुजरात की सड़कों पर तीन लोगों की एक तिकड़ी दिन-रात एक कर रही थी- केशुभाई पटेल, शंकरसिंह वाघेला और एक बेहद युवा आरएसएस प्रचारक नरेंद्र मोदी।
ये तीनों नेता चिलचिलाती धूप में साइकिलों और पुराने स्कूटर्स पर बैठकर गुजरात के गांव-गांव का दौरा करते थे।
केशुभाई पटेल का किसानों और गांव वालों से कनेक्ट इतना ज़बरदस्त था की लोग उनके एक इशारे पर अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार रहते थे।

कांग्रेस के अजेय KHAM के जादू को तोड़कर जब 1995 में पहली बार गुजरात के ‘बापा’ ने पहना था मुख्यमंत्री का ताज
80 के दशक में कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी ने गुजरात में एक ऐसा सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला तैयार किया था जिसे भेद पाना नामुमकिन सा लगता था।
इस फार्मूले का नाम था ‘KHAM’ यानी क्षत्रिय (Kshatriya), हरिजन (Harijan), आदिवासी (Adivasi) और मुस्लिम (Muslim)।
इस अजेय वोट बैंक के दम पर कांग्रेस ने 1985 के विधानसभा चुनाव में 149 सीटें जीतने का वो रिकॉर्ड बनाया था, जिसे हाल ही में जाकर बीजेपी तोड़ पाई है।
लेकिन माधवसिंह सोलंकी के इस KHAM फार्मूले में एक बहुत बड़ी सियासी चूक हो गई थी। उन्होंने गुजरात के सबसे ताकतवर, सबसे अमीर और सबसे प्रभावी समुदाय- ‘पाटीदार’ (पटेल) समाज को सत्ता के समीकरण से पूरी तरह किनारे कर दिया था।
पाटीदार समाज इस बात से खुद को अपमानित और ठगा हुआ महसूस कर रहा था। पूरे गुजरात के पटेलों के अंदर कांग्रेस के खिलाफ एक भयंकर गुस्सा उबल रहा था।
केशुभाई पटेल खुद लेउवा पाटीदार समुदाय से आते थे। उन्होंने समाज की नब्ज़ पकड़ी और पाटीदारों के इस उबलते हुए गुस्से को बहुत ही सधे हुए तरीके से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मोड़ दिया।
उन्होंने पाटीदारों को ये अहसास दिलाया की अगर तुम्हें अपना सम्मान वापस चाहिए, तो तुम्हें एकजुट होकर बीजेपी के झंडे तले आना होगा। केशुभाई का कद इतना बड़ा हो गया की पूरा पाटीदार समाज उन्हें अपना निर्विवाद नेता और ‘बापा’ मानने लगा।
इसी धरातल की मेहनत, पाटीदारों के एकतरफा समर्थन और हिंदुत्व की लहर का नतीजा था की 1995 के विधानसभा चुनाव में गुजरात की राजनीति का सबसे बड़ा चमत्कार हुआ।
कांग्रेस का KHAM तिलिस्म भरभरा कर गिर गया और भारतीय जनता पार्टी ने 121 सीटों के भारी-भरकम बहुमत के साथ इतिहास में पहली बार गुजरात की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया।
और इस ऐतिहासिक जीत के बाद जब मुख्यमंत्री का ताज पहनने की बारी आई, तो सबकी पहली और इकलौती पसंद थे- केशुभाई पटेल। 14 मार्च 1995 को उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
अपनों की वो ऐतिहासिक बगावत और मशहूर ‘खजुराहो कांड’ जिसने सिर्फ सात महीने में ही छीन ली थी केशुभाई की कुर्सी
केशुभाई ने जब मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभाली, तो लगा की अब गुजरात में बीजेपी दशकों तक आराम से राज करेगी। लेकिन सियासत में अक्सर जो दिखता है, वो होता नहीं है।
सत्ता मिलते ही पार्टी के अंदर वर्चस्व और गुटबाजी की एक ऐसी खौफनाक जंग शुरू हुई, जिसने सिर्फ सात महीने में ही बीजेपी की इस पहली सरकार की नींव हिला कर रख दी।
असल में, केशुभाई के ही पुराने साथी शंकरसिंह वाघेला खुद को मुख्यमंत्री पद का असली हकदार मानते थे।
जब पार्टी हाईकमान ने वाघेला को किनारे करके केशुभाई को सत्ता सौंप दी और युवा नरेंद्र मोदी का पार्टी संगठन में कद बढ़ने लगा, तो वाघेला के अंदर बगावत की आग सुलग उठी।
