बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 12: आज जो तिलचट्टे मोदी को कहते ‘डरपोक’, उन्हें याद करना चाहिए कश्मीर का 1992 का इतिहास, जब आतंकियों की धमकी से दुबक गयी थी कांग्रेस, तब इसी शेर ने लाल चौक पर तिरंगा गाड़ के जीत लिया था हर हिंदुस्तानी का दिल

एक मिनट के लिए सोचिए।

1992। कश्मीर की सड़कों पर खून बह रहा था। मस्जिदों से नरसंहार के नारे गूंज रहे थे। आतंकियों ने खुली चुनौती दी थी – “जिसने मां का दूध पिया है, वो लाल चौक पर तिरंगा फहरा कर दिखाए।”

दिल्ली में कांग्रेस की सरकार बैठी थी। एक भी नेता ने आगे आने की हिम्मत नहीं की।

और फिर एक आदमी आगे बढ़ा। बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के। बिना किसी गारंटी के कि वो जिंदा वापस आएगा।

आज वही आदमी देश का प्रधानमंत्री है। और कुछ लोग उसे ‘डरपोक’ कह रहे हैं।

ये कहानी उन लोगों के लिए है जो इतिहास पढ़े बिना ट्विटर पर क्रांतिकारी बन जाते हैं।

घटना कांग्रेस ने क्या किया मोदी ने क्या किया
आतंकियों का ओपन चैलेंज (1991) दिल्ली में दुबक गए कन्याकुमारी से एकता यात्रा शुरू की
फगवाड़ा हमला (1992) यात्रा रोकने का दबाव डाला मंच से दहाड़ा – फैसला लाल चौक पर होगा
26 जनवरी 1992 कोई सेक्युलर नेता नहीं गया रॉकेट धमाकों के बीच तिरंगा गाड़ दिया
अनुच्छेद 370 (2019) “खून की नदियां बहेंगी” का डर फैलाया 370 उखाड़ फेंका, आज शांति है

1. अमेरिका से लौटा लड़का मोदी को डरपोक कह रहा है

उसने कभी मौत की आंखों में आंखें नहीं डाली

अक्टूबर 2026। दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक लड़का कैमरे के सामने चिल्ला रहा था।

“मैं नरेंद्र मोदी से कहना चाहता हूं, आप एक डरपोक तानाशाह हो।”

नाम है अभिजीत दिपके। कॉकरोच जनता पार्टी नाम का ईकोसिस्टम चलाता है। पहले AAP की सोशल मीडिया टीम में था। ये भाई अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में मास्टर्स करके आए हैं।

सोचिए। अमेरिका के आलीशान कैंपस में बैठकर डॉलर में डिग्री पूरी की। और भारत आकर उस इंसान को डरपोक कह रहे हैं जिसने 1992 में आतंकियों की गोलियों के बीच कश्मीर में तिरंगा फहराया था।

इनको लगता है कि ट्विटर पर चार लाइनें लिख देने से या माइक पकड़कर चिल्ला देने से क्रांतिकारी बन जाते हैं। इन्हें असली डर का मतलब पता ही नहीं। 1992 के कश्मीर की किसी गली में बिना सुरक्षा के खड़ा कर दो, तो समझ आएगा।

जब आप मोदी को डरपोक कहते हैं, तो आप खुद उस इतिहास को याद दिला देते हैं जहां कांग्रेस दुम दबाकर बैठी थी और एक आदमी जान हथेली पर लेकर आगे बढ़ रहा था।

सीधा सवाल · जो आदमी बंदूकों के साये में खड़ा होकर आतंकियों को चुनौती दे सकता है, उसे डरपोक कहने वाले खुद कहां छिपे थे?

2. 1990 का कश्मीर – जब तिरंगा लेकर चलना मौत का फरमान था

1990-91। कश्मीर घाटी पूरी तरह आग में जल रही थी।

कश्मीरी पंडितों का दर्दनाक पलायन हो चुका था। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से अजान की जगह नरसंहार के नारे गूंज रहे थे – “रालिब, गालिब या चालिब।” इस्लाम कबूल करो, मर जाओ, या भाग जाओ।

सड़कों पर कोई कानून नहीं था। पुलिस, प्रशासन, अदालतें – सब ढह चुका था।

JKLF और हिज्बुल मुजाहिदीन का राज था। पाकिस्तान से आई AK-47 के साथ दिन-दहाड़े सरकारी अधिकारियों और जजों को बीच चौराहे पर गोलियों से भून दिया जाता था।

अखबारों में हिट-लिस्ट छपती थी। आज किसे मारा जाएगा।

तिरंगा तो छोड़िए, अगर कोई गलती से ‘जय हिंद’ बोल दे, तो अगले दिन सूरज की रोशनी नसीब नहीं होती।

जिहादियों को लगता था कि अब दिल्ली की किसी सरकार में इतनी हिम्मत नहीं बची कि वो कश्मीर की तरफ आंख उठाकर भी देख सके।

याद रखें · ऐसे माहौल में सड़क पर तिरंगा लेकर चलना सीधे मौत के फरमान पर दस्तखत करने जैसा था।

3. “मां का दूध पिया है तो तिरंगा फहरा कर दिखाओ”

आतंकियों ने पूरे हिंदुस्तान को खुली चुनौती दी

1991 के अंत में आतंकियों ने तय किया कि अब भारत सरकार की इज्जत सरेआम नीलाम की जाए।

उन्हें पता था कि दिल्ली में कांग्रेसी सरकार तुष्टिकरण और खौफ में इतनी डूबी हुई है कि कोई कड़ा एक्शन नहीं लेगी।

श्रीनगर के लाल चौक को अपनी जागीर समझ लिया। दीवारों पर बड़े-बड़े पोस्टर चिपका दिए।

पोस्टर पर लिखा था – “अगर किसी में हिम्मत है, जिसने अपनी मां का दूध पिया है, वो 26 जनवरी को लाल चौक पर आकर तिरंगा फहरा कर दिखाए। जो भी आएगा, जिंदा वापस नहीं जाएगा।”

ये सिर्फ धमकी नहीं थी। ये पूरे 100 करोड़ हिंदुस्तानियों के लिए खुली चुनौती थी।

आतंकियों ने लाल चौक के आसपास स्नाइपर्स बिठा दिए थे। बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं। प्लान साफ था – कोई झंडा लेकर आए तो कैमरे पर गोलियों से छलनी कर देंगे।

अब सवाल था – दिल्ली में बैठी कांग्रेस क्या करेगी?

सोचिए · अगर उस दिन कोई कांग्रेसी नेता आगे आ जाता, तो आज राजनीति की तस्वीर अलग होती। लेकिन वो नहीं आए।

4. कांग्रेस को सांप सूंघ गया

तुष्टिकरण के लालच में पूरे विपक्ष ने घुटने टेक दिए

जब आतंकियों ने खुली चुनौती दी, तो देश की नजरें दिल्ली पर टिक गईं।

केंद्र में पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार थी। लोगों को उम्मीद थी कि सरकार कड़ा रुख अपनाएगी और लाल चौक पर तिरंगा फहराकर जिहादियों का गुरूर तोड़ेगी।

हुआ क्या? दिल्ली के एसी कमरों में बैठे नेताओं को सांप सूंघ गया।

किसी भी कांग्रेसी मंत्री या नेता की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वो कैमरे पर आकर कह सके – “हम जाएंगे और फहराएंगे तिरंगा।”

सिर्फ कांग्रेस नहीं। पूरा सेक्युलर और वामपंथी विपक्ष खामोश हो गया। आज जो ट्विटर पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, उस वक्त उनके मुंह पर ताले लगे हुए थे।

कारण साफ था। मौत का खौफ। और उससे बड़ा – तुष्टिकरण की राजनीति। डर था कि कश्मीर में कड़ा स्टैंड लिया तो एक खास वोटबैंक नाराज हो जाएगा।

कुर्सी और वोटबैंक के लालच ने पूरे विपक्ष की रीढ़ की हड्डी चकनाचूर कर दी।

जब आम नागरिक, फौजी और युवाओं ने देखा कि उनकी चुनी हुई सरकार आतंकियों से डरकर छिप गई है, तो कांग्रेस के लिए एक ऐसी नफरत पैदा हुई जो आज तक खत्म नहीं हुई।