केशुभाई को सरकार चलाते हुए अभी ठीक से छह-सात महीने ही हुए थे की गुजरात की राजनीति में वो कांड हो गया, जिसे आज भी ‘खजुराहो कांड’ के नाम से जाना जाता है।
सितंबर 1995 में जब केशुभाई पटेल एक आधिकारिक दौरे पर अमेरिका गए हुए थे, तब पीछे से शंकरसिंह वाघेला ने अपनी ही पार्टी की पीठ में छुरा घोंप दिया।
वाघेला ने बीजेपी के 47 बागी विधायकों को इकट्ठा किया और उन्हें रातों-रात एक चार्टर्ड फ्लाइट में बिठाकर मध्य प्रदेश के खजुराहो के एक फाइव स्टार होटल में ले जाकर कैद कर दिया।
उस वक्त मध्य प्रदेश में कांग्रेस (दिग्विजय सिंह) की सरकार थी, जिसने वाघेला को पूरा लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया।
बगावत इतनी भयंकर थी की दिल्ली में बैठे अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के पसीने छूट गए। आनन-फानन में अटल जी को गुजरात भेजा गया ताकि वाघेला और केशुभाई के बीच कोई समझौता कराया जा सके।
लेकिन बात बहुत आगे निकल चुकी थी। वाघेला किसी भी कीमत पर केशुभाई को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। आख़िरकार, पार्टी को टूट से बचाने के लिए दिल्ली हाईकमान को झुकना पड़ा।
अक्टूबर 1995 में भारी मन और आंखों में आंसू लिए केशुभाई पटेल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके बाद वाघेला गुट के सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बनाया गया (हालांकि बाद में वाघेला ने उन्हें भी गिरा दिया और अपनी अलग पार्टी बना ली)।

गोकुल ग्राम का वो सुनहरा सपना और IT पॉलिसी का ब्लूप्रिंट जिसने रखा था आज के आधुनिक गुजरात का बेस
सियासत में एक बात हमेशा कही जाती है की जो नेता ज़मीन से जुड़ा होता है, उसे आप एक बार धोखा देकर कुर्सी से तो उतार सकते हैं, लेकिन लोगों के दिलों से नहीं निकाल सकते।
शंकरसिंह वाघेला की बगावत के बाद गुजरात में जो सियासी नौटंकी चली, उससे राज्य की जनता भयंकर तरीके से ऊब चुकी थी। वाघेला की अपनी बनाई हुई ‘राजपा’ सरकार भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया।
आखिरकार 1998 में गुजरात में फिर से विधानसभा चुनाव हुए। इस बार जनता ने ठान लिया था की अपने असली ‘बापा’ को ही गद्दी पर बैठाना है।
केशुभाई पटेल के चेहरे पर बीजेपी ने 117 सीटें जीतकर एक बार फिर शानदार वापसी की और केशुभाई दूसरी बार डंके की चोट पर मुख्यमंत्री बने।
ये वो दौर था जब केशुभाई पटेल के अंदर का असली ‘विज़नरी’ (दूरदर्शी) नेता निखर कर सामने आया। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला जिसने उन्हें गांव-गांव में भगवान बना दिया।
इस योजना का नाम था- ‘गोकुल ग्राम योजना’।
केशुभाई का सपना था की गुजरात के 18,000 से ज़्यादा गांवों को बिल्कुल शहरों जैसी सुख-सुविधाएं दी जाएं। हर गांव में पक्की सड़कें, 24 घंटे बिजली, पीने का साफ पानी, पक्के स्कूल और पंचायत घर बनाने का काम युद्ध स्तर पर शुरू हुआ।
इस योजना ने गांवों की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी और किसानों के बीच केशुभाई का रुतबा इतना बढ़ गया की कोई उनके खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकता था।
लेकिन वो सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रहे। आज जिस ‘वाइब्रेंट गुजरात’ (Vibrant Gujarat) के इंडस्ट्रियल और आधुनिक मॉडल की पूरी दुनिया में चर्चा होती है, उसकी पहली ईंट भी केशुभाई ने ही रखी थी।
1998 में, जब देश के कई राज्यों के नेताओं को ‘इंटरनेट’ और ‘सॉफ्टवेयर’ का मतलब भी ठीक से पता नहीं था, तब केशुभाई सरकार गुजरात की सबसे पहली ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) पॉलिसी’ लेकर आई थी।