याद रखें · कांग्रेस ने उस दिन साबित कर दिया कि वो सत्ता तो चला सकते हैं, लेकिन जब देश की इज्जत दांव पर हो तो दुम दबाकर भागने वालों में से हैं।
तारीख क्या हुआ
11 दिसंबर 1991 मोदी की रणनीति से कन्याकुमारी से यात्रा शुरू
23 जनवरी 1992 फगवाड़ा में बस पर खूनी हमला, कई शहीद
24 जनवरी 1992 जम्मू में मोदी की ललकार – फैसला लाल चौक पर होगा
26 जनवरी सुबह वायुसेना के प्लेन से श्रीनगर पहुंचे
26 जनवरी लाल चौक रॉकेट धमाकों के बीच तिरंगा फहराया
सीधा सच · जब सरकार घुटने टेक चुकी थी, तब समाज के बीच से नायक उठ खड़ा हुआ।

5. कन्याकुमारी से उठी एकता यात्रा

जब सत्ता हथियार डाल दे, तो समाज से नायक उठता है

जब कांग्रेस ने कश्मीर को उसके हाल पर छोड़ दिया, तब बीजेपी ने देश की इज्जत बचाने का बीड़ा उठाया।

11 दिसंबर 1991 को एकता यात्रा शुरू हुई। दिल्ली के जंतर-मंतर से नहीं। भारत के सबसे दक्षिणी छोर कन्याकुमारी से। उसी विवेकानंद रॉक मेमोरियल से जहां खड़े होकर स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को सनातन की ताकत दिखाई थी।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी यात्रा के नेता थे। टारगेट साफ था – 14 राज्यों को चीरते हुए 7000 किलोमीटर का सफर तय करके ठीक 26 जनवरी 1992 को लाल चौक पहुंचना और झंडा फहराना।

यात्रा जहां से गुजरती, लाखों लोगों का हुजूम उतर आता। “जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है” के नारे आसमान गूंजने लगे।

कांग्रेस के पसीने छूटने लगे। दिल्ली की सरकार को आतंकियों से ज्यादा इस यात्रा से डर लगने लगा। राष्ट्रवादी तबका रातों-रात बीजेपी के झंडे तले एकजुट हो रहा था।

कांग्रेस ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर यात्रा रोकने की कोशिश की। लेकिन जनता जाग चुकी थी।

याद रखें · यह यात्रा सिर्फ राजनीतिक इवेंट नहीं थी। यह पूरे देश का जवाब था आतंकियों की खुली चुनौती का।

6. 41 साल का नरेंद्र मोदी था इस पूरी यात्रा का मास्टरमाइंड

आज जिसे डरपोक कहते हैं, वो तब जमीन पर खून-पसीना एक कर रहा था

डॉ. जोशी यात्रा का चेहरा थे। लेकिन 7000 किलोमीटर और 14 राज्यों वाले इस महायज्ञ का असली रणनीतिकार कौन था? राष्ट्रीय संयोजक थे 41 साल के एक RSS प्रचारक और बीजेपी कार्यकर्ता – नरेंद्र मोदी।

हां। आज जिसे ये लोग डरपोक कहते हैं, वो इंसान उस वक्त जमीन पर खून-पसीना एक कर रहा था।

उस दौर में इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां नहीं होती थीं। बीजेपी के पास भारी सरकारी तंत्र नहीं था। मोदी जी ने एक साधारण मारुति गाड़ी और एक रथ के सहारे पूरे देश का लॉजिस्टिक्स संभाला।

कहां रुकना है, पब्लिक को कैसे जोड़ना है, स्थानीय कमेटियां कैसे बनेंगी, कश्मीर तक का खतरनाक रूट कैसे तय होगा – सब कुछ उस 41 साल के मोदी के दिमाग की उपज थी।

उन्होंने इस यात्रा को सिर्फ राजनीतिक इवेंट नहीं रहने दिया। इसे सीधे कश्मीर के मुद्दे से जोड़ दिया।

गांव-गांव जाकर लोगों को बताया कि हमारी ही जमीन पर तिरंगा फहराने के लिए हमें धमकियां मिल रही हैं।

नतीजा ये हुआ कि कश्मीर से हजारों किलोमीटर दूर बैठा साउथ का आदमी भी लाल चौक पर तिरंगा फहराने के लिए अपनी जान देने को तैयार हो गया।

जो काम पूरी भारत सरकार अपनी पुलिस और इंटेलिजेंस के दम पर नहीं कर पा रही थी, वो काम एक युवा कार्यकर्ता अपने दम पर कर रहा था।

सोचिए · आज का अर्बन-नक्सल ईकोसिस्टम यही बात पचा नहीं पाता कि कैसे एक साधारण कार्यकर्ता पूरे देश के राष्ट्रवादियों को एक धागे में पिरो सकता है।

7. फगवाड़ा में खून से लाल हो गई एकता यात्रा की सड़क

आतंकियों ने निहत्थे राष्ट्रवादियों पर गोलियां बरसा दीं

जैसे-जैसे यात्रा कश्मीर की तरफ बढ़ रही थी, आतंकियों में बौखलाहट बढ़ने लगी। उन्हें समझ आ गया था कि ये लोग कांग्रेस की तरह डरने वाले नहीं हैं। इसलिए उन्होंने सबसे कायराना चाल चली – निहत्थे लोगों पर खूनी हमला।

23 जनवरी 1992। गणतंत्र दिवस से सिर्फ तीन दिन पहले।

पंजाब के फगवाड़ा में यात्रा की एक बस को निशाना बनाया। अंधाधुंध AK-47 से गोलियां बरसा दीं। कई निहत्थे स्वयंसेवक मौके पर शहीद हो गए। दर्जनों लहूलुहान। सड़कों पर खून बिखरा था।

आतंकियों का मैसेज साफ था – आगे एक भी कदम बढ़ाया तो सबको इसी तरह भून दिया जाएगा।

दिल्ली की कांग्रेसी सरकार को बहाना मिल गया। आतंकियों को खत्म करने की बजाय बीजेपी पर दबाव बनाया – “यात्रा रोक दो, वरना कोई जिंदा नहीं बचेगा।”

सोचिए उस रात का माहौल। आपके साथी गोलियों से मारे जा चुके हैं। लाशें सामने पड़ी हैं। सरकार कह रही है वापस लौट जाओ। और सामने कश्मीर की खूंखार वादी है जहां मौत मुंह बाए खड़ी है।

कोई आम नेता होता तो प्रेस कांफ्रेंस करके यात्रा रद्द कर देता। लेकिन इन लोगों को अंदाजा नहीं था कि ये किस मिट्टी के बने हैं।

याद रखें · इस हमले के बाद आगे बढ़ने का फैसला ही असली परीक्षा थी।

8. “फैसला 26 जनवरी को लाल चौक पर ही होगा”

मौत की आंखों में आंखें डालकर मोदी ने दहाड़ लगाई

फगवाड़ा के हमले के बाद जब यात्रा जम्मू पहुंची, माहौल बेहद तनावपूर्ण था।

लोगों को लग रहा था कि अब यात्रा आगे नहीं जाएगी। लेकिन जम्मू की एक विशाल जनसभा में 41 साल के युवा नेता ने माइक पकड़ा।

बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के, बिना टेलीप्रॉम्प्टर के, मोदी ने सीधे मौत की आंखों में आंखें डालकर भाषण दिया।

“भाइयों, आतंकवादियों ने लाल चौक पर पोस्टर लगाए हैं। उन्होंने लिखा है किसने अपनी मां का दूध पिया है जो लाल चौक पर आकर तिरंगा फहराए। मैं आज जम्मू की इस धरती से उन आतंकियों को कहना चाहता हूं – कान खोलकर सुन लो, फैसला 26 जनवरी को लाल चौक पर होगा कि किसने अपनी मां का दूध पिया है।”

ये सिनेमा का डायलॉग नहीं था। ये उस दौर में बोला गया था जब कश्मीर में आतंकियों के पास रॉकेट लॉन्चर और मशीनगनों की कोई कमी नहीं थी।

ये वो इंसान बोल रहा था जिसके साथियों को महज कुछ घंटे पहले गोलियों से छलनी कर दिया गया था।

आज अमेरिका के बोस्टन में बैठकर PR की डिग्री लेने वाले अभिजीत दिपके जैसे लोग जो मोदी को डरपोक कहते हैं, उन्हें ये इतिहास पढ़ना चाहिए।

जब आप बंदूकों के साये में खड़े होकर सरेआम आतंकियों को चुनौती देते हैं, तब पता चलता है असली शेर कौन है।

मोदी की उस एक दहाड़ ने यात्रा में जान फूंक दी। स्वयंसेवक कफन सिर पर बांधकर खड़े हो गए – अब चाहे जान चली जाए, लेकिन तिरंगा तो लाल चौक पर ही फहराया जाएगा।

सीधा सवाल · जो आदमी साथियों की मौत के बाद भी पीछे नहीं हटा, उसे डरपोक कहने वाले खुद कहां थे?