इसके साथ ही उन्होंने सरदार सरोवर डैम (नर्मदा प्रोजेक्ट) के काम में ऐसी तेज़ी दिखाई जो पहले कभी नहीं दिखी थी। उनका सपना था की नर्मदा का पानी गुजरात के उस सूखे सौराष्ट्र और कच्छ तक पहुंचे, जहां की औरतें पानी के लिए कोसों पैदल चलती थीं।
गुजरात में चौड़ी सड़कों और स्टेट हाइवे का जो जाल आज आप देखते हैं, उसकी नींव भी इसी 1998 से 2001 वाले कार्यकाल में ही रखी गई थी।
1998 का कांडला तूफान और 2001 का भुज भूकंप जो केशुभाई पटेल के सियासी सफर के लिए बन गया सबसे बड़ा काल
एक नेता के रूप में केशुभाई पटेल का विज़न बहुत शानदार था, लेकिन एक अच्छा विज़नरी होना और संकट के समय एक अच्छा ‘क्राइसिस मैनेजर’ (Crisis Manager) होना, दोनों में बहुत बड़ा फर्क होता है।
कुदरत ने केशुभाई पटेल का इम्तिहान लेने के लिए उनके रास्ते में दो ऐसी खौफनाक आपदाएं खड़ी कर दीं, जिनमें उनका पूरा का पूरा प्रशासनिक तंत्र ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
पहली विपदा आई 1998 के जून महीने में, जब केशुभाई को दोबारा मुख्यमंत्री बने मुश्किल से तीन महीने ही हुए थे। गुजरात के कांडला बंदरगाह पर एक ऐसा विनाशकारी साइक्लोन (समुद्री तूफान) टकराया, जिसने सब कुछ तबाह कर दिया।
हजारों लोग इस तूफान की भेंट चढ़ गए। सरकार को तूफान की चेतावनी पहले से थी, लेकिन प्रशासन की लापरवाही और राहत कार्यों (Relief work) में हुई भयंकर देरी ने लोगों का गुस्सा भड़का दिया।
लेकिन यह तो सिर्फ एक ट्रेलर था। केशुभाई पटेल के सियासी सफर का असली काल बनकर आई 26 जनवरी 2001 की वो खौफनाक सुबह। पूरा देश गणतंत्र दिवस का जश्न मना रहा था की तभी सुबह 8:46 बजे गुजरात की धरती 7.7 तीव्रता के एक विनाशकारी भूकंप से कांप उठी।
कच्छ, भुज, अंजार, रापर और यहां तक की अहमदाबाद… कुछ ही सेकंड्स में इन शहरों की बड़ी-बड़ी इमारतें मलबे के ढेरों में तब्दील हो गईं। इस दिल दहला देने वाले भूकंप ने 20,000 से ज़्यादा लोगों को ज़िंदा निगल लिया।
ऐसे नाज़ुक वक्त में जनता को उम्मीद थी की सरकार उनके आंसू पोंछने के लिए चौबीसों घंटे सड़क पर होगी। लेकिन दुर्भाग्य से, केशुभाई पटेल की सरकार का पूरा का पूरा एडमिनिस्ट्रेशन लकवाग्रस्त हो गया।
राहत सामग्री सही लोगों तक नहीं पहुँच पा रही थी। नौकरशाही (Bureaucracy) पूरी तरह से बेलगाम हो गई थी और अफसर नेताओं की बात नहीं सुन रहे थे।
कई जगहों पर तो हफ्तों तक मलबा नहीं हटाया जा सका। प्रशासन की इस सुस्ती और संवेदनहीनता ने लोगों के दिलों में सरकार के खिलाफ एक ऐसा ज्वालामुखी भर दिया, जो किसी भी वक्त फटने वाला था।

जब जनता के टूटते भरोसे ने मजबूर किया और दिल्ली हाईकमान ने भेज दिया नरेंद्र मोदी को गुजरात का नया मुख्यमंत्री बनाकर
भूकंप के बाद सरकार की इस भयंकर नाकामी ने गुजरात में केशुभाई के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को चरम पर पहुंचा दिया था। जनता का भरोसा टूट चुका था और इसका सीधा असर चुनावों के नतीजों पर दिखने लगा।
सितंबर 2001 में गुजरात में दो बड़े उप-चुनाव (By-elections) हुए। एक साबरकांठा लोकसभा सीट का और दूसरा साबरमती विधानसभा सीट का।
ये दोनों सीटें भारतीय जनता पार्टी के अजेय गढ़ माने जाते थे। लेकिन जब नतीजे आए, तो बीजेपी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पार्टी ये दोनों ही सीटें बुरी तरह हार गई।
दिल्ली में बैठे अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को यह बात शीशे की तरह साफ हो गई की अगर केशुभाई पटेल के नेतृत्व में ही 2002 का विधानसभा चुनाव लड़ा गया, तो बीजेपी का सूपड़ा साफ होना तय है।
केशुभाई की उम्र भी काफी हो चुकी थी (वह 73 साल के थे) और उनकी सेहत भी उनका साथ नहीं दे रही थी।
पार्टी हाईकमान को अब एक ऐसा युवा, तेज-तर्रार और कड़क क्राइसिस मैनेजर चाहिए था, जो ढीली पड़ चुकी अफसरशाही के पेंच कस सके और जनता का खोया हुआ भरोसा वापस जीत सके।
और फिर आया अक्टूबर 2001 का वो ऐतिहासिक हफ्ता, जिसने भारत की राजनीति की दिशा ही बदल कर रख दी। दिल्ली से फरमान आया और पार्टी ने केशुभाई पटेल से उनका इस्तीफा मांग लिया।
पार्टी के आदेश का पालन करते हुए केशुभाई ने मुख्यमंत्री पद की कुर्सी छोड़ दी।
उनकी जगह दिल्ली से उस शख़्स को गुजरात का नया मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया, जिसने 80 के दशक में केशुभाई के साथ ही साइकिल पर घूम-घूमकर पार्टी खड़ी की थी- नरेंद्र मोदी।
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
किसने सोचा था की कुदरत की वो एक मार और प्रशासन की वो एक चूक सिर्फ एक मुख्यमंत्री की विदाई का कारण नहीं बनेगी, बल्कि भारत के भविष्य के प्रधानमंत्री के उदय की सबसे बड़ी वजह बन जाएगी!
कुर्सी छिनने की वो टीस जब 84 साल की उम्र में अपनी ही खड़ी की हुई पार्टी के खिलाफ केशुभाई ने फूंक दिया था बगावत का बिगुल
एक ऐसे नेता के लिए, जिसने साइकिल के पैडल मार-मारकर एक पूरी की पूरी पार्टी खड़ी की हो, यह बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल था की अब उसी पार्टी में उसे हाशिए पर धकेल दिया गया है।
जैसे-जैसे गुजरात में नरेंद्र मोदी का कद बढ़ता गया और ‘गुजरात मॉडल’ की गूंज पूरे देश में सुनाई देने लगी, वैसे-वैसे केशुभाई पटेल और उनके समर्थकों के भीतर यह टीस और गहरी होती चली गई।
आखिरकार 2012 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह ज्वालामुखी फट गया। केशुभाई पटेल ने ऐलान कर दिया की वो अब भारतीय जनता पार्टी में नहीं रहेंगे।
अगस्त 2012 में उन्होंने बीजेपी से इस्तीफा दे दिया और अपनी एक नई राजनीतिक पार्टी बना ली, जिसका नाम रखा गया ‘गुजरात परिवर्तन पार्टी’ (GPP)।
जब 2012 के चुनाव नतीजे आए, तो केशुभाई पटेल को सियासत की सबसे कड़वी हकीकत का सामना करना पड़ा। उनकी बनाई ‘गुजरात परिवर्तन पार्टी’ पूरे राज्य में सिर्फ 2 सीटें जीत पाई।
बगावत में नाकामी के बाद वापस घर वापसी और गुजरात की राजनीति के उस ‘भीष्म पितामह’ की एक खामोश विदाई
2012 की उस करारी हार ने केशुभाई पटेल को यह समझा दिया था की अब गुजरात की राजनीति पूरी तरह से बदल चुकी है।
2014 का वो ऐतिहासिक साल आया, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री पद से उठकर देश के प्रधानमंत्री बनने के लिए दिल्ली कूच कर रहे थे।
इसी बदलते सियासी मौसम में केशुभाई पटेल ने भी एक सुलझा हुआ फैसला लिया। उन्होंने अपनी उस सियासी कड़वाहट और बगावत को खत्म करने का मन बना लिया।
उन्होंने अपनी ‘गुजरात परिवर्तन पार्टी’ का वापस भारतीय जनता पार्टी में विलय (Merger) कर दिया।
यह उनकी ‘घर वापसी’ थी। इसके तुरंत बाद, अपनी ढलती उम्र और खराब होती सेहत का हवाला देते हुए, उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया और सक्रिय राजनीति से हमेशा-हमेशा के लिए संन्यास ले लिया।
और फिर 29 अक्टूबर 2020 का वो दिन आया, जब 92 वर्ष की आयु में गुजरात की राजनीति के इस ‘बापा’ ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं।
भारत सरकार ने मरणोपरांत (Posthumously) देश के प्रति उनके शानदार योगदान के लिए उन्हें भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया।