9. रॉकेट धमाकों को चीरते हुए लाल चौक की तरफ

26 जनवरी 1992। गणतंत्र दिवस की वो सुबह श्रीनगर के इतिहास की सबसे सर्द और खौफनाक सुबह थी।

पूरे श्रीनगर को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। सड़कों पर भयंकर कर्फ्यू। आम इंसान तो दूर, कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।

जिहादियों ने लाल चौक के आसपास ऊंची इमारतों पर स्नाइपर्स बिठा रखे थे। सड़कों पर बारूदी सुरंगें बिछी होने की रिपोर्ट्स थीं।

जम्मू से श्रीनगर का रास्ता इतना असुरक्षित हो चुका था कि आखिरी सफर के लिए मुरली मनोहर जोशी, नरेंद्र मोदी और कुछ चुनिंदा नेताओं को भारतीय वायुसेना के स्पेशल विमान से श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतारा गया।

वहां से बुलेटप्रूफ गाड़ियों के भारी सुरक्षा वाले काफिले में लाल चौक की तरफ ले जाया जाने लगा।

जैसे-जैसे काफिला करीब पहुंच रहा था, आतंकियों ने लाल चौक के पास कई रॉकेट दागे और बम धमाके किए। धमाकों की गूंज पूरे शहर को दहला रही थी। मकसद साफ था – ये लोग डर जाएं और वापस एयरपोर्ट भाग जाएं।

चारों तरफ सन्नाटा। छतों पर AK-47 लिए आतंकी। हर कदम पर मौत का खतरा। और बैकग्राउंड में बम फटने की आवाजें।

दिल्ली में बैठी कांग्रेसी सरकार टीवी के सामने सांसें रोके बैठी थी कि अभी खबर आएगी कि सब मारे गए।

लेकिन उन धमाकों का इन मुट्ठी भर राष्ट्रवादियों पर कोई असर नहीं हुआ। काफिला बिना रुके, बिना डरे, मौत के चक्रव्यूह को चीरता हुआ सीधा लाल चौक की तरफ बढ़ता रहा।

याद रखें · देश की इज्जत दांव पर थी। और ये लोग अपना कफन साथ लेकर चले थे।

10. बंदूकों के बीच लाल चौक पर तिरंगा लहराया

वंदे मातरम की गूंज से टूट गया आतंकियों का गुरूर

आखिरकार वो पल आ ही गया।

रॉकेट और बम धमाकों की गूंज को पीछे छोड़ते हुए डॉ. जोशी और नरेंद्र मोदी का काफिला लाल चौक के बीचोंबीच पहुंच गया। वहां का नजारा किसी हॉलीवुड वॉर-मूवी से कम नहीं था। लेकिन ये फिल्म नहीं, खौफनाक हकीकत थी।

गाड़ियों से उतरकर जब ये मुट्ठी भर लोग चौक पर पहुंचे, चारों तरफ मौत का सन्नाटा था और छतों से स्नाइपर्स की बंदूकें इनकी तरफ तनी हुई थीं।

जिहादी पूरी कोशिश में थे कि तिरंगा फहराने की प्रक्रिया रोक दी जाए। लेकिन राष्ट्रवादियों के कदमों में कोई झिझक नहीं थी।

नरेंद्र मोदी और डॉ. जोशी सीना तानकर उस पोल के पास पहुंचे जहां झंडा फहराया जाना था।

आतंकियों की बौखलाहट का आलम ये था कि पोल को भी नुकसान पहुंचाया गया था। लेकिन इन लोगों ने हार नहीं मानी।

अपनी जान की परवाह किए बिना, बंदूकों के साये में, उस ऐतिहासिक पोल पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज बांधा गया।

जैसे ही तिरंगा हवा में लहराया, लाल चौक का खौफनाक सन्नाटा “वंदे मातरम” और “भारत माता की जय” के गगनभेदी नारों से गूंज उठा।

उन 15-20 मिनटों के लिए कश्मीर का वो लाल चौक, जिसे आतंकियों ने अपनी बपौती समझ लिया था, पूरी तरह तिरंगे के रंग में रंग गया।

राष्ट्रगान गाया गया। हर शब्द के साथ आतंकियों के उस गुरूर के टुकड़े-टुकड़े हो गए जिसमें उन्होंने कहा था कि “जिसने मां का दूध पिया है वो आकर दिखाए।”

उस दिन पूरे पाकिस्तान और उनके पाले हुए जिहादियों को सीधा मैसेज मिल गया – कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और हमेशा रहेगा।

मुद्दा 1992 2026
लाल चौक मौत का सन्नाटा, छतों पर स्नाइपर्स रात 12 बजे भी पर्यटकों की भीड़
तिरंगा झंडा उठाना मतलब मौत को दावत हर घर तिरंगा अभियान के तहत शान से लहराता है
आतंक सरेआम कत्लेआम, हिट-लिस्ट छपती थी पत्थरबाजी जीरो, G20 की बैठकें
याद रखें · ध्वजारोहण सिर्फ यात्रा का लक्ष्य पूरा करना नहीं था। यह खुली चुनौती का सीधा जवाब था।

11. 1992 के तिरंगे से 2019 के 370 तक

मोदी ने अलगाववादियों का परमानेंट इलाज कर दिया

1992 में लाल चौक पर तिरंगा फहराना महज कुछ मिनटों का प्रतीकात्मक कदम नहीं था। वो ट्रेलर था। पूरी पिक्चर 2019 में रिलीज होनी बाकी थी।

दशकों तक दिल्ली के सत्ताधीशों ने कश्मीर को तुष्टिकरण और खौफ का चारागाह बनाकर रखा। पूरे देश के दिमाग में ये मुगालता भर दिया गया कि अनुच्छेद 370 एक ऐसी बारूदी सुरंग है जिसे छूने से पूरे हिंदुस्तान में आग लग जाएगी।

विपक्षी नेता छाती पीटते हुए कहते थे – “अगर 370 को हाथ लगाया तो कश्मीर में खून की नदियां बह जाएंगी।”

कुछ महबूबाओं और अब्दुल्लाओं ने खुलेआम धमकी दी – “अगर 370 हटा तो कश्मीर में भारत का तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं बचेगा।”

लेकिन ये लोग एक बात भूल गए थे। अब दिल्ली की गद्दी पर कोई कांपने वाली सरकार नहीं बैठी थी।

अब वो इंसान बैठा था जिसने 1992 में रॉकेट लॉन्चरों और AK-47 के बीच तिरंगा गाड़ा था।

5 अगस्त 2019 को जब 370 को उखाड़कर इतिहास के कूड़ेदान में फेंका गया, तो खून की नदियां तो छोड़िए, इन जिहादियों और अलगाववादियों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

आज 1992 के खौफनाक लाल चौक और 2026 के कश्मीर की तुलना करके देखिए। जमीन-आसमान का फर्क है।

जिस लाल चौक पर तिरंगा फहराने के लिए फौजी काफिलों और बुलेटप्रूफ जैकेट की जरूरत पड़ती थी, आज उसी जगह रात के 12 बजे भी आम कश्मीरी युवा तिरंगे के साथ सेल्फी ले रहा है।

कहां गए पत्थरबाज? कहां गया आतंकियों का खौफ? आज स्नाइपर्स की बंदूकें नहीं दिखतीं, टूरिस्टों का सैलाब दिखता है। कश्मीर को भारत से अलग रखने की वैचारिक दुकान पर मोदी ने हमेशा के लिए ताला जड़ दिया।

सीधा सच · कश्मीर में जो बदलाव हुआ, वो विपक्ष के लिए करारा तमाचा साबित हुआ।
विरोधियों का झूठ ऐतिहासिक हकीकत
“मोदी डरपोक है” असली शेर वो है जिसने 1992 में आतंकियों के बीच घुसकर झंडा फहराया
“हम असली क्रांतिकारी हैं” 1992 में जब देश की इज्जत दांव पर थी, ये बिलों में छिपे थे
“विपक्ष सुरक्षा को लेकर गंभीर है” कांग्रेस के सरेंडर ने ही राष्ट्रभक्तों को बीजेपी का वोटर बनाया
“370 हटाया तो कश्मीर जल जाएगा” 370 हटने के बाद कश्मीर नहीं, वामपंथियों की दुकान जली

12. कांग्रेस का सबसे बड़ा सेल्फ गोल

जिसने रातों-रात राष्ट्रवादियों को बीजेपी के साथ खड़ा कर दिया

जब मोदी ने लाल चौक पर तिरंगा फहराया, अगले दिन पूरे देश के अखबारों के फ्रंट पेज पर वो तस्वीरें छपीं। आम नागरिक, युवा, और सरहद पर खड़ा फौजी – सबने एक साफ अंतर देखा।

एक तरफ कांग्रेसी सरकार जो आतंकियों की धमकी से दिल्ली के सुरक्षित कमरों में दुबकी हुई थी। दूसरी तरफ बीजेपी जिसके नेता अपनी छाती पर गोलियां खाने को तैयार थे, सिर्फ इसलिए कि आतंकियों को ये गलतफहमी न हो कि हिंदुस्तान डर गया है।

यही वो ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट था। वो सबसे बड़ा सेल्फ-गोल था जिसने कांग्रेस के ताबूत में कील ठोक दी। विपक्ष ने खुद अपने हाथों से अपना पूरा राष्ट्रवादी वोटबैंक उठाकर बीजेपी की झोली में डाल दिया।

जनता को समझ आ गया कि जो पार्टी आतंकियों के डर से अपने ही देश में तिरंगा फहराने से भाग खड़ी होती है, वो देश की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा क्या खाक करेगी?

कांग्रेस की इसी कायरता ने रातों-रात बीजेपी को वो विशाल राष्ट्रवादी जनाधार सौंप दिया जिसकी बदौलत आज बीजेपी एक अजेय इमारत बनकर खड़ी है।

बीजेपी को कोई जादू नहीं आता। वो बस विपक्ष की ऐसी कायरताओं और तुष्टिकरण की नीतियों को जनता के सामने बेनकाब कर देती है।

1992 का इतिहास गवाह है कि डरपोक मोदी नहीं, वो विपक्ष है जो आज भी देश की सुरक्षा के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकता है।

आज 2026 में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हंसी आती है उन तिलचट्टों और अमेरिका से लौटे अभिजीत दिपके जैसे लोगों पर जो जंतर-मंतर पर माइक पकड़कर मोदी को डरपोक कहते हैं।

अरे भाई! जिस इंसान ने 1992 के खूंखार दौर में मौत की आंखों में आंखें डालकर आतंकियों को उनके गढ़ में ललकारा था, तुम उसे डरपोक कह रहे हो?

तुम्हारी कॉकरोच जनता पार्टी और तुम्हारे वामपंथी आकाओं का इतिहास क्या है? तुम वो लोग हो जो सर्जिकल स्ट्राइक पर अपनी ही सेना से सबूत मांगते हो।

तुम वो लोग हो जो पुलवामा और बालाकोट के समय आतंकियों के मानवाधिकार का रोना रोते हो।

जब-जब देश की अस्मिता पर संकट आया है, इस लिबरल विपक्ष ने हमेशा देश को कमजोर करने का ही काम किया है।

1992 में अगर कांग्रेस ने खुद लाल चौक पर झंडा फहराया होता, तो शायद आज राजनीति की तस्वीर कुछ और होती। लेकिन अहंकार, तुष्टिकरण और खौफ ने उन्हें ऐसा अंधा कर दिया कि उन्होंने खुद अपनी बर्बादी की पटकथा लिख डाली।

विपक्ष आज भी वही गलती कर रहा है। मोदी से नफरत करते-करते कब देश के स्वाभिमान और सुरक्षा से नफरत करने लगते हैं, इन्हें खुद पता नहीं चलता। और बीजेपी के रणनीतिकार बस इसी मौके का इंतजार करते हैं।

जो लोग आज मोदी को गालियां दे रहे हैं, उन्हें एक बार 1992 के लाल चौक की वो तस्वीरें जरूर देखनी चाहिए। शायद समझ आ जाए कि असली शेर कौन है और असली डरपोक कौन।

आखिरी बात · बीजेपी अजेय इसलिए नहीं है कि उसके पास कोई जादू है। बीजेपी इसलिए मजबूत है क्योंकि विपक्ष बार-बार खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता रहता है।
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